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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

बलात्कार से बचने के भागवत-रहमानी नुस्खे - राकेश बिहारी



आज मोहन भागवत का एक और बयान आया है, साथ में कैलाश विजयवर्गीय का बयान आया है. बयानों का यह सिलसिला तो चलता ही रहेगा. शुक्रवार के ताज़ा अंक में ऐसे तमाम अटपटे बयान हैं. . हिंदी के युवा कथाकार राकेश बिहारी ने उनमें से दो को केंद्र में रखते हुए यह टिप्पणी जनपक्ष के लिए लिखी है






शुक्रवार के ताज़ा अंक में प्रकाशित बसपा सांसद शफीकुर्रहमान वर्क और आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान स्त्री संबंधी अपराधों को रोकने का एक नायब नुस्खा पेश करते हैं. इन दो
महापुरुषोंने जो नुस्खे पेश किये हैं, वे हैं - घर में गो-पालन शुरु कर दिया जाये और महिलाओं को पर्दे में रखा जाय. एक ऐसे समय में जब स्त्री सम्मान और सुरक्षा को लेकर देशव्यापी  आंदोलन और विमर्श जारी है, ये बयान इस बात को स्पष्ट करने के लिये काफी हैं कि धर्म आधारित सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था के हिमायती ये लोग स्त्रियों के सम्मान और सुरक्षा को लेकर किस व्याधि से पीड़ित हैं.

उल्लेखनीय है कि ये दोनों महानुभावहमारे समय के दो महत्वपूर्ण राजनैतिक विचारधारओं के प्रतिनिधि हैं. महत्वपूर्ण है कि इन दोनों जमातों में कई प्रभावशाली महिलायें जिम्मेदार पदों पर मौजूद हैं जो न तो पर्दे में रहती हैं और न सिर्फ उन्हीं पुरुषों के बीच उठती-बैठती हैं जिनके घरों पर गायें पाली जाती हैं. क्या ये दोनों धर्माधिकारी यह बता सकते हैं कि सत्ता और शक्ति के केन्द्र में स्थित उनकी पार्टी की ये महिलायें कैसे सुरक्षित हैं? चाहे महिलाओं को पर्दे में रहने की हिदायत हो या फिर स्त्री संबंधी अपराध से मुक्ति के लिये गो-पालन का सुझाव, उसी पितृसत्तात्मक सोच के बीज-मंत्र हैं, जो स्त्रियों को निरीह जायदाद से ज्यादा कुछ नहीं मानते. गाय की तरह घर के खूंटे से बंध कर गोधर्म का निर्वहन करने और बाहर निकलने पर अपना सर्वांग ढंककर रखने की यह हिदायत दर असल महिलाओं को एक तरह की धमकी है कि यदि सुरक्षित रहना चाहते हो तो ऐसे रहो वर्ना....

इस कूढ़मगज मर्दवादी मानसिकता का बहिष्कार किये बिना स्त्री अधिकार और सम्मान की कोई बात बेमानी होगी. उम्मीद करता हूं कि हमारे कुछ तत्वज्ञानी साथी धर्म और संप्रदाय के इस सामाजिक-व्यावाहारिक और सर्वधर्म समभावीचेहरों के  बचाव में धर्मशब्द की कोई थोथी और सैद्धांतिक व्याख्या लेकर नहीं बैठ जायेंगे. समय उन लोगों की तरफ भी देख रहा है जो एकांगी यथार्थ की आलोचना-प्रतिआलोचना में अपनी ऊर्जा लगाकर चाहते न चाहते इन्हीं शक्तियों को मजबूत कर जाते हैं.