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मंगलवार, 12 मई 2020

प्रिय पूंजीवाद, मार्क्स अभी अप्रासंगिक नहीं हुये है

  • पुरुषोत्तम अग्रवाल 
  • अनुवाद : तरुण भारद्वाज 


मार्क्स यदि जीवित होते तो 5 मई 2018 को 202 वर्ष के हो गए होते। तो क्या? क्या मार्क्स के विचारों को याद करने और उन पर चिंतन करने से अब कोई फायदा है ? क्या यह एक तथ्य नहीं है कि पूंजीवाद ने मार्क्सवाद द्वारा बुरी तरह पछाड़ दिया है। क्या यह एक तथ्य नहीं है की स्वयं आज वामपंथी बुद्धिजीवी “वर्ग” की जगह “पहचान” की तरफ अधिक झुके हुये है, इतिहास की जगह “संस्कृति” से ज्यादा सरोकार रकते है, और “सार्वभौम मूल्यों” की तुलना मे “विभेदों” की उपस्थिती मे ज्यादा विश्वास रखते है।

क्या इतिहास ने स्वयं यह निर्णायक फैसला नहीं कर दिया है की मार्क्स अब प्रासंगिक नहीं रह गए है? क्या साम्यवादी शासन भयावह रूप से दमनकारी नहीं रहे है और क्या मार्क्सवादी राजनीतिक पार्टियां समकालीन विश्व और उसकी समस्याओं, मुद्दों से कटी हुई नहीं है?

सारांश यही है की 21वीं सदी बिना किसी बड़े बौद्धिक जोखिम के मार्क्स को अनदेखा कर सकती है; या ज्यादा से ज्यादा, कोई महत्व दिये बिना बस एक औपचारिक जिक्र कर आसानी से आगे बढ़ सकती है।

मार्क्स-एक मानव, न कि पैगंबर 

लेकिन ऐसा करना भारी भूल होगी । मार्क्स को लेनिन, स्टेलिन, माओ या किसी अन्य मार्क्सवादी के अच्छे-बुरे कृत्यों के लिए उत्तरदाई ठहराने का कोई मतलब नहीं है। उनका मूल्यांकन उनकी अपनी राजनित्क गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, और किया भी गया है, लेकिन मार्क्स के दशकों बाद आने वाले लोगों की राजनीतिक गतिविधियों के लिए उन्हे को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं।


फिर, यह भी नहीं भूलना चाहिए की मार्क्स कोई पैगंबर नहीं थे जो कोई गलती न कर सके। वे बेशक कई मामलों मे गलत थे, लेकिन फिर भी मार्क्स एवं फ़्रेडरिक एंजेल्स और “भौतिक परिस्थितियों” की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे मे उनकी सूक्ष्मदृष्टि हमे इतिहास के उतार-चढ़ावों और मानव जीवन के मूलभूत मुद्दों और समस्याओं को समझने मे काफी मदद कर सकती है।

यदि मार्क्स से अपने परवर्तियों के कृत्यों के उस बोझे को हटा लिया जाये जो उनपर जबर्दस्ती लाद दिया गया है, तो मानव स्वभाव के बारे मे मार्क्स की समझ और पूंजीवाद के बारे मे उनकी अंतर्दृष्टि बहुत प्रासंगिक है और हम उनसे काफी कुछ सीख सकते है। लेकिन यह सीख मार्क्स का ज्यों का त्यों अनुरसरण करना नहीं हो सकती ।आज हमे मार्क्स से सिर्फ अंतर्दृष्टि की ही उम्मीद करनी चाहिए, आज की परिस्थ्तियों के लिये पहले से तैयार समाधानों की नहीं।


पूंजीवाद और मानवता की निराशा

पुरुषोत्तम अग्रवाल 
20वी सदी सपनों और आशाओं के टूटने और निराशा एवं दुःस्वप्न मे बदलने की सदी थी। न सिर्फ साम्यवाद बल्कि कई अन्य देवताओं ने मानवता को धोखा दिया था। इसका नतीजा यह हुआ की किसी सार्वभौमिक महत्व के ग्रांड नरेटिव की बात करना भी राजनीतिक दृष्टि से गलत समझा जाने लगा।

लेकिन साथ ही, मानव चेतना की समस्या महामारी का रूप ग्रहण करने लगी है। सबसे ज्यादा सफल माने जाने वाले पूंजीवादी देश –अमरीका मे “मन की शांति” प्रदान करने वाले पोंगा पंडितों की संख्या बढ़ती जा रही है। वहाँ मनोचिकित्सा के व्यवसाय का भी दिनों दिन विस्तार हो रहा है।अधिकांश अमरीकी अवसाद दूर करने की दवाओं को लेने के लिए मजबूर है। ऐसा लगता है मानो सामाजिक सम्बन्धों का टूटना “विकास” की पूर्वशर्त बन गया है; आज हमारा अपना समाज इसका उदाहरण है। गांधीजी इस खतरे को अपने अंदाज मे पहले ही भाप चुके थे, और नेहरू जी भी, जैसा की उन्होने 1960 मे आर॰के॰ करांजीया को बताया था, “हमारी तकनीकी सभ्यता के आध्यात्मिक खोखलेपन” के प्रति चिंतित थे ।
मानवता का ह्रास, मानव होने के एहसास का खो जाना –मानव स्वभाव से अलगाव –मार्क्स के जीवन की सबसे बड़ी चिंता थी। 30 वर्ष से भी कम की आयु मे लिखी उनकी “इकोनोमिक एंड फिलोसोफ़िकल मेन्यूस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844” मे मार्क्स ने मनुष्य को सोशल-बीइंग ही नहीं उस से भी बढ़कर “स्पीसीज़ बीइंग” बताते हुए, मानव के इसी पहलू का सार पकड़ने का प्रयास किया है। इन नोट्स मे मार्क्स लुडविग फ्यूअरबेक और हिगल से प्रभावित थे।

मार्क्स मनुष्य की “अद्वितीयता” को रेखांकित करते है। अन्य प्राणियों से इतर मनुष्य महज प्रकृति का जैविक विस्तार नहीं है; वह प्रकृति मे है और, अन्य प्राणियों से भिन्न, वह इस बात को जानता भी है। अपने होने की इस चेतना से मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध अन्य प्राणियों के प्रकृति के साथ संबंध की तुलना मे गुणांत्मक रूप से भिन्न हो जाता है। मार्क्स ने स्वयं इस संबंध को “अजैविक, आध्यात्मिक(स्प्रिच्यूअल)” (मार्क्स के स्वयं के शब्दों का हिन्दी अनुवाद) कहा है ।


जब मनुष्य की स्वाभाविक शारीरिक-मानसिक गतिविधि को बाजार मे बिकने वाली वस्तु बना दिया जाता है तो उसका अपने ही उपरोक्त आध्यात्मिक पक्ष से अलगाव हो जाता है। अलगाव की यह प्रक्रिया सामाजिक संगठन की शुरुआत से शुरू हो जाती है जो पूंजीवाद मे पहुच कर एक भयावह रूप धरण कर लेती है। पूंजीवाद मे मनुष्य का बाह्य-प्रकृति और उसके अपने आध्यात्मिक पक्ष से ही नहीं, स्वयं अपने शरीर तक से अलगाव हो जाता है।


धर्म बतौर दर्द-निवारक

मार्क्स ने संस्थागत धर्म पर भी इसी दृष्टि से विचार किया है। मार्क्स ने बताया कि धर्म “मानव कल्पना की स्वतःस्फूर्त गतिविधि” से मनुष्य का अलगाव कर उसके स्थान पर दैवीय-पिशाचीय के चिंतन को स्थापित कर देता है। साधारण शब्दों मे धर्म विश्व के साथ एकत्व महसूस करने की भावना को, ब्रह्मांडीय-आश्चर्य को और चेतना की अभिव्यक्ति को एक बाहरी वस्तु का रूप दे देता है।


मार्क्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम कहा है । मार्क्स की यह उक्ति जितनी प्रख्यात है उतनी ही ज्यादा गलती इसे समझने मे हुई है। अफीम से मार्क्स का तात्पर्य नीद की दवा या दर्द निवारक से है जो विध्यमान परिस्थितियों के कारण जरूरी हो गई है। जैसे ही इस संदर्भ मे मार्क्स का पूरा कथन पढते है यह बात बिलकुल साफ हो जाती है-“धार्मिक-पीड़ा, वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है और साथ ही साथ उस वास्तविक पीड़ा का विरोध भी। धर्मं शोषित व्यक्ति के लिए राहत की सांस का काम करता है, वह हृदयहीन विश्व का हृदय है, आत्माहीन-अमानवीय परिस्थितियों की आत्मा है। धर्म जनता के लिए अफीम है”।


कालांतर मे मार्क्स ने “आध्यात्मिक (स्प्रिच्यूअल)” जैसे शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया और अपने विचारों को अधिक सेकुलर शब्दावली मे प्रस्तुत किया, किन्तु अब भी उनकी चिंता वही अलगाव ही था। अपनी सबसे प्रख्यात कृति “केपिटल” मे मार्क्स पूंजीवाद की कठोर निंदा इसलिए की है कि वह श्रमिक को बहुआयामी मनुष्य से गिराकर मशीन का ही एक अनुलग्नक मात्र, महज मजदूर, मे तब्दील कर देता है, उसके श्रम को “पीड़ा” मे बदल देता है और उसके जीवन-जीने-के-समय को काम-करने–के-समय मे बदल देता है जिसकी वजह से श्रमिक अपनी बौद्धिक शक्यता से दूर हो जाता है ।

गलत भविष्यवाणियाँ या गलत समझ ?

कुछ लोग मार्क्स की अप्रासंगिकता का प्रमाण उनकी इस भविष्यवाणी के सच नहीं होने मे देखते है कि “पूंजीवाद मे दिनों-दिन गरीबी बढ़ती जाएगी और मजदूरों की दशा खराब होती जाएगी”। यह सच है कि मार्क्सोत्तर पश्चिम मे पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भी मजदूर समृद्ध हुये है। बस समस्या यह है की यदि विश्व अर्थव्यवस्था को एक इकाई के रूप मे देखा जाये तो, पूंजीवादी व्यवस्था मे पश्चिम के मजदूरों की तरक्की की भयावह और घिनौनी कीमत पश्चिमेत्तर विश्व के लोगों ने चुकाई है, और आज भी चुका रहे है।


ब्रिटेन के श्रमिक इसीलिए ‘समृद्ध’ हो सके क्यों की अंग्रेजों ने भारत का सोचे-समझे तरीके से वि-औध्योगीकरण किया और गरीब बनाया; अमरीकी श्रमिक विश्व के विभिन्न हिस्सों मे “एक्सपोर्ट ऑफ डेमोक्रेसी” के नाम पर पर थोपे गए शोषण के बिना समृद्ध नहीं हो सकता। यहाँ तक की भारत,चीन जैसे उन देशों मे जो विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहे है वहाँ भी शहरों और उनके निवासियों को स्मार्ट बनाए जाने की कीमत दूसरे लोग चुका रहे है । ये लोग कहीं गायब नहीं हुये है, बस दिखना बंद हो गए है क्यों की मीडिया और बुद्धिजीवियों ने इनकी ओर आँख मूँद ली है।


बड़ी बड़ी कंपनियो के तथाकथित ‘बिजनेस प्रेक्टिसेज’ से तो सभी भली भांति परिचित है। वालमार्ट स्टोर्स मे सेल्स्पर्सन को बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी जाती है, उनसे यह अपेक्षित है की वे 8-10 घंटे खड़े रहें।


सामान्य तौर पर कहा जाये तो आज नियमित रोजगार का स्थान “संविदा मजदूरों” और “आकस्मिक एवं अस्थायी कामगारों” (प्रबंधन शब्दावली मे “जस्ट इन टाइम”) ने ले लिया है । ‘पकोड़ा और पान की अर्थव्यवस्था’ इसी सोच का देशी अवतार है । नैतिकता से असंपृक्त मुनाफाखोरी के लिए जरूरी है की जितना संभव हो सके उतने लोगों को कल की रोजी-रोटी के लिए असमंजस मे रखा जाये । याद है किस प्रकार बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने मनरेगा का इसलिये विरोध किया था की इसकी वजह से ‘सस्ता श्रम’ ‘महंगा’ हो गया है और श्रमिक मिलने मे कठिनाई आ रही है ।

रोजी की यह अनिश्चितता चिंता और क्रोध को जन्म देती है जिसे या तो आक्रामक राजनीति की तरफ मौड़ दिया जाता है या फिर फर्जी ‘अध्यात्म’ या ‘मनोचिकित्सा’ की तरफ । और फिर, जैसा की मार्क्स ने कटाक्ष पूर्वक कहा था, “अपराधी सिर्फ अपराध को ही जन्म नहीं देते, बल्कि इससे निपटने के लिए जरूरी कानूनी ढांचे को भी जन्म देते है”।


आध्यात्मिक संकट, पूंजीवादी जड़ें

विश्व अर्थव्यवस्था को एक इकाई के रूप मे देखने पर मार्क्स अप्रासंगिक और पुराने नहीं दिखाई देते है खास तौर पर जब वे कहते है –“एक सिरे पर धन का संकेन्द्रण उसी समय दूसरे सिरे पर दुख, श्रम की पीड़ा, दासता, अज्ञानता, अमानवीयता और नैतिक अवमूल्यन का संकेन्द्रण है”।


वे मार्क्स ही थे जिनहोने अपने मित्र एंजेल्स के साथ मिलकर ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ (1948) मे पूंजी की वैश्वीकरण की तरफ यात्रा की और बढ़ी बड़ी कंपनियों के विश्व के वास्तविक शासक बन जाने की –डेमोक्रेसी को कोर्पोरेटोक्रेसी द्वारा -बदल दिये जाने की भविष्यवाणी की थी।


आप इसे आध्यात्मिक कहे या कुछ और नाम दे, लेकिन अलगाव द्वारा पैदा हुये संकट को नकारा नहीं जा सकता ।मार्क्स ने इस संकट के “भौतिक” आधार और “ऐतिहासिक” परिप्रेक्ष्य को उजागर कर बहुत महत्वपूर्ण सेवा की है । सनद रहे, भौतिकवाद सुखवाद (नैतिकता से असंपृक्त सुख प्राप्ति की अंधी दौड़ ) नहीं है । बल्कि मार्क्सवादी भौतिकवाद सुखवाद की कड़ी आलोचना करता है।

जब कबीर अपनी एक कविता मे भीतर और बाहरी (‘भीतर बाहर शबद निरंतर’) की सतत अन्तरक्रिया की बात करते है तब वे परंपरागत भारतीय समझ को ही दोहराते है जो सही और गलत की एकांतवादी सोच के शिकंजे को खारिज करता है। जब मार्क्स इस बात पर ज़ोर देते है की मानव चेतना और भोतिक परिस्थितियाँ एक दूसरे पर द्वन्द्वात्मक रूप से कार्य करती है तो वे भी अपनी दार्शनिक परंपरा की शब्दावली मे, अपने तारीक से यही करते है।


‘आधात्मिक सुनेपन’ की समस्या का समाधान करने के लिए जरूरी है की उत्पादन और वितरण की सारी व्यवस्था का मानवीयकरण हो। ‘आत्मा के संकट’ का इलाज महज आध्यात्मिक या मनोचिकित्सकीय उपायों से नहीं किया जा सकता। इसके समाधान हेतु भीतर चेतना की तरफ किये जाने वाले इस उपायों के साथ-साथ बाहरी की, जगत की समस्याओं का न्यायपूर्ण समाधान खोजना आवश्यक है।

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मूल रूप से THEQUINT.COM पर प्रकाशित

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

नाकोहस पढ़ते हुए कुछ फुटकर नोट्स



मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है[1]



  • ·        अशोक कुमार पाण्डेय

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नाकोहस जब कहानी के रूप में आई थी तब इस पर टिप्पणी करते लिखा था – “समय का बदलना अक्सर महसूस नहीं होता. उसे कुछ प्रतीकों के सहारे पढ़ना होता है. और यह पाठभी क्या होता है? दरअसल यह जितना पढ़ी जाने वाली चीज़ में होता है उतना ही उस ज़मीन में भी जिस पर खड़ा हो के उसे पढ़ा जा रहा है. यानी हमारी अपनी नज़रपर. बकौल साहिर ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है/ क्यूं देखें ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम.यू आर अनंतमूर्ति की मृत्यु के बाद के उल्लास और पटाखों को कोई गौर से देखे तो यह किताब जालाये जाने, लेखकों पर हमलों, मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग्स फाड़े जाने के क्रम में तो थे लेकिन अपनी अभिव्यक्ति और सार में यह एक गुणात्मक छलांगथी. महात्मा गांधी की मृत्यु पर बंटी मिठाइयों के बाद यह पहला सार्वजनिक गिद्धभोज था, याद कीजिए हुसैन के मरने पर भी यह दृश्य नहीं देखा गया था. इस तरह यह एक पुख्ता प्रतीक था, हमारी ज़मीन से देखें तो फासिज्म के विजय उद्घोष का और उनकी ज़मीन से देखें तो अच्छे दिनों का.  नाकोहस इसी नई हकीक़त का एक आख्यान है.

और देखिये इन कुछ महीनों में कितना कुछ बदल गया. अपने देश मे दादरी से जे एन यू तक, रोहित वेमुला से ऋचा सिंह तक, पटियाला कोर्ट परिसर से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और ग्वालियर तक फ़ासीवाद अपनी विजय का उन्मुक्त उद्घोष करता विचर रहा है तो अमेरिका जैसे मुक्त बाज़ार वाले देश मे डोनाल्ड ट्रम्प खुलेआम अपनी घोर दक्षिणपंथी नीतियों के साथ ताल ठोंक कर भूमंडलीय नेता बनने की रेस मे है. अम्प्टन सिंक्लेयर ने फासीवाद को पूंजीवाद + हत्याकहा था और आज चार सू जो मंज़र है वह इसकी सख्त ताक़ीद करता नज़र आता है. ऐसे में नाकोहस अब जब उपन्यास के रूप में आया है और अपने फलक को और व्यापक करता हुआ वक़्त की तस्वीर और उसके पाठ, दोनों को और अधिक स्पष्ट करता है, तो इस पर ज़रा तफ़सील से बात करना ज़रूरी हो जाता है.

देखें तो नाकोहस की कहानी मुख़्तसर सी है. एक कॉलेज के अलग अलग धर्मों के तीन प्रोफ़ेसर दोस्त जो धर्मनिरपेक्ष हैं, मुखर हैं और लगातार साम्प्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ हैं, सत्ता के एक गोपनीय संगठन नाकोहस यानी  नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेंट्स द्वारा गिरफ़्तार किये जाते हैं, उनका उत्पीड़न होता है और फिर उन्हीं हालात में चेतावनी के साथ उन्हें वापस छोड़ दिया जाता है. तीन लाइनों की इस कहानी के कोई एक सौ साठ पन्नों में आप किसी औपन्यासिकउतार चढ़ाव और रहस्य रोमांच की उम्मीद करते हों तो निराश होने की पूरी संभावना है. नाकोहस की कथा इसके विषय वस्तु सी खुरदुरी है, जिसमें घटनाएँ नहीं एक मुसलसल बहस और जद्दोजेहद है. यह पूरा उपन्यास हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन की इस विडंबना को आहिस्ता आहिस्ता दर्ज़ करता जाता है और उसकी भयावहता को पाठक के दिल-ओ-दिमाग में पैबस्त करता जाता है. पन्ना दर पन्ना यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे में लगती दीमकों और उसके ढहते कंगूरों की शिनाख्त करता चलता है. असहमतियों को देशद्रोह में तब्दील कर देने वाले समय के तमाम बिम्ब असुन्दर होने के लिए अभिशप्त हैं तो यह उपन्यास अपने खुरदुरे शिल्प के साथ, जो न क्लासिकल अर्थों में फैंटसी या जादूई यथार्थवाद जैसी तकनीकों से परिभाषित किया जा सकता है, न ही सपाटबयानी कहा जा सकता है, एक प्रतिरोध की तरह, एक प्रतिआख्यान की तरह उपस्थित है जहाँ बहसें कथा का स्थान लेती जाती हैं, क्रूरताएं और उनसे उपजी आशंकायें रोमांच का. अपनी पूरी संरचना में यह शिल्प नया भले न हो लेकिन इस समय की भयावहता को उसकी सूक्ष्म पदचापों के साथ पहचानने और पाठकों तक संप्रेषित करने में काफी हद तक सफल है. उपन्यास की भाषा पर थोड़ी बात आगे की जायेगी.

नाकोहस का कोई अर्थ नहीं बनता. अर्थ बनाने की कोई सचेत कोशिश भी नहीं दिखती. इसके कारिंदों के लिए उपयोग किया गया पदबंध बौनेसरभी क्लबों में अनियंत्रित होने वाले अतिथियों को नियंत्रित करने वाले समानधर्मी बाउंसरसे ध्वनि साम्य के बावजूद कोई अर्थ नहीं देता.  पर कहानी में ये अपनी उपस्थिति से, अपने नाम मात्र से जैसे रीढ़ की हड्डियों में एक सिहरन पैदा कर देते हैं, इसके विपरीत ये वस्तुतः अर्थहीन पदबंध हैं. यही इसकी व्यंजना है. दक्षिणपंथ के अपने तंत्र में उपस्थित ऐसी संरचनाएं, जो बाहर से दिखती ही नहीं, जिनका अस्तित्व एक सभ्य समाज में निरर्थक है, पूरे समाज को इतने गहरे प्रभावित करती हैं. आप देखिये प्रशांत भूषण पर आक्रमण करने वालों के हाथ में भगत सिंह सेना का बैनर था. भगत सिंह और साम्प्रदायिक ताक़तों का बैनर! मनसे को याद कीजिए. तर्कबुद्धि कहेगी, एकदम निरर्थक, एकदम बकवास. अनुभव कहेगा, हिंसक, भयानक, हत्यारे! यहाँ कथा की अनुपस्थिति  इस नए समय की उपस्थिति है. जहाँ सब कुछ इतना आवेगहीन, ठंढा और पूर्वनिर्धारित है कि कोई कुतूहल नहीं जगाता, कोई कथानक, कोई उतार चढ़ाव नहीं, एक सीधी सपाट रेखा पर चलता हुआ वह स्वाभाविक सा लगता चला जाता है. धीरे धीरे फासिज्म का दर्शन सहज स्वीकार्य होता चला जाता है. हम मान कर चलते हैं कि भड़काऊ भाषणोंया दंगोंया स्नूपिंगके कितने भी सबूत आ जाएँ, केस हो जाएँ लेकिन कुछ होना नहीं है. हम न पुलिस की कार्यवाही की प्रतीक्षा करते हैं न अदालत के आदेश का. अब फैसले टीवी बहसों और सड़क की गुंडागर्दी से होते हैं जहाँ संत-साध्वी-महंत-मौलवी अपने विषाक्त धर्मादेश बेखटके देते रहते हैं. गोएबल्स की ज़रुरत तक ख़त्म होती जाती है और लोग पहली बार ही आत्मविश्वास से बोला गया झूठ स्वीकार कर लेते हैं, भले ही सच की तरह नहीं. चंद टीवी चैनल और अखबार पूरे विश्वास से झूठ को लगातार दिखाते हैं और एक भीड़ सड़कों पर नारे लगाते उतर आती है जो किसी पर कहीं भी हमला कर सकती है, उनके लिए क़ानून और पुलिस उपस्थित होकर भी अनुपस्थित हैं या यह कहें कि उनके द्वारा छोड़ा गया स्पेस जिन्होंने साधिकार कब्ज़ा कर लिया है. वे सत्ता के बगलगीर हैं और न्याय के स्थानापन्न. उनके पास तर्क नहीं हैं परन्तु निष्कर्ष हैं- अप्रश्नेय निष्कर्ष. इस उपन्यास पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बहुत गंभीरता से संचार माध्यमों के हमारे मानस और स्पेस पर कब्ज़े को रेखांकित किया है, जिस पर आगे विस्तार से बात की जाएगी. ज़ाहिर है, इस आख्यान को भी ऐसा ही होना था. यह न उतार चढ़ाव और किस्सागोई की शक्ल में आ सकता था, न ही किसी एकालाप की शक्ल में. चेखव की एक कहानी एक क्लर्क की मौत याद आती है. कोई मार्केज की क्रानिकल भी याद कर सकता है और कामू की द स्ट्रेंजर भी. नाकोहस का निरर्थक होना और उसका इस क़दर वर्चस्व अपने आप में एक व्यंजना रचता है.

नाओमी क्लेन अपनी किताब द शॉक थेरापी में अर्जेंटीना के यातना शिविर में चार महीने गुज़ारने वाले मारियो बिलानी को उद्धृत करती हैं. वह कहते हैं, “मेरा सिर्फ़ एक लक्ष्य था अगले दिन तक ज़िंदा रहना. लेकिन सिर्फ़ ज़िंदा रहना नहीं, बल्कि जैसा हूँ वैसे बने रहना. जैसा हैं वैसा बने रहना - यह चुनौती सुकेत की भी है, रघु की भी और शम्स की भी. नाकोहस के यातना शिविर मे गुज़ारे कुछ घंटों मे ही नहीं बल्कि अपने सुरक्षित घरों के हर झरोखे मे आँख लगाए बौनेसर आँखों के बीच रहते भी।  यह यातना शिविर  किसी एक जगह तक महदूद नहीं है बल्कि हमारे पूरे पब्लिक और प्राइवेट स्पेस मे पसर गया है। नाकोहस सिर्फ़ शरीर को चोटिल नहीं करता. वह दिमाग और दिल पर भी कब्ज़ा करता जाता है. लोकतंत्र के भ्रम के भीतर चेतनाओं पर नियंत्रण का हिंसक उपक्रम करती दक्षिणपंथी राजनीति सुनहले लबादों, पवित्र शब्दों और ख़ूबसूरत प्रतीकों की आड़ में आती है. उपन्यास के शुरू में ही शम्स कहता है, “जो भी आमादा है, वह गले में कुत्तोंवाला पट्टा पहनाने पर आमादा है...हिल डुल पर कोई रोक नहीं, बशर्ते दुम साथ में हिलती रही...भौंकने की भी इजाज़त, बशर्ते चेन मज़बूती से उसके हाथ में थमी रहे...उसके बाद आये रघु के लेकिनके बाद के वाक्य को पूरा करने वाले शब्द कहीं नहीं थे. यह जो निःशब्दता है, जो बेबसी और बेचैनी है, यह उपन्यास उस बेबसी और बेचैनी का ज़िंदा दस्तावेज़ है तो उसके बाद का जो हँसी मजाक है वह इस अमानवीय वातावरण में मुखालिफ़त करते लोगों की लाचारी भी है और हिम्मत भी.  नियंत्रण की ये कोशिशें कई कई स्तरों पर चलती हैं. घर घर में पहुँचे टी वी चैनल और हर हाथ को काम की जगह मिले मोबाइल सेट चौबीसों घंटे आपकी चेतना के चोर दरवाज़े तलाशते रहते हैं, रिमोट के सहारे नियंत्रण का आपका भ्रम टूट जाता है. याद कीजिये जे एन यू की हालिया घटना जब फ़र्ज़ी वीडियोज और चयनित रिपोर्टिंग के सहारे टीवी चैनल्स ने उन्माद का ऐसा माहौल बना दिया है कि जे एन यू के लिए ऑटो करने पर ऑटो वाला कहता है सीधे पाकिस्तान क्यों नहीं जाते? याद कीजिये मेरठ के पास बनाई जा रही हिन्दू सेना से जुडी कोई बीस साल की लड़की का वह बयान जिसमें सेकंड्स में व्हाट्सेप के ज़रिये कई लाख लोगों तक अपने ज़हरीले सन्देश पहुँचा देने की गर्वोक्ति है. मुजफ्फरपुर दंगों के समय पकिस्तान के एक वीडियो के सहारे रातोरात दंगों की आग लगा देने की घटना याद कीजिये. सुकेत जब कोशिशों के बावज़ूद टीवी चैनल नहीं बंद कर पाता है या मोबाइल की स्क्रीन पर नाकोहस का कब्ज़ा कुछ ऐसा होता है कि वह उसके मन की बात भी जान लेता है तो याद कीजिये फेसबुक की टाइमलाइन पर दर्ज वह सवाल : आपके दिमाग में क्या है? अस्सी के दशक में लिखी नोम चोमस्की की विश्वप्रसिद्ध किताब मैन्यूफेक्चरिंग कंसेंट” इस अवधारणा को बहुत विस्तार से बता चुकी है. वियतनाम युद्ध सहित तमाम घटनाओं के दौरान जनता की अवधारणा को कैसे मिथ्या या अर्ध सत्यों और दुष्प्रचारों  के सहारे सत्ता के पक्ष में निर्मित किया जाता है इसे तबसे आज तक दुनिया भर में लगातार देखा गया है. अभिव्यक्ति की आज़ादी के नारे के  साथ अस्तित्व में आये मुक्तसंचार माध्यम मुक्त बाज़ार की तरह ही अपने मालिक के ग़ुलाम होते हैं और उसकी विचारधारा को लगातार इकलौती सही विचारधारा तथा बाक़ी सबके विरोधी नहीं शत्रु होने का जो द्वैत रचते हैं वह अंततः समाज में स्वतंत्र सोच और प्रतिरोध की सारी संभावनाओं के दमन के लिए आवश्यक जनमत निर्मित करता है. यही वह जनमत होता है जो खुलेआम पटियाला कोर्ट में कन्हैया की पिटाई से लेकर कलबुर्गी की हत्या तक को नज़रंदाज़ करता है. यह खाना, पहनना, बोलना, लिखना सब नियंत्रित करने की हिंसक हठ लिए संस्कृति के उद्धारक के वेश मे आई सांस्कृतिक सेना को न्यायसंगत सिद्ध करने वाला जनमत है, और उसे सही न मानते हुए भी चुप रह जाने वाला भी।
कमाने, खाने और आनंद मनाने को नाकोहस मनुष्य के लिए ज़रूरी और पर्याप्त काम घोषित करता है तो सुखवाद के इस दर्शन की मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था में विन्यस्त जड़ें साफ़ दिखती हैं. आखिर मुसोलिनी ने खुद कहा था – “फ़ासीवाद को बेहतर तरीके से कारपोरेटवाद कहा जा सकता है. क्योंकि वह राज्य और कार्पोरेट शक्ति का सम्पूर्ण विलयन है.यहाँ निकोलस लामेर साउटे का उपन्यास द वाटर थीफ़याद आना स्वाभाविक है. तो यह सुखवाद नाकोहस के लिए सबसे मुफ़ीद दर्शन है जो एक तरफ़ जनता को चौबीसों घंटे कमाने और खर्च करने के चक्र में उलझा देता है तो दूसरी तरह परम्परा,इतिहास और दर्शन की जड़ों से पूरी तरह काटकर ज्ञान की जगह सूचना पर निर्भर एक संवेदनहीन मनुष्य में तब्दील कर देता है. उपन्यास की एकदम शुरुआत देखिये . सुकेत स्वप्न में गजग्राह के मिथक का नया रूप देख रहा है. इसमें नया क्या है? नया है गज की हत्या के इर्द गिर्द ज़िन्दगी का हस्ब मामूल चलते रहना. कुछ भी हो जाये ज़िन्दगी हस्ब मामूल चलती रहती है. आहत भावनाओं के पोषण के लिए सुकेत के घर आई गुंडा छात्रों की भीड़ शिक्षकों की उस कॉलोनी में बाक़ी लोगों के लिए सिर्फ़ एक व्यवधान है, खाए अघाए संपन्न लोगों के जीवन में एक अवांछित व्यवधान. टीचर्स असोसिएशन की बैठक में वबाल से दूर रहने की सलाहें आम शिक्षकों की हैं तो प्रगतिशील बख्शी जी के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं भावनाओं का आहत होना बड़ा मुद्दा है. कॉलेज से लेकर मध्यवर्गीय सोसायटी और सड़क तक सब अपने अपने समझौतों में मशरूफ़.  आपस मे बतियाते जब ये दोस्त कहते हैं कि यह अब वह देश नहीं रहा जिसकी आदत पड़ चुकी थी हमें, तो इस बदले हुए देश मे नाकोहस के लिए इससे अच्छा माहौल क्या हो सकता है? और इस माहौल में सबसे बड़ा ख़लल है स्वतन्त्र सोच. दुनिया भर में ऐसी ताक़तों ने सबसे पहले स्वतन्त्र सोच पर हमला किया है और दुनिया भर के लेखकों ने इसे दर्ज किया है. ओरहान पामुक के उपन्यास स्नो में एक प्रसंग है। देश में सर उठा रहे दक्षिणपंथ के दौर में एक छोटे से कस्बे में हिज़ाब पहनने वाली लड़कियों को कालेज में प्रतिबंधित करने वाले सरकारी आदेश का सख़्ती से पालन करने वाले कालेज के निदेशक की हत्या के इरादे से आया एक धर्मांध युवा उनसे पूछता है – ‘क्या संविधान के बनाये नियम ख़ुदा के बनाये नियम से ऊपर हैं?’ निदेशक के तमाम तर्कों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता और वह उसकी हत्या कर देता है। हिटलर या मुसोलिनी के मॉडल ही नहीं अमेरिका में ओवरमैंन कमिटी या हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टिविटीज़ जैसी संस्थाएं नाकोहस की पूर्वपीठिका हैं. अगर वामपंथी मित्र अति संवेदनशील न हों तो स्टालिन की सत्ता संरचना भी. सन चौरासी से बयानबे तक हमारा समाज लगातार और बीमार और संवेदनहीन होता चला गया है और प्रत्यक्ष सत्ता में आने से पहले ही फासीवाद जनमानस में अपना वर्चस्व विभिन्न रूपों में स्थापित कर चुका है. इस उपन्यास मे ही नेल्ली के नरसंहार का ज़िक्र है। फरवरी, 1983 मे असम मे हुए इन दंगों मे 2000 से ज़्यादा मुसलमानों को मार दिया गया था (यह आधिकारिक संख्या है, स्वतंत्र रिपोर्टों मे यह संख्या दस हज़ार तक बताई गयी थी)। चौदह से अधिक गांवों मे एक तरह का नस्ली सफाया। सरकारें आती जाती रहीं लेकिन जांच के लिए बनी तिवारी समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गयी। कोई सात सौ केस दर्ज़ हुए थे लेकिन आधे से अधिक सबूतों के अभाव मे रद्द हो गए। जीवन हस्बे मामूल चलता रहा। जातीय नरसंहारों की तो एक लंबी सूची है। बाबरी मस्जिद विवादित ढाँचा बनती गयी और अब तो मुख्यधारा के तमाम माध्यम इसे विवादित ढांचा कहने लगे हैं। सुकेत के लेख मे जिन बातों से भावनाएं आहत हुई हैं उनमें से एक यह भी थी।

यहाँ सुकेत को गिरफ्तार करने आये चौड़ा सिंह के चरित्र को अगर थोड़ा सा विवेचित कर लें तो चीज़ें और साफ़ होंगी. संवेदना से पूरी तरह से खाली वह साक्षर लेकिन अनपढ़ नौजवान जब एक क्षण के लिए द्रवित होता है तो उसका साथी उसे तुरंत सावधान करता है. और उसकी संवेदना को हरने वाले टूल्स क्या हैं? बेरोज़गारी, इतिहास-दर्शन-साहित्यहीन शिक्षा, चारों तरफ़ बजता निरर्थक संगीत. एरिक हाब्स्बाम एज ऑफ़ एक्स्ट्रीम्स में बताते हैं - फासीवादी और ग़ैरफासीवादी दक्षिणपंथ में असली अंतर यह है कि फासीवाद निचले तबके की भीड़ को आंदोलित करके अस्तित्वमान होता है। यह निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक और लोकलुभावन राजनीति के युग से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक प्रतिक्रियावादी इन राजनैतिक व्यवस्थाओं का फ़ायदा उठाते हैं और जैविक राज्यके समर्थक इनके अतिक्रमण का प्रयास करते हैं। फासीवाद अपने पीछे जनता को भारी संख्या में ले आने में गौरवान्वित महसूस करता है’… ये पीले बीमार चेहरेही हिटलरी फरमानों को पूरी आस्था से कोई सवाल किये बिना पालित करने वाले लोग होते हैं. कला, विद्या, ज्ञान आदि से काट दिए गए पुच्छ विषाण हीन पशु में तब्दील कर दिए गए ये युवा आज हमें हर सड़क पर नहीं दिखाई देते? और इनके नेतृत्व मे दिखते हैं गिरगिट। वह अपढ़ नहीं है। खूब पढ़ा लिखा है।  पर तीनों उसे छेड़ते हैं और शम्स कहता है, "ऐन मुमकिन है, शे'र अभी भी फरमाते हों"  इस पर उसकी प्रतिक्रिया “" आई एब्हार एवरीथिंग ऑफ माई पास्ट...बीत चुके वक्त के एक एक पल से नफरत है मुझे..." इस बौद्धिक कौम का एक सिरा है भावनाओं के आहत होने को लेकर संवेदित प्रगतिशील बख्शी जी तो दूसरा सिरा है अपने अतीत मे अर्जित सारे लोकतान्त्रिक संस्कारों और ज्ञान को पूरी तरह सत्ता के पक्ष मे उपयोग करने वाला गिरगिट। बक़ौल रसूल हमजातोव अतीत पर पिस्तौलें दागते समय पर भविष्य की तोपों के गोले गिरने लाज़िम हैं, लेकिन उनकी जद मे जाने क्या क्या नष्ट होगा। टीवी की बहसों से अखबारों के पन्नों मे फासीवाद का वैचारिक आधार पुख्ता करते और उसकी कार्यवाहियों को अपने (कु) तर्कों का वैचारिक कवर देते तमाम बुद्धिजीवियों और उनके अतीत को देखते इन गिरगिटोंकी एकदम भौतिक उपस्थिति हाल के दिनों मे और मुखर होकर सामने आई है।

तो अगर एक उपन्यास वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की इस क़दर भविष्यवाणी करने लगे तो यह लेखक की सफलता भले हो, समाज की भयावह असफलता भी है.

इन सब कथाओं के बीच सुकेतु के टूटे विवाह और एक प्रेम का किस्सा है. दोस्तों के हँसी मजाक हैं. नशा है. स्त्रियाँ हैं. उनकी अपनी महत्त्वाकांक्षाएं और रुमान हैं. ये सहज मानवीय कमज़ोरियाँ जो यह बताती हैं कि सच के पक्ष में खडा मनुष्य कोई परफेक्ट मनुष्य नहीं होता रेमंड के विज्ञापन की तरह, वह हमारे आपके ही तरह एक आम मनुष्य होता है बस उसने तर्क से दुनिया को देखना सीख लिया है. चरित्र को जिस तरह से प्रगतिशील ताक़तों पर हमला करने के लिए हथियार बना लिया जाता है उसे हमने नेहरू और गांधी ही नहीं हमारे अपने समय में खुर्शीद अनवर से कन्हैया तक देखा है. तर्कों का जवाब तर्कों से देने की जगह चारित्रिक हत्याएं, अफवाहें, झूठ और दुष्प्रचार सबसे बड़े औज़ार होते हैं प्रतिक्रियावादी ताक़तों के.

मार्क्स ने कहा था कि किसी भी समय की संस्कृति उस समय के वर्चस्वशाली वर्ग की संस्कृति होती है. व्यवस्था अपने सहजबोध (कॉमन सेन्स) निर्मित करती है और उसे हर तरह से स्थापित करती है. भाषा से लेकर नाम तक उस सहजबोध का हिस्सा होते चले जाते हैं. ऑन लिटरेचर में अपने लेख फंक्शन्स ऑफ़ लिट्रेचरमें अम्बर्तो इको इटली के फासीवादी समय में भाषा के साथ हुए व्यवहार का विस्तार से विवेचन करते हैं. हमारे समय में भी यह सहज बोध लगभग स्थापित सा ही है. उर्दू यानी मुसलमान, संस्कृतनिष्ठ हिंदी यानी द्विज, लोकभाषा यानी गँवार (देहाती को लगभग गँवार के पर्यायवाची की तरह उपयोग किया जाता है). फ़िल्में इस सहज बोध को स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम हैं तो पाठ्य पुस्तकों से लेकर कथित लोकप्रिय संचार माध्यम इसे बहुत बारीक़ी से स्थापित करते हैं और यह आम जीवन में जितनी स्वीकार्य होती जाती है, वर्चस्वशाली वर्ग की जकड़न उतनी मज़बूत होती जाती है. अभी एकदम हाल की घटना है कि मेट्रो में एक आयोजन का उर्दू ब्रोशर पढ़ती महिलाओं को पाकिस्तानी कहकर लगभग धमकाया गया. पुरुषोत्तम अग्रवाल इस उपन्यास में भाषा के इस सहजबोध का दो स्तरों पर प्रतिवाद करते हैं. पहला इस उपन्यास की अपनी भाषा और दूसरा इसके कथ्य में विन्यस्त भाषा और संस्कृति का सवाल. यहाँ रघु एक ईसाई पिता की संतान है, सेना में ब्रिगेडियर रहा पिता, योग और ध्यान का अभ्यासी पिता, नैष्ठिक ईसाई और रामायण-महाभारत का जानकार पिता जिसने पुत्र का नाम राम के पितामह राजा रघु से प्रभावित होकर रखा था. कहानी के रूप में पाखी में प्रकाशित होने पर एक आलोचक मित्र ने इसे हिन्दू साम्प्रदायिकता से जोड़ कर देखा था. यह आरोप मुझे वैसे है जैसे कोई कहे कि शरद जोशी रिवर्स लव जिहाद के संघी नारे से प्रभावित होकर इरफाना जी से विवाह को उद्धत हुए थे. अव्वल तो क्या किसी ईसाई का रघु या ऐसा कोई नाम होना सचमुच इतना अस्वाभाविक है? खुशवंत सिंह के उपन्यास अ ट्रेन टू पाकिस्तान में एक पात्र है इक़बाल. वह गाँव के भाई जी को इक़बाल सिंह, एक मोना सिख लगता है लेकिन सब इन्स्पेक्टर को इक़बाल खान. क्यों लगता है, प्रबुद्ध पाठकों को यह बताना मुझे ज़रूरी नहीं लगता. कबीर खान और दीपक कबीर और कबीर राजोरिया और कबीर बेदी हमारे समाज में जाने कितने हैं. अब किसी रसखान की कृष्णभक्ति या रघुपति सहाय के फ़िराक हो जाने या किसी ब्राह्मण शायर के शीन काफ़ निज़ाम हो जाने का क़िस्सा क्या सुनाना? मेरी गुजरात पोस्टिंग के दौरान मेरी सहकर्मी थी मनीषाबेन क्रिश्चियन. दिल्ली में मेरे एक सहकर्मी हैं विजय दीप मसीह. मेरी अपनी बेटी वेरा के नाम से ही अधिक जानी जाती है. हिन्दू मिथकों से प्रभावित ईसाइयों/मुसलमानों या इसके उलट के किस्से भी हमारे समाज में इतने अनुपस्थित तो नहीं तो रघु मसीह या रघु क्रिश्चियन नाम से इस क़दर चौंका जाए? यह चौंकना दरअसल नाकोहस के उस गिरगिट की याद दिलाता है जो कहानी में एक जगह कहता है, “एक आरोप तुम पर अपनी पहचान छिपाने का है.गुलजार की काफी पहले लिखी कहानी धुंआ में मुसलमान चौधरी चाहता है कि मरने के बाद दफनाने की जगह उसे जला दिया जाय. यह किन्हें नागवार गुजरता है?  गरबा नवरात्रों में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना है. उसमें बुतपरस्ती से इंकार करने वाले मुसलमानों का शामिल होना जिन्हें आपत्तिजनक लगता है वे कौन लोग हैंकम्युनिस्ट उमर खालिद की जो पहचान इसे स्वीकार्य है वह मुसलमान की है. पहचानों के नशे में इस क़दर मदहोश हो जाना कि उनमें किसी अंतरण, किसी व्यतिक्रम के होने को अस्वीकार कर देना या संदेह की नज़र से देखना तो नाकोहस का ही नज़रिया है!  असल में उसके लिए सामने यह पहचान ओढ़े लोग होना ज़रूरी है जिससे वह हमऔर वेकी बाइनरी पैदा कर सके. तरल पहचानें उसके लिए एक संकट की तरह हैं. इसके उलट यह होना और इस होने को रेखांकित करना उस खाई के अस्तित्व का अस्वीकार और प्रश्नांकन है जिसकी उपस्थिति दक्षिणपंथ की उपस्थिति के लिए प्राण तत्व है. ईसाई होकर अपनी कविता में रघु का महाभारत के चरित्र के सहारे बात करना प्रगतिशील उमानाथजी को भी नहीं पच पाता. इसलिए जब पंडित शुक्ल जी रघु नाम जानने पर उपहास करने के लिए पूछते हैं कि नाम ही नाम के रघु हैं, या कुछ ज्ञान भी है महाराज रघु के बारे मेंतो वह इस सहजबोध के वाहकों के प्रतिनिधि बन जाते हैं और रघु जब अपनी ईसाई पहचान को साफ़ करते हुए उन्हें शास्त्रार्थ में धाराशायी करता है तो यह उस साम्प्रदायिक सहजबोध का एक प्रतिपक्ष रचता है. इसी तरह जब खुर्शीद कहता है, “मेरे नाम को लेके उर्दूआइये मतया जब सुकेत अपने सपनों में मिथकों के सहारे दुहस्वप्नों से गुजरते हुए देखता है कि मनुष्यों की ज़िन्दगी तो हस्ब मामूल चल ही रही है, देवताओं को भी उस गज को बचाने की कोई फ़िक्र नहीं तो यह एक तरफ़ उन पार्थक्य के उन बाड़ों को तोड़ते हैं जिनके बिना दक्षिणपंथ का कोई अस्तित्व ही नहीं तो दूसरी तरफ़ उस संवेदनहीन हो चुके समाज को रेखांकित  करते हैं जिसके लिए एक लेखक की मृत्यु पर हो रहे नृत्य में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं.  दूसरे स्तर पर यह काम लेखक ने उपन्यास की भाषा से किया है. जैसा कि मैंने शुरू में ही ज़िक्र किया, बेहद गंभीर विषय पर लिखे इस उपन्यास में एक पात्रों के बीच के लम्बे लम्बे संवादों में भी एक बेफ़िक्री है. शम्श ख़ासतौर बेहद मजाहिया है. हालांकि कई बार यह भाषा को हलके स्तर पर और फूहड़ मजाकों तक भी ले जाता है. मेरे लिए इसकी एक अपनी व्यंजना है. यह शत्रु को हलके में लेना नहीं है बल्कि प्रतिरोध को किसी उदास आख्यान की जगह एक ज़िंदादिल संघर्ष की तरह ज़िंदा रखना है. लोकभाषा से लेकर सोशल मीडिया और टीवी पर निर्मित हुई नई वाली हिंदीतक का बखूबी प्रयोग साजिशों की व्याप्ति के बरक्स उन स्पेसेज पर प्रतिरोध की आवश्यकता को बड़े सटल तरीके से इंगित करता है. और इन सबके साथ हर खंड की शुरुआत जिस तरह के काव्यात्मक वाक्यों या कहें कविता की दो पंक्तियों से हुई है वह संवेदना की आतंरिक तहों तक दस्तक देती है. लम्बी बहसें कई जगह ऊबाऊ हुई हैं, कई जगह इनमें उपन्यासकार पर आलोचक हावी होता दिखा है लेकिन अपनी सम्पूर्ण निर्मिति में भाषा प्रतिरोध के एक आदमक़द आख्यान के निर्माण के ज़रूरी टूल की तरह सामने आई है.

एक आखिरी उल्लेखनीय बात यह कि इस उपन्यास में कोई कृत्रिम उम्मीद नहीं. हाल में मुक्तिबोध को पढ़ते यह लगा है कि उनकी निराशा कितनी ईमानदार थी और उसी दौर में दस साल में क्रान्ति हो जाने की आशाएं कितनी निरर्थक. एक तरह का क्रांतिकारी नियतिवाद भी होता है जो अतिउत्साहों की जड़ में होता है. पामुक के उपन्यास अ स्ट्रेंजनेस इन माई माइंडमें वामपंथी युवा फ़रहत भीतर भीतर आसन्न संकट और हार को जानता है लेकिन प्रत्यक्ष में कहता है हम जीतेंगे. एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए यह ज़रूरी हो सकता है लेकिन एक लेखक के लिए यह असल में बेईमानी है. उसे निराशाओं को भी उनकी पूरी भयावहता के साथ दर्ज़ करना होता है जैसे अम्पटन सिंक्लेयर जंगलमें करते हैं या मुक्तिबोध अँधेरे मेंजैसी कविता में. इस निराशा और नाउम्मीदी का स्वीकार ही सामने खड़ी चुनौती का असली आकार देखने को मजबूर करता है और उसके बरक्स ज़रूरी लड़ाइयों की हदें भी। नाकोहसमें जो अँधेरा है उसमें उम्मीद की इकलौती मद्धम रौशनी तीन दोस्तों की बेफ़िक्र हँसी में है, ज़िद में है, पागलपन में है, बेबसी में है, उदासी में है. इसलिए यह उपन्यास महान उपन्यास हो न हो आज एक बेहद ज़रूरी उपन्यास है. अपने समय का एक ज़िंदा दस्तावेज़ जो जितनी जल्दी अप्रासंगिक हो जाए, समाज के लिए उतना ही प्रासंगिक होगा.




[1] अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है /मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है (अहमद फ़राज़)
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पाखी के मई अंक से साभार