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बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

यह शिक्षा किसका भला कर रही है?


  • वंदना शुक्ला 
चित्र एन डी टी वी की वेबसाईट से साभार 


पिछले दिनों मलेशिया सिंगापूर यात्रा के दौरान एक चीनी परिवार में जाने का मौक़ा मिला |भारत के भौगोलिक सौंदर्य और संस्कृति व संयुक्त परिवार की अवधारणा के वो कायल थे |उन्होंने कहा ‘’ सुना है कि भारत में शिक्षा अन्य देशों की अपेक्षा सस्ती और सुलभ है शायद इसीलिये वहां पढ़े लिखे अधिक हैं |"शिक्षा और शिक्षित" ...ये शब्द बहुत देर तक कौंधते रहे ज़ेहन में |क्या ज्ञान (?)को खरीदकर एक अदद नौकरी हासिल कर पाना ही शिक्षा का उद्देश्य है?क्या बड़े बड़े उलझे हुए गणित या विज्ञान जैसे विषयों के प्रश्नों को हल कर देने मात्र को शिक्षा कहा जा सकता है?क्या शिक्षा में नैतिकता अथवा मानवीयता की कोई ज़रूरत वाकई नहीं ?

भूमंडलीकरण,वैश्वीकरण,नव-उदारवाद ,उत्तर-औपनिवेशिक इत्यादि ना जाने पिछले कुछ दशकों में इन जैसे कितने ही शब्द संस्कृति के विशाल आँगन में उग खड़े हुए हैं फल फूल रहे हैं |जाहिराना तौर पर समय के साथ आवश्यकताएं और बाजार की  मांग आपूर्ति के समीकरण बदलते ही हैं लेकिन इन भौतिक ज़रूरतों और बदलाव के चलते मानवीय मूल्य और संस्कारों का अपने विशिष्ट अर्थों में बाजारीकरण हो जाने की हद तक क्षरण हो जानाचिंतनीय नहीं? या ये हर युग परिवर्तन के साथ अनिवार्यतः परिवर्तनशील ही हैं हमारी पीढ़ी इस बदलाव को नयेपन के साथ स्वीकार कर रही है?

समय और समयगत परिवर्तन (वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ) का प्रभाव देश की शिक्षा ,साहित्य,विचारधारा ,विकास ,संस्कृति आदि पर पढ़ना स्वाभाविक ही है |इतिहास गवाह है कि यह देश प्रायः अतीत जीवी रहा है यानी अपने अतीत की पूर्णता और सम्पन्नता से आश्वस्त जबकि वर्तमान से निराश ....नतीजतन भविष्य से कुछ सशंकित | उसी परिपेक्ष्य में देखें तो अब सामान्य और असामान्य घटनाओं का फर्क शनैः २ कम हो रहा है |उदाहरणार्थ ...अब  आम आदमी अख़बारों चैनलों पर अपराध जगत की ख़बरें सुनने पढ़ने का इस क़दर अभ्यस्त हो चुका है कि ये घटनाएँ आँखों के सामने से गुज़र जातीं हैं महज कुछ फ़िल्मी द्रश्यों की तरह एक हल्की सी आह छोड़कर और बस....फिर सामान्य ...फिर कोई दूसरी वैसी ही घटना ढँक लेती है ज़ेहन को |वीडियो गेम ,कार्टून ,या एनीमिटेड कॉमिक्स बनाने वाली कम्पनियां जिनकी सफलता का राज़ उनका मौजूदा वक़्त पर नज़रें गढ़ाए रखना और उनका सही वक़्त पर इस्तेमाल करना है (विज्ञापन कंपनियों की तर्ज़ पर ) इन घटनाओं –दुर्घटनाओंसे प्रेरित असंख्य कहानियां बना रही हैं जिनमे मारधाड़,लड़ाई, प्रतियोगिता और हिंसा जैसे द्रश्य बहुलता में हैं जो बच्चों में आश्चर्यजनक रूप से लोकप्रिय हैं |

कोई भाव या घटना अति हो जाने पर स्थिर हो जाती है ,अपना ‘’गुण’’ खो देती है जैसे अत्यधिक खुशी ,अत्यधिक दुःख,या अत्यधिक पीड़ा या ऐसी किसी अवस्था में मनुष्य अपनी विचारगत /विवेकशीलता /दैहिक क्षमता खो एक तटस्थ भाव में आ जाता है जिसे सन्निपात की अवस्था कहते हैं |दरअसल ख़बरों और उनसे सरोकार के मामले में आजकल देश ऐसी ही वैचारिक तथा भावनात्मक सन्निपात की अवस्था से गुजर रहा है | ये अवस्था अंततोगत्वा किसी भी घटना और उसके (कितने ही )तीव्रतम विरोध की परिणिति या अंतिम अवस्था ही हैं |चाहे वो राजनतिक मसला हो,सामाजिक,वैचारिक कोई भी |सच यह है कि झूठ और अन्याय सहने के हम उतने ही अभ्यस्थ हो चुके हैं जितने अन्याय करने वाले उसे सफलता पूर्वक अंजाम देने के|

मुझे पाओलो कोएलो का एक गद्यांश (ज़ाहिर)याद आता है उन्होंने लिखा है ‘’हम विद्रोही समय में पैदा हुए हैं इसमें हम अपनी सारी शक्ति उंडेलते हैं हम अपनी ज़िंदगी और जवानी का जोखिम उठाते हैं अचानक हम डरने लगते हैं और शुरुवाती जोश के सामने असली चुनौतियां आती हैं तो थकान,अकेलापन,और अपनी क्षमताओं के बारे में संदेह उस जोश की जगह ले लेता है |हमने देखा है कि हमारे कुछ दोस्त पहले ही हार मान चुके हैं ,हम मजबूर हैं अकेलेपन का सामना करने को सड़क को खतरनाक मोडों के मुताबिक चलने को ,थोड़ी सी गिरावटें झेलने को ,जबकि आसपास कोई नहीं जो मदद करे और अंत में हम खुद से पूछते रह जाते हैं क्या ये सब इस लायक है कि इतनी कोशिश की जाये?’’

उक्त सम्पूर्ण गद्यांश की अंतिम पंक्ति ‘’क्या ये सब इस लायक है कि इतनी कोशिश की जाए?’’सचमुच विचारणीय है ,बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण, हताशा व स्व-ग्लानि के |

विश्व का बाजार में तब्दील हो जाना समय के सापेक्ष ,कोई अनहोनी घटना नहीं ,लेकिन बाजार का भावनाओं और संवेदनाओं पर अतिक्रमण मानवीयता के सन्दर्भ में निश्चित ही एक चिंतनीय घटना है|कहते हैं कि एक संवेदनशील शिक्षित समाज सोच और परिपक्वता के स्तर पर (तकनीकी और विकास की द्रष्टि से) देश को आगे ले जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होता है |लेकिन शिक्षा?...

शिक्षाकेमायने?

एक रशियन मनोवैज्ञानिक की किताब पढ़ी थी ,लेखक का नाम तो याद नहीं पर उसका शीर्षक था ‘’बाल हृदय की गहराईयाँ ‘’|लेखक स्वयं जाने माने बाल मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविद थे |  उन्होंने लिखा था कि बच्चे का मस्तिष्क पांच वर्ष की आयु तक सक्षम हो जाता है  वे पांच वर्ष उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होते हैं और जो उसने उस दौरान ग्रहण किया होता है स्कूल से ,समाज से ,परिवार से,परिवेश से आगे सिर्फ उसका परिष्करण ही होता है लेकिन भविष्य की नींव वही पांच वर्ष हैं (जबकि हमारे यहाँ बच्चा समझे जाने की कोई उम्र नहीं है |अपनी इस संस्कृति पर हम स्व मुग्ध भी रहते हैं ..हमारी न्याय प्रणाली तो एक कदम आगे ... बच्चा घोर अपराध करने के बाद भी नाबालिग कह छोड़ दिया जाता है, ) बच्चों के बालिग़/ना बालिग़ मानने का पैमाना आखिर क्या है?

दूसरी बात जो मुझे अति महत्वपूर्ण लगी वो ये कि,बच्चे को कम से कम इन पांच वर्षों तक ज्यादा से ज्यादा प्रकृति के सानिध्य में रखना चाहिए |उसे बिना किसी विशेष युनिफोर्म,पीरियड्स की बंदिश,या आदेशों नियमों के उसे वनस्पतियों,बगीचों ,फूलों,खुले मैदान में छोड़ना चाहिएइससे उसमे स्वाभाविक क्रियाशीलता का विकास होता है | उसे मुक्त छोड़ना चाहिए अपने खेल ,अपने स्थान और अपनी बातें (विषय)चुनने के लिए | इससे उसमे आत्म निर्णय लेने की क्षमता और आत्म विशवास का संचार होता है वो क्रिएटिव होता है |उन्होंने उदाहरण स्वरुप अनुभव भी लिखे थे जो सचमुच आश्चर्य चकित कर देने वाले थे कि बच्चे इतने गहरे होते हैं उनके मासूम प्रश्नों में इतनी डेप्थ भी हो सकती है !अनेक विद्वान मानते हैं कि पाठ्यपुस्तकों की निर्भरता से बच्चे में सीखने की प्रक्रिया पर दुष्प्रभाव पड़ता है |इसमें निरंतर एक बासीपन आता जाता है | जबकि प्राकृतिक रूप से सीखने जानने की आजादी उसकी ग्राह्य क्षमता को परिवर्धित करती है|

हाँ हो सकता है कि (हिन्दुस्तानी शिक्षा की मौजूदा अवधारणा के मुताबिक )वो उस वातावरण में वहां कुछ खास प्रसिद्द लोगों की कवितायेँ ,गणित के कुछ आधुनिक और कठिन सवाल या प्रथ्वी के बारे में ज्यादा नहीं जान पाए बच्चा शैक्षिक प्रतियोगिता में भी अव्वल ना आ पाए और अपनी उम्र के अन्य बच्चों से ‘अंकों की दौड़ में’पिछड़ जाए |लेकिन ये निश्चित है कि बाल सुलभ मासूमियत,निश्छलता, (जो आज के बच्चों में प्रायह गायब दिखाई देती है और मनुष्य के तौर पर उसका होना बेहद ज़रूरी भी है )कायम रहेगी | ‘’स्वाभाविकता या नैसर्गिकता ’’ निस्संदेह किसी आरोपित प्रयास से ज्यादा मूल्यवान होती है | जबकि प्राकृतिक रूप से सीखने जानने की आजादी उसकी ग्राह्य क्षमता को परिवर्धित करती है और ये प्रकति,आजादी, मानसिक स्वछंदता की वो प्रारम्भिक अनुभूति उसे फिर ता उम्र नहीं मिलेगी 

एक बच्चे की भावनाओं को एक कवि ने (नाम याद नहीं ) बखूबी उकेरा है

‘’रविवार होने से दिन अच्छा होता है
माँ अच्छी होती है
हवा कितनी ठंडी होती है
पापा घर में ज्यादा होते हैं,पिता कम
मै इतना सोचता हूं माँ उतना नहीं चिल्लातीं
रविवार रोज क्यूँ नहीं होता
दिन की शुरुवात रोज क्यूँ नहीं होती ‘’

आजादी क्या और कितनी?

हमारे यहाँ आजादी की अवधारणा एक विचित्र अर्थ लिए हुए है |ये उन शब्दों में से एक है जो बच्चा रट लेता है (जो आधुनिक शिक्षा का मूल मन्त्र है )लेकिन समझ नहीं पाता कि आजादी वो है जो पिता अक्सर धमकाते हुए कहते हैं ‘’आजकल बहुत आज़ाद हो रहे हो तुम “” या वो जिसके गुण गान हर पन्द्रह अगस्त पर किये जाते हैं या फिर वो जिसे अभिव्यक्ति की आजादी (?)कहा जाता है |यानी आजादी गुण है या अवगुण ?

भारतीय परिवेश और सोच को दरकिनार कर स्कूल्स कॉलेज पश्चिमी शिक्षण पद्धतियों को धडल्ले से अपना रहे हैं बोर्ड्स में होड लगी हुई है श्रेष्ठता सिद्ध करने की नतीजतन वो हर वर्ष शिक्षा पद्धतियों,पाठ्यक्रम में युद्ध स्तर पर परिवर्तन कर रहे हैं और अभिभावकों में एक ‘’श्रेष्ठं’’ स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ा पाने की उत्कट लालसा |बच्चा इन दौनों महत्वाकांक्षाओं के बीच पिसता है |हलाकि बोर्ड्स गुणवत्ता के हिसाब से संतोषजनक परिवर्तन भी कर रहे हैं लेकिन स्कूलों ने जो दुकाने खोल रखी हैं वो एक ओर अपनी चमक दमक से अभिभावकों को चमत्कृत कर रही हैं और दूसरी ओर बच्चों की  प्राकृतिक क्षमताओं से उनको दूर कर रही हैं | स्कूलों की शानदार इमारत,रंग बिरंगी और कहीं दिनों के हिसाब से बंटी युनिफोर्म, शानदार चमकते हुए क्लास रूम्स ,खेल के लंबे चौड़े मैदान अमूमन माता पिता स्कूलों की इसी चमक दमक से आकर्षित होते हैं और स्कूल संचालक अभिभावकों के इस मनोविज्ञान को भली भाँती ना सिर्फ समझते बल्कि दोहन भी करते हैं |निजी विद्यालयों के इसी ‘चमत्कार’’ के सामने सरकारी स्कूल और उसमे पढने वाले बच्चे /अभिभावक कभी २ हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं जबकि महाविद्यालयों में स्थिति लगभग उलट है |हलाकि बच्चों के मस्तिष्क और ग्राह्य क्षमता समान नहीं होती इसलिए सभी के लिए एक सी शिक्षा पद्धति,लागू करना कुछ अस्वाभाविक तो है ही ..लेकिन इसको गहराई से विचारने का जोखिम बोर्ड या स्कूल क्यूँ लें ?उन्होंने एक पूरा पैटर्न तैयार किया है जो हरेक बच्चे पर लागू होगा |’’बौद्धिक असमानता’’ की समस्या माता पिता की है बोर्ड या स्कूल प्रबंधन की नहीं ....एक दुकानदार कभी नहीं कहेगा कि आपका घर इन पर्दों के लायक नहीं है यदि आप उसे वो मोटी रकम चुका रहे हैं जो उसने परदे के लिए निश्चित की है |

हमारे नौनिहाल हमारे सपनों की चाभी !

पिछले दिनों एक नामी गर्ल्स कॉलेज में परिसर के भीतर बलात्कार का प्रकरण काफी उछला था ,जो किसी तरह ‘’रिसकर’’ बाहर तक अनहोनी स्वरुप आ गया था खबरों की भीड़ में एक खबर यह भी थी  पिछले कुछ हफ़्तों के बीच उसी महाविधायालय की दो और छात्राओं ने गले में फांसी लगाकर आत्म ह्त्या कर ली | प्रबंधक इस बात से खुश थे कि पहली बार की तरह इस बार वो कटघरे में नहीं खड़े किये गए वजह लड़कियों के सोसईड नोट में ‘’घरेलू वजह ‘’होना बताया गया है | कहा जा रहा है कि लड़कियां होस्टल में पढ़ना नहीं चाह रही थी बावजूद  इसके उन्हें यहाँ जबरन भर्ती किया गया | खैर सच्चाई जो भी हो लेकिन हॉस्टल के जिम्मे भले ही पूरा का पूरा दोष मढ़ दिया जाए पर ऐसे प्रकरणों के लिए माँ पिता भी कम जिम्मेदार नहीं होते |आखिर कैसी शिक्षा देना चाहते हैं वो अपने बच्चों विशेषकर लड़कियों की | छात्रावासों की परिकल्पना के मूल में संभवतः छोटे शहरों में ‘’अच्छे स्कूल कॉलेजों’’ का ना होना भी एक वजह रही होगी लेकिन अब बच्चों को छात्रावास में रखना एक स्टेटस सिम्बल बन गया है|

शहरों का माहौल देखते हुए छोटी २ बच्चियों को अपनों से घर से दूर एक ऐसे कैदखाने में भेज दिया जाये ताकि लडकियां मन ना होते हुए भी बिना किसी अनहोनी की आशंका से पढ़ लिख और ब्याह दी जाएँ | क्या ये अपनी ही संतान के साथ बर्बरता नहीं ?बात सिर्फ होस्टल की नहीं  आजकल शिक्षा का मतलब एक मानसिक द्वंद्व एक संघर्ष हो गया है माता पिता के लिए भी जितना बच्चे के लिए | प्रश्न ये है कि क्या पहले बच्चे शिक्षित नहीं हुआ करते थे ?इस पर तर्क हो सकता है कि शैक्षिक तकनीक में उन्नति वजह है लेकिन एसी उन्नति किस काम की जहाँ शिक्षा का अर्थ ज्ञानार्जन ना रहकर सिर्फ एक प्रतियोगिता और चुनौती भर रह गया हो? क्या बच्चों की योग्यता का मापदंड  उनके हर विषय में प्राप्त अंक होना चाहिए जिसके लिए हर महत्वाकांक्षी माता पिता सामर्थ्य भर जोर लगाते हैं कोचिंग, छात्रावास प्राइवेट ट्युशन !कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शिक्षा भी आज एक वस्तु या उत्पाद हो गई है जिसे ‘’कीमत’’ के हिसाब से खरीदकर उससे (येन-केन  प्रकारेण )‘’लाभ’’ हासिल किया जाता है |अमूमन जिस उम्र में बच्चों को (उनकी नहीं माता पिता की इच्छा के अनुसार )छात्रावासों में भेजा जाता है उम्र का वो हिस्सा बच्चों के शारीरिक बदलाव व मानसिक उद्विग्नता का होता है अनायास आये इस स्वभावगत परिवर्तन को ना तो माता पिता समझ पाते हैं ना बच्चा और यही वो समय होता है जब बच्चे को उसके अभिभावकों की सख्त ज़रूरत होती है |उनकी इस ज़रूरत को छात्रावास कभी पूरा नहीं कर सकते ,उनको एक दो नहीं सैंकडों बच्चों को संभालना होता है |छात्रावास में बच्चों को भेजने से पूर्व उन्हें मानसिक रूप से तैयार करना बहुत आवश्यक है ,उन्हें छात्रावास की उपियोगिता,महत्व आदि ताकि बच्चा अपने भविष्य और माता पिता के स्वयं के प्रति सरोकार से आश्वस्त हो सके |

जहाँ तक शिक्षा के उद्देश्य का प्रश्न है क्या शिक्षा का अर्थ एक बने बनाये ढर्रे को रटवाकर शिक्षित मान लिया जाना होता है?बिना किसी नैतिक,मूल्यों एवं भविष्य की संभावित योजनाओं की बुनियाद रखे एक अंतहीन दौड़ ?क्या यही वजह नहीं की कई अभिभावक बच्चों को तथाकथित स्कूलों कॉलेजों की ‘’उच्च’’शिक्षा देने ,अपनी जमा पूंजी का एक बड़ा हिस्सा कोचिंग ,छात्रावासों ,किताबों में खर्च कर देने के बावजूद उनकी ‘’आधुनिकता एवं अमर्यादित व्यवहार को देखकर ठगा हुआ महसूस करते हैं ?ज़रूरी नहीं की हर बच्चा असंवेदनशील ही निकले लेकिन आज शिक्षण संस्थाओं का तथाकथित ‘’पढ़ाई’’की गंभीरता की तरफ  विकेंद्रीकरण होना व् सभ्यता के मायने बदल जाना (सिर्फ अंग्रेजियत)इस गुंजाईश को उकसाता तो है ही |‘’असल में शिक्षा ऐसी होने चाहिए जो बच्चों को ना आधुनिकता की आंधी में धकेले न रुढ़िवादी परम्पराओं में बल्कि उन्हें अच्छा बुरा ,सही गलत ,न्याय अन्याय के बारे में सोचने और फैसले लेने में सक्षम बनाये |(तद्भव )

पहले कहा जाता था कि घर ,बच्चे की पहली पाठशाला होते है लेकिन अब तो दो ढाई साल के बच्चे को युनिफोर्म में कस लपेटकर भेज दिया जाता है उस ‘’अनजान’’ स्थान पर जब वहां कोई अपना नहीं दिखाई देता उसे ,और तब उसका सामना पहली बार होता है ‘’अविश्वास ‘’ से |और वो संदेह की द्रष्टि से देखने लगता है सभी को ....मासूम मस्तिष्क पर कई नए २ रिश्तों का बोझ पड़ता है घर में माँ पिता भाई बहन मामा मौसा और स्कूल में टीचर, मैडम, बाई आदि | ढाई तीन वर्ष का बच्चा स्कूल में पहले दिन से प्रतियोगिता और स्वीकृति का पाठ पढता है वो जानता है कि स्कूल में शाबाशी इनाम और घर में अच्छा व्यवहार वो तब हासिल कर सकता है जब वो ना सिर्फ अपने पड़ोसी ,रिश्तेदारों या दोस्तों से अव्वल आयेगा बल्कि अपने शिक्षकों और ‘’बड़ों’’द्वारा दिये गए हर आदेश को चुपचाप मान लेगा |स्कूल में ,वो नहीं दौडेगा जब उसका मन दौड़ने का होगा ,वो भूखा बैठा रहेगा जब तक रिसेस नहीं होगी ,उसे माँ से दूर रहना ही होगा जब तक छुट्टी की घंटी नहीं बजती | और यही वो समय होता है जब वो अपने से बड़ों की हर ना मानने वाली बात को भी मानना सीखता है उसकी तर्कशीलता और विरोध करने की क्षमता शनैः शनैः लुप्त होती जाती है जो उम्र भर उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा बन जाती है |परिवार,दोस्त,समाज,सरकार,बॉस किसी की बात का विरोध करने का साहस उसमे नहीं रहता |

एक तरफ उपभोक्तावादी संसार में बच्चों को ‘’किसी भी तरह’’ शिक्षा मिले यह जंग लड़ी जा रही है,तो दूसरी तरफ रुढ़िवादी विचार पुख्ता किये जा रहे हैं हम अपने बच्चों को मौजूदा सोच के चलते क्या बनाना चाहते हैं ?एक योग्य ,वास्तविक सुशिक्षित व्यक्ति अथवा येन केन प्रकारेण कोई भ्रमित डिग्री ले कोई इंजीनियर डॉक्टर ?आजकल इंजीनियरिंग ,एम् टेक,एम् बी ए जैसी डिग्रियां  बेचने वाले कॉलेज शहरों ,कस्बों तक कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं क्या माता पिता जान पाते  हैं उन बच्चों का मानसिक द्वन्द जो अपने माता पिता के सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी फ्रॉड कॉलेज में भरती कर दिये जाते हैं डोनेशन देने और किसी भी प्रायवेट कॉलेज की डिग्री हासिल करने के बाद कहलाते तो इंजीनियर हैं लेकिन खड़े बेरोजगारों की लाइन में होते हैं?दुहरा प्रायश्चित...एक मोटी फीस अदा करने का और दूसरा बेरोजगारी का |

आउट लुक के एक सर्वेक्षण के मुताबिक ‘’भारत का पूरा हायर एजुकेशन सेक्टर ग्रसित है तेज़ी से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सप्लाई तो बढ़ती है लेकिन क्वालिटी कंट्रोल की व्यवस्था ना होने से हालत यह है कि भारत के लाखों नौजवानों के पास डिग्री ज़रूर है लेकिन वे किसी लायक नहीं |’’

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लेखिका लम्बे समय से शिक्षा के क्षेत्र से जुडी हैं और साहित्य में सक्रिय हैं.

शनिवार, 18 जून 2011

कलम, बन्दूक, आजादी....अँधेरे समय में एक काला दिवस!


आज देश भर के पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ाते जा रहे खतरों के खिलाफ 'काला दिवस' मनाने की घोषणा की है. एक तरफ मीडिया का धनपतियों के हाथों में सिमटता जाना और दूसरी तरफ जनता की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों का दमन, यह लोकतंत्र के धनतंत्र में बदलते जाने का सबूत है. किसी की वह बात याद आती है कि इस देश में आप तब तक ही सुरक्षित हैं जब तक कोई आपको मारना नहीं चाहता. वंदना शुक्ला का यह लेख इस पूरी प्रक्रिया की गहन छानबीन करता है.

क्या हम नायक-विहीन दौर में जी रहे हैं ?

11 जून  को मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की ,दोपहर बाईक से घर लौटते समय हत्या कर दी गई !        वजह ?..अंडर वर्ल्ड से सम्बंधित ..कुछ संवेदन शील खुलासों कि कोशिश,जो देश कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए ख़तरा हो सकते  थेहम दुनियां के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक राष्ट्र  का एक हिस्सा हैंकहा तो ये भी जाता है, कि यहाँ हमको अभिव्यक्ति कि पूर्ण स्वतंत्रता हैआप बीच चौराहे पर खड़े होकर अपने पडौसी, अफसर, विरोधी दल, दुकानदार किसी को भी बेतकल्लुफी से गलिया सकते हैं ! कलम, ज़ुबान ,नारेबाजी किसी भी माध्यम का इस्तेमाल कर सकते हैं ! परिवार समाज से शिकायत हैन्यायालय उपलब्ध हैं ! व्यवस्था से कुछ शिकवा चुनाव प्रणाली है ,पिछला नेता हटाओ, नया नेता चुन लो तत्कालीन सरकार को परे धकेल ‘’नई’’सरकार को लगाम सौंप दो !...ये  आज़ादी ठीक वैसी ही है,जैसे कोई खूबसूरत बगीचे में  हाथ में बन्दुक लेकर   मुस्कुराता  हुआ कहे ’’जो चाहते हो कर लो तुम आजाद हो’’ 


आजादी क्या हैअप्राप्य आदर्श का स्वप्नलोक,जो जनता को मोहित कर लेता है?या कम से कम काम और ज्यादा से ज्यादा आराम की लुभावनी धारणा गोर्की कहते हैं’’ आजादी का अर्थ क्या है,यह समझना कठिन है!यों देखो तो आज़ादी का अर्थ है मनचाही जिंदगी !पर चारों तरफ तो अहलकारों का,सरकारी हकीमों का जाल बिछा हुआ है!मनचाही जिंदगी कि बात उनके सामने कोरी कल्पना है !” दरअसल ,आज़ादी किसी मुल्क किसी समाज किसी व्यक्ति कि चाहत नहीं यह एक सार्वभौमिक इच्छा  है,जिसके लिए संघर्ष एक ज़रुरी उपकरण है !परयदि धरती पर सुख के हेतु निरंतर संघर्ष का नाम जीवन है,तो करुना या प्रेम क्या इस संघर्ष में राह के रोडे नहीं ये प्रश्न   एक गहरी सच्चाई से उपजी चिंता है संभवतः प्रेम करुना ,तथा संघर्ष ये लगभग  दो विपरीत विचारधाराएँ हैं जिनके अंतर्संबंध सदा विरोधी रहे,एक असमंजस पूर्ण स्थिति ! 

मनुष्य जाति आज विभाजन का संकट भोग रही है! जाति,ओहदे,कर्म,वंशानुगत,सभ्यता,शिक्षा,राजनीतिक संरचना  अदि से समाज कई भागों में विभाजित हो गया है ! यहाँ तक कि  उनकी जिंदगी और मौत भी इस बंटवारे का एक हिस्सा है ! एकसुरक्षितवर्ग के लिए जीवन एक जश्न और मौत एक महत्वपूर्ण घटना होती  है ,जिसे उत्सव कि तरह प्रसारित किया जाता है ,तो दूसरे संघर्षरत’’तबके के लिए जिंदगी कभी ना बीतने वाली रात और मौत एक चुपचाप आने वाली कोई मामूली सी घटना,किसी बन्दुक कि गोली में बिंधी ,किसी सडक पर ,किसी चौराहे पर,या किसी अन्नरहित पेट में भोजन कि जगह या ,किसी भी ऐसी जगह !

ये  युग चमत्कारों का युग है ! अलबर्ट आइन्स्टाइन कहते हैं ‘’जीवन जीने के दो तरीके हैं !एक इस तरह जैसे चमत्कार जैसा कुछ भी ना हो ! दूसरा इस तरह जैसे हर चीज़ खुद में एक चमत्कार हो !’’ ये दरअसल परिभाषा का एक सरलीकरण है !जिसे व्यक्ति कि सहूलियत या व्यक्तिगत द्रष्टि मान लिया गया है ,लेकिन अब इसके मायने बदल गए हैं!(विशेषतः महानगरों में ) ..यदि आप सुबह घर से निकले और शाम को सकुशल घर वापस पहुँच गए तो ये एक चमत्कार है !यदि नहीं पहुंचे तो ये सामान्य स्थिति ...बस किसी आशंका के सच हो जाने जितनी सहज !

आज़ादी इकहरी नहीं होती ! सार्त्र कहते है ’’आदमी जो आज़ाद रहने के लिए अभिशप्त है,उसे जीवन की हर सांस में आज़ाद  रहना है!और उसकी अंतिम सांस को भी इसी आजादी कि गवाही देनी चाहिए !.लेकिन इस आज़ादी की  कीमत?समझौता या मौतआजादी एक शब्द है ,लेकिन अमूमन हर समाज हर देश हर वर्ग के लिए इसके मायने अलग अलग होते हैं ! एक मजदूर के लिए दो वक़्त का भरपेट भोजन आज़ादी हो सकती है ,तो एक बेरोजगार के लिए नौकरी,एक महिला के लिए घर कि आर्थिक व्यवस्था में सहयोग! किसी समाज का भ्रष्टाचार से मुक्त होना आज़ादी का एक रूप,एक राष्ट्र के लिए खुद कि सरकार और संविधान होना !...वस्तुतः आज़ादी का अर्थ बंधन मुक्ति नहीं होता,’’स्वतंत्र होने के लिए हमारे भीतर जागरूकता और दुस्साहस का होना बहुत ज़रुरी है ताकि एक व्यवस्था(बंधन ) में से निकलकर दुसरी व्यवस्था में ना जकडे जाएँ ! जहाँ भय हो उसे आज़ादी नहीं कहा जा सकता !तो दो ही विकल्प बचते हैं या तो दी गई आज़ादी के नियमों के प्रारूप में जीते रहें या फिर बुद्धिमत्ता के साथ हथेली पर जान लेकर कूद पड़ें सच्चाइयों के मैदान में,अन्याय से जूझने  !

याद कीजिये ,उस मुल्क में जो  क्रूरता के किये कुख्यात है खुलासों के ज़रिये अमेरिकी राजनयिकों कि दुनियां में भूचाल लाने वाले विकिलिक्स  वेबसाईट के संस्थापक जूलियन असान्जे  को प्रतिष्ठित ‘’टाईम’ मेगजीन ने सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति चुना !(अपनी इसी तथाकथित आज़ादी के लिए?) ‘’पर्सन ऑफ द इयर ‘’के लिए सर्वाधिक वोट मिले थे !वहीं असंजे के वकील ने कहा कि असंजे को कोई नुक्सान पहुँचाया जाता है तो वो कुछ गोपनीय सामग्री को सार्वजानिक करेंगे !’’....निश्चित रूप से वे कोई कमज़ोर खेल नहीं खेल रहे थे ! सच्चाइयों (काली करतूतों)के उजागर होने का खौफ , बन्दुक कि गोली  से कहीं अधिक  डरावना होता है ,ठीक उसी तरह जैसे मौत कि खबर का असर मौत से भी ज्यादा दहशत भरा होता है!.उल्लेखनीय है कि ये एक असाधारण और अभूतपूर्व घटना थी और निश्चित रूप से दुस्साहस पूर्ण भी !बेहद संवेदन शील मामला था ना सिर्फ अमेरिका के लिए वरन अन्य देशों के लिए भी ! अफगानिस्तान ईराक में हजारों सैनिकों कि मौत और लाखों बेगुनाहों के क़त्ल के जिम्मेदार देश के लिए एक व्यक्ति को  उड़ा देना  क्या मायने रखता  है?तब जबकि वो व्यक्ति उस देश कि अस्मिता के लिए एक खतरा बना हुआ हो!ज़ाहिर है कि कुछ  भी हो सकता था पर  बावजूद इन आशंकाओं खतरों के चूँकि कि एक पूरा का पूरा समूह था इस  प्रष्ठभूमि में ,जो निरंतर उनके पीछे खड़ा था ना सिर्फ मौजूद बल्कि उनकी हौसलाफजाई करता हुआ ! जैसे (उदहारण स्वरुप)‘’ अलास्का कि रिपब्लिकन पार्टी की प्रमुख नेता साराह पालिन ने खुलेआम कहा  कि अमेरिका के विशेष छः दस्तों को खोजकर असान्जा को उन्हें सफाया करना चाहिए ‘’निस्संदेह यह भी प्रतिबद्धता और निर्भयता के अनेक उदाहरणों में से एक था !

आदमी सिर्फ एक चीज़ से सबसे ज्यादा डरता है और वो है मौत!इसी से बचने के लिए वो तमाम असहमतियों ,अन्यायों को मक्खी की तरह निगलता रहता है!समझौते करता रहता है,!सड़क पर टक्कर मार भाग जाने वाले वाहन से छटपटाते आदमी के अगल बगल से निकल जाने में भी डरता है कि कहीं पुलिस के चंगुल में ना फंस जाएँ !ये कैसी और किसकी आजादी है?घायल आदमी को मर जाने की ?टक्कर मारकर अपराधी के भाग जाने कि?या घरवालों को अवसादित हो जाने तक न्यायलय के चक्कर लगाने किवस्तुतः,आज आजादी,व्यवस्था कि ओर से दी गई मोहलत है और इस मोहलत को पूरी जिंदगी जीने यानि  एक स्वाभाविक मौत तक पहुंचाने  के लिए दो ही रस्ते बचते  हैं ..पहला ,गर्म खून पर धैर्य और सहनशीलता के ठन्डे पानी के छींटे डाल दिए जाएँ ताकि परिवार समाज और आप खुद आपकी उपस्थिति का दीर्घ  कालीन सुख भोग सके जड़ भरत कि तरह बस जीते रहें चुपचाप!या फिर अन्याय ना सह पाने और उसका मुकाबला करने का कीड़ा काट ले आपको और आप खुद को मौत के जंगल में भूखे भेड़ियों के सामने छाती ठोक कर खड़े होने का माद्दा पैदा कर पायें  !

आज़ादी कि अभिव्यक्ति क्या है?आपकी अपनी जिंदगी का फलसफा ही ना? ’!या  तथाकथित आज़ादी का एक सुनिश्चित फोर्मेट होना  जिस के बाहर जाने कि अघोषित अनुमति (आज़ादी)पर प्रतिबन्ध हो?जहा आज़ादी चाहने कि कीमत प्रताडना और  उसकी अभिव्यक्ति जीवन का अंत हो चाहे वो ओनर किलिंग का मामला हो,या शिवानी भटनागर जैसी पत्रकार कि हत्या का ,या शराब परोसने को मना कर देने पर गोलियों से भून दिए जाने का !ये कैसी आज़ादी है और किसकी?!इतिहास साक्षी है गांधीजी और स्वतंत्रता संग्राम में अपने जान कि बाज़ी लगा देने वाले शहीदों से लेकर उन आंदोलनकारियों या अपरोक्षतः अपना विरोध दर्ज करने वाले पत्रकारों ,समाज शास्त्रियों,नाटक कारों,कवियों तक जिन्हें इस अभिव्यक्ति का मूल्य समय २ पर सजा स्वरुप प्रतिबन्ध,पलायन,विस्थापन ,कैद या  कि  जान देकर चुकाना पड़ा  !ये अलग बात है कि कुछ भाग्यशाली इन त्रासदियों  के बावजूद जिंदगी बचा पाने में सफल रहे पर ये घटना ज्यादातर उन  देशों कि है जिनके बाशिंदों की जान कि कीमत दुनियां के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र के नागरिकों की जान से कहीं अधिक है !

आज़ादी को पाने व उस छटपटाहट को व्यक्त करने के तरीके अलग अलग होते हैं !संघर्ष शीलता के बाद असफलता कि पीड़ा भोगते जन आन्दोलन ,धरने,हडतालों जैसे प्रत्यक्ष या फिर  एक शांतिपूर्ण पर ज्वलंत/असरदार  माध्यम लेखन के द्वारा !गौरतलब है कि  कहानी,कविता,नाटकअखबार पत्रिकाओं तक ,जहाँ रोष अपने समग्र पैनेपन के साथ स्थितियों पर वार करता है ! नागार्जुन केदार नाथ अग्रवाल,धूमिल,दुष्यंत जैसे असंख्य रचनाकार रहे जिन्होंने अपना विरोध लेखन के मद्ध्यम से दर्ज किया

दुष्यंत त्यागी ने कहा ‘’तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक ना कर
                  तू इस मशीन का पुर्जा है ,तू  मशीन नहीं !’’

और फिर एक आगाह....

‘’ना आंसुओं में ज़मी तर ,ना उँगलियों में लहू
 कहीं बगीचों में ऐसे भी घांस लगती है?’’

अदम जग्जेव्सकी 

‘’जीने के लिए ....एक लंबा जीवन जीने के लिए,
सौंप देना होता है स्वयं को,
भावहीन सितारों में से किसी एक के हवाले !
और कभी कभी इस पर हंसना भी होता है !

कलम की ताकत किसी हथियार से कम नहीं होती !यह एक अपरोक्ष तरीका है विरोध दर्ज कराने का तात्कालीन  व्यवस्था के खिलाफ !अपने देश में ही नहीं बल्कि विदेशी लेखकों ने भी कलम को हथियार बना अपने देश कि सरकारों कुव्यवस्थाओं के खिलाफ खुलकर अपना असंतोष और रोष  व्यक्त किया ! ,नोबेल पुरूस्कार विजेता ओरहन पामुक (तुर्की के उपन्यासकार)विवादास्पद लेखकों में से हैं जो अपने विद्रोही स्वर के कारन अपने देश कि सरकारों से संघर्षरत रहे !ब्रिटिश नाटककार (नोबेल पुरूस्कार विजेता )हेराल्ड पिंटर ईराक युद्ध में अपने देश के शामिल होने के कट्टर विरोधी साहित्यकार रहे !वहीं २००४ की  नोबेल पुरूस्कार प्राप्त साहित्यकार जेलिनेक अपने देश ऑस्ट्रिया के अनुदारवादी राजनीतिबाजों की तीव्र आलोचक रहीं !गौरतलब है कि दुनियां में आज भी रूस की पहचान तालस्तोय ,गोर्की लेनिन और चेखव से होती है लोकतंत्र के संस्थापक मिखाइल गोर्वाचोव से नहीं (भगवत रावत)! आज़ादी चाहने या गुलामी या अन्याय का विरोध करने के लिए हमेशा किसी आक्रामकता कि ज़रूरत नहीं पड़ती (नहीं पड़नी चाहिए)बल्कि इसे अन्य शांतिपूर्ण तरीकों या माध्यम  यथा लेखन ,मंचन,नुक्कड़ नाटकों ,अदि जैसे  ज़रिये से भी उतनी ही गंभीरता के साथ व्यक्त किया जा सकता है  (और संभवतः सुलझाया भी) पर आज़ादी का मुंह बंद करने के लिए हमेशा ही बन्दुक का सहारा लिया जाता है!  

मीडिया ,किसी भी प्रजातान्त्रिक देश में एक अहम भूमिका निभाता है !प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया जिसके द्वारा मनोरंजन के अलावा देश में होने वाली घटनाएँ गतिविधियां सूचनाएं हमें प्राप्त होती हैं !पर ‘’आज़ादी कि अभिव्यक्ति’’के बावजूद ये बहुत संवेदनशील माध्यम भी है !

उल्लेखनीय है कि सीपीजेज़ कि ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार इऑनम्प्युनिटी इंडेक्स में भारत  का बारहवां स्थान है  सूचि में जहाँ फ्री मीडिया व  अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता के साथ बड़े शहरों में पत्रकारों में लगातार हिंसा और धमकी की घटनाएँ बढ़ रही हैं !विभिन्न मीडिया कर्मियों को तरह २ से प्रताड़ित किया जा रहा है!प्रजातंत्र के इस चौथे खम्भे के कुछ परिद्रश्य....... -

(1)_अट्ठाईस जनवरी २०११ को छत्तीस गढ़ के युवा पत्रकार उमेश राजपूत को लगातार धमकियाँ मिलती रहीं !तब cpj’s एशिया प्रोग्राम कोर्डिनेटर बोब दित्ज़ ने कहा था ‘’India’s poor record of investigating journalist murders is stedily  growing worse a travesty in what is the world’s largest democracy.’’
‘’if you don’t stop publishing news,you will be killed’’ये धमकी भरा पत्र मिला था २३ जनवरी को नई दुनियां के रिपोर्टर उमेश राजपूत को !सशु ने कहा ‘’ये अभिव्यक्ति की आज़ादी  पर एक सीधा आक्रमण है ,इसे सहजता से नहीं लिया जा सकता ‘’!
उमेश राजपूत अकेले नहीं थे उस वक़्त,जिन्हें धमकियाँ मिल रही थीं !इनके अतिरिक्त तीन और भी पत्रकार थे

(2)३२ वर्षीय रिपोर्टर प्रहलाद गोआला आसाम,सन २००६,गोअला उन दिनों वन विभाग से सम्बंधित एक सीरीज पर काम कर रहे थे और जब से ये लेख प्रकाशित हुआ तब से लगातार धमकियाँ मिल रही थीं !
इस पर यूनेस्को के निर्देशक ने इसकी भर्त्सना करते हुए कहा था कि ‘’पत्रकारों का दायित्व  डेमोक्रेसी को सुचारुतम रूप देना है इस कृत्य से ये सिद्ध होता है कि समाज में अपराध पूरी तरह व्याप्त हो चूका है !’’

 (3)-जनवरी में ही एक दलित कार्यकर्त्ता संपादक मराठी पत्रिका “”विद्रोही’’,इन्हें माओ वादियों से संपर्क तथा देश द्रोहिता का लांछन लगा अरेस्ट कर लिया गया !

(4)-जनवरी में ही सोमनाथ साहू रिपोर्टर ‘’धरित्री’’को इतना प्रताडित  किया गया कि उन्हें पुलिस में रिपोर्ट करनी पड़ी !

(5)-फरवरी-उड़ीसा में ‘’संवाद’’के रिपोर्टर रजत रंजन दास को एक राजनैतिक प्रकरण के विरोध के तहत प्रताड़ित किया गया  !

(6)-फरवरी में ही otv रिपोर्टर किरण कानूनगो और कैमरा  मैन तथा एक अन्य otv रिपोर्टर एन एम् बैसाख और उनके केमरामैन अनूप राय को प्रताड़ित किया गया !

(7)-मई में इटानगर में अरुणाचल कोंग्रेस के प्रमुख  द्वारा मीडिया कार्यालय पर अटैक करवाए गए !
मई में ही वेस्ट बंगाल में

(8)-तीन पत्रकारों कि पिटाई कम्युनिस्ट पार्टी के सपोर्टर्स द्वारा करवाई गई !

(9)-२१ मई को अज्ञात लोगों द्वारा वी बी उन्नीथन जो एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और केरल में ‘’मात्रभूमि’’के संपादक उन पर लोहे कि रोड से जान लेवा आक्रमण किया गया !

(१०)-11 जून पूर्व पत्रकार कपिल शर्मा को अवैध हिरासत और प्रताडना !

(11)-11  जून को मुंबई मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे कि हत्या कर दी गई !उल्लेखनीय है कि इस वक़्त वो अंदर वर्ल्ड पर लिख रहे थे !

खुलासे के द्वारा  अकेले ज्योतिर्मय देश के अग्रणी जनों  और जनता को आगाह  करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए गोलियों से भून दिए जाते हैं गौरतलब है कि पिछली धमकियों को नज़रंदाज़ करते हुए  ,वहाँ  ‘बाबा’ अपने लाखों प्रसंशकों के बीच अनशन कि मुनादी का लुत्फ़ उठा  रहे होते हैं?!प्रश्न ये उठता है,कि विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र कि ये कैसी प्रणाली है जहा  दलों कि दलदल के किसी भी महिमामंडित नेता ,या  किसी अभिनेता की  जान कि कीमत समझते हुए  अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया करवाई जाती  है ,जबकि उसी देश के गले तक डूबे भ्रष्टाचार को सामने लाने या विरोध करने वाले किसी जुझारू व्यक्तिको सरेआम भून दिया जाता है ,और हत्यारे खुले आम घूमते रहते हैं ?पकडे जाते हैं तो मामला ठंडा होने पर छोड़ दिए जाते हैं !कुव्यवस्था और आतंक एक कदम और आगे बढ़ जाता है?

ज़ाहिर है कि ये एक लंबी लड़ाई है ,व्यवस्था के खिलाफ,उन ताकतों के खिलाफ और उन ताकतों को प्रश्रय देने वालों  के खिलाफ ,जिसका  ना सिर्फ मुठ्ठी भर पत्रकारों,लेखकों,सैनिकों,सामाजिक संस्थाओं,स्वयंसेवी संस्थाओं पर  दायित्व है बल्कि हर उस नागरिक का जो कैसे भी कभी भी इस कुव्यवस्था का शिकार बन सकता है उस के चंगुल में फंस सकता है !वास्तविक पत्रकारिता एक निर्भयता का पेशा है जो देश कि रक्षा प्रणालियों में से एक अपरोक्ष मद्ध्यम है !उसे सुचारू रूप से चलाना,पोषित करना,निर्भय होकर उसका साथ देना आम नागरिक का कर्तव्य है !

ज्योतिर्मय डे सहित वो सभी दिवंगत पत्रकार जो इस आतंक का ग्रास बने तथा वे जो बेवजह राजनीती का शिकार हो प्रताड़ित किये गए व ’’देश भर में पत्रकारों पर बढते हमलों के खिलाफ 18 जून को एक राष्ट्र व्यापी काला दिवस आयोजित किया गया है !प्रेस फ्रीडम के संयोजक अजय कुमार पाण्डेय ने कहा है कि पत्रकार डे के शोक संतप्त परिवार के लिए मुआवजा भी मिलना चाहिए !साथ ही पत्रकारों को बन्दुक के लाईसेंस (बगैर सत्यापन के )दिलवाने कि भी मांग की है !सराहनीय कदम !पर यहाँ भी एक ही बात कौंधती है मस्तिष्क में कि एक दिन काला  फीता बाँध  कर रोष ज़ाहिर करना  या नारे लगा लेना  या अतिरिक्त पुलिस आयुक्त को सूचित कर देना ,भविष्य के खतरों से मुक्ति मिल  जाने का यकीं होगा ?  

‘’इब्शन ‘’की एक कविता -
‘’तुम कहते हो कि मै दकियानूस बन गया ?आश्चर्य!
क्यूँ कि मै तो वहीं रहा ,जो था !मैंने कब कहा कि
प्यादे को हटाओ ,और फर्जी को बढाओ
मै तो कहता हूँ ,मारो गोली पूरे खेल को ही
बस क्रांति तो जगती-तल पर केवल एक हुई .
जो क्रांति थी सच्ची ना धोखा ना फरेब
जिसके आगे बाद की सारी क्रांतियां मात हैं !
वह था प्रलय....
पर उस वक़्त भी लुसिफर खा गया गच्चा !
क्यूंकि नोया,आर्क पर बैठा ,बन गया तानाशाह सच्चा
तो आओ ,उग्रपंथी दोस्तों,,आओ नए सिरे से ज़ोर
लगाओ,ऐसा कि काम अंजाम हो
इसलिए लड़ाकों और वक्ताओं को बुलाओ
सब मिलकर फिर जगती-तल पर प्रलय का दिन लाएं ,
और इस बार आर्क में भी चुपके से आग लगाएं !’’