शुक्रवार, 9 जून 2017

ब्रिटेन में आम चुनाव के नतीजे: व्यवस्था के विकल्प की उम्मीदों के लिए शुभ संकेत- अक्षत

ब्रिटेन में आम चुनाव के परिणाम कॉर्पोरेट मीडिया घरानों और सर्वेक्षण एजेंसियों के लिए झटका हैं जिन्होंने इस बार प्रधानमंत्री थेरेसा मे और उनकी कंजरवेटिव पार्टी को जिताने के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र के बुनियादी मानकों को भी ताक पर रख दिया था। ज्ञात हो कि यह चुनाव प्रधानमंत्री मे ने यूरोपीय संघ से पिछले वर्ष ब्रिटेन के निकल जाने के जनमत संग्रह के बाद पिछली कंज़र्वेटिव सरकार के कार्यकाल के बीच ,में ही रखवा दिए थे। पर लगता है मतदाताओं को उनकी यूरोपीय संघ से अलगाव की शर्तों पर वार्ता के लिए एक 'मज़बूत ' और 'स्थिर' नेतृत्व की अपील ज़्यादा भायी नहीं। सभी सर्वेक्षणों में थेरेसा में व कंज़र्वेटिव पार्टी को पिछली बार से ज़्यादा सीट और विपक्षीय लेबर पार्टी के आज की तमाम आर्थिक व अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर सुलझी हुई राय रखने वाले नेता जेरेमी कोर्बिन के लिए ज़बरदस्त हार और अस्तित्व की लड़ाई का डंका पीटा गया। अब तक आये नतीजों में सत्तापक्ष को सबसे ज़्यादा लेकिन पिछली बार से कहीं कम सीट मिली हैं , और नवउदारवाद और जनविरोधी नीतियों के समाज के निछले तबकों पर पड़ने वाले असर पर खुलकर बोलने वाले जेरेमी कोर्बिन की पार्टी ने अपेक्षा से ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है।
पिछले तीस वर्ष से पूंजीवादी सब्बसे भयानक स्वरुप नवउदारवाद की आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक जकड का कोई उत्तर नज़र नहीं आ रहा था। ब्रिटेन जैसे देशों में अस्पतालों, स्कूल व सार्वजनिक सेवाओं में फण्ड कटौती व निजीकरण से समाज में लोगों के भीख मांगने और सरकारी दया पर ज़िंदा रहने की नौबत आ गयी थी। सोवियत रूस के टूटने और यूरोपीय संघ के फैलने के साथ बड़ी कंपनियों ने मुनाफे के लिए पूर्वी यूरोप के सस्ते पड़ने वाले मज़दूर भरभर कर ब्रिटेन लाये। इधर मध्य पूर्व में अमेरिका की दखलंदाज़ी का पिछलग्गू बनकर अपने पूर्व साम्राज्यवादी स्वरुप के लौट आने के मुगालते में रहने वाले ब्रिटेन की सरकारों ने न सिर्फ एक बड़ा शरणार्थी संकट खड़ा किया बल्कि कट्टरपंथ के लिए रास्ते खोले और आतंरिक सुरक्षा पर भी ख़तरा मोल लिया। इन तीस सालों में यूरोप और अमेरिका के विकसित देशों में राजनैतिक पार्टियों में अंतर ख़त्म हो चला- सब एक सी आर्थिक नीतियां, मध्यवर्गीय अधिनायकवाद और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध को छितरा देने और उन्हें निराशाओं के जंजाल में अकेला घुटता छोड़ देने का पर्याय बन गयीं। खुद को सोशल डेमोक्रेटिक कहने वाली सेण्टर-लेफ्ट पार्टियों में 'लैफ्ट के नाम पर जनविरोधी आर्थिक नीतिओं पर थोथे अस्मितावाद और 'सामाजिक न्याय' की लफ़्फ़ाज़ी का कलफ चढ़ा दिया गया। ब्रिटैन में कभी ट्रेड यूनियन संघर्षों का पर्याय मानी जाने वाली लेबर पार्टी नब्बे के दशक में टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में 'न्यू लेबर' में बदल गयी जहाँ बात-बात पर दुसरे देशों पर बम गिराना और अस्थिरता पैदा करना विदेश नीति का पर्याय बन गया और आर्थिक नीतियों में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को ज़बरदस्त छूट दी गयी। सन 2008 में स्टॉक मार्किट और हवा-हवाई विकास दर पर आधारित र्नीतियों का बुलबुला लालची शेयर दलाल और कंपनियों के लालच की अति से फुस्स हो गया। सरकारों ने घाटे में जा रहीं कंपनियों को बचाने के लिए रही-सही सामाजिक सुरक्षा में और ज़्यादा कटौती शुरू की, जिसका प्रभाव हताश निम्न-वर्ग में रोष उतपन्न करने वाला था। अमेरिका में इस रोष का फायदा रिपब्लिकन पार्टी के धूर दक्षिणपंथ ने डोनाल्ड ट्रम्प की जीत से उठाया। ब्रिटेन में शुरू में कोई वाम विकल्प न होने से पलड़ा नस्लभेदी समझ रखने वाली यूके इंडिपेंडेंस पार्टी की और मुड़ा। फिर 2015 का चुनाव आया और टोनी ब्लेयर की दोगली नीतियों ने लेबर पार्टी का आधार और खिसका दिया। अस्तित्व को जूझ रही पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए फिर चुनाव हुए। पार्टी के मूल में उभर रहे असंतोष को शांत करने के लिए एक सतही कदम के रूप में अब तक पार्टी के हाशिये पर रहे लेबर सोशलिस्ट धड़े के एक नेता को 'चुनाव को ज़्यादा लोकतान्त्रिक' बनाने के नाम पर खड़ा करवा दिया गया। पार्टी नेतृत्व का दांव उनपर तब उलटा पड़ गया जब बहसों और प्रचार के दौरान जेरेमी कोर्बिन अब तक हताश ट्रेड यूनियन, युवाओं और प्रगतिशील तबके के लिए विकल्प बनकर उभरे। तीस से ज़्यादा सालों से ट्रेड यूनियन संगठनकर्ता, पार्टी की सरकार में रहते हुए आर्थिक नीतियों और इराक युद्ध से लेकर परमाणु हथियारों का जमकर विरोध करने वाले कोर्बिन अपने प्रतिद्वंदियों पर भारी पड़े। लेबर पार्टी के ब्लेयरवादी धड़े में हड़कंप मच गया और तत्कालीन कंज़र्वेटिव प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 'लेबर पार्टी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है'. सन 2016 में यूरोपीय संघ में रहने का जनमत संग्रह कैमरन के लिए वॉटरलू साबित हुआ जब वे कॉर्पोरेट के फायदे के लिए लायी गयी नीतियों से श्रमिक वर्ग में उभरे असंतोष का अंदाज़ा लगाने में नाकाम रहे। उनके इस्तीफे के बाद थेरेसा में ने खुद को मार्गरेट थैचर की तर्ज पर सशक्त नेत्री के रूप में पेश किया। इधर ब्लेयरवादी धड़े ने कोर्बिन को निकलवाने के लिए पार्टी सांसदों का अविश्वास प्रस्ताव पारित करवाया और दोबारा नेतृत्व के लिए चुनाव हुए। पर अब लेबर पार्टी की सदस्य्ता में न सिर्फ तीव्र संख्यात्मक वृद्धि हुयी बल्कि गुणात्मक बदलाव आया। पढ़ाई में क़र्ज़ और नौकरियों में कटौती से हताश अब तक के अराजनैतिक युवा वर्ग ने कोर्बिन के लिए व्यापक समर्थन जुटाया। कोर्बिन फिर जीते और ब्लेयरवादियों का मुंह बंद हो गया। जैसे-जैसे कोर्बिन ने रोज़गार, शिक्षा, स्वस्थ्य, सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण वगैरह का सवाल उठाया और सीधे तौर पर उच्च वर्ग को निशाने पर लेते हुए उनके टैक्स में कटौती की जगह बढ़ौतरी की बात की, उनपर भीतरी और बाहरी हमले तेज़ हो गए। सनसनी जुटाने के लिए सेलिब्रिटी सितारों के घर के बाहर पहुँचने, उनके फोन हैक करने और ब्लैकमेल के लिए कुख्यात ब्रिटैन की टेबलायड प्रेस ने इसका बीड़ा उठाया। कोर्बिन को व्यक्तिगत रूप से निशाने पर लेकर उनकी छवि धूमिल किये जाने के प्रयास होने लगे। इराक युद्ध और दखलंदाज़ी की विदेशी नीति का उनका विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया जाने लगा। उनकी आर्थिक नीतियों को 'कोरी कल्पना' बोला जाने लगा। यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाये गए और उन्हें फिलिस्तीन और आयरलैंड में शांति बहाली का समर्थन करने के लिए आतंकवादियों के समर्थक का लेबल भी चस्पा कर दिया गया।
मज़ेदार बात यह है कि कोर्बिन का अजेंडा आर्थिक रूप से पिछली सदी के छठे दशक की वेलफेयर स्टेट नीति को जीवंत करना है, न कि आर्थिक संबंधों में मूल परिवर्तन करके पूंजीवाद ख़त्म करना। पर कॉर्पोरेट कंपनियों की मुनाफे की हवस इतनी बढ़ गयी है कि मोटे तौर पर आर्थिक दक्षिणपंथ और बाज़ारवादी तर्क समाज और राजनीती का कॉमन सेंस बना दिया गया है। इससे उपजे असंतोष, बेकारी, युद्ध और कट्टरपंथ पर ज़रा सुलझी बात करने वाला व्यक्ति अब 'हार्ड लैफ्ट या 'धुर वामपंती हो जाता है। ब्रिटिश प्रेस ने इस जुमले का इस्तेमाल कर लोगों के पूर्वाग्रहों को भड़काने की पूरी कोशिश की।
चुनाव घोषित होने पर जहाँ कोर्बिन ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वस्थ्य, पेंशन बढ़ौतरी और रेल के दोबारा राष्ट्रीयकरण का प्रश्न उठाया, थेरेसा मे और उनके पिछलग्गू मीडिया ने इसे व्यक्ति-केंद्रित कर दिया। इधर ब्लेयरवादी लॉबी ने खुलेआम यह प्रचार शुरू किया कि कोर्बिन तो चुनाव जीत नहीं सकते, अतः उनकी 'अतीवादी' छवि से परेशान लेबर समर्थकों को ज़्यादा व्यवहारिक और माध्यममार्गीय सांसदों को चुन लेना चाहिए। चुनाव घोषणा की शुरुआत में सर्वेक्षण कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए प्रचंड बहुमत और लेबर के लिए भारी नुक्सान दर्शाते रहे। पर समय के साथ सत्तापक्ष की बढ़त घटने लगी। प्रधानमंत्री में ने पूरा चुनाव यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को लेकर होने वाले समझौते के लिए एक सशक्त छवि के ऊपर लड़ा। उन्होंने टेलीविज़न डिबेट भी हिस्सा नहीं लिया। वहीँ उनके लापरवाही से तैयार घोषणापत्र में वृद्धों को अपनी पेंशन के बदले ज़्यादा टैक्स देने की बात लीक हो गयी जिससे प्रधानमंत्री को बीच चुनाव पीछे हटना पड़ा। इधर लेबर के मैनिफेस्टो ने युवाओं और समाज के निम्न वर्ग में ज़बरदस्त उत्साह पैदा किया।
इसी बीच ब्रिटैन के अंदर एक बाद एक मेनचेस्टर और लंदन में दो आतंकी घटनाएं घटीं। पूरा विमर्श राष्ट्रीय सुरक्षा पर आ गया और मध्य पूर्व में आक्रामकता का विरोध करने का सुलझा पक्ष लेने वाले कोर्बिन मीडिया में देश के लिए खतरे का पर्याय बना दिए गए। इधर कंज़र्वेटिव पार्टी को नस्लभेदी यूकेआईपी का वोट स्थानांतरित होने लगा और इनके कैंप में प्रवासी विरोधी पक्ष का असर बढ़ने लगा। थेरेसा में ने ब्रिटिश भारतीय समुदाय को लेबर से तोड़कर रिझाने के लिए कोई कसर न छोड़ी। जेरेमी कोर्बिन का गुजरात दंगों पर मोदी का विरोध और उनकी आर्थिक नीतियां अभिजात्य व प्रतिक्रियावादी प्रवासी भारतीय हलकों में वैसे उल्लास नहीं जगा रहीं थीं। थेरेसा में ने बड़ी चालाकी से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेला। कोर्बिन ने थेरेसा में के गृहमंत्री रहते पुलिस संख्या में की गयी भारी कटौती का बुनियादी सवाल उठाया, हालाँकि मुस्लिम आबादी की भावनाओं को ध्यान में रखकर ब्रिटैन के सऊदी अरब जैसे देशों से रिश्ते और कट्टरपंथी मदरसों की उसकी फंडिंग पर ज़्यादा खुलके न बोला। थेरेसा में ने चुनाव का अंत आतेआते अपना आधार खिसकता देखकर नस्लभेदी भावनाओं को भड़काने के लिए मानवाधिकार क़ानूनों को फाड़कर फेंक देने और संदेह के आधार पर हिरासत में लिए जा सकने जैसे काले क़ानून बनाने का वायदा किया। मीडिया में अंत तक इस बात पर जनता को बेवकूफ बनाया जाता रहा कि जहाँ कोर्बिन के लिए युवाओं का ज़बरदस्त समर्थन है, युवा वोट करने नहीं आते।
चुनाव में इन सभी झूठों की पोल खुल गयी है। कंज़र्वेटिव पार्टी और मीडिया की मुंगेरीलाली आकांक्षाओं पर पानी डालते हुए युवाओं ने इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। कोर्बिन का मुफ्त यूनिवर्सिटी शिक्षा का वायदा इनके लिए उम्मीद की किरण है। ध्यान रहे कि न सिर्फ कोर्बिन कॉर्पोरेट दुष्प्रचार, व्यक्तिवादी तुलनाओं और पूर्वाग्रहों से लड़ रहे थे, बल्कि ब्लेयराइट लॉबी ने पार्टी की एकता तोड़ने और अंदरूनी साज़िश में कोई कसर न छोड़ी। उसके बावजूद लेबर के वोट और सीट में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। प्रतिकूल हालातों में यह बड़ी उपलब्धी है। सबसे ज़्यादा यह लेबर के विरोधियों को एक जवाब है कि कोर्बिन के नेतृत्व में पार्टी कभी चुनी नहीं जा सकती। कहाँ बहुमत बढ़ाने का लक्ष्य और कहाँ ब्रेक्सिट पर वार्ता से ठीक पहले त्रिशंकु संसद। बेशर्म मीडिया और बिके हुए विश्लेषक बड़ी बेशर्मी से अपने झूठ को छिपाकर स्क्रीन पर मुस्कुरा रहे हों पर भीतर हलचल है। निर्मम शोषण पर आधारित सामान्य दिन अब दूर की कौड़ी हैं। शायद थेरेसा में का इस्तीफा हो और छोटे दलों के समर्थन से एक अनिश्चित कंज़र्वेटिव सरकार बने।
इस नतीजे के भारत के लिए क्या मायने हैं? ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है। पुराने दिनों जैसी न सही, अभी भी उसकी एक अंतर्राष्ट्रीय साख है। वहां के प्रमुख विपक्ष में प्रगतिशील तबके का मज़बूत होना भारत में लोकतंत्र की लड़ाई में कुछ सहायता पहुंचा सकता है। कोर्बिन ने मोदी के गुजरात के नरसंहार की भूमिका पर ब्रिटिश संसद में कई निंदा प्रस्ताव लाये हैं। यहाँ साम्प्रदायिकता के खतरे से निबटने के तरीकों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मदद मिलना निश्चित तौर पर शुभ होगा। ज्ञातब्य रहे कि थेरेसा में ने इस बार ब्रिटिश भारतीय समुदाय को रिझाने के लिए हिंदी में अटपटे प्रमोशनल वीडियो बनवाने से लेकर मंदिर दर्शन तक हिंदुत्व और उच्च जातीय/वर्गीय चेतना को खूब सहलाया है। इधर कोर्बिन ने ब्रिटैन में जाति के आधार पर भेदभाव पर अंकुश लगाने के पक्ष में स्टैंड लिया है।
वे मध्य सीरिया और लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप और शरणार्थी संकट के विरुद्ध खड़े हुए हैं। पर्यावरण और प्रवासी श्रमिकों के हक़ पर भी उनकी आवाज़ बुलंद रही है।
मुझे कोर्बिन के उभार का सबसे सकारात्मक पक्ष दुनियाभर में दमनकारी आर्थिक नीतियों और साम्प्रदायिकता/कटटरपंथ के ज़हर से लड़ रहे लोगों के लिए एक रोशनी की किरण का आना लगता है। अब तक पूरी दुनिया में विभिन्न तरह के शोषण-आत्याचारों का विरोध भी दक्षिणपंथ ने हाईजैक कर रखा था। अमेरिकी साम्राज्यवाद का इस्लामिक जिहाद व ट्रम्प की जीत इसके उदाहरण हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के सपने बेचने वाली व्यवस्था जिस बर्बरता का डर दिखाकर विपक्ष समेट रही थी, उसके विकल्प में एक रेडिकल प्रगतीशील विकल्प उभरकर आने लगा है।
यह सवाल कि क्या कोर्बिन वाम विपक्ष कहलाने के लायक हैं इस बात पर निर्भर करता है कि सिर्फ कुछ प्रतीकों तक सिमटना ही वाम है या सही समय पर सुलझे ढंग से सही बात कहना। कोर्बिन न तो माओ, लेनिन या स्टालिन का नाम जपते हैं न पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने की बात करते हैं। उनकी पार्टी और उनका खुद का रुझान भी क्लासिकीय मार्क्सवादी दायरे में सोशल डेमोक्रेटिक ही होगा। पर क्या उन्होंने अब तक कोई ग़लत बात की है? मुझे कोर्बिन हमेशा वंचितों के पक्ष में खड़े बोलने वाले प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने वाले और नक़्क़ाली और ट्रम्प जैसे वाहियातपने के बरक्स एक मनुष्य लगते हैं। एक ऐसा मनुष्य जिसने अपने पूरे कैंपेन में व्यक्तिगत स्तर पर हमलों को नज़रअंदाज़ कर बड़े धैर्य से समाज के बीच की गैर-बराबरी पर अपनी बातें दुहरायी हैं। वाम उम्मीद की राजनीति होनी चाहिए और कोर्बिन निश्चित रूप से वह लेकर आये हैं।

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