अभी हाल में


विजेट आपके ब्लॉग पर
मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

मुख्यधारा का मीडिया किसका ताबेदार है?


  • -- शीबा असलम फ़हमी


जिस तरह हम स्टॉक-एक्सचेंज, मुद्रा-बाज़ार या सटोरिया बाज़ार पर नैतिकता का बोझ डाले बग़ैर उन्हें आत्मसात कर चुके हैं, अगर उसी तरह समाचार-मीडिया को भी हम आत्मसात कर लें तो बहुत से ऐसे कष्टों से बचा जा सकता है जो हमारी अंतरात्मा पर भारी पड़ते हैं. यक़ीन मानिये की मीडिया भी इस मुक्ति के लिए छटपटा रहा है. वो नैतिकता के दबाव में न खुद खुल के मुनाफ़ा-उन्मुख हो पा रहा है न अपने उपभोक्ता को अपना असली हुनर दिखा पा रहा है. फिर भी अहिस्ता-अहिस्ता मीडिया खुद ही भार-मुक्त हो रहा है. नेपाल-भूकंप, केदार-नाथ-बाढ़ से ले कर ख़ुदकुशी और फांसी की लाइव रिपोर्टिंग तक मीडिया अपनी उत्सव-धर्मिता का परिचय दे चुका है. मीडिया हर कष्टकारी-सवाल और कष्टकारी-घटना में मनोरंजन फेंट के अपने उपभोक्ता के दुखों को कम करना चाहता है. लेकिन हमारा आदर्शवाद है की उससे समाज की बिमारियों का इलाज करवाना चाहता है, निर्मम सर्जरी करवाना चाहता है. भारत ग़रीबों का देश है, वंचितों का देश है, अन्याय की पीड़ा में तड़पती नस्लों का देश है. काश मीडिया इन्ही के हाथों में भी होता. (लेकिन ये ग़रीबी, पीड़ा और बेदखली दी किसने है? जिसके हाथों में मीडिया है उसने .) तो ये तो मुमकिन नहीं, ऐसे में मीडिया जैसा महंगा शौक़, ग़रीबी, अन्याय, महरूमी को भी बेचने लायक़ कमोडिटी न बना दे तो क्या करे? कुछ जुनूनियों को छोड़ दें तो मुख्यधारा का मीडिया वैश्विक कॉर्पोरेट-लूट से ध्यान हटाने, या उसको सही-ठहराने, उसका महिमा मंडान करने, और उसके अवरोधों को औकात बताने का औजार भर है.

लेकिन ऐसा करते हुए उसे स्वीकार्यता भी चाहिए जिसके लिए वो शहरी प्रभुत्व-वर्ग के अहम्, दंभ, आदर्श और नैतिकता को महिमा-मंडित करता रहता है. प्रभुत्व-वर्ग का धर्म, आस्था, भाषा, तीज-त्यौहार, मूल्य-मान्यताएं, मनोरंजन और भय, का प्रतिपादन विशेषांकों और पेज-३ के कंटेंट से सुनिश्चिंत करता रहता है. क्यूंकि जब तक ये वर्ग सधा रहेगा, तब तक नेता-कॉर्पोरेट की जुगलबंदी निर्बाध चलती रहेगी.

मुख्यधारा के मीडिया पर सबसे पहले एक स्थापना: भारत राष्ट्र-राज्य जो की अपनी काया में एक ‘सवर्ण-हिन्दू-पुरुष’ है का सबसे बेहतरीन तराशा हुआ हथियार भारतीय मीडिया है. एक सवर्ण हिन्दू पुरुष का महिलाओं के प्रति, दलितों के प्रति, अल्पसंख्यकों के प्रति, हाशिया ग्रस्त के प्रति, विदेश निति के प्रति, राष्ट्रीय सीमाओं के प्रति, राष्ट्रीय संसाधनों के प्रति और ‘सुरक्षा’ के प्रति जो मालिकाना रवैय्या है, भारतीय मीडिया उसका दर्पण है. बस दिक्क़त ये है की माडिया ने हमें बड़ी होशियारी से इस भ्रम में मुब्तिला रखा की वो समाज को प्रगतिशील बनाने का काम कर रहा है और इस प्रक्रिया में वो खुद एक आधुनिक प्रहरी की भूमिका में है. और ये वो भ्रम ही है जिसके चलते हम बार-बार नैतिक सवालों के आधार पर मीडिया को परखने बैठ जाते हैं. उस पर विशेषांक निकलते हैं, उस पर रेडियो-टीवी में विशेष चर्चा होती हैं. और पाठक-दर्शक वर्ग को भी गुमराह करते हैं की मीडिया कोई हवन-कुंड है जिसके ज़रिये बुराई ख़त्म होनी है.

भारत में समाचार-मीडिया उस वक़्त जन्मा जिस वक़्त देश एक विदेशी सत्ता से आज़ाद होने के संघर्ष में मुब्तिला था. राजनैतिक फ़िज़ा हर प्रकार के विद्रोह, अवज्ञा और आन्दोलन का, देश की आवाज़ के तौर पर स्वागत कर रही थी. भारतीयता का महिमामंडन चरम पर था. विदेशी शासक नीच, लालची और षड्यंत्रकारी शोषक था तो हम सीधे-सादे पीड़ित. ऐसे समय में जनमानस के बीच समाचार-पत्र आज़ादी के संघर्ष को जन जन तक पहुंचा रहे थे. तिलक, गाँधी, नेहरु, पटेल एक तरफ, तो कुटिल अंग्रेजी सरकार और पाकिस्तान का ख्वाब देखने वाले विधर्मी जिन्ना दूसरी तरफ़. लेहाज़ा राजनीती और समाज के चिंतन में ये दो फाड़ ही चिंतन का मुख्या आधार बन गए. यानी उसी समय राजनैतिक-सामाजिक तौर पर अगले सौ सालों का मुख्य-विमर्श तय हो गया की हम साम्प्रदायिकता-धर्मनिरपेक्षता और इसमें विदेशी क्षडयन्त्र के त्रिकोण में ही उलझे रहने वाले हैं.

भारत का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन जिस तरह शिक्षित, संभ्रांत, कुलीन, शहरी हिन्दू मर्दों के हाथ में था, समाचार पत्रों का सञ्चालन भी इसी वर्ग के हाथ में था. इसलिए कोई ताजुब नहीं की बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर के जाती-विरोधी आन्दोलन को कभी भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन नहीं माना गया. महिलाओं की छतपटाहट और आजादी के अजेंडे को कभी भी राष्ट्रीय अजेंडा का दर्जा नहीं मिला. कोढ़ में खाज ये हुआ की पाकिस्तान-तहरीक ने तीसरा ‘राष्ट्रवादी’ कोण दे कर बहुजन के अजेंडे को हाशिये से बाहर कर दिया.

इस माहौल की पैदाइश और परवरिश पाया मीडिया सवर्ण-हिन्दू-पुरुष की काया से निकल कर कैसे दलित-नारी-अल्पसंख्यक काया में प्रवेश करे? खबरनवीसी वाली मीडिया से दलित, महिला, पिछड़ा, और अल्पसंख्यक खामखाँ की उम्मीद पाले बैठा है.
इक्कीसवीं सदी के भारत के अख़बारों में जब ये खबर सुर्ख़ियों में छपती है की ‘युवती प्रेमी संग भागी’ या ‘प्रेमी ने तेज़ाब फेंका’,या ‘प्रेम-संबंधों के चलते पत्नी की हत्या’, तो अहसास होता है की रिपोर्टर से ले कर संपादक तक खाप पंचायत के नज़रिये से लैस हैं. लड़की कैसे अपने जीवन का एक फैसला ले सकती है? अगर एक प्रेमी-जोड़ा पैत्रक परिवार से बहार आया है तो बस ये लड़की के बहकाने का मामला हो सकता है, लड़का बेचारा मासूम है और नारी नरक का द्वार है, तेजाब भी लड़की की नाफ़रमानी की ही वजह से फेंकना पड़ता है, और ‘रखैल-दूसरी पत्नी’ की मान्यतावाले समाज में पत्नी का प्रेम सम्बन्ध उसकी हत्या पर न ख़त्म हो तो और क्या हो? इन सभी सुर्ख़ियों में आप महिला के अपराध को पहचान पा रहे हैं ना?

कुछ और सुर्खियाँ देखिये - ‘दलित महिला को नंगा कर घुमाया’, दलित महिला से गैंग-रेप कर हत्या’, ‘खैरलांजी में दलित महिलाओं की हत्या’, ‘दलित दुल्हे के घोड़ी चढ़ने पर बवाल’ आदि सुर्खियाँ इसलिए नहीं होती हैं की पूरा भारतीय समाज उद्वेलित हो सके, बल्कि इसलिए होती हैं की ये ऍफ़.आई.आर हो ही गयी है इसलिए क्राइम-रिपोर्ट बनती है, लेकिन है ये दलित समाज का मसला, दलित-नेता-कार्यकर्ता और सरकार इसे देख लेंगे. बृहत-समाज अपना कीमती समय न बर्बाद करे. लेकिन जब ‘पिछड़ा’ या ‘दलित’ लगाये बग़ैर सुर्खियाँ छपने की चूक हो जाती है तो १६ दिसंबर का बलात्कार डेल्ही-रेप-काण्ड आन्दोलन में तब्दील हो जाता है और सरकार-प्रशासन-न्यायपालिका की चूलें हिल जाती हैं. आखिर एक ग़ैर-दलित हिन्दू महिला का गैंग-रेप दिल्ली कैसे बर्दाश्त करती? इस घटना से उत्साहित हो कर १६ दसंबर के बाद होनेवाले गैंग-रेप+हत्या की १०० घटनाओं की फेहरिस्त दलित-कार्यकर्ताओं ने हर मीडिया में भेजी, लेकिन ये दुर्दांत अपराध की रिपोर्टिंग हुई क्या? कोई आन्दोलन हुआ क्या?

सुर्ख़ियों को समझने के इसी सूत्र के सहारे आप उन ख़बरों को भी याद कर लें जिनमे गिरफ़्तारी होते ही तय हो जाता है की एनकाउंटर में ढेर हुआ या गिरफ्तार हुआ पुरुष ‘आतंकवादी’ ही है, वो लश्कर-इ-तैयाबा का मेम्बर है और पि.एम्., सी. ऍम. को मारने के लिए घूम रहा था. भारत के नार्थ-ईस्ट राज्यों, कश्मीर और छतीसगढ़ आदि में तैनात पुलिस, सुरक्षा बल, आदि को मिलनेवाले मैडल के पीछे की कहानियों को मीडिया में खंगाल के देखिये.
न्याय-प्रिय समाज ये बकते-बकते थक गया की मीडिया ट्रायल बंद हो, मीडिया लेबिल चिपकाना बंद करे, मीडिया मुलजिम और मुजरिम के बीच के भारी फर्क को नज़रंदाज़ न करे. लेकिन नहीं, मीडिया तो पुलिस-नेता-न्यायाधीश-ज्योतिषाचार्य का ऐसा जानलेवा मिश्रण है की जो इसकी ज़द में आया, गया.

ये तो वो है जो मीडिया करता है, और ये छोटा हिस्सा है उसके चरित्र का, समझिये उसको जो वो नहीं करता है. वो कभी भी राष्ट्र की ‘सुरक्षा-निति’ पर सवाल नहीं करता. रक्षा मंत्रालय का बजट जो की हमेशा स्वास्थ्य और शिक्षा बजट से लूटकर बढाया जाता है पर मीडिया हाय-तौबा करता है क्या? रक्षा संस्थानों में भ्रष्टाचार, अस्त्र-शास्त्र की खरीद फरोख्त, यौन-उत्पीडन, कश्मीर-नार्थ-ईस्ट-छत्तीसगढ़ में हो रहे हत्या-बलात्कार-लूट पर बात करता है क्या? युद्ध या प्रॉक्सी-वॉर पर कोई सवालिया निशान लगाता है क्या? युद्ध–उन्माद, शस्त्रों की होड़, सीमा पर तनाव का उत्सव नहीं मनाता क्या? विदेश दौरे के दौरान कई सौ करोड़ जो बाप-का-माल समझ कर बांटे गए उन पैसों की बर्बादी पर किसी भी समाचार-मीडिया ने सवाल उठाया क्या? विदेश नीति की नाकामयों जिसके चलते चारो तरफ से पड़ोसियों से खतरा बना रहता है पर मीडिया सख्त सवाल पूछता है क्या? परमाणु शस्त्र और मिसाइलों की होड़ पर मीडिया सवाल उठाता है क्या? प्रधानमंत्री के विदेश दौरों से किस कॉर्पोरेट समूह को व्यवसायिक लाभ मिल रहा है, इस पर किसी ने चूं भी की क्या? राज्य जो भी स्याह-सफ़ेद करे वो सब सही मान पचा जाने वाला मीडिया तंत्र शासक वर्ग को संकट में नहीं डालता बल्कि उनकी हरकतों पर या तो पर्दा डालता है या उन्हें सही ठहराने में जुट जाता है.

29 और 30 जुलाई 2015 की रात जब सर्वोच्च न्यायलय में याक़ूब मेमन की फांसी रोकने की अंतिम कोशिश का स्वांग चल रहा था, तब मीडिया का जमावड़ा कोर्ट के बाहर लाइव रिपोर्ट कर रहा था. इसी रिपोर्टिंग पर कमेन्ट करते हुए किसी फेसबुक मित्र ने पोस्ट लिखी थी की ‘एनडीटीवी इंडिया के एक सीनियर रिपोर्टर इस समय की रिपोर्टिंग को एक एडवेंचर की तरह रिपोर्ट करते हुए इसकी तुलना पिछली ऐसी ही रोमांचक रिपोर्टिंगों से कर रहे हैं’. उनका आशय था की इस सीनियर रिपोर्टर के लिए आधी रात की अदालत की ये रिपोर्टिंग महज़ एक एडवेंचर है, ये किसी की जिंदगी-मौत का सवाल नहीं है, न ही राष्ट्र के सामने खड़ा एक नैतिक भार से दबा वो क्षण जिसमे राष्ट्र के चरित्र का फैसला होना है. (यहाँ मैं उन पत्रकारों की बात नहीं कर रही जिन्होंने फांसी की सज़ा के बने रहने पर एक दूसरे को बधाई दी थी, उनसे तो कोई उम्मीद ही नहीं). आप यकीन करें मीडिया हर ऐसी घटना को मनोरंजन में बदल सकता है, उसे ज़रा आप दर्शक-पाठक अपनी नैतिक आकांक्षाओं से मुक्त तो कीजिये.

देखिये देश को सवर्ण-हिन्दू-पुरुष चला रहे हैं, उद्योग, कारोबार, न्यायपालिका और मीडिया भी वही चला रहे हैं. कहीं कोई दिक्क़त है ही नहीं. भारत का आजाद मार्किट में तब्दील हो जाना और तथाकथित आज़ाद मीडिया का पैदा होना एक ही घटना के दो सिरे हैं. पूंजीवाद के इस निबार्ध, निर्लज्ज दौर में मीडिया रोड़ा नहीं है, बल्कि वो जादूगर है जो भारत में चल रही संसाधनों की लूट को, उनके खिलाफ जनांदोलनो को, दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक विस्थापन को, राज्य-समर्थित नस्लकुशी को आपकी नज़रों से ओझल रखता है. लेकिन उन इमानदार बुद्धिजीवियों, आर्थिक-राजनैतिक विशेषज्ञों और इंसाफ़पसंदों का क्या करें जो इस खेल को समझते हैं? उन को खपाने के लिए ‘एनडीटीवी-रवीश कुमार’ जैसे कुछ केलकुलेटेड-रिस्क हैं ना. हालाँकि सवाल ये है कि और कितने दिन?
------------------------------




दिल्ली में रहने वाली शीबा 
जानी मानी पत्रकार, स्तम्भ लेखक 
और एक्टिविस्ट हैं। 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

बाज़ार और टीवी सीरियल : प्रांजल धर

अँधेरा इन दिनों सबको नया-सा लगता है
बाज़ार की माँग के हिसाब से तय होते हैं टीवी सीरियलों के विषय और चरित्र

  • प्रांजल धर 


कोई सात साल पहले की मेरठ की एक ख़ूबसूरत रात की बात है। ख़ूबसूरत यानी सन्नाटे भरी। माघ महीने के अँजोर पाख की रात। शब्दों से नशा पैदा करने वाले शायर शबाब मेरठी से अचानक मेरी मुलाकात हुई। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे कहा कि आप तो मीडिया पर लिखते हैं, आप यह बताइये कि आपको आज तक का सबसे पसन्दीदा टीवी सीरियल कौन-सा लगा? मैंने अपने दिल की बात तपाक से कह दी कि ‘फिर वही तलाश’। तब उन्होंने बताया कि इस सीरियल के टाइटिल सांग और डायलॉग्स को लिखने से लेकर इसकी रचना तक के अन्य अनेक चरणों में भी उनका योगदान रहा है। मेरे पास शब्द नहीं हैं, उस पल को बयाँ करने के लिए कि अपने सर्वाधिक प्रिय टीवी धारावाहिक की मुख्य टीम में शामिल रहे किसी महत्वपूर्ण शख्स से बहुत लम्बी बात करने का मौका मुझे मिला है। मैंने उनकी चर्चित किताब ‘लोहे का जायका’ पढ़ी थी। यह किताब मेरे पैदा होने के तीन बरस पहले यानी सन 1979 में दिल्ली से प्रकाशित हुई थी और नब्बे के दशक में मुझे मेरे एक पत्रकार मित्र ने उपहार में दी थी। शबाब मेरठी अच्छे शायर हैं, यह बात तो मुझे मालूम थी। पर सीरियल वाली बात से मैं बिल्कुल अनजान था। तभी सोचा था, और उन्होंने कहा भी था कि धारावाहिकों के बदलाव और विश्लेषण पर कुछ लिखो प्रांजल। इस बदलाव का ज़िक्र करते हुए उन्होंने अपना एक शेर कहा था, “किसी को दर्द, किसी को दवा-सा लगता है/ अँधेरा इन दिनों, सबको नया-सा लगता है।” मैंने उनसे हाँ कहा था। उस लेखन की शुरूआत करते हुए मैं शबाब मेरठी साहब को धन्यवाद दे रहा हूँ।

जहाँ पिछली शताब्दी के सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में दूरदर्शन अकेला चैनल था, वहीं आज ज़ी टीवी, सोनी, कलर्स, स्टार प्लस, लाइफ़ ओके, सहारा वन और सब टीवी जैसे अनेक चैनल ऐसे धारावाहिकों को प्रसारित कर रहे हैं जिनसे हमारे देश का मिडिल क्लास बहुत लगाव महसूस करता है। ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ के बाद आया ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे टीवी सीरियलों का दौर। इसके बाद ‘ब्योमकेश बख्शी’ और ‘देख भाई देख’ जैसे सीरियलों ने अपना जलवा बिखेरा और उस समय के यथार्थ को परदे पर पेश करके इण्डियन सोप ओपेरा की नई इबारत लिखी। जहाँ ‘ब्योमकेश बख्शी’ वकील से लेखक बने शरदिन्दु बन्द्योपाध्याय की साहित्यिक कृति का टेलीविज़न संस्करण था, वहीं ‘देख भाई देख’ ने जया बच्चन के प्रोडक्शन और आनन्द महेन्द्रू के लेखन और निर्देशन के अन्तर्गत हल्की-फुल्की कॉमेडी टीवी शो के रूप में अपनी खूब पहचान बनाई। ‘देख भाई देख’ पहले तो डीडी मेट्रो पर 1993 से 1997 के दौरान दिखाया गया और बाद में सोनी सब टीवी और दूरदर्शन पर इसका पुनर्प्रसारण किया गया। फ़रीदा जलाल, शेखर सुमन, नवीन निश्चल और उर्वशी ढोलकिया जैसे कलाकारों के अभिनय ने दीवान परिवार की तीन पीढ़ियों की समानताओं-असमानताओं को नये तरीके से दर्शकों के सामने रखा था। बहरहाल, आज के सीरियल नई देहभाषा के साथ-साथ नये किस्म के संवादों को पेश करके बदलाव की नई बयार का रुख़ नापने की कोशिश करते नज़र आते हैं। यह ठीक है कि न सिर्फ़ सीरियलों के मुद्दे बदले हैं, बल्कि उनकी थीम, करेक्टर, भाषा और बारीकी की मात्रा में भी बहुत परिवर्तन आए हैं। इनमें से काफी कुछ तो बाजार ही तय कर रहा है ताकि लोगों का ‘टाइम पास’ आराम से हो सके। फिर भी तमाम दर्शकों को आज की तकनीकों से लैस धारावाहिक अँधेरे की तरह ही लगते हैं। किरदारों के चेहरों पर लगातार लम्बे समय तक कैमरे को फोकस कर-करके दर्शकों को बोर करना मानो आज शगल ही बन चुका है। ऊपर से कानफोड़ू ध्वनियाँ तंग करती हैं, जिन्हें कम से कम संगीत कहने से तो परहेज ही करना उचित होगा। इन सवालों पर सीरियल निर्माताओं को सोचना चाहिए।

समय के साथ पहनावे, फैशन, सोच-विचार और राजनीतिक यथार्थ में बदलाव आए। यह राजनीतिक यथार्थ में आई बदलाव की लहर को पकड़ने की ही कोशिश है कि ज़ी टीवी के सीरियल ‘कुबूल है’ ने धर्म और रिश्तों के आपसी उलझाव की व्यापक पड़ताल की। ज़ोया और असद की तय शादी के बार-बार टूटने का यथार्थ हमें बताता है कि आज समय किस कदर बदल चुका है। असद का छोटा भाई इस सीरियल में अपने पहनावे का बहुत खयाल रखता है। वैसे इस सीरियल ने इस्लामी कल्चर को बेहद रवानी के साथ पेश किया है और आज धारावाहिकों की भीड़ में भी यह शायद अकेला ऐसा सीरियल है जो मुसलमानों में हो रहे वैचारिक परिवर्तनों को बेहद गहराई से रेखांकित करता है। पर एक अँधेरा पहलू यह भी है कि आज के धारावाहिकों में कुछ खास टाइप्ड फ़ार्म्यूलों और कुछ स्पेशल स्टाइल के उबाऊ दोहरावों के कारण दर्शकों का एक बड़ा तबका इनसे भाग भी रहा है। इसीलिए सीरियलों में व्याप्त अँधेरे को दूर करने के लिए सीरियल इण्डस्ट्री पर एक दबाव यह है कि किस तरह इस दूर भागते दर्शक वर्ग को नज़दीक लाया जाए?

भारतीय समाज का एक पुराना मिथक है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है। क्या किसी कामयाब स्त्री के पीछे किसी मर्द का हाथ नहीं हो सकता! हमारे नये समय की नई सोच को देखना हो तो ‘दिया और बाती हम’ का नाम लिया जा सकता है। स्टार प्लस के इस सीरियल में कम पढ़ा-लिखा सूरज अपनी टॉपर पत्नी सन्ध्या के सपनों को पूरा करने के लिए अनेक मुसीबतें झेलता है। यह सीरियल वैचारिक बदलाव का बैरोमीटर है। पुष्कर की एक मारवाड़ी फैमिली से जुड़े ढेर सारे पहलुओं को दिखाकर दर्शकों का मन मोहने वाला यह सीरियल परम्परा और आधुनिकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। हमारे समय की आधुनिकता के तापमान को मापते हुए यह सीरियल परम्पराप्रेमी सास भाभो को दर्शकों के सामने लाता है और उनके संवादों के ज़रिये प्रेम में मगन एक ऐसे जोड़े को पेश करता है जिनकी शैक्षिक योग्यताएँ बहुत अलग हैं, जिनमें बहुत ज्यादा ऐसे डिफ़रेंसेज़ हैं, जिसे हम मनोविज्ञान की चलताऊ भाषा में ईडियोसिनक्रेसीज़ कह सकते हैं।
 प्रेम फिल्मों के लिए ही नहीं, बल्कि सीरियलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण और रोचक विषय रहा है। सवाल है कि इस घिसे-पिटे विषय में नया क्या है? हाँ, नया है प्रेम को पेश करने का तरीका, चाहे वह एसएमएस की सुविधा का लाभ लेते हुए किया जाए या फिर वैलेण्टाइन कार्ड देकर। उदारीकरण और सैटेलाइट चैनलों की बाढ़ के बाद प्रेम की व्यूअरशिप में जो बदलाव आए उन्होंने सीरियल-निर्माताओं पर यह दबाव डाला कि वे प्रेम के ऐसे पक्षों को प्रसारित करें जो या तो अब तक अछूते रहे थे या फिर जिनका ग्लोबल करेक्टर रूपायित नहीं हो पा रहा था। पर इस ग्लोबल करेक्टर में सामाजिक सरोकार खोजना रेगिस्तान में पानी खोजने के बराबर कठिन हो सकता है। पहले भी प्रेम के सीरियल बने और दिखाए गये थे। उदाहरण के लिए हम प्रेम के गुनगुने और शरबती आयाम को दिखाने वाले दूरदर्शन के दो दशक पुराने सीरियल ‘फिर वही तलाश’ का नाम ले सकते हैं। यह सीरियल जब शुरू होता था तो शबाब मेरठी के लिखे टाइटिल सांग की ये पंक्तियाँ अनिल बिस्वास के संगीत के अन्तर्गत चन्दनदास की मीठी आवाज़ में गूँजती थीं-

     यूँ निकल पड़ा हूँ सफ़र पे मैं, मुझे मंजिलों की तलाश है,     नए रास्ते, नए आसमाँ, नए हौसलों की तलाश है।     जहाँ बन्दिशों की हो हद ख़तम, उस हसीं सहर की तलाश है,     जहाँ रंग-ओ-ख़ुशबू का हो मिलन, मुझे उस उफ़क़ की तलाश है।

पर इस टाइटिल सांग का वह हिस्सा भी कुछ कम मज़ेदार नहीं जो इस सीरियल में नहीं गाया गया था। वह यों है-
     मुझे याद है तेरे इश्क में कभी फूल बनके हँसा था मैं,     मेरी उस हँसी पे जो हँस सके, उन्हीं कहकहों की तलाश है।     कोई मुझसे दूर भी जाए तो, जिन्हें अपनी रूह में सुन सके,     मुझे ज़िन्दगी तेरी नब्ज़ में उन्हीं आहटों की तलाश है।     वो जो मुद्दतों मेरे साथ था, वो जो मेरा दाहिना हाथ था,     मेरी ज़िन्दगी से निकल गया, मुझे आसरों की तलाश है।


इनके बरअक्स आज प्रेम को केन्द्र में रखने वाले सीरियलों का मिजाज अलग ही है। कॉस्मेटिक उत्पादों से लबरेज। कई बार तो कॉरपोरेटिया प्यार भी और अक्सर प्रोफेशनल। मसलन, ‘मधुबाला – एक इश्क, एक जुनूँ’ की बात करें तो एक ब्यूटीशियन का काम करने वाली और फिल्म इंडस्ट्री के इर्द-गिर्द पलने-बढ़ने वाली इसकी नायिका मधु और उसके प्रेमी आरके के बीच आने वाले नए-नए अड़ंगे दर्शकों को काफी पसन्द आए। आज इश्क से जुड़ी चीजें ‘प्यार का दर्द है मीठा-मीठा, प्यारा-प्यारा’(स्टार प्लस पर) और ‘बड़े अच्छे लगते हैं’(सोनी पर) जैसे सीरियलों के ज़रिये अपने बदले हुए रूपों में दिखाई जा रही हैं। ‘बानी – इश्क द कलमा’ जैसे सीरियलों ने उन भारतीय परिवारों पर अपना फोकस किया है जो अपनी बेटियों के लिए एनआरआई यानी कोई विदेश में बसा भारतीय या भारतीय टाइप का लड़का खोजते हैं। बैकग्राउण्ड में पंजाबी जीवनशैली को रखने वाले इस सीरियल का नाम शुरू-शुरू में ‘गुरबानी’ था लेकिन सिखों की कुछ आपत्तियों के चलते इसका नाम बदल दिया गया। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए लोकेशन अब ड्राइंगरूम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आउटडोर शूटिंग, हरियाली और पेड़ों की प्रस्तुति पर भी खासा ध्यान दिया जाने लगा है। तमाम सीरियल तो जान-बूझकर गाँव-जवाँर की सोंधी माटी, खेतों और फसलों के आंचलिक नज़ारों का मद्धिम छौंक लगाते नज़र आते हैं।

 ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ ने सास बहू जैसी किसी स्टोरी की बजाय चालीस की उम्र के आस-पास के एक जोड़े की भावनाओं को समग्रता में दिखाया है। युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षाएँ ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में बढ़ी हैं और लिव-इन, होटल कल्चर या करियर की तरफ ध्यान देने के कारण आज विवाह की उम्र बढ़ी है। राम कपूर और प्रिया पहले शत्रुता का भाव रखते हैं, फिर दोस्त बनते हैं और वक्त के साथ यह दोस्ती प्यार में बदल जाती है। इस सीरियल में, और प्रकारान्तर से कहें तो आज के अनेक सीरियलों में भाई-बहन के खूबसूरत रिश्ते भी पार्श्व में चलते रहते हैं। यह सब एक भव्य सेट के साथ आज के सीरियलों में दिखाया जा रहा है। हालाँकि ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ जैसे सीरियलों ने भी संयुक्त परिवार की विकृतियों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया और दर्शकों ने इसे खूब पसन्द भी किया है। आज के सीरियलों ने हमारे समाज का चित्र खींचने के साथ-साथ उसे यह प्रेरणा भी दी है कि उसे कैसा होना चाहिए। उदाहरण के लिए ‘प्यार का दर्द है मीठा-मीठा, प्यारा-प्यारा’ की अवन्तिका के फ़ैशन सेंस ने बहुत प्रशंसक पैदा किये हैं और मेट्रोपॉलिटन्स में ही नहीं, गाँवों में भी इस तरीके के फ़ैशन का असर देख सकते हैं। यहाँ आदी और पंखुरी के दोस्ताना रिश्ते में प्यार का मसालेदार छौंक भी मिला हुआ है। ज़ाहिर है कि आज का समाज ‘नीम का पेड़’ वाले समाज से काफी आगे का है और आज के व्यूअर्स परिधान और गहनों के साथ-साथ इस बात पर भी ध्यान देते हैं कि उनके प्रिय सीरियल में किरदारों के पास किस कम्पनी के मोबाइल फोन्स, आई पॉड्स या कारें हैं या फिर उनके घरों की, उनके किचन की सजावट भला किस तरह की गयी है। ‘इण्टीरियर डेकोरेशन’ वाले समय में आज खाने से ज्यादा जोर खाना परोसने के और खाना खाने के तरीकों पर है। अधिकतर सीरियलों के परिवार आर्थिक रूप से सम्भ्रान्त दिखते हैं, लम्बी-लम्बी विदेशी गाड़ियाँ दिखाते हैं या फिर गाँव-गँवई के फुटेज लाकर रूरल-अरबन डिवाइड का रेखांकन करते हैं।

 सोचने वाली बात है कि आज के सीरियलों की स्क्रिप्ट भला किस किस्म के लोग लिख रहे हैं? एक दौर था जब शबाब मेरठी जैसे लोगों ने यह काम किया था, गरीबी के ऐसे दिन देखे थे कि पेट भरने के लिए अपने तमाम लेखों और स्क्रिप्ट को रद्दी में कबाड़ी वाले को बेच दिया मजबूरी में। आज भी मेरठी साहब (जिनका मूल नाम दिनेश कुमार स्वामी है) कहते हैं कि मैं सोचता था कि गीत और स्क्रिप्ट मैं किसी को दिखाकर क्या करूँगा प्रांजल! जिसको मेरा लेखन अच्छा लगेगा, वह मुझे खुद खोज लेगा। उसके बाद वे बताते हैं कि किस प्रकार कमलेश्वर जी ने अपनी कथा यात्रा नामक पत्रिका में उनकी रचनाओं को प्रमुखता से स्थान दिया था, कि किस तरह बेनज़ीर भुट्टो उनसे तब सम्पर्क रखती थीं, जब वे निर्वासन में थीं और अख़बार निकाला करती थीं, कि किस प्रकार मेरठी साहब कितनी गहराई तक कम्युनिस्ट बने रहे...। ये संस्मरणात्मक बातें लिखने का औचित्य यहाँ नहीं बनता इसलिए इन चीज़ों पर कभी बाद में विस्तार से लिखूँगा। फिलहाल इतनी प्रासंगिकता इन बातों की यहाँ ज़रूर है कि अगर स्क्रिप्ट राइटर काफी पढ़ा-लिखा होगा, हाशिये के लोगों के प्रति उसमें कोई संवेदना होगी तो कहानी में दम अपने आप आ जाएगा और कोई भी सीरियल उतना ही कामयाब या लोकप्रिय होता है जितनी कि उसकी कहानी। आर.के. नारायण की लघु कथाओं पर आधारित ‘मालगुडी डेज़’ इस बात की एक उम्दा मिसाल है।



 चाहे वह नैतिक और अक्षरा सिंघानिया के रिश्तों को लेकर दिखाया जाने वाला सीरियल ‘यह रिश्ता क्या कहलाता है’ हो या फिर कच्ची उम्र के पक्के रिश्तों का खाका खींचने वाला सीरियल ‘बालिका वधू’, इन सबमें मानवीय सम्बन्धों की भीतरी तहों तक पहुँचने की कोशिश की गयी है। उन तहों की जिन्हें हमारे देश का मध्य वर्ग देखना चाहता है, जब वह टाइम पास कर रहा होता है। शुद्ध मनोरंजन को केन्द्र में रखकर बनाये जाने वाले इन सीरियलों में समाज तो खूब दिखता है लेकिन सामाजिक सरोकार उतने नहीं दिखाई देते। इनकी सारी संवेदनाएँ बनावटी लगती हैं, स्त्रियों की छवियों को भी ये कोई अच्छे तरीके से नहीं पेश करते, ये प्रायः बाज़ार के बोझ तले दबे-से नज़र आते हैं और समानता जैसे सामाजिक मूल्यों से इनका कोई वास्ता भी नहीं होता। शबाब मेरठी के ही शब्दों में कहें तो “कुछ लोग जिनके पास चरागों के ढेर हैं/ वो लोग चाहते हैं बड़ी लम्बी रात हो।” वैसे भी फेसबुक और इण्टरनेट से जुड़ी हमारी युवा पीढ़ी अपने घर के पड़ोस में रहने वाले लोगों की तुलना में उनकी फिक्र ज्यादा करती है जो उससे फेसबुक पर जुड़े हुए हैं, कहीं थाईलैण्ड या अमरीका में बैठे हैं और जिनसे न पहले कभी उनकी मुलाकात हुई होती है और न ही आगे होने की कोई सम्भावना बनती है। तो क्या मदर्स डे, फ़ादर्स डे और वैलेण्टाइन डे वाली टेलीविजन धारावाहिकीय संस्कृति ही हमारे समाज का पूरा सच है? अगर नहीं, तो ‘मालगुडी डेज़’ जैसे सीरियल आज क्यों कोई बना नहीं पा रहा?
---------------------

प्रांजल धर 
मई 1982 में  उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले के ज्ञानीपुर गाँव में जन्मे  प्रांजल की  कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ, यात्रा वृत्तान्त और आलेख देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में  प्रकाशित और प्रकाशित। देश भर के अनेक मंचों से कविता पाठ। अनेक विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय- अन्तरराष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में व्याख्यान। राष्ट्रकवि दिनकर की जन्मशती के अवसर पर ' समर शेष है ' पुस्तक का संपादन। ' नया ज्ञानोदय ' और ' जनसंदेश टाइम्स ' समेत अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भकार । वर्ष 2006 में राजस्थान पत्रिका पुरस्कार, वर्ष 2010 में अवध भारती सम्मान तथा  पत्रकारिता और जनसंचार के लिए वर्ष 2010 का प्रतिष्ठित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार। हाल ही में कविता के लिए प्रतिष्ठित भारत भूषण पुरस्कार से सम्मानित