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बुधवार, 23 मार्च 2016

भगत सिंह : कितने दूर, कितने पास



यह लेख मैंने दखल विचार मंच द्वारा प्रकाशित भगत सिंह के धर्म एवं जाति सम्बन्धी लेखों की पुस्तिका "इन्क़लाब ज़िन्दाबाद" की भूमिका के रूप मे लिखा था। आज भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव की शहादत दिवस पर यह लेख देश मे बनते जा रहे भयानक सांप्रदायिक-फासीवादी माहौल के मद्देनज़र एक हस्तक्षेप के रूप मे 




भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नायक बनाने और उनसे अपनी परम्परा जोड़ने का भरसक प्रयास करते हैं. उनके जन्मशताब्दी वर्ष में शायद ही देश की कोई ऐसी पत्रिका होगी जिसने उन पर विशेषांक नहीं निकाला या फिर विशेष सामग्री नहीं दी. गांधी के अलावा शायद ही ऐसा किसी अन्य के साथ होता हो. गांधी के सन्दर्भ में भी स्वरों में पर्याप्त अंतर होता है तथा अक्सर वाम तथा दक्षिण अलग अलग कारणों से उनके प्रति आलोचनात्मक रुख रखते हैं, भगत सिंह के सन्दर्भ में अनिवार्य रूप से सभी का स्वर प्रशंसा का ही होता है लेकिन यहाँ अपनी अपनी तस्वीरों में मढ के. जहाँ वामपंथी उन्हें कम्युनिस्ट बता कर उनके सपनों के भारत की बात करते हैं वहीँ संघ परिवार उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी और देश की आन बाण शान पर अपने प्राणों की बलि देने वाला देशभक्त जवान बताकर अपने सपनों का भारतवर्ष बनाने की बात करता है. ज़ाहिर है जनता के बीच भगत सिंह की जो विश्वसनीयता और उन्हें लेकर जो श्रद्धा भाव है वह अद्वितीय है. लेकिन इन सबके बीच असली भगत सिंह कहाँ हैं? कौन हैं? क्या थे उनके स्वप्न और हम उनसे कितने दूर खड़े हैं या फिर कितने पास हैं? संयोग से अपने अन्य समकालीन क्रांतिकारियों से अलग भगत सिंह का लिखा पढ़ा आज भी उपलब्ध है और भगत सिंह की तलाश उन्हीं लेखों, पत्रों, टिप्पणियों और पर्चों के सहारे की जा सकती है. उनके कुछ प्रतिनिधि लेखों की यह पुस्तिका इसी दिशा में हमारी एक कोशिश है. ये सभी लेख अलग अलग जगहों पर संकलित हैं और हमने इन्हें वहाँ से साभार लिया है

सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” नाम से प्रकाशित किए. मुख्य खंड में 29 दस्तावेजी लेख/पत्र तथा परिशिष्ट के अंतर्गत भगत सिंह के संगठन ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन’ के दस दस्तावेज़ इसमें शामिल थे, जिनके लिखने में निश्चित रूप से उनकी प्रमुख भूमिका रही होगी और जिनसे सहमति तो रही होगी. इन दस्तावेजों के साथ शिव वर्मा ने एक लम्बी भूमिका के रूप में “क्रांतिकारी आन्दोलन का वैचारिक इतिहास” लिखकर भगत सिंह की वैचारिक अवस्थिति साफ़ की थी. यहाँ यह याद कर लेना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संगठन का नाम बदल उसमें “समाजवादी” शब्द जुड़वाने में भगत सिंह की प्रमुख भूमिका थी. एक मज़ेदार तथ्य यह कि जिन दो लोगों ने “समाजवादी” शब्द जोड़ने का विरोध किया था उन दोनों ने ही बाद में भगत सिंह और उनके साथियों के खिलाफ़ गवाही दी, खैर, इन लेखों और दस्तावेजों को पढ़ते हुए इतना तो बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि चाफेकर बंधुओं से ग़दर पार्टी तक के क्रांतिकारियों की जो पूरी परम्परा थी भगत सिंह उसके सबसे आधुनिक और विकसित प्रतिनिधि थे. भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में वह पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने धर्म, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी. 1928 में किरती में लिखे अपने आलेख “धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम” में वह लिखते हैं – “बात यह है कि क्या धर्म घर में रहते हुए भी लोगों के दिलों के भेदभाव नहीं बढ़ाता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? ... बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है मनुष्य कुछ भी नहीं है, मिट्टी का पुतला है, बच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है. उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की भावना को नष्ट कर देना है.” अपने थोड़े बाद के लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में वह कहते हैं, “तुम जाओ और किसी प्रचलित धर्म का विरोध करो, जाओ किसी हीरो की, महान व्यक्ति की, जिसके बारे में सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि वह आलोचना से परे है क्योंकि वह ग़लती कर ही नहीं सकता, आलोचना करो तो तुम्हारे तर्क की शक्ति हज़ारों लोगों को तुम पर वृथाभिमानी का आक्षेप लगाने को मज़बूर कर देगी.” उस दौर में जब महाराष्ट्र में एक मज़बूत दलित आन्दोलन के बावजूद कांग्रेस सहित आज़ादी की लड़ाई के तमाम भागीदारों के बीच जाति प्रश्न को लेकर कोई दृढ़ चेतना दिखाई नहीं देती और संघ जैसे कट्टरपंथी संगठन तो वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, भगत सिंह का अछूत समस्या पर जून, 1928 को किरती में प्रकाशित लेख “अछूत समस्या” निश्चित रूप से क्रांतिकारी था. इस लेख में वह यह कहते हुए कि  “क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है”, खुली अपील करते हैं कि “संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।“ यह यों ही नहीं था कि उनकी शहादत के बाद महान दलित नेता रामास्वामी पेरियार ने अपने अखबार “कुडई आरसु” में श्रद्धांजलि लेख लिखा था. जिस तरह गांधी ने आंबेडकर को उस समय पूना पैक्ट करने पर मज़बूर किया और लगातार वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते रहे और वाम आन्दोलन के भीतर जाति के सवाल को लगातार टाला गया उसमें भगत सिंह का जाति प्रश्न पर यह स्पष्ट और कड़ा स्टैंड निश्चित रूप से उनकी अग्रगामी चेतना और भारतीय समाज की बेहतर समझ का परिचायक था.

यही नहीं जो लोग उन्हें “मरने के लिए मरे जा रहे” रूमानी क्रांतिकारी के रूप में देखते हैं उन्हें युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखा उनका पत्र पढ़ना चाहिए जिसमें वे उन्हें गाँवों और फैक्ट्रियों में जाकर लोगों को संगठित कर एक नयी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की अपील करते हैं. इसी पत्र में वह लिखते हैं कि “इससे क्या फर्क पड़ता है कि भारतीय सरकार के प्रमुख लार्ड इरविन हों या सर पुरुषोत्तम ठाकुर दास. एक किसान को इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू गद्दी पर बैठे हैं.” ज़ाहिर है कि उनकी देशभक्ति गोरे अंग्रेजों को सत्ता से हटाने भर तक सीमित नहीं थी बल्कि वह देश के मज़दूर, किसानों और वंचित जन के हाथ में सत्ता पहुँचाने की उस लड़ाई में मुब्तिला थे जिसकी तलाश में वह समाजवाद के सिद्धांत तक पहुँचे थे. “इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा अभिप्राय क्या है” नामक लेख में वह इसका मज़ाक उड़ाने वाले सम्पादक को जवाब ही नहीं देते बल्कि क्रांति के अपने स्वप्न को भी स्पष्ट करते हैं, “क्रान्ति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है.” इस प्रगति को लेकर उनका नज़रिया तमाम जगहों पर बहुत स्पष्ट रूप से सामने आता है. यह कोई वायवीय रोमांटिक स्वप्न नहीं है. अपने समकालीन क्रांतिकारी लाला रामशरण दास की किताब “ड्रीमलैंड” की भूमिका में वह रूमानी इन्कलाब और अपने उद्देश्यों का ज़िक्र करते हैं. लेखक की स्वप्नजीविता की कड़ी आलोचना करते हैं और साफ़ साफ़ अपनी विचारधारा “भौतिकवाद” घोषित करते हैं. यह भूमिका दरअसल पुस्तक की समीक्षा ही है और इस रूप में राजनीतिक आलोचना का एक उत्कृष्ट उदहारण है. इस भूमिका के अंत में वह कहते हैं कि “मैं अपने नौजवानों के लिए ख़ास तौर पर इस पुस्तक की सिफारिश करता हूँ, लेकिन एक चेतावनी के साथ. कृपया आँख मूंदकर इस पर अमल करने के लिए या इसमें जो कुछ लिखा है उसे वैसा ही मान लेने के लिए इसे न पढ़ें. इसे पढ़ें, इसकी आलोचना करें, इस पर सोचें और इसकी सहायता से स्वयं अपनी समझदारी बनाएँ.” भगत सिंह की यह चेतावनी किसी भी समय किसी भी रचना के पाठक के लिए समीचीन है. 

भगत सिंह को समझने के लिए उनके दिए नारे भी बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं. उन्होंने ‘वन्दे मातरम’ या ‘भारत माता की जय’ की जगह जो नया नारा उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन को दिया वह था – इन्कलाब जिंदाबाद. इन्कलाब से उनका अभिप्राय क्या था यह हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. अराजकतावाद से आगे बढ़ते हुए समाजवादी विचारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया में उन्होंने यह साफतौर पर कहा कि ‘हथियार और गोला बारूद क्रांति के लिए कभी कभी आवश्यक हो सकते हैं लेकिन इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है. यानि इस क्रान्ति को वैचारिक तैयारी के बिना अंजाम देना संभव नहीं था. भगत खुद भी दीवानावार किताबें पढ़ते थे. उनकी जेल डायरी के नोट्स देखें जांय तो मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन से लेकर गैरीबाल्डी और मैजिनी तक को वह पढ़ रहे थे और इन्हीं किताबों से उनके सम्मुख क्रान्ति का स्वप्न आकार ले रहा था. यह यों ही नहीं था कि उन्होंने कोर्ट में अपनी पेशी के दौरान लेनिन के निर्वाण दिवस पर तीसरी कम्युनिस्ट इंटर्नेशनल को पत्र लिखा था. इस पत्र में  एक और नारा है – साम्राज्यवाद मुर्दाबाद. ज़ाहिर है वह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे कि यह एक विदेशी हुकूमत थी. वह साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और इसके विकल्प के रूप में समाजवाद के समर्थक. यह यों ही नहीं है कि ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसी के प्रमुख ने अपनी रपट में गांधी से अधिक ख़तरा भगत सिंह जैसे “कम्यूनिस्ट” क्रांतिकारियों से बताया था. भगत सिंह निश्चित तौर पर भारत की आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अपने विचारों में वह वैज्ञानिक समाजवाद के बेहद करीब थे. आज़ाद हिन्दुस्तान को लेकर उनके स्वप्न एक शोषण विहीन और समानता आधारित समाज के थे जिसमें सत्ता का संचालन कामगार वर्ग के हाथ में हो.


और उस स्वप्न के आईने में जब हम अपना समय देखते हैं तो निश्चित रूप से यह उनके जितने पास लगता है उससे कहीं अधिक दूर. वह लड़ाई उपनिवेशवाद की मुक्ति तक तो पहुंची लेकिन उसके आगे जाकर वंचित जनों के हाथ में सत्ता देकर एक समतावादी समाज की स्थापना अब भी एक स्वप्न ही है. हमने जो आर्थिक व्यवस्था चुनी वह समतावादी होने की जगह लगातार विषमता बढ़ाने वाली साबित हुई और आज आज़ादी के सात दशकों बाद भी हम अपनी जनता के बड़े हिस्से को ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पा रहे. सामाजिक ताना बाना भी बुरी तरह उलझा और ध्वस्त हुआ है. एक अपेक्षाकृत बराबरी वाला संविधान अपनाने के बावजूद समाज के भीतर जातीय, धार्मिक और इलाकाई भेदभाव लगातार बढ़ता गया है. बाबरी विध्वंस के बाद से देश में दक्षिणपंथी ताक़तें मज़बूत हुई हैं और धर्म का स्पेस राजनीति में घटने की जगह भयावह रूप से विस्तारित होता चला जा रहा है. कश्मीर और उत्तर पूर्व में जिस तरह उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के प्रतिरोध और दमन देखे जा रहे हैं वह देश के रूप में हमारी परिकल्पना को ही प्रश्नांकित कर रहे हैं. ऐसे में भगत सिंह को याद करना उपनिवेशवादी आन्दोलन की क्रांतिकारी तथा जनपक्षधर धारा को याद करना है. यह सवाल सिर्फ एक महान क्रांतिकारी शहीद की स्मृति को ज़िंदा रखने का नहीं बल्कि उस विचार और स्वप्न को जीवित रखने का है और इसे आगे ले जाने की जिम्मेवारी उनकी है जो खुद को भगत सिंह का वारिस कहते हैं.

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावों के आप की जीत पर “दख़ल विचार मंच” तथा “हिंसा के ख़िलाफ़ कला” का सामूहिक बयान



हाल में संपन्न हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत पर सबसे पहले तो हम उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करते हैं. यह निश्चित तौर पर थैलीशाहों और साम्प्रदायिक ताक़तों पर जन पहल की जीत है.
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“आप” की इस जीत में बड़ा योगदान झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले ग़रीब जन, अल्पसंख्यक समुदाय, निम्न मध्यवर्ग और युवाओं का रहा है. पिछले नौ महीनों में जिस तरह आर्थिक सुधारों की गति तेज़ करने के नाम पर लगातार जनविरोधी नीतियों को बढ़ावा दिया गया, निजीकरण की प्रक्रिया और तेज़ की गयी, लोक खर्चों में कटौती की गई, साम्प्रदायिक गुंडागर्दी बढ़ी, गोडसे जैसे हत्यारे की मूर्तियाँ स्थापित करने की कोशिश से लेकर जनसंख्या बढ़ाने की फतवानुमा सलाहें दी गईं, जनता के बीच एक असंतोष उपजा और पिछली सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन से ऊबी जनता ने इन चुनावों में उपलब्ध सर्वोत्तम विकल्प को चुना. यही नहीं दिल्ली के कुछ इलाक़ों में जिस तरह से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए दंगो का सहारा लिया गया (बवाना में तो दख़ल की फैक्ट फाइंडिंग टीम गयी थी और हमें चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं) जनता ने उसे ठुकरा कर शान्ति के पक्ष में मतदान किया. हम दिल्ली की सदियों पुरानी रवायत से मुहब्बत करने वाली अमनपसंद जनता को सलाम करते हैं और उनकी बुद्धिमत्ता के समक्ष सिर झुकाते हैं.
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लेकिन इसी के साथ कुछ सवाल भी उठते हैं. क्या आम आदमी पार्टी उन सपनों को पूरा करने में सक्षम है, या कम से कम उन सपनों को को पूरा करने की इच्छा शक्ति है उसमें जिनके वायदे उन्होंने किये हैं? अन्ना आन्दोलन से लेकर पिछली 49 दिनों की सरकार और उसके बाद उनके कुछ महत्त्वपूर्ण सदस्यों के बयानात दुर्भाग्य से इस ओर से आश्वस्त नहीं करते.
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सबसे पहले हम अगर आर्थिक नीतियों की ही बात करें तो बासी पड़ चुके “मानवीय चेहरे वाले पूँजीवाद” और “पब्लिक सेक्टर” वाली कथित “समाजवादी” व्यवस्था के अलावा आप के पास कोई ऐसी नीतिगत समझदारी नहीं दिखती जिससे कारपोरेट कुचक्र में फँसी दिल्ली के ग़रीबों के दुखों का कोई दीर्घकालीन इलाज़ किया जाए. सी आई आई में दिए अपने भाषण में अरविंद केजरीवाल जी जिस ओर इशारा करते दीखते हैं वह दुर्भाग्य से कांग्रेस और भाजपा से अलग राह नहीं. जिस तरह के विषमता और अन्याय से आज दिल्ली का कामगार वर्ग दो चार है उसे कुछ छोटी मोटी रियायतों या घोषणाओं से दूर नहीं किया जा सकता. उसके लिए एक रेडिकल जनपक्षीय गतिशील आर्थिक नीति की आवश्यकता है, जिस दिशा में आम आदमी पार्टी कहीं से चलती नहीं दिखती. देश और दिल्ली के ग़रीबों को वाई फाई से अधिक रोटी और रोज़गार की ज़रूरत है.
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साम्प्रदायिकता की बात करें तो हमारी फैक्ट फाइंडिंग टीम ने बवाना में पाया कि दंगों के दौरान न तो आप के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने कोई प्रतिरोधी भूमिका निभाई न ही इस दल के बड़े नेता वहाँ ऐसी कोई कोशिश करने गए. अब तक कि जो नीतियाँ दिखीं हैं वे भी लचर और हद से हद कांग्रेस जैसे ढीले ढाले सर्वधर्म समभाव के एक छाया भाव सी हैं. आप के बड़े नेताओं ने अपनी धार्मिक आस्थाओं का खुला प्रदर्शन किया है और साम्प्रदायिकता के मामले में गोल मोल बयान देते हुए कोई सख्त स्टैंड लेने से हमेशा ही बचने की कोशिश दिखी है. जाति के मसले पर भी आरक्षण विरोधी अपने अतीत के बरक्स श्री केजरीवाल या उनके कुछ अन्य साथी खुलकर कुछ कहते या पक्ष लेते नहीं दिखे हैं. हम इस नई सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि इस मुद्दे पर वह गंभीरता से विचार करे और तेज़ी से सर उठा रहे साम्प्रदायिक कट्टरपन के ख़िलाफ़ वे आवश्यक क़दम उठाये जिससे समाज में सद्भाव कायम रह सके तथा लेखकों/कलाकारों तथा आम जन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बरक़रार रहे. अल्पसंख्यक और दलित समुदाय के साथ साथ उत्तर पूर्व के लोगों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता में शामिल की जानी चाहिए.

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स्त्री सुरक्षा का मामला पूरे देश की ही तरह दिल्ली में भी एक बड़ा मामला है. दुर्भाग्य से इस मामले पर भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह ढुलमुल सा ही रवैया दिखता है. सी सी टी वी का जो प्रस्ताव है वह एक सीमित प्रभाव ही डाल सकता है, साथ ही उसमें जनता की निजता भंग होने का एक सतत ख़तरा मौजूद है. हमारा मानना है कि इसके लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक, दोनों तरह के गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है, जिससे एक तरफ़ ऐसी घटनाओं पर अंकुश लग सके और दोषियों को पकड़ा जा सके तो दूसरी तरफ समाज में ऐसे मूल्य विकसित किये जा सकें जिनसे स्त्री-पुरुष असमानता को दूर करने में मदद मिले.
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दिल्ली की जनता, खासतौर पर ग़रीब कामगार और नौजवानों के एक बड़े हिस्से ने दिन रात लगकर ‘आप’ को वह प्रचंड बहुमत दिया है जिसकी कल्पना खुद उनके लिए भी मुश्किल थी. अब यह विपक्षहीन बहुमत उसे एक रेडिकल दल में बदलने की ज़रूरी ताक़त देता है या सत्ता वर्ग का हिस्सा बनने का अहंकार, यह समय बतायेगा. हमने पहले सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन के जनता पार्टी शासन में तब्दील होते और फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन द्वारा कांग्रेस सरकार को अपदस्थ करते (जिनका आधार, प्रसार और संघर्ष निश्चित रूप से 'आप' से कहीं अधिक प्रखर था) और फिर धीरे धीरे सत्ताधारी वर्ग का हिस्सा बनते देखा है. सही दिशा का अभाव और पूँजी की जनविरोधी ताक़तों से सतत संघर्ष के लिए आवश्यक प्रतिबद्धता के अभाव में आदर्शों का दम तोड़ना स्वाभाविक है. हम उम्मीद करते हैं कि इस प्रचंड जनसमर्थन से मिली ताक़त का इस्तेमाल "आप" जनता के हित की नीतियाँ बनाने तथा उदारीकरण के वर्तमान माडल का विकल्प खड़ा करने की कोशिश में लगाएगा.
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आज जब कहीं विपक्ष नहीं है, जनविरोधी नीतियों पर सत्ता वर्ग का पूर्ण एका है तो जनता ही विपक्ष है और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली जनपक्षधर ताक़तें इसका हिरावल दस्ता. हम अपनी बेहद सीमित ताक़त और उपस्थिति के साथ इस ज़रूरी काम को करते रहने की अपनी भूमिका निभाने को संकल्पबद्ध हैं. हम थैलीशाहों और साम्प्रदायिक ताक़तों की इस चुनावी हार से खुश हैं लेकिन इसे न तो थैलीशाहों और न ही साम्प्रदायिकता की अंतिम हार की तरह देखते हैं और न जनता की किसी अंतिम और फैसलाकुन जीत की तरह.