गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

ब्रह्मराक्षस : ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी की तलाश

  • अशोक कुमार पाण्डेय


मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़ते हुए लगातार यह लगता है जैसे सिर्फ़ दो कविताओं को लिखने या पूरा करने के लिए वह लगातार लिख रहे थे – अँधेरे में’ और ब्रह्मराक्षस।’ यह अनायास नहीं है कि दोनों के बिम्ब और दृश्य उनकी दूसरी तमाम कविताओं में मिल जाते हैं। गहरी रहस्यमयी बावड़ी और खुली सार्वजनिक सड़क के दो पाटों के बीच जूझते मुक्तिबोध लोगों को दुरूह और अबूझ से लेकर अस्तित्वादी और इन दिनों अचानक आध्यात्मिक भी लगने लगे हैं। लम्बी कविता और लगभग फैंटसी का जो शिल्प उन्होंने अपनाया वह उनमें कुछ भी देख लेने की एक सुविधा तो देता ही है, अँधेरे के जुलूसों में शामिल लोगों के लिए थोड़ी देर बावड़ी में छुप कर प्रलाप कर लेने का भी अवसर प्रदान करता है। एक ऐसे समय में जब डोमाजी जुलूस के पीछे नहीं आगे है तो मुक्तिबोध के ऐसे कुपाठ साहित्यिक से आगे राजनीतिक बयान में तब्दील हो जाते हैं इसलिए आज उन कविताओं में दुबारा धँसने और उनके वैचारिक स्रोत तलाशने का काम भी कोई शुद्ध साहित्यिक कर्म नहीं हो सकता। इस लेख में भी मेरी कोशिश ‘ब्रह्मराक्षस’ के बहाने मुक्तिबोध के कवि कर्म के एक सक्षिप्त  सामाजिक-राजनैतिक अध्ययन की ही है।



ग्राम्शी : विचारधारा, वर्चस्व और ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी
 
मार्क्सवाद में हेजिमनी या वर्चस्व कोई नया पद नहीं था लेकिन इसका उपयोग ग्राम्शी से पहले राजनैतिक वर्चस्व के लिए ही किया जाता था और आर्थिक सवालों को मूलभूत प्रश्न माना जाता था। विचारधारा को सुपरस्ट्रकचर का हिस्सा माने जाने की मान्यता के चलते यह माना जाता था कि आर्थिक मूलाधार में परिवर्तन के साथ अपने आप बौद्धिक वर्चस्व का प्रश्न हल हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कामगार वर्ग के राजनीतिक नेतृत्व का रेखांकन हुआ था लेकिन ग्राम्शी ने इसे आगे बढ़ाते हुए नैतिक तथा बौद्धिक नेतृत्व तथा वर्गों के बीच ग़ैर आर्थिक सम्बन्धों के महत्त्व का रेखांकन किया। उनके अनुसार विचारधारा आर्थिक सुपरस्ट्रक्चर के बदलाव से अपने आप बदल जाने वाली कोई उपोत्पाद नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहारों, सिद्धांतों और रूढ़ियों में विन्यस्त ऐसा कारक है जो समाज में व्यक्तियों को पराश्रितों तथा सामाजिक अभिकर्ताओं में तब्दील कर देती है। यही सामाजिक अभिकर्ता उत्पादन कार्यों में भी अपनी भूमिका निभाते हैं और इस तरह आर्थिक तथा राजनैतिक संघर्ष के साथ विचाधारात्मक संघर्ष भी वर्ग संघर्ष का अहम हिस्सा बन जाता है। इस स्थापना से ग्राम्शी उस ‘सिविल सोसायटी’ को वर्ग संघर्ष के दायरे में ले आते हैं जो समाज में जनमत निर्माण में अहम भूमिका निभाती है। इस सिविल सोसायटी को लेकर ग्राम्शी की प्रस्थापना बेहद महत्त्वपूर्ण है। उनका मानना है कि विचारधारात्मक धरातल पर यानी कि सिविल सोसायटी में विचारधारात्मक आधार पर एक तरह का पुल निर्मित हो सकता है यानी ज़रूरी नहीं कि विचारधारात्मक तत्व एक ही वर्ग से सम्बन्धित हों।  विचारधारात्मक निकाय अपने विचारधारात्मक निष्कर्षों से परिभाषित होते हैं  और ये निष्कर्ष विचारधारात्मक तत्त्वों से। इस तरह वर्चस्व के लिए संघर्षरत विभिन्न वर्गों के भिन्न विचारधारात्मक विमर्शों में तत्व रूपायित होते हैं।



ग्राम्शी के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष था ‘ऑर्गेनिक विचारधारा’ का। विचारधारा वर्गीय शासन के निकाय यानी वर्चस्व के संदर्भ में ही परिभाषित होती है जिसमें एक एकीकृत व्यवस्था में सभी विचारधारात्मक तत्त्व व्यवस्थित होते हैं। यह जटिल व्यवस्था ही ‘ऑर्गेनिक विचारधारा’ है – एक वर्ग द्वारा अधिकृत राज्य व्यवस्था तथा तत्जनित सामाजिक वर्चस्व के भीतर एक समाज के सामुदायिक जीवन की अभिव्यक्ति। इस ऑर्गेनिक विचारधारा की व्याप्ति पूरे सिविल समाज में इसकी विभिन्न संस्थाओं और संरचनाओं जैसे, परिवार, धार्मिक संस्थाएं, मीडिया, शिक्षण संस्थान, विधि व्ययस्था, ट्रेड यूनियन आदि में होती है। यह व्याप्ति वर्चस्वशाली वर्ग के सामाजिक अभिकर्ताओं के माध्यम से होती है जिन्हें ग्राम्शी ‘ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी’ कहते हैं यानी लेखक, पत्रकार, शिक्षक, वक़ील, नेता, उद्योगपति, इंजीनियर आदि आदि। 

गौर से देखिये तो ‘अँधेरे में’ के जुलूस में चलते लोग इसी सिविल समाज के हिस्से हैं, रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध। इस पर आगे हम और विस्तार से बात करेंगे

कहना न होगा कि वर्चस्वशाली वर्ग के साथ साथ वर्चस्व के संघर्ष के संघर्ष में रत वर्ग के भी अपने ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी होते हैं। बहुत विस्तार में न जाते हुए यहाँ इतना बता देना काफी होगा कि ग्राम्शी वर्चस्व को दो तरह से परिभाषित करते हैं, पहला यह कि वर्चस्वशाली वर्ग उन वर्गों और समूहों के हितों को ध्यान में रखता है जिन पर उसका वर्चस्व है और इस प्रक्रिया में अपने अधीनस्थ वर्ग के साथ एक तरह का संतुलन बनाने के लिए वह अपने हितों के साथ कुछ समायोजन भी करता है तो दूसरे यह वर्चस्व नैतिक-राजनैतिक नेतृत्व के साथ आर्थिक वर्चस्व भी स्थापित करता है। यानी एक वर्ग के वर्चस्व में आर्थिक, राजनैतिक, नैतिक और बौद्धिक वर्चस्व शामिल है, इस प्रक्रिया में अपने कुछ निगमित हितों का बलिदान वस्तुतः एक ऐसा संतुलन बनाये रखने के लिए किया जाता है जो सर्वसहमति स्थापित कर अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को बनाए रखने में सहायक हो। इस तरह ‘सत्ता’ दो रूपों में अभिव्यक्त होती है, बलपूर्वक नियंत्रण और सर्वसहमति। ये दोप्रविधियाँ शासक और शासित के बीच एक संतुलन की स्थापना करती हैं। जबकि राज्य के नौकरशाही, पुलिस, सेना और दूसरे तंत्र बलपूर्वक नियन्त्रण में काम आते हैं सिविल सोसायटी और उसके सामाजिक अभिकर्ता यानी ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी वर्चस्वशाली वर्ग की विश्वदृष्टि को सर्वमान्य बनाकर सर्वसहमति की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं अर्थात वे विचारधारात्मक संघर्ष में विरोधी वर्ग की विश्व दृष्टि या विचारधारा के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर अपने वर्ग के विचारों को अपने अपने तरीक़े से जनसामान्य में प्रतिष्ठित करते हैं। इस प्रस्थापना से ग्राम्शी अपने महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कामगार वर्ग को राज्यसत्ता हासिल करने से पहले सत्ताधारी वर्ग के बरक्स राजनैतिक, सांस्कृतिक और नैतिक क्षेत्रों में नेतृत्व हासिल करना होगा।

यहाँ ग्राम्शी के विस्तृत विवरणों को छोड़ते हुए हम ‘ब्रह्मराक्षस’ की तरफ़ लौटते हैं।   

ऐसी ट्रेजेडी है नीच  : ब्रह्मराक्षस और उनका सजल उर शिष्य

कुबेरनाथ राय ‘ब्रह्मराक्षस’ को मुक्तिबोध की इकलौती शुद्ध अर्थ में फंतासी कहते हैं। इस लेख की विषयवस्तु को देखते हुए यह बहस विषयांतर होगी कि यह कविता क्या वाकई में कोई फंतासी रचती है! लेकिन इस पर बात शुरू करने से पहले यह कह देना प्रासंगिक होगा कि अपने पाठ में यह कविता ‘अँधेरे में’ या ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ और ‘भूल ग़लती’ की तुलना में न केवल छोटी है बल्कि अपने कथ्य और शिल्प में अधिक सहज और स्पष्ट है और एक निष्कर्षात्मक अंत तक पहुँचती है। यह उनकी इकलौती कविता है जिसके साथ उन्होंने इसी शीर्षक की कहानी लिखी। दोनों का प्रकाशन का समय एक ही है (1957) इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि कविता को समझाने के लिए कहानी लिखी गई या फिर कहानी की असंतुष्टि से कविता जन्मी। लेकिन इन्हें बार-बार पढ़ते हुए मुझे लगता है कहानी अपने रचाव और कथ्य दोनों ही में बेहद साधारण है जबकि कविता बेहद संश्लिष्ट। जैसे कहानी लिखने के बाद अनभिव्यक्त की बेचैनी ने उनसे यह कविता लिखवाई है।  कहानी का ब्रह्मराक्षस अपना अलौकिक होना प्रदर्शित करता है अंत में जबकि कविता में ‘वह कोठरी में किस तरह/अपना गणित करता रहा/औ’ मर गया।..इसके बाद का सवाल ‘यह क्यों हुआ! क्यों यह हुआ!!’ कविता का केन्द्रीय सवाल है. यह वह सवाल नहीं जिसके इर्द गिर्द कविता का वितान रचा जाता है बल्कि यह वह सवाल है जिसका जवाब ढूँढने का निश्चय कविता का वाचक ब्रह्मराक्षस का शिष्य है और इस तरह कविता की परिधि पर दिखने वाला सवाल उसके केंद्र में स्थापित हो जाता है।

गौर से देखें अगर तो यह सवाल अपने मूल में क्या है? उस ‘क्यों’ का जवाब किस विमर्श में अवस्थित है जिसे मुक्तिबोध लगातार दो बार पूछते हैं बढ़ते हुए विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ। यह विमर्श है समाज में बुद्धिजीवी की भूमिका की तलाश। मैं नहीं जानता कि 1946 में प्रकाशित हो पाई ग्राम्शी की जेल नोटबुक मुक्तिबोध पढ़ पाए थे या नहीं, हालाँकि इस बात की संभावना भी कम ही है और उनके लेखन में भी ग्राम्शी का कहीं कोई ज़िक्र नहीं आता लेकिन यह बिलकुल अस्वाभाविक नहीं है कि दुनिया के दो कोनों पर एक राजनैतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी तथा एक जनपक्षधर कवि नए बनते बिगड़ते समाजों में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका को लेकर एक जैसी गंभीर चिंताओं और सवालों से जूझ रहे थे। जैसा कि मैंने पहले भी इंगित किया है अपनी बेहद महत्त्वपूर्ण कविता ‘अँधेरे में’ कवि अपनी अपूर्ण अभिव्यक्ति की घायल प्रतिमूर्ति के साथ प्रोसेशन में जिस मृत्यु दल की सी शोभायात्रा को देखता है उसमें प्रत्यक्ष शासन के सैन्य अधिकारी, मंत्री, उद्योगपति ही नहीं बल्कि ग्राम्शी जिसे सिविल समाज के ऑर्गेनिक निकाय कहते हैं उसके हिस्से लेखक, कवि, आलोचक, विचारक, चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक, चिकित्सक, पत्रकार सब शामिल हैं। वह इन्हें ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध’ कहते हैं। रक्तपायी वर्ग, यानी समाज, संस्कृति और राजनैतिक सत्ता पर काबिज़ वर्चस्वशाली वर्ग। वे इस वर्चस्व अपने सामाजिक-सांस्कृतिक निगमनों से जनता के लिए स्वीकार्य और सह्य बनाने की अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रहे हैं। इसी कविता में मुक्तिबोध और स्पष्ट करते हुए कहते हैं – ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास।’  ज़ाहिर है पूँजीवादी वर्ग के वर्चस्व में वह इन ‘ऑर्गेनिक बुद्धिजीवियों’ की सहकारी भूमिका को बहुत स्पष्ट लक्षित कर पा रहे हैं और इसके समक्ष वह अपनी आत्म-सम्भवा ‘परम अभिव्यक्ति अनिवार’ की तलाश में हैं। यहाँ वह परम अभिव्यक्ति उनकी गुरु है। यह परम अभिव्यक्ति ‘अनखोजी निज समृद्धि का परम उत्कर्ष’ है। और इस निजी समृद्धि की राह उस बदले हुए समय के स्वप्न में है जिसमें प्रतिकार के उजले दृश्य हैं, जिसमें कहीं आग लग गई है कहीं गोली चल गई है और इस निश्चय के साथ कि ‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता’ मुक्ति का मन और जन आंदोलित हैं। चंद्रकांत देवताले के शब्दों में यहाँ ‘फैंटेसी और बाह्य अनुभव जगत के मध्य छलाँगे’ लगती रहती हैं जबकि ब्रह्मराक्षस में सब कुछ फैंटेसी के भीतर घटित होता है। क्या सच में? इस सवाल पर आने से पहले ज़रा देखें की फैंटेसी किसे कहा जा रहा है? उस प्रोसेशन को या अपनी अनिवार अभिव्यक्ति के साक्षात्कार को या फिर प्रतिरोध के उस स्वप्न दृश्य को? फैंटेसी यानी एक अवास्तविक और आधारहीन स्वप्न, अपनी सुविधा या दुविधा से चुनी हुई एक ऐसी दुनिया जिसका अस्तित्व न हो, जो अनिवार नहीं दुर्निवार हो। क्या अँधेरे में का कोई भी स्वप्न या दृश्य अपने अभिधार्थ में इस तरह की फंतासी रचता है? क्या ब्रह्मराक्षस का प्रतीक उस फैंटेसी के पात्र में अविश्वसनीयता की हद तक जाता है? मुक्तिबोध ख़ुद अपनी कविताओं के शिल्प को फंतासी कहते थे, लेकिन क्या किसी कवि की कविताओं के पाठ के लिए हम उसके ही मानकों और पर्यवेक्षणों पर निर्भर होंगे? ऐसा करते हुए हम न्यूनाधिक डॉ रामविलास शर्मा की उस मनोविश्लेषक पद्धति के समीप ही पहुँचेंगे जिसमें मुक्तिबोध के भीतर ब्रह्मराक्षस के स्रोत तलाशते हुए वह उनके बचपन में पहुँचते हैं और अंततः उनमें व्यक्तिवाद ढूँढ कर अस्तित्ववाद का लेबल चिपका देते हैं। कभी किसी अन्य लेख पर उस पर विस्तार से बात होगी लेकिन अभी इतना कि यह समझ अपने आप में दिक्कततलब है कि वाह्य संघर्ष ‘मार्क्सवादी’ हैं और ‘आतंरिक संघर्ष’ ग़ैर मार्क्सवादी। असल सवाल यह है कि इन संघर्षों का उद्देश्य क्या है और इसमें कवि की पक्षधरता किस ओर है। यानी ग्राम्शी की शब्दावली उपयोग करूँ तो वह किस वर्ग का सामाजिक अभिकर्ता या ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी है।


‘ब्रह्मराक्षस’ वर्चस्वशाली वर्ग का हिस्सा नहीं है। आप देखिये कि कहानी में तमाम प्रसिद्ध गुरुओं के बीच वह अलक्षित और उपेक्षित है तो कविता में ज्ञान के लिए भटकते ब्रह्मराक्षस को योग्य गुरु न मिलने के कारण हैं कि बदले हुए युग में ‘धन-अभिभूत अंतःकरण’ से युक्त ‘कीर्ति व्यवसायी’ उपस्थित हैं। ज़ाहिर है वह धन-अभिभूत नहीं है। वह ज्ञान का शोधक है, सत्य का निःस्वार्थ शोधक। यह साधना वह अपने स्तर पर करता है। दुनिया भर का ज्ञान हासिल करता है। देखना रोचक है कि ‘सुमेरी-बैबिलोनी जन कथाओं से मधुर वैदिक ऋचाओं तक’ यानी विश्व के इतिहास के ज्ञान से वह मार्क्स, एंगेल्स, बर्ट्रेंड रसेल, टाएनबी, हिडेगर, स्पेंगलर, सार्त्र और गाँधी तक पहुँचा है। यानी मनुष्य की मुक्ति के सभी आख्यानों का अध्ययन किया है उसने। यह चुनाव यों ही नहीं है। बहुत स्पष्ट है कि उसकी दिशा मनुष्य की मुक्ति की दिशा है। लेकिन अगर मुक्तिबोध के ही एक बेहद मानीखेज़ पद का प्रयोग करें तो जो नहीं है उसके पास वह है –जनसंगउष्मा। इस जनसंगउष्मा का अभाव उसके ज्ञान को मनुष्य की मुक्ति के मार्ग का सहधर्मी बनाने की जगह एक आत्ममुग्ध और असफल व्यक्ति में तब्दील कर देता है। यहाँ हम रुककर माओ त्से तुंग का अत्यंत महत्त्वपूर्ण लेख ‘ज्ञान के बारे में’ याद कर सकते हैं तो थोड़ा अलग संदर्भों में पाउलो फ्रेरे की किताब ‘एजुकेशन फॉर क्रिटिकल कंसशनेस’ में समझाया गया मनुष्य होने का मतलब भी – ‘मानव होने का मतलब  अन्यों और दुनिया के साथ रिश्ता रखना है। इससे व्यक्ति यह अनुभव करता है कि दुनिया व्यक्ति से अलग, समझे जाने योग्य वस्तुपरक वास्तविकता है। वास्तविकता के भीतर डूबे जानवर इससे रिश्ते नहीं रख सकते; वे केवल संपर्क रखने वाले प्राणी हैं। लेकिन मनुष्य की दुनिया से विलगता और खुलापन उसे रिश्ते रखने वाले प्राणी के रूप में अलगाती है... मनुष्य आलोचनात्मक तरीके से अपनी दुनिया से रिश्ते बनाते हैं... चूंकि वे प्राकृतिक (जैवीय) क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं बल्कि सृजनात्मक आयाम में भी हिस्सा ले सकते हैं, इसलिए वास्तविकता को बदलने के लिए मनुष्य उसमें हिस्सा ले सकते हैं।’ कहना न होगा कि फ्रेरे ख़ुद ग्राम्शी से बहुत प्रभावित थे।

जनसंगउष्मा का यह अभाव उसे उस बावड़ी में क़ैद करता है, अपने अस्तित्व के प्रति शंकालु बनाता है और उसकी संवेदना को स्याह करता है। यह उसके ‘उर’ को शुष्क बना डालता है और उसे अपने प्रचंड ज्ञान के बावज़ूद समाज के लिए एक अनुपयोगी तथा भयोत्पादक प्रेत में तब्दील कर देता है। शिष्य का ‘सजल उर’ हो उसकी वेदना के स्रोतों को संगत निष्कर्षों तक पहुँचाना उस जनसंगउष्मा से लैस हो ज्ञान की सामाजिक संपत्ति को समाज तक लौटाना तथा परिवर्तन के संघर्ष में धन-अभिभूत क्रीतदास बौद्धिक वर्ग के बरक्स सर्वहारा वर्ग के आर्गेनिक बुद्धिजीवी की तरह व्यवहृत होने का संकल्प है। इसे मुक्तिबोध के अपने आन्तरिक संघर्षों की तरह बहुत विवेचित किया गया है लेकिन मुझे यह कविता अपनी सामाजिक उपस्थिति में एक संक्रमणकालीन समय में बुद्धिजीवी के पक्ष चयन और लोक व्यवहार की संकेतक कविता लगती है और इसीलिए आज के समय के लिए बेहद प्रासंगिक।       

इन झीलों में मुग्ध खिली हैं लाल पंखुरियाँ

ब्रह्मराक्षस के ठीक पहले मुक्तिबोध के जीवनकाल में अप्रकाशित रह गई और अपूर्ण सी एक सुदीर्घ कविता है। यह कविता जितनी अभिधा में है उतनी ही अभिव्यंजना में। पढ़ते हुए लगता है जैसे मुक्तिबोध तय ही नहीं कर पा रहे कि उन्हें इसमें कहना क्या है। गौर से देखें तो यह ब्रह्मराक्षस और अँधेरे में, दोनों की तैयारी कविता लिखती है। किसी बड़ी पेंटिंग को बनाने से पहले का अभ्यास जहाँ बेहद अवसादजनक दृश्य हैं तो ‘लम्बी सड़कें चली आ रही हों/लपेटने तुमको बरबस/चीख़ो, चीख़ो, ‘फ़ायर-फ़ायर’/ गोली दागो, गोले दागो’/.../इस नगरी में अच्छे अच्छे/ लोग हुए जाते हैं देखो/ शैतानों के झबरे बच्चे’ जैसी बेचैनी और गुस्सा भी है। यहाँ भी ‘दुखते हिय से भीष्माचार्यों की मज़बूरी/कौरवों के घर’ के बाद दो विस्म्याधिबोधक चिह्न है। यह विस्मय बौद्धिक वर्ग के वर्चस्वशाली जनशत्रु के दास हुए जाने का विस्मय है। यह किसी शोधक की बेचैनी है जो लगातार उस समूह की भूमिका और पक्षधरता को लेकर बेचैन है और उसे हल करने का प्रमेय तलाश रहा है। इसके एक हिस्से का शीर्षक उन्होंने ‘डूबता चाँद कब डूबेगा’ दिया था। स्पष्ट है कि यह डूबता चाँद पतनशील पूँजीवादी व्यवस्था है जिसके डूबने की चिंता उनकी प्राथमिक चिंता है और डूबने की इस प्रक्रिया में अपने समूह की भूमिका की तलाश उनका प्रमुख कार्यभार। यह तलाश उन्हें उन झीलों के पास ले जाती हैं जिनमें ‘मुग्ध खिली हैं/ लाल पंखुरियाँ/ जन अनुभव की कमल-श्रेणियाँ’ और ‘देश-देश की ऐतिहासिक पीड़ाओं की बातों’ के सिलसिले में मिला यह निष्कर्ष एक बार फिर उन्हें विस्मय से भर देता है। लेकिन इस विस्मय में हर्ष है और ये बातें भी ख़ुद से नहीं की हुई हैं बल्कि यहाँ हम है, हम यानी उनका समूह, बौद्धिकों का समूह।

यही शोध ब्रह्मराक्षस में जाकर अपनी तार्किक निष्पत्ति तक पहुँचता है। दूसरों से उनकी पॉलिटिक्स पूछने वाला कवि ख़ुद से भी अपनी पॉलिटिक्स के बारे में निर्मम सवाल पूछता है और सरल उत्तरों में फँसने की जगह अपने समय, समाज और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भीतर और बाहर भटकता अपनी सच्ची अभिव्यक्ति तलाशता वह जहाँ पहुँचता है वह एकदम स्पष्ट जनसंगउष्मा से दीप्त होकर मनुष्य की मुक्ति की राह में अपनी भूमिका लक्षित करने की दिशा है। 
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पहल-110 में प्रकाशित  


1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ललिता पवार और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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