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सोमवार, 8 जुलाई 2013

अर्चना वर्मा के कथादेश में छपे लेख पर वीरेन्द्र यादव का प्रतिवाद

समास में दिए गए साक्षात्कार में कवि कमलेश के सी आई ए समर्थन वाले बयान और उसके बाद चली बहस से आप परिचित हैं ही. इसी क्रम में अर्चना वर्मा ने उस पूरी बहस को 'बचकाना' जैसा बताते हुए और कमलेश के बयान को 'पासिंग रिमार्क' तथा 'कृतज्ञता के अतिरेक में एक असतर्क, असावधान क्षण में' की गयी भावुक अभिव्यक्ति ही नहीं  साबित किया बल्कि इस बहस में भागीदार लोगों की उम्र का मज़ाक उड़ाते हुए इसे 'युवकोचित उत्साह' भी कहा . अब हम अपनी उम्र वक़्त से पहले तो नहीं ही बढ़ा सकते लेकिन सी आई ए के समर्थन की परतें खोलने के लिए वयोवृद्ध होने की भी प्रतीक्षा भी नहीं कर सकते. खैर. उनके लेख के निहितार्थों और इस पूरी बहस के असली उद्देश्यों की पड़ताल करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने यह प्रतिवाद लिखा है, जो कथादेश के ताज़ा अंक में प्रकाशित है. इसे हम पूरी क्रोनोलाजी के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. साथ ही जनसत्ता में नहीं छापे गए मेरे और गिरिराज किराडू के प्रतिवाद भी इसी क्रम में जनपक्ष पर छापे जायेंगे.

और यह प्रतिवाद 

सी आई ए के प्रति ऋण बनाम ‘अज्ञान का अन्धेरा ‘

           

   
'असहमति और विवाद की संस्कृति '  (कथादेश ,जून २०१३) शीर्षक लेख में अर्चना वर्मा का यह कथन आश्वस्तकारी है कि ,"एकवीय विश्व में समतोल या प्रतिभार की जो भूमिका जरूरी है और थोड़ी बहुत निभायी जा सकती है उसके लिए संगठित प्रतिपक्ष का ,चाहे कितना भी अपर्याप्त ,विकल्प वामपंथ ही है ."  लेकिन ज्यों ही वे कमलेश जी के 'समास -५' के  अमरीका और सी आई ए विषयक कथन को 'सिर्फ एक पासिंग रिफरेन्स ' बताती हैं त्यों ही वे अपना तयशुदा पक्ष उजागर कर देती हैं .दरअसल सच यह है कि कमलेश का यह कथन महज 'एक पासिंग रिफरेन्स ' न होकर उनकी  उस सुचिंतित सोच का परिणाम है जिसकी धुरी कम्युनिज्म और वामपंथ विरोध पर टिकी है और इसे वे सुस्पष्ट भी करते हैं . दिक्कत कमलेश के उन समर्थकों की है जो  अमरीका और सी आई ए के पक्ष में दिए गए  उनके कथन का बचाव करते हुए निर्लज्ज रूप से उसके पक्ष में दीखना   नहीं चाहते क्योंकि ऐसा करना 'पोलिटिकली करेक्ट ' नहीं होगा .कमलेश का कथन कुछ यूं है ,"शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे धीरे उपलब्द्ध होने लगा .यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमरीका और  सी आई ए ने उपलब्द्ध कराया ,इसके लिए मानव जाति अमरीका और सी आई ए की ऋणी है .भारतवर्ष को यह बौद्धिक खुराक शायद ही उपलब्द्ध होती अगर अमरीका और सी आई ए इस दिशा में सक्रिय नहीं होते .हमारा दुर्भाग्य है कि हिन्दी में नयी पीढी के अधिकांश लेखकों को सोवियत संघ के इन भयंकर अपराधों का ज्ञान भी नहीं है." और यह भी कि ,"इन जानकारियों के बाद भी लोग कम्युनिस्ट रह सकते हैं ,यह भारतवर्ष में फैले हुए अज्ञान के घोर अँधेरे में ही संभव है ."
               
दरअसल कमलेश की मुख्य चिंता कम्युनिज्म द्वारा फैलाये गए 'अज्ञान के घोर अँधेरे ' से मुक्ति और अभी भी भारत में कम्युनिस्टों के वजूद के बने   रहने से है . अर्चना वर्मा के 'विकल्प वामपंथ ही है’  की सदेच्छा और कमलेश की कम्युनिज्म द्वारा फैलाये गए  'अज्ञान के घोर अँधेरे’ व कम्युनिस्टों से मुक्ति पाने की मुहीम के बीच नट-संतुलन के निहितार्थों को पढ़ा जाना चाहिए . क्या ही अच्छा होता यदि अर्चना जी ने 'समास -६' में प्रकाशित कमलेश के  उन विचारों को भी पढ़ लिया होता जिनमें उन्होंने नात्सीवाद  के समर्थक जर्मन दार्शनिक हाइडेगर का यह कहकर बचाव किया  है कि भले ही वे नात्सी  पार्टी के सदस्य रहे हों लेकिन "वैचारिक स्तर पर उनका चिंतन नात्सी विचारधारा से अलग ही नहीं था ,बल्कि उसका गंभीर प्रत्याख्यान भी था.” ज्ञातव्य है कि नाजी विचारों के समर्थन के ही  कारण जर्मन विश्वविद्यालय में उनके अध्यापन पर रोक लगा दी गयी थी  .कमलेश  हाइडेगर को महात्मा गांधी के 'हिन्द स्वराज ' के निकट भी पाते हैं . उन्हें हाइडेगर के चिंतन में वह 'लोकोन्मुख राष्ट्रवाद ' दीखता है जिसके प्रतीक पुरुष के रूप में इन दिनों नरेंद्र मोदी को प्रस्तुत किया जा रहा है .आखिर ऐसा क्यों है कि जब जर्मनी सहित समूची दुनिया में हाइडेगर को हिटलर के समर्थक  दार्शनिक  के रूप में पढ़ा और समझा जा रहा है तब कमलेश उनमे गांधी से  सादृश्य तलाश रहे हैं . यह सचमुच गंभीर विचार का विषय  है कि जिन दिनों  हाइडेगर के नाजी संबंधों को  लेकर साएमन हेफर की   'हिटलर'र्ज सुपरमैन’ और इमनेल फाई की  'हाइडेगर -दि इंट्रोडक्सन आफ नाजिज्म इन्टू फिलासफी’  सरीखी पुस्तकें   समूचे विश्व के बुद्धिजीवियों के बीच गंभीर चर्चा के केंद्र में हों तब हिन्दी का एक  बुद्धिजीवी  हाइडेगर की औचित्यसिद्धि कर रहा हो . 
                 
अभी पिछले दिनों कमलेश ने  मार्क्सवादी इतिहासकार डी डी कोसंबी को अपना कोपभाजन इसलिए बनाया कि वे ब्राह्मणवाद को प्रश्नांकित करते हैं .कमलेश का कहना है कि "कोसंबी ब्राह्मणों पर ऐसे आरोप लगाते हैं जो नात्सियों द्वारा यहूदियों पर लगाये गए आरोपों से समान्तर है .इसके बाद 'फाइनल साल्युशन ' ही बच जाता है ,जिसके लिए राज्य पर मार्क्सवादियों का कब्ज़ा आवश्यक है” .(जनसत्ता ,१० मार्च २०१३) काजी जी ,दुबले क्यों शहर के अंदेशे से ! यानि वे मार्क्सवादी आन्दोलन को ब्राह्मणवाद  के लिए  बड़े खतरे के रूप में देखते हैं .यही कारण है कि वे साफगोई के साथ अपने इस निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हैं कि ,"मार्क्सवादी इतिहासकार ,कम्युनिस्ट पार्टियाँ ,ईसाई प्रचारतंत्र ,ईसाई समर्थित दलित आन्दोलन सभी ब्राह्मण विरोधी प्रचार में लगे हैं ." (जनसत्ता ,२४ मार्च २०१३ ) दरअसल जिसे कमलेश ‘ब्राह्मण विरोधी’ प्रचार बताते हैं  उसे ही डॉ.आंबेडकर ‘दलितों की मुक्ति’ की युक्ति मानते थे .डॉ. आंबेडकर की दो टूक सोच थी कि, “असमानता ब्राह्मणवाद का आधिकारिक सिद्धांत है और समानता की चाहत रखने वाले निम्न वर्गों का दमन व उन्हें नीचा दीखाना उनका पश्चाताप रहित पवित्र कर्तव्य रहा है”.कमलेश जिस ईसाई समर्थित दलित आन्दोलन को ब्राह्मण विरोधी करार देकर उसके द्वारा अपनाई गयी ‘धर्मान्तरण’ की प्रक्रिया को  ख़ारिज करते हैं उसे ही दलित अपनी   सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक स्वतंत्रता और समता का माध्यम मानते रहे हैं  .  आश्चर्य की क्या बात यदि कमलेश के निशाने पर वे इतिहासकार ,कम्युनिस्ट पार्टियाँ और दलित आन्दोलन हों जो ‘ब्राह्मणवाद’  को बपर्दा करते हों .! अर्चना वर्मा को कमलेश जी की यह वैचारिक पृष्ठभूमि 'आधुनिक भारतीय मानस की औपनिवेशिक बनावट के बरक्स भारतीय मेधा की मौलिकता के अनेक परतीय विश्लेषणलगती है तो यह उनका ‘उदारवादी’ दृष्टिकोण ही है .कमलेश के बचाव में अर्चना जी का यह तर्क सचमुच दिलचस्प है  कि ,  “ जो कम्युनिस्ट नहीं है उसे कम्युनिस्ट विरोधी होने का हक़ है” . इसी तर्क के आधार पर यह भी तो कहा जा सकता है कि जो ब्राह्मण है उसे ब्राह्मणवाद समर्थक होने का हक़  है . कमलेश  के सन्दर्भ में तो यह काफी कुछ सच भी है. कहना न होगा कि ब्राह्मणवाद को बचाने, नात्सी दार्शनिक के समर्थन और अमरीका व सी आई ए के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की यह  मुद्रा महज एक 'पासिंग रिफरेन्स ' नहीं है . यह एक सोची समझी विचारसारिणी  का हिस्सा है .वामपंथ के विरुद्ध कमलेश के  मन-मस्तिष्क में  कितनी रोगमूलक वितृष्णा है इसका अनुमान कुलदीप कुमार द्वारा  फेसबुक (९ मई )पर लिखी इस आपबीती से लगाया जा सकता है ,"कमलेश कवि अच्छे हैं, लेकिन उनके विचार निकृष्टतम कोटि के हैं। शुक्रवार (७ मई) को 'द हिन्दू' में बलराज साहनी पर छपे मेरे स्तंभ को पढ़कर वे इतने उत्तेजित हो गए कि मेरे एक मित्र से मेरा फोन नंबर लेकर जीवन में पहली बार (और आशा है अंतिम बार भी) उन्होंने मुझे फोन किया। लगभग आधे घंटे तक वे मुझे लताड़ते रहे, बेहद अपमानजनक भाषा और टोन में। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि बलराज साहनी के पुत्र परीक्षित साहनी ईसाई प्रचारक  हो गए हैं और लोगों को ईसाई बनाते हुए घूम रहे हैं। मैंने पूछताछ की तो पता चला कि यह सफ़ेद झूठ है। 'समास' में छपे अपने विवादास्पद इंटरव्यू में कमलेश लोहिया के समाजवाद से अपने दूर होने की बात कह चुके हैं। दरअसल वे पूरी तरह से ब्राह्मणवादी, अतीतोन्मुखी और वाम-विरोधी हैं। उनकी कुछ कविताओं में उनका पुराणप्रेम और सनातनधर्मी चेतना मुखर होकर व्यक्त भी हुई है जिसकी ओर मैंने 400 शब्दों की एक अति-संक्षिप्त समीक्षा में इशारा भी किया था। ... मुझे भेजे एक ई-मेल में उन्होंने मेरे बलराज साहनी वाले स्तंभ के हवाले से मुझ पर "घृणित झूठ" फैलाने का आरोप लगाया है। परीक्षित के बारे में उनका यह झूठ किस श्रेणी में रखा जाएगा?"  कुलदीप कुमार के इस कथन को संदिग्ध इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि  ‘ ओम थानवी   २ जून के  ‘जनसत्ता’ के अपने स्तम्भ में  'साहित्य में फिर सी आई ए ' शीर्षक लेख में उन्हें 'स्वतंत्रचेता लेखक ' होने की सनद दे चुके हैं .
                   
कमलेश की इस वैचारिक पृष्ठभूमि को दृष्टिगत रखते हुए उनका सी आई ए और अमेरिका के प्रति नतमस्तक होना स्वाभाविक है .लेकिन जिस तत्परता  और उत्साह के साथ ' ओम थानवी  ने उनके पक्ष में  मोर्चाबंदी की है ,वह वास्तव में दिलचस्प  है .अर्चना वर्मा को 'उदारवादी '  और उनके  लेख को 'सुविचारित ,अकाट्य तथ्यों  व मिसाल कायम करने वाला'  करार देते हुए उन्होंने कमलेश जी को 'भावुक इंसान’ बताया और उनके विरुद्ध किये जा रहे 'क्षुद्र अभियान ' को नेस्तनाबूद करने के लिए शिखा बाँध ली .यानि अमरीका और सी आई ए के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन उद्दात्तता और इसे प्रश्नांकित करना छुद्रता. अर्चना वर्मा और ओम थानवी दोनों ने ही  बात मुद्दों से भटकाकर उम्र पर टिका दी गोया कि बहस के प्रतिभागी दूधपीते बच्चे हों ,बिना इस बात का ख्याल किये कि उस बहस में शामिल  कईयों की उम्र लगभग उनके बराबर या कुछ की तो अधिक ही थी .
                    
अर्चना वर्मा 
प्रश्न यह है कि  अमरीकी साम्राज्यवाद और सी आई ए के विरोध के लिए  वामपंथियों  की यह लानत मलामत क्यों ? आज जब एशिया , अफ्रीका ओर लातिनी अमरीका के सल्वादर आयेंदे ,शेख मुजिबुर्र रहमान और सद्दाम हुसैन सहित कई राष्ट्राध्यक्षों के खून का अपराध अमरीका और सी आई ए के  .रक्तरंजित हाथों पर हो और जब सी आई ए के  गुप्तचर ही  इसका खुलासा कर रहे हों तब हिन्दी के एक कवि ,एक संपादक और एक लेखिका द्वारा सी आई ए का यह बचाव क्यों ?याद किया जाना चाहिए अमेरिकी नाटककार हेराल्ड पिटर के वर्ष   2005 के उस नोबेल पुरस्कार भाषण को जिसमें उन्होंने बौद्धिकों की  'नैतिक संवेदना ' का प्रश्न उठाते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जहाँ सोवियत संघ के राजनीतिक अपराध चर्चा का विषय बनते रहे हैं वहीं अमरीका की हत्यारी भूमिका पर पर्दा क्यों डाल दिया जाता है ?निकारगुआ ,चिली , इंडोनेशिया ,ग्रीक, उरुग्वे,ब्राजील,परागुवे ,हायती ,टर्की,फिलिपाईन्स ,ग्वाटेमाला ,एल साल्वाडोर आदि देशों में अमेरिका द्वारा किये गए तख्तापलट को याद करते हुए उनका सवाल था कि अमेरिका के अपराधों को दर्ज करने के लिए अभी कितना खून बहना शेष है ! जिन सोलझ्नित्सिन  ने अमरीका में शरण ले रही थी उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के 1979 के अपने भाषण में अमरीकी जनतंत्र ,प्रेस  की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का काफी कुछ मिथक भेदन करते हुए उसे सोवियत संघ के मुकाबले आदर्श  विकल्प मानने से इन्कार कर दिया था .  याद  किया जाना चाहिए अमेरिकी खुफिया अधिकारी फिलिप एगी की उस “सी आई ए डायरी” को जिसके प्रकाशन से अस्सी के दशक में समूचे विश्व में सी आई ए की भूमिका को लेकर हंगामा खडा हो गया था. फिलिप एगी का कहना था कि ,  “ ..संपादक ,राजनेता ,व्यवसायी घराने व अन्य लोग सी आई ए के प्रचारक , यहाँ तक कि पैसे के लिए भी ,हो सकते हैं बिना यह जाने कि उनके आका कौन हैं !” सी आई ए की कारगुजारियों का खुलासा करते हुए फिलिप का कहना था कि ,   “ क्रांतिकारी संगठनों में घुसपैठ की योजनाओं के साथ ही साथ मनोवैज्ञानिक और अर्धसैनिक कारगुजारियां  भी अंजाम दी जाती हैं .इनमें सार्वजानिक मीडिया में कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार ,पार्टी पदाधिकारियों को फर्जी मामलों   में पुलिस द्वारा गिरफ्तार कराना , गुंडों के समूहों द्वारा धमिकियाना आदि शामिल हैं” . अभी इन्ही दिनों पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित  न्यूयार्क टाईम्स के पत्रकार मार्क मज़ेटी ने  अपनी नयी पुस्तक ‘ दि वे आफ दि नाईफ’ में शीतयुद्धोतर दौर में  सी आई ए की  बदलती हिंसक   भूमिका का खुलासा करते हुए लिखा है कि ,  “ सी आई ए अब  विदेशी सरकारों के दस्तावेजों को चुराने वाली पारंपरिक गुप्तचर सेवा भर न रह गयी है .सी आई ए अब हत्यारी मशीन सरीखी ऐसी संस्था बन गयी है जिसमें इंसानी जिदगियों का शिकार किया जा रहा है .”   
             
              
 यह सचमुच हैरत की बात है जब  सी आई ए के निशाने पर भारत सहित समूची दुनिया के देश हों और जब सोसल मीडिया सहित भारतीय नागरिकों की निजी स्वतन्त्रता पर उसकी तेज निगहबानी हो  और भारत का बौद्धिक और नागरिक समाज इसको लेकर उद्विग्न हो , तब हिन्दी के लोकवृत में  अमरीका और सी  आई ए के प्रति समूची मानवता के ऋणी होने की  सदाशयता व्यक्त की जा रही है . देश की शीर्ष बौद्धिक पत्रिका ‘इकोनोमिक एंड पोलटिकल वीकली ‘ने अभी अपने २२  जून के अंक में अमेरिकी गुप्तचरी के इस अभियान को नागरिक स्वतंत्रता का हनन मानते हुए इसके विरुद्ध नागरिक और राजनीतिक समाज द्वारा प्रभावी प्रतिरोध दर्ज करने का आह्वान किया है .  सी आई ए और अमरीका के प्रति कृतज्ञताज्ञापन  का यह अभियान और भी विस्मयकारी इसलिए  है कि न तो इन दिनों  हिन्दी में साठ के दशक सरीखी शीतयुद्धकालीन बहसे हैं और न ही  भारत में  वामपंथी विचारधारा का कोई नया विस्फोट . बल्कि इसके उलट जब स्वयं ओम थानवी के ही अनुसार डॉ.नामवर सिंह ,मैनेजर पण्डे से लेकर प्रणय कृष्ण  आदि  तक  ‘संकीर्ण मतवाद’ से मुक्त हो चुके हों तब इसकी क्या जरूरत !
               
यहाँ यह तथ्य दिलचस्प है कि कमलेश के सुर में सुर मिलाते हुए अर्चना वर्मा ने सी आई ए के प्रति ऋणी होने की औचित्यसिद्धि के लिए अन्ना अख्मातोवा, ओसिप मंदेल्स्ताम .मारिना त्स्वेतायेवा ,निकोलोई बोलोस्की, बुल्गाकोव ,युरी ओलेशा ,आइजक बाबेल अदि के साहित्य के प्रकाशन  का श्रेय सी आई ए को दे दिया .और साथ ही दूदिनेत्सेव के  उपन्यास ‘नाट बाई ब्रेड अलोन’ और सोल्झेनित्सिन के ‘वन डे इन दि लाईफ आफ इवानोविच’   के  प्रकाशन का सेहरा भी सी आई ए के सिर बाँध दिया ,जबकि इन दोनों पुस्तकों का पहला प्रकाशन सोवियत संघ में ही हुआ था . इन दोनों उपन्यासों को सोवियत प्रकाशन ‘.नोवी मीर’ ने क्रमशः १९५६ और   १९६२  में प्रकाशित किया. सोल्झेनित्सिन को  तो  ‘वन डे इन..’ के लिए रायल्टी के रूप में सामान्य से दुगनी राशि भी दी  गयी थी . यह सही है कि स्टालिन के व्यक्तिपूजा के दौर  और बाद में भी  अख्मातोवा , मन्देल्स्ताम  और पास्तनाक सहित कई लेखकों की कुछ रचनाएँ सोवियत सेंसर की शिकार हुईं और इनका विदेशों में प्रकशन हुआ .इनमें से कुछ लेखकों की रचनाएँ  पहली बार फ़्रांस ,ज़र्मनी ,ब्रिटेन और इटली के प्रकाशकों द्वारा  भी छापी गयीं . अमेरिका में भी कई चर्चित पुस्तकें प्रकाशित हुईं  , लेकिन यह कहना कि ये सारे प्रकाशन सी आई ए द्वारा संचालित थे उन प्रकाशनों  के लिए अपमानजनक है.   नहीं ,अर्चना जी  सी आई ए के आगे जहाँ और भी हैं . ओम थानवी आपके जिस ‘शोध’ पर मुग्ध हैं ,काश वह सचमुच शोध होता बकौल आपके ‘पूछताछ से मिली सूचनाओं’ पर न टिका होता . याद यह भी  रखना चाहिए कि जिन अख्मातोवा  को १९४६ में स्टालिन का कोपभाजन होना पड़ा उन्हें ही  १९५५ में उच्च स्तर की सुविधाएँ प्रदान कर ससम्मान पुनर्स्थपित किया गया .उनकी कविताओं का प्रथम चयन १९५८ में और वृहत संचयन १९६१ में सोवियत संघ  में ही प्रकाशित हुआ .१९६६ में उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाएँ तत्कालीन सोवियत   संघ में प्रकाशित होती रही थीं .इसी प्रकार बुल्गाकोव ,खेल्बिनिकोव,ओलेशा,प्लातोनोव और सेवेतायेवा अदि सहित कई ऐसे लेखक थे जिन्हें उत्तर-स्टालिन दौर में पुनर्प्रतिष्ठित किया गया और इन सभी लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित भी किया गया . इन सारे तथ्यों की पुष्टि के लिए फिलहाल रोनाल्ड हिन्गले के पुस्तक ‘राशियन राईटर्स एंड सोवियत सोसाईटी’ और विटाली शेन्तिलान्स्की की ‘दि के जी बी आर्काविव्स’ को पढ़ा जा सकता है .
          
दरअसल कमलेश और अर्चना वर्मा की रूचि उन्ही पुस्तकों में है जो सी आई ए द्वारा कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार के लिए भारत में सस्ते दामों में छापी गयी थीं . वरना वे त्रात्सकी की आत्मकथा ‘ माई लाईफ’ और स्टालिन की बेटी स्वेतलाना की पुस्तकों ‘ट्वेंटी लेटर्स टू ए फ्रेंड’ और ‘ओनली वन ईअर’ का जिक्र जरूर करते जिनमें स्टालिनकालीन सोवियत संघ का  अन्तरंग  और प्रामाणिक खुलासा होता है .क्या ही अच्छा होता यदि  अपने समय के विश्वविख्यात पत्रकार और स्टालिनकालींन दौर के विशेषज्ञ आईसक  दुएश्चर की पुस्तकों को भी इस सन्दर्भ में याद कर लिया जाता .स्टालिन और त्रात्सकी की शाहकार  जीवनी लिखने के साथ साथ उन्होंने ‘रशिया आफ्टर स्टालिन’, ‘हेरेटिक्स एंड रेनेगेड्स’ ,  ‘आयरनीज आफ हिस्ट्री’ सरीखी स्थाई महत्व की पुस्तकें लिखीं ,जिन्हें संदर्भित किये बिना स्टालिनकालीन रूस की कोई भी प्रामाणिक चर्चा  आज भी अधूरी  रहती है .  मंतव्य यदि सोवियत समाज के सच को जानने और कम्युनिस्ट तंत्र को आलोचनात्मक दृष्टि से समझने का ही हो तो यह सूची किंचित लम्बी हो सकती है. लेकिन यह अवश्य है कि इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन सी आई ए की मदद द्वरा न किया जाकर विश्वप्रसिद्ध प्रकाशन गृह ‘पेंग्विन’ द्वारा किया गया है .स्वाभाविक है सी आई ए का शुक्रगुजार होने के लिए तो उन्ही पुस्तकों की चर्चा की जानी थी जो सस्ते दामों में छपकर प्रचार सामग्री के रूप में फुटपाथों पर बिकती थीं .
            
कमलेश को इस बात पर हैरत है कि सी आई ए द्वारा इतना कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार साहित्य मुहैय्या कराने के बाद भी ‘लोग कम्युनिस्ट रह सकते हैं’ ! दरअसल  ब्राह्मणवाद की जिस जमीन पर  आज कमलेश खड़े हैं वहां से यही सोचा  जा सकता है . इस प्रसंग में याद आते हैं इतिहासकार एरिक हाब्स्बाम .  हाब्स्बाम से जब उनके अंतिम दौर में यह पूछा गया कि वे अंत तक कैसे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने हुए हैं  तो उन्होंने कहा कि , “ मुझे उन पूर्व-कम्युनिस्टों की  संगत में रहने का विचार  अत्यंत विकर्षक लगता रहा जो दुराग्रह  की हद तक  कम्युनिस्ट विरोधी हो गए थे और जो   ‘असफल देवता’ (गॉड दैट फेल्ड) की सेवा से तभी मुक्त हो सके थे जब  उन्होंने उसे  दानव में तब्दील कर दिया था. शीतयुद्ध के दौर में ऐसे लोग बहुतायत में थे”. शीतयुद्ध के इसी दौर में स्टीफेन स्पेंडर ,आर्थर कोसलर सहित बुद्धिजीवियों  को बड़ी जमात ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम ‘ के बैनर तले अमरीका के  कम्युनिस्ट विरोधी अभियान का हिस्सा बनी थी .भारत में इस अभियान की  बागडोर उन दिनों ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की भारतीय शाखा के सचिव  प्रभाकर पाध्ये के हाथों  में थीं . अज्ञेय किस तरह इस अभियान से जुड़े थे इसका खुलासा ‘परिमल’ के केशव चन्द्र वर्मा ने अपने उस संस्मरण में किया है जो ओम थानवी द्वारा दो खण्डों में सम्पादित पुस्तक ‘अपने अपने अज्ञेय’ के दूसरे खंड में शामिल है . ‘परिमल’ के  १९५७ के ‘साहित्य और राज्याश्रय’ विषय पर आयोजित सम्मेलन का उल्लेख करते हुए  केशव चन्द्र वर्मा ने लिखा है  , “ उस सम्मलेन में दो कड़वी बातें हुईं –एक तो यह कि वात्स्यायन ने बिना परिमल की संयोजन समिति से स्वीकृति लिए एक मराठी लेखक प्रभाकर पाध्ये को निमंत्रित कर दिया जो ,उस समय ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ वाली अमेरिकी एजेंसी के एक सक्रिय कारकुन माने जाते थे .उन्होंने इस आयोजन के लिए कुछ रकम देने की बात भी वात्स्यायन के जरिये कहलाई .बस फिर क्या था इस पर ‘नकचढ़े परिमल दिमाग’ ने न केवल थू थू की ,बल्कि प्रकारांतर से पाध्ये को अपमानित भी किया . .पाध्ये का अपमान ,प्रस्ताव पास करने का विरोध और और परिमल के भीतर से ऊभरता हुआ अपने को मुक्त करने का अंदाज वात्स्यायन को कहीं गहरे स्तर पर काट गया .उन्हें सदा आँखें मूंदकर साथ चलने वालों की तलाश थी ,जो परिमल से उन्हें अंततः नहीं मिला”.(अपने अपने अज्ञेय खंड २ –सं. ओम थानवी ,पृष्ठ ६१७-६१८)
             
दरअसल ‘अज्ञेय पंथ’ की  शीतयुद्ध के  दौर की  यही वह  विरासत है जिसे अज्ञेय के ‘शिविर शिष्य’ ओम थानवी आज भी ढो रहे हैं . यहाँ दिलचस्प यह भी है कि अमेरिकी मदद को नकारने की ‘थू थू’  का ‘परिमालियन’ दायित्व भी आज केवल उन वाम मतवादियों का रह गया है जो पहले से ही इसके लिए प्रतिज्ञाबद्ध थे .अर्चना वर्मा  जिसे  ओम थानवी द्वारा   फेसबुक पर   ‘मजा लेते से अंदाज में कोंचना’ कह रही हैं वास्तव में वह अज्ञेय के महिमामंडन का ऐसा  ‘राजसूय यज्ञ’ है जिसमें वामपंथी विचारधारा को यज्ञ की समिधा के रूप में स्वाहा किया जा रहा है . इस यज्ञ के दोषपूर्ण मन्त्राचार को जब प्रश्नांकित किया जाता है तब ओम थानवी उन्हें ‘मतवादी ,शोहदे ,मनचले और पण्डे’ जैसी उपाधि देकर संवाद के कपाट बंद कर देते हैं . इतना ही नहीं वे फेसबुक के अपने अभियान को ‘साहित्य में फिर सी आईए’ जैसी सनसनी के साथ ‘जनसत्ता’ में परोस देते हैं  और कुतर्कों व मिथ्या तर्कों का प्रतिवाद किये जाने पर उसे प्रकाशित तक करने की जनतांत्रिकता का निर्वाह नहीं करते . यह सचमुच विस्मयकारी है कि अर्चना वर्मा इस सब की अनदेखी करके ‘दलबद्ध आयोजन बनाम एकाकी योद्धा’ का रूपक गढ़ती हैं . क्या सचमुच उन्हें कमलेश ,अशोक वाजपेयी ,ओम थानवी और उदयन वाजपेयी की जुगलबंदी नहीं सुनायी दे रही है ? क्या यह अनायास है कि ज्यों ही  कमलेश का सी आई ए और अमेरिका के प्रति शुक्राने का साक्षात्कार अशोक वाजपेयी द्वरा प्रकाशित रज़ा फाऊंडेशन की  पत्रिका ‘समास’ में प्रकाशित होकर विवादित होता है त्यों ही ओम थानवी पहले फेसबुक पर फिर ‘जनसता’ के पृष्ठों पर मोर्चा संभाल लेते हैं !  ‘प्रतिलिपि’ पत्रिका  की कथित खरीद पर  ओम थानवी की गलतबयानी को लेकर ज्यों ही  उन्हें घेरा जाता है , अशोक वाजपेयी उनके बचाव में ‘नरो वा कुंजरो’ की शैली में  बयान के साथ प्रस्तुत हो जाते हैं . कमलेश के विचारों और कविता पर जव  फेसबुक पर प्रसंगवश मंगलेश डबराल सवाल उठाते हैं तो क्या यह यूं ही  है कि ‘समास’ के संपादक उदयन वाजपेयी ‘जनसत्ता’ में नया मोर्चा खोल देते हैं , और कम्युनिज्म को विदेशी विचारधारा कहकर ख़ारिज करते हैं .क्या कमलेश के दो-दो कविता संग्रहों का रजा फाऊंडेशन के तत्वावधान में अशोक वाजपेयी द्वारा विमोचन महज एक संयोग है ? आखिर ऐसा क्यों है कि जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उपाध्यक्ष की संस्था के कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी के एकल कविता पाठ पर सवाल उठाये जाते हैं तो उनके बचाव में ओम थानवी यह ढाल लेकर खड़े हो जाते हैं कि उन्हें ‘कवि’ जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने आमंत्रित किया था ? अब यह कौन ,कैसे कहे कि न तो जगदम्बा प्रसाद दीक्षित कवि हैं और न उन्होंने अशोक वाजपेयी को आमंत्रित किया था . जगदम्बा प्रसाद दीक्षित शिव सेना के मुखपत्र ‘सामना’  के स्तंभकार रहे हैं और शिव सेना से अपनी वैचारिक नजदीकियों के ही चलते ‘मनसे’ के साहित्यिक मंच से सम्बद्ध  हैं . हाँ, एक समय उन्होंने ‘मुर्दाघर’ सरीखा बहुचर्चित उपन्यास  और ‘गंदगी और जिन्दगी’ सरीखी कुछ कहानियां हिन्दी में  जरूर लिखी थीं . अर्चना वर्मा उपरोक्त  सारे सहकार की अनदेखी करती हैं तो क्यों ? कहीं इसलिए  तो नहीं कि वे स्वयं भी अज्ञेय की ‘वत्सल निधि’ के लेखक शिविरों की सहभागी रही हैं?  

 दो टूक बात तो यह है कि अज्ञेय के  शताब्दी  समारोह के अंतर्गत किये जाने वाले आयोजनों के बहाने ओम थानवी ने अज्ञेय की पुनर्प्रतिष्ठा का जो अभियान शुरू किया था , अब विचारधारा और वामपंथ विरोध के रूप में यह उसकी तार्किक परिणति है . कमलेश ने तो कन्युनिस्टों को नेस्तनाबूद करने के लिए   धूनी रमा ही ली है . इस सिलसिले में वे अब  ‘रूसी संस्कृति के उद्भव और विनाश’ की चर्चा के  बहाने कम्युनिस्टों की खबर लेंगें .अशोक वाजपेयी ने भी गिरिराज किराडू को लिखे पत्र में स्वयं के विचारधारा विरोधी होने का फिर से ऐलान कर दिया है .ओम थानवी भी भोपाल के ‘वनमाली समारोह’ में साहित्य को विचारधारा से अलग रखने की अपनी मंशा प्रकट कर चुके हैं . और अर्चना जी तो सी आई ए का साथ मकतल तक देने को प्रस्तुत ही हैं .कहने की आवश्यकता नहीं कि यह ‘विचारधारा के विरोधियों’ द्वारा वामपंथी ‘ अज्ञान के अँधेरे’ को मिटाने की नयी मुहीम  है . यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण  है कि जब दुनिया के बुद्धिजीवी नागरिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसकी  गुप्तचर संस्था  की हत्यारी  भूमिका को लेकर चिंतित हों तब हिन्दी की दुनिया में कुछ लोगों द्वारा  वामपंथ और विचारधारा का बिजूका खड़ाकर अमेरिकी साम्राज्यवाद  के पक्ष में सहमति  का वातावरण बनाया जा रहा है . काश इन योद्धाओं को यह समझ होती कि इन्होने जिनके जिरिह- बख्तर  पहन रखे हैं वे ही इनके देश और समाज पर हमलावर  हैं ! सचमुच ग़ालिब ने इन्ही वक्तों के लिए लिखा था कि 

          “दे  और  दिल उनको, जो  न दे मुझको जुबाँ और !”

सी -855.इंदिरा नगर ,लखनऊ -226016. मो.09415371872. email: virendralitt@gmail.com





           


मंगलवार, 11 जून 2013

मुद्दा विचारधारा विरोध है - वीरेन्द्र यादव


फेसबुक पर सी आई की भूमिका को लेकर जो बहस चली थी उसे आप जनपक्ष पर पढ़ चुके हैं. सी आई ए के ऋणी कवि कमलेश के उत्कट समर्थक और इन दिनों वाम विरोधी तथा सी आई ए द्वारा कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम की 'विचाधाराहीनता' वाले मूल्यों के सबसे वाचाल और उत्कट समर्थक जनसत्ता संपादक ओम थानवी इस बहस को नितांत एकपक्षीय तरीके से अपने अखबार में ले गए थे और तर्कों पर बात करने की जगह उन्होंने निजी आरोप लगाने, कीचड़ उछालने तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कुत्सा प्रचार वाली जानी मानी राह चुनी. गोएबल की तरह शायद उन्हें भी भरोसा है कि वह लगातार झूठ बोलकर उसे विश्वसनीय बना सकते हैं. कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के साम्राज्यवादी तथा षड्यंत्रकारी रवैये से उनकी कितनी समानता है यह इस तथ्य से जानी जा सकती है कि उन्हें अपने इस भयावह मिथ्या कथन का प्रतिवाद छापने का भी साहस नहीं ठीक वैसे जैसे सी सी ऍफ़ की पत्रिका ने अपने ही एक पूर्व सम्पादक माइक डोनाल्ड का लेख सिर्फ़ इसलिए छापने से इनकार कर दिया था कि वह अमेरिका के रवैये पर सवाल उठाता था. मेरे भेजे गए प्रतिवाद को उन्होंने 'चार सौ शब्दों' में भेजने को ही नहीं कहा बल्कि उसके 'सम्पादन' का अधिकार भी जताया. वह यह भूल गए कि जिस बहस में वह खुद प्रतिपक्ष हैं उसमें उन्हें सम्पादन का अधिकार कैसे हो सकता है और जिस झूठ को उन्होंने तीन चौथाई पन्ने में पसारा है उसका प्रतिवाद चार सौ शब्दों में कैसे हो सकता है? 

जाने-माने आलोचक वीरेन्द्र यादव के ११०० शब्दों के प्रतिवाद को उन्हें दो-चार लाइनों का बना कर 'सम्पादक के नाम पत्र (चौपाल) में छापा. हम उनके इस कुत्सा प्रचार की गोएबेलियन नीति, अखबार को अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जागीर की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृति और प्रतिवाद न छापने की भयावह अलोकतांत्रिक पद्धति की कठोर आलोचना करते हैं. पाठकों तक दूसरा पक्ष पहुंचाने के लिए हम वीरेन्द्र जी का प्रतिवाद यहाँ दे रहे हैं.

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 मुद्दा विचारधारा विरोध है                          

                 

यह वास्तव में दिलचस्प है कि जब न सोवियत संघ रहा और न शीतयुद्ध की बहसें तब 'साहित्य में फिर सी
आई ए ' की गढ़ंत की जा रही है .जाहिर है इस गढ़ंत में तथ्यों और तर्कों का क्या औचित्य ! वामपंथ विरोध के इस 'महायज्ञ' में मेरी आहुति देते हुए ओम थानवी जी ने स्वयं को मिले एक पुरस्कार का उल्लेख करते हुए लिखा  है कि ,"..कुछ कट्टर मार्क्सवादियों को मेरा चयन खल गया .इनमें एक वीरेन्द्र यादव कार्यक्रम में तो नहीं बोले, पर घर लौटकर फेसबुक पर शमशेर सम्मान के संस्थापक प्रतापराव कदम को उन्होंने इस तरह कोसा "..क्या कोई साझा मंच साम्प्रदायिकों और सी आई ए के समर्थकों का भी बनाना चाहिए ?" अब इस 'सादगी ' पर कौन न मर जाय या खुदा ! सच यह है कि १२ मई को लखनऊ में आयोजित शमशेर सम्मान के इस आयोजन की स्वागत समिति का मैं सदस्य था ,निमंत्रणपत्र पर मेरा नाम घोषित वक्ताओं की सूची में था .आयोजन में  मैं थानवी जी के साथ मंच पर था . मुझे कवि नरेश सक्सेना के बारे में वक्तव्य देना था उन्हें भी इस सम्मान से सम्मानित किया गया था .नरेश सक्सेना पर बोलने के पूर्व अपने वक्तव्य में मैंने मंच से सार्वजानिक रूप से ओम थानवी को सम्मान हेतु बधाई दी.समारोह के पहले भी मेरी उनसे अन्य लेखक मित्रों के साथ मुलाकात हुयी और मंच पर भी अन्य लोगों के साथ बैठे हम दोनों के बीच सहज संवाद  हुआ .लेकिन इस सब पर उन्होंने धूल डालकर यह कह दिया कि मैं वहां तो चुप रहा लेकिन 'घर लौटकर' सम्मान के संस्थापक को कोसा .अब घर तो मैं उसी दिन लौटा था लेकिन प्रताप राव कदम से ओम थानवी को सम्मान दिए जाने के बाबत उस दिन से लेकर आज तक न तो फेसबुक पर कोई चर्चा हुयी और न ही फोन पर .




                      
 ओम थानवी जी ने जिस आधे वाक्य को मेरे द्वारा स्वयं को'कोसने' के लिए उधृत किया है वह  समारोह के १३ दिन बाद २५ मार्च की फेसबुक की  उस बहस का हिस्सा है जिसका प्रसंग मनसे के पदाधिकारी की संस्था में अशोक वाजपेयी के काव्यपाठ से सम्बद्ध है .हुआ यह कि जब कुछ लोगों द्वारा साम्प्रदायिक लोगों के मंच से अशोक वाजपेयी के काव्यपाठ को प्रश्नांकित किया गया तो प्रताप राव कदम ने साझा मंच पर 'अपनी बात ' कहने की दलील दी थी. इस पर मेरी टिप्पणी थी कि ,".साझा मंचों पर अक्सर शालीनता की दरकार होती है जैसा की आपके मंच पर लखनऊ में मैंने स्वयं महसूस किया .था. जरा सोचिये कि जब आप अपने मंच पर ओम थानवी का सम्मान कर रहे थे और जब वे मंच से अपने पिता जी का हवाला देकर स्वयं को वाम मित्र बता रहे थे और जब हमारे मित्र रमेश दीक्षित थानवी जी की जनतांत्रिकता की पताका लहरा रहे थे ,तब यदि मैं उसी मंच का सहभागी होने के कारण 'अपनी बात ' कहते हुए उनकी जनतांत्रिकता की धज्जियां उड़ा देता ,तो क्या होता आपके कार्यक्रम का ? मैं यह कर सकता था क्योंकि वे वहां सोसल मीडिया पर अपनी आलोचना की चर्चा कर रहे थे .और उसके पहले ही अज्ञेय पर बहस के चलते मुझे ब्लाक कर चुके थे .इसलिए यह स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए की साझा मंचों की अपनी सीमाएं हैं .फिर क्या कोई साझा मंच सम्प्रदयिकों और सी आई ए के समर्थकों से भी बनाना चाहिए ?" यहाँ ओम थानवी की चर्चा उनके  उन  'जनतांत्रिक '  दावों को लेकर थी जो उन्होंने उस आयोजन में किये थे ,वह भी  इस कारण कि इसके पूर्व  अज्ञेय पर हुयी बहस के कारण वे मुझे फेसबुक पर ब्लाक कर चुके थे  . यहाँ साम्प्रदायिक से तात्पर्य मनसे के कार्यकर्ता से था और ओम थानवी का सम्मान प्रसंग इस बहस में कहीं भी  लक्षित नहीं था लेकिन  उन्होंने  यह गढ़ंत पेश कर दी, जैसे कि मेरी यह टिप्पणी उनके इस पुरस्कार के चयन से सम्बद्ध  थी .इसके  साथ उन्होंने यह अनैतिकता भी बरती कि जिसे वे फेसबुक पर ब्लाक कर चुके थे उसकी  फेसबुक  टिप्पणी को अपने लेख में प्रसंग से काटकर पेश कर रहे थे .

दरअसल जब सब कुछ काले उजले में बांटकर देखा जाता है तब ऐसा ही होता है . आखिर 'कट्टर मार्क्सवाद ' और 'जनतांत्रिक आवाजाही ' के  एक साथ संभव होने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है ! मार्क्सवादी यदि किसी कार्यक्रम में न जाएँ तो यह उनकी संकीर्ण गोलबंदी और यदि जाएँ तो उसके मनमाना  भाष्य ,शायद यही अब जनतांत्रिकता का तकाजा शेष है .खैर ,यह तो अपनी अपनी जनतांत्रिकता है ,इसका क्या गिला !वैसे इस समूची बहस में यह शिकायत सही है कि कवि कमलेश का वह बहुचर्चित वाक्य ठीक से उधृत नहीं किया गया क्योंकि ऋणी सिर्फ सी आई ए का ही नहीं बल्कि अमेरिका के भी होने की बात कही गयी थी .पूरा वाक्य इस प्रकार था ,"...शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे धीरे उपलब्द्ध होने लगा .यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमरीका और  सी आई ए ने उपलब्द्ध कराया ,इसके लिए मानव जाति अमरीका और सी आई ए की ऋणी है ." 
              
यह स्वीकार करना होगा कि मार्क्सवादी हों या मार्क्सवाद विरोधी हिन्दी में  अब पढने -पढ़ाने की परम्परा क्षीण से क्षीणतर होती जा रही है .वरना बहस इस बात पर भी होनी चाहिए थी कि जिन कमलेश ने मानव जाति को अमरीका और सी आई ए  का ऋणी होने की बात कही है उन्होंने ही यह भी  क्यों कहा कि हिटलर के दार्शनिक गुरु हाइडेगर नाजीवादी पार्टी के सदस्य तो थे लेकिन   ' ...वैचारिक स्तर पर उनका चिंतन नात्सी विचारधारा से अलग ही नहीं था ,बल्कि उसका गंभीर प्रत्याख्यान भी था .' यह सचमुच दिलचस्प है कि जिन दिनों  हाइडेगर के नाजी संबंधों को  लेकर सायेमन हेफर की   'हिटलर'र्ज सुपरमैन 'और इमनेल फाई की पुस्तक 'हाइडेगर -दि इंट्रोडक्सन आफ नाजिज्म इन्टू फिलासफी ' सरीखी पुस्तकें   समूचे विश्व के बुद्धिजीवियों के बीच गंभीर चर्चा के केंद्र में हों तब हिन्दी का एक विचारक बुद्धिजीवी कवि हाइडेगर की औचित्यसिद्धि कर रहा हो . यह महज संयोग नहीं है कि उनके ये विचार भी 'समास 'पत्रिका के ही अंक ६ में प्रकाशित हैं . ध्यान देने की बात है कि 'समास ' के प्रकाशक रजा फाऊंडेशन के न्यासी अशोक वाजपेयी हैं और उसके संपादक उदयन वाजपेयी हैं .

              
अशोक वाजपेयी ने यह याद दिलाकर कि वे 'विचारधारा विरोधी' हैं इस समूची बहस को सार्थकता प्रदान कर दी है .कमलेश जी को भी   लगता है कि अमरीका और सी आई ए द्वारा  इतना साहित्य उपलब्द्ध होने के बाद भी यदि 'लोग कम्युनिस्ट हो  सकते हैं तो यह भारतवर्ष में फैले हुए अज्ञान के घोर अँधेरे में ही संभव है '. ओम थानवी जी भी भोपाल के वनमाली समरोह 
में यह कह ही  चुके  हैं कि 'साहित्य को विचारधारा से मुक्त रखना होगा '. अतः मसला' विचारधारा बनाम विचारधारा विरोध' का विचारधारा द्वारा फैलाये गए 'घोर अँधेरे 'को मिटाने का है   . विचारधारा के विरोधी अपनी मुहीम में एकजुट हैं लेकिन जो विचारधारा के पक्षधर हैं वे साम्प्रदायिकता विरोध की चोरगली से अभी भी 'आवाजाही ' के नाम पर कुछ भ्रम बनाये हुए हैं .जरूरत है आत्मावलोकन की ,क्योंकि  बकौल  धूमिल यह कब तक संभव है कि " मुठ्ठी भी तनी रहे और कांख भी ढकी रहे !"

  
वीरेन्द्र यादव , सी  855, इंदिरा नगर ,लखनऊ -226016.  मो. 09415371872.  

शुक्रवार, 31 मई 2013

सी आई ए का भूत, वर्तमान और एक ‘सु’कवि को सम्पादक का साथ : आभासी दुनिया की एक वास्तविक बहस

  
·         यह लेख समयांतर के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है. पूरी बहस आपने जनपक्ष पर पहले पढ़ी ही है. इस बीच अर्चना वर्मा का भी एक आलेख इस मुद्दे पर कथादेश में छपा है. मजेदार बात यह है कि इस लेख में कमलेश जी की वह आप्त पंक्ति जिस पर सारी बहस केन्द्रित थी ( ‘शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे-धीरे उपलब्ध होने लगा. यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमेरिका और सी आई ए ने उपलब्ध कराया. इसके लिए मानव जाति अमेरिका और सी आई ए की ऋणी है.) गायब कर दी है या फिर यों कहें कि तीन बिन्दुओं (...) की 'सांकेतिक' भाषा में व्यक्त की है. उनका सारा ज़ोर इस बात पर था कि 'कम्युनिस्ट विरोधियों को इस विरोध का हक होना चाहिए', उनसे यह पूछा जा सकता है कि आखिर 'कम्युनिस्टों को अपने विरोधियों का जवाब देने का हक है या नहीं? खैर यह लेख ज़ाहिर तौर पर एक स्वतन्त्र आलेख है और इसे उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए.
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पिछला महीना फेसबुक के साहित्यिक समुदाय के बीच काफ़ी हंगामाखेज़ रहा. यों तो इस आभासी दुनिया में गर्मागर्म और मीठी बहसें लगातार चलती रहती हैं और इस रूप में यह कस्बाई नुक्कड़ में तब्दील होता जा रहा है लेकिन यह हंगामा अब तक कि तमाम बहसों से अलग इसलिए कहा जा सकता है कि इसने लम्बे अरसे बाद वामपंथी और वामपंथ विरोधियों को एकदम स्पष्ट दो खेमों में बाँट दिया. एक तरफ मंगलेश डबराल, वीरेन्द्र यादव, आशुतोष कुमार, शिरीष कुमार मैरी, गिरिराज किराडू और इन पंक्तियों के लेखक सहित वाम-लिबरल धारा के तमाम लोग तो दूसरी तरफ की कमान मुख्यतः ओम थानवी ने संभाली तथा उनके साथ ओम निश्चल, अख़लाक़ उस्मानी जैसे लोग रहे. मुआमला शुरू हुआ गिरिराज किराडू के एक स्टेट्स से जिसमें उन्होंने लिखा “भंतेयह साहित्य के विश्व इतिहास में उल्लेखनीय है. वह कौनसा प्रसिद्ध लेखक है जिसने कहा है कि मानवता को सी.आई.ए.का ऋणी होना चाहिए. क्लू यह है कि कारनामा एक वरिष्ठ हिंदी लेखक के किया हुआ है.”


ज़ाहिर है यह ‘कारनामा’ स्तब्ध करने वाला था. भारत में शीतयुद्ध काल में सी आई ए द्वारा वित्तपोषित ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की उपस्थिति और उसमें अज्ञेय और उनके अनुयायियों की सक्रिय भागीदारी से परिचित हिंदी समाज भी अमेरिका की कुख्यात जासूसी संस्था सी आई ए के खुले समर्थन की इस मुद्रा से अब तक अपरिचित था. इसका अंदाज़ा उस पोस्ट के बाद आये कमेंट्स से लग जाता था जिसमें कवि आशुतोष दुबे से लेकर आशीष त्रिपाठी सहित तमाम लोग इस सूचना पर अविश्वास से भरी टिप्पणियाँ करते हुए उस महानुभाव का नाम पूछ रहे थे. वह महानुभाव थे कवि कमलेश! समास पत्रिका में दिए गए अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ‘मानव जाति को सी आई ए का ऋणी होना चाहिए.’ कारण बताया उस संस्था की ‘बुक वेंडर’ की भूमिका जिसके तहत उसने शीत युद्ध काल में तमाम मार्क्सवाद विरोधी पुस्तकें उपलब्ध कराईं. समास -5 के पेज 6 पर जनाब फरमाते हैं ‘शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे-धीरे उपलब्ध होने लगा. यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमेरिका और सी आई ए ने उपलब्ध कराया. इसके लिए मानव जाति अमेरिका और सी आई ए की ऋणी है.’ इसके बाद इस लम्बे साक्षात्कार में कम्युनिस्ट विरोधी चिर-परिचित विषवमन है. अमेरिका और सी आई के इस पुण्य काम के पीछे के ‘कारणों’ पर न कोई बात है, न उसके दूसरे मानव जाति विरोधी कारनामों की कोई चर्चा. अभी हाल में विकीलीक्स के एक खुलासे में सी आई ए से कांग्रेस सरकार पलटने में मदद माँगने वाले पूर्व समाजवादी , अज्ञेय के प्रसंशक और इन दिनों अशोक वाजपेयी खेमे के ‘सेलीब्रेटेड’ कवि (हाल में न केवल उनकी दो किताबें आईं बल्कि उनका विमोचन अशोक वाजपेयी रज़ा फाउंडेशन में किया, फिर यह लंबा साक्षात्कार छापने वाली समास तो उनकी पत्रिका है ही)  के कमलेश का यह साक्षात्कार शीत युद्ध काल में लोहियावाद के करीब रहे कुछ साहित्यकारों के सी आई ए के उन दिनों चल रहे वाम-विरोधी अभियान के हाथों संचालित होने की पुरानी आशंका को पुष्ट करने वाला है. खैर, इसके बावजूद अज्ञेय जैसे कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के करीब रहे लोगों ने भी कभी इस तरह खुल्लमखुल्ला सी आई ए का अहसान नहीं जताया था. ज़ाहिर है कि इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. लेकिन ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा के लिए आगे आये जनसत्ता संपादक और इन दिनों साहित्य-सत्ता के खेल में संलग्न ओम थानवी!


यों भी ओम थानवी जनसत्ता के पन्नों से लेकर आभासी जगत तक में इन दिनों वाम विरोधी साहित्यिक समूह के सबसे वाचाल प्रवक्ता के रूप में उभरे हैं. पाठकों को याद होगा कि मंगलेश डबराल के सन्दर्भ में उठे एक विवाद में वह फेसबुक की बहस को न केवल जनसत्ता के पन्नों पर ले गए बल्कि इसका प्रयोग वामपंथ पर धूल फेंकने  तथा उदय प्रकाश के आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कृत होने की घटना पर  धूल-गर्द डालने के लिए किया. जब उनके उस असत्य तथा अर्धसत्य पर आधारित एकतरफा लेख का जवाब दिया गया तो उन्होंने उसे जनसत्ता में छापने से इंकार कर दिया. साहित्य के कुछ अफसरान और मठाधीशों को अपनी पत्रकार वाली हैसियत से उपकृत करते रहने ( अभी कुछ दिनों पहले फेसबुक पर बहुत इमोशनल होते हुए उदयप्रकाश ने लिखा था कि ओम थानवी के सहयोग से उन्हें अपने बड़े बेटे की शादी के लिए इंडिया इंटरनेशल सेंटर बहुत सस्ते दामों पर मिल गया जिससे वह शादी ‘अभिजात भव्यता’ के साथ संपन्न हुई. साथ ही उन्होंने इसके लिए थानवी जी के प्रति अपने पूरे परिवार की ‘आभार’ भावना का ज़िक्र किया है. मजेदार बात यह है कि इसके तुरत बाद उन्होंने अपने द्वारा साहित्य अकादमी के एक समारोह में अज्ञेय को वामपंथी कवि बताये जाने और उससे अभिभूत होकर थानवी जी द्वारा उनके खीसे में अपनी कलम खोंस दिए जाने का ज़िक्र किया है. गोया इन दिनों वह अपने नहीं थानवी जी के ‘कलम’ से ही लिख रहे हैं) के अलावा ओम थानवी का हिंदी में कुल जमा योगदान एक लघु यात्रा वृत्तांत और अज्ञेय वंदना की सारी हदें पार कर लेने का ही रहा है. अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष में दिल्ली से कोलकाता तक उन्होंने जो ‘अभिजात भव्यता’ वाले आयोजन कराये, अपने अखबार (जिसमें इन दिनों जन की नहीं अभिजन साहित्य की चर्चा ही अधिक होती है) के पन्ने भर डाले, उन पर संस्मरणों की भारी-भरकम पोथी तैयार कर दी उसके बावज़ूद साहित्य जगत में अज्ञेय को लेकर किसी सकारात्मक हलचल की अनुपस्थिति ने उनमें कुंठा का एक भाव पैदा किया हो तो किमाश्चर्यम? आखिर छोटे शहरों, कस्बों और महानगरों तक में नागार्जुन, शमशेर और केदार नाथ अग्रवाल पर अक्सर संस्थाओं की मदद के बिना सामूहिक पहलों से जो कार्यक्रम हुए, पत्रिकाओं के अंक निकले, उनकी कविताओं के पुनर्पाठ हुए, अशोक वाजपेयी और थानवी जी के भरपूर प्रयास के बावजूद वह अज्ञेय को कहाँ नसीब हुआ?

खैर, बात हो रही थी सी आई ए के सम्बन्ध में कमलेश जी के बयान की. ओम थानवी ने इस बहस में भागीदारी करते हुए कहा कमलेश के ‘अच्छे कवि’ होने की बात की और कहा कि हमें उनकी कविता पर बात करनी चाहिए, न कि उनके विचारों पर क्योंकि वह मूलतः विचारक नहीं कवि हैं. यहाँ तक कि अगर वे सी आई ए के समर्थन में भी कविता लिख दें तो मैं देखूँगा कि वह कैसी कविता है. ज़ाहिर है उनकी किसी बात की तरह यह बात भी ‘राग अज्ञेय’ के बिना पूरी कैसे हो सकती थी, तो उन्होंने अज्ञेय जन्मशताब्दी वर्ष में शिरकत करने वालों का नाम भी गिनाया और मार्क्सवादियों की आलोचना का धर्म भी निभाते हुए लोकतंत्र और आवाजाही के कुछ सबक दिए. यहाँ तक कि अपनी बात में वज़न डालने के लिए विजयदेव नारायण साही का वह वक्तव्य भी दुहराया कि मैं नीत्शे की किताब जरथुस्त्र उवाच को समाज विरोधी मानता हूँ लेकिन साहित्य के दृष्टि से महान रचना मानता हूँ और उसकी एक प्रति अपने पास रखता हूँ. बार-बार पूछे जाने पर पहले तो वह सी आई एक पर कुछ बोलने को तैयार न होते हुए उसे एक गौण मुद्दा बताने पर तुले रहे और फिर कहा “उनका यह कहना गलत नहीं कि एक दौर में सीआइए ने अनेक महान लेखकों को (प्रताड़ित रूसी लेखकों पास्तरनाक, सोल्जेनित्सीन, जोजेफ ब्रोड्स्की आदि के अनेक नाम तो जगजाहिर हैं) मदद की. और सीआइए ने दुनिया का महान साहित्य (नोबल रचनाओं सहित) भी सस्ती दरों पर दुनिया में उपलब्ध करवाया. मगर यह काम तो केजीबी भी तो करती थी. चेखव-तोल्स्तोय सस्ते में उपलब्ध कराते-कराते कौड़ियों के मोल स्तालिन के विचार भी सुन्दर जिल्दों में परोस दिए जाते थे! ....बहरहाल, मेरे इस बहस में पड़ने का एक ही सबब है कि कमलेशजी ने क्या कहा उस पर इतना कुढेंगे तो एक वक्त के बाद उनकी कविता का आनंद कभी नहीं ले पाएंगे जो सचमुच अच्छा काव्य है. एक रचनाकार के मामले में वही महत्त्वपूर्ण है. वे सीआइए की नौकरी करने लगें तब भी मैं यह बात इसी तरह कहूँगा... मेरा तो इतना निवेदन ही था की कमलेश जी मूलतः कवि हैं, विचारक या दार्शनिक आदि नहीं. तो उनकी रचना से ही उन्हें नापा जाना चाहिए, विचारों से नहीं. ” 

ज़ाहिर है यह बहस दो व्यक्तियों या समूहों भर की नहीं रह गयी थी. यह उस पुरानी बहस की पुनरावृत्ति थी जिसमें एक पक्ष जीवन और रचना के बीच में गहरे अंतर्संबंध की बात को स्वीकार करता है तो दूसरा पक्ष वास्तविक जीवन में ली गयी पक्षधरताओं को दरकिनार कर रचना को उसके विशुद्ध सौंदर्यवादी नज़रिए से प्राप्त निकष के आधार पर देखने को कहता है. ये स्पष्ट रूप से दो भिन्न विश्व दृष्टियों का सवाल है. कविता को उसके सौन्दर्य के आधार पर देखने की इस ज़िद के पीछे भी आलोचना का कितना स्वीकार था यह तब समझ में आ गया जब मंगलेश डबराल ने कमलेश के कवि रूप पर केन्द्रित होते हुए कहा कि  कमलेश जी कुल मिलाकर एक रूमानी कवि हैं, जिनकी कविता पर विदेशी कवियों का बहुत साफ़ असर रहा है. उनका प्रारम्भिक दौर काफी अच्छा था और उत्तर छायावादी, रोमांचक भाषा और विन्यास उन्होंने विकसित किया था. एक भाषाई सवर्णात्मकता , जो कुछ रोमांचित करती थी. लेकिन परवर्ती कमलेश बेहद निराशाजनक हैं. मार्क्सवाद के बारे में उनका सोच और उनकी समझ, दोनों बहुत पिछड़े हुए हैं और शीतयुद्धकालीन हैं, उनका आज के पूंजीवाद और मार्क्सवाद की वैचारिकी में आये बदलावों से कोई दूर का भी रिश्ता नहीं. अब उन्हें कोई महाकवि कहे या महा विचारक,इससे कविता और विचार, दोनों पर आज कोई फर्क नहीं पडता, हाँ कुछ तात्कालिक चर्चा वगैरह तो हो सकती है. या कुछ धुंधलका फ़ैल सकता है, जैसे भगवान सिंह की किताब के बहाने डी डी कोशाम्बी पर उनके बचकाने और अतार्किक प्रहार या कुलदीप कुमार को दिए गए कुंठित जवाब से चंद लम्हों के लिए फैली. (२) पोलिश कवि मिलोश के अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित चयन का नाम 'खुला घर' है तो कमलेश जी के संग्रह का नाम 'खुले में आवास' है, और फिर अगला कमज़ोर संग्रह है 'बसाव'. और ये सभी नाम सचमुच के महाकवि पाब्लो नेरुदा के 'रेसीडेन्स आन अर्थ' --- रेसिदेंसिया एन ला तियेरा - के फालआउट्स हैं, तो हिंदी में यह सब चलता है तात्कालिक और क्षणिक महानताओं के नाम पर.”  इसे एक स्वस्थ आलोचना की तरह लेने या फिर उनकी कविताओं के आधार पर इसका सम्यक प्रतिउत्तर देने की जगह इसे  विचारधारा से इतर कवि को खारिज़ करने की साजिश की तरह प्रसारित किया गया. ज़ाहिर है कि ओम थानवी की आवाजाही और उनके  लोकतंत्र का एकमात्र अर्थ उनके कहे का अप्रश्नेय स्वीकार है.  इसका सबसे बड़ा उदाहरण फेसबुक का ही है जहाँ अज्ञेय पर ज़ारी बहस में असहमति के कारण उन्होंने वीरेन्द्र यादव, हिमांशु पंड्या और प्रियंकर पालीवाल जैसे लोगों को उन्होंने ब्लाक कर दिया तो भाषा सम्बन्धी के विवाद में अपना झूठ पकडे जाने पर (आशुतोष कुमार का प्रतिवाद न छापने के लिए ओम थानवी ने सफाई दी थी कि वह तय शब्द सीमा से अधिक का है, जबकि कम्प्युटर से गिने जाने पर वह तय शब्द सीमा में ही निकला और अंततः एक आधे-अधूरे जवाब के साथ उसी स्पेस में प्रकाशित हुआ) उन्होंने गिरिराज किराडू, अमलेंदु उपाध्याय, आशुतोष कुमार और मुझ सहित अनेक लोगों को ब्लाक कर दिया.

सी आई एक वाले मुद्दे पर बहस आगे चली. लगभग डेढ़ महीने चली यह पूरी बहस जनपक्ष ब्लॉग पर है और हू-ब-हू पुनर्प्रस्तुत करना स्थानाभाव में संभव न होगा. किताबें छापने की सी आई ए की भूमिका पर दिगंबर ओझा ने पद्मा सचदेव द्वारा संकलित इब्ने इंशा के लेखों की किताब ‘दरवाज़ा खुला रखना’ के हवाले से लिखा, ‘"बेऐब ज़ात तो खुदा की है, लेकिन अफसानातराजी कोई हमारे मगरबी मुसन्निफों से सीखे. चीन के मुतल्लिक अकेले अमरीका में इतनी किताबें छप चुकी हैं कि ऊपर-तले रखें तो पहाड़ बन जाए. लेकिन अक्सर उनमें से वासिंगटन और न्यू यार्क में बैठ कर लिखी गयी हैं. वहाँ ऐसे रिसर्च के अदारे हैं, ज्यादातर सी.आई.ऐ. के ख्वाने-नेमत से खोशा चीनी करनेवाले जो आपकी तरफ से वाहिद मुतकल्लिम में चश्मदीद हालात लिखकर देने को तैयार हैं. आप फकत इस पर अपना नाम दे दीजिए. बाज़ पब्लिशिंग हाउस (मसलन प्रायगर) तो चलते ही सी.आई.ए. के पैसे से हैं. मशहूर रिसाला एनकाउण्टर भी इन्हीं इदारों से सांठ-गाँठ रखता है. कीमत इसकी ढाई-तीन रूपए है लेकिन कराची के बुकस्टालों पर एक रुपए में मिल जाता है. मालूम हुआ कि पाकिस्तान में इल्म का नूर फ़ैलाने के लिए इसकी कीमत खास तौर पर रखी गयी है. हम चाहते हैं कि चीजें सस्ती हों लेकिन ऐसा भी नहीं कि कलकलाँ अफीम सस्ती हो जाए तो खाना शुरू कर दें और जहर की कीमत चौथाई रह जाए तो मौका से फायदा उठाकर ख़ुदकुशी कर लें. आठ-आठ दस-दस आने की किताबों का सैलाब भी आया और बराबर आ रहा है. जिनको स्टूडेंट एडिशन का नाम दिया जाता है. प्रोपेगंडे की किताबों में चंद किताबें बेजरर किस्म की भी डाल दी जाती हैं कि देखिये हमारा मकसद तो फकत इसाअते तालीम है.’  आशुतोष कुमार ने ओम थानवी के एक सवाल के जवाब में कहा कि ‘ कमलेशजी मानवजाति की ओर से जिस सी आइ ए के ऋणी हैं , अच्छा होता कि पिछली सदियों में , एशिया -अफ्रीका से ले कर - लातीनी अमरीका में -- दुनिया भर में-- लोकतांत्रिक समाजवादी सरकारों को पलटने , नेताओं और लेखकों को खरीदने , उनकी हत्या कराने , से ले कर खूनी सैनिक क्रांतियां /जनसंहार कराने तक की उस की करतूतों के बारे में भी दो शब्द कह देते . सोवियत विकृतियों की आलोचना की सुदृढ़ परम्परा खुद कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर ट्रोट्स्की से ले कर माओ और उस के बाद तक मौजूद रही है . सोवियत संघ के और दुनिया भर के स्वतंत्र मार्क्सवादी/ नव-मार्क्सवादी लेखकों ने लिखा है . सी आइ ए की सुनियोजित प्रचार सामग्री इस लिहाज से कतई भरोसे लायक नहीं हो सकती . उसके प्रति कृतज्ञता केवल वे लोग महसूस कर सकते हैं , जिन्हें कम्युनिस्ट विरोधी साहित्य की सख्त जरूत थी . वो चाहे जहां से मिले , जैसी मिले . वे जो यों तो किसी विचार के 'पश्चिमी' होने मात्र से आशंकित हो जाते हैं , और भारत पर उस का प्रभाव पड़ते देख पीड़ित , लेकिन हर उस पश्चिमी लेखक के मुरीद हो जाते हैं , जो कम्युनिस्ट विरोधी हो . इन पन्नों को पढ़ कर तो यही लगता है कि कमलेश जी की कृतज्ञता ज्ञान के विस्तार के कारण नहीं , बल्कि कम्युनिस्ट -विरोध के कारण है . उन्हें अपनी कृतज्ञता जाहिर करने से कौन रोक सकता है , लेकिन उसे '' मानवजाति की कृतज्ञता '' के रूप में स्थापित करने की कोशिश पाखंडपूर्ण तो है ही , हास्यास्पद भी है .” लेकिन इन सवालों का कोई जवाब देने की जगह पूरी बहस को पटरी से उतारने , कम्युनिस्टों को लोकतंत्र के खिलाफ कहने, एजरा पाउंड तथा ज्यां जेने के बहाने लेखन और जीवन को दो लग-अलग खांचों में देखने की वक़ालत की गयी. जब मंगलेश डबराल, गिरिराज किराडू और वीरेन्द्र यादव ने एजरा पाउंड को महान बताने वालों पर सवाल उठाये और खुद एजरा के फासीवाद समर्थन को लेकर अपराधबोध से ग्रस्त होने की बात की तो ज़ाहिर है जवाब इसका भी नहीं था. गिरिराज किराडू का यह सवाल कि ‘एक फासिस्ट को महत्वपूर्ण लेखक कौन और कैसे मानता है,मनवाता है इसे समझे बिना, एजरा पाउंड को एक बड़ा लेखक न मानने की लम्बी अकादमिक और वैचारिक परंपरा को समझे बिना (पाउंड के फासिज्म पर अब तक लगातार अध्ययन हो रहे है और उनके जितना पहले समझा जाता था उससे कहीं ज्यादा संगीन फासिस्ट और रेसिस्ट - एंटी-सेमेटिक, यहूदी-विद्वेषी - होने के प्रमाण सामने आये हैं,उनकी बेटी अभी दो साल पहले यह लड़ाई लड़ रही थी कि पाउंड के नाम से ही एक नवफासीवादी समूह ने अपना नाम रख लिया है) एक नजीर की तरह उनके मामले को उद्धृत करना जानकारी व अध्य्यन की कमी के साथ समझ का भी कुछ पता देता है. ज्यां जने जिनके अपराधों में चोरी, बदलचलनी, हेराफेरी के साथ साथ समलैंगिकता भी शामिल थी को सार्त्र द्वारा कैननाईज (दोनों अर्थों में) करने का मामला पाउंड के मामले से अलग है और दोनों को मिलाना एक गैर-डायलेक्टिकल समझ का ही प्रमाण है . जेल से छुड़ा लिये जाने के बाद जने कभी अपराध की तरफ नहीं गये. डाकू से लेखक बनना स्वीकार्य है अपने यहाँ भी. और पत्रकार से लेखक बनना भी.”  औरमंगलेश डबराल का यह सवाल एजरा पाउंड ने करीब ७० वर्ष पहले मुसोलिनी के रेडिओ से प्रसारण किये थे. क्या हम इतिहास के अँधेरे से कुछ नहीं सीख पाए, जो आज मानवता के शत्रुओं के ऋणीहो रहे हैं ? पाउंड के कुकृत्य के कारण भी परिचित हैं - एक, अर्थशास्त्री डगलस के विचारों का प्रभाव जो सूदखोरी और वित्तीय पूँजी को अपराध की जड़ मानता था. पाउंड बैंक्स के विरोधी थे और मानते थे कि इंग्लैण्ड की डेमोक्रेसी बैंक और सूदखोरी पर प्रभुत्व रखने वाले ज्यूज के हाथ में है. लेकिन क्या हम भूल जाते हैं कि पाउंड के 'anti-antisemitism' का कितना तीखा, उग्र विरोध हुआ, पाउंड खुद पागल होकर जेल, हास्पीटल में वर्षों तक रहे और अंत में भयानक पश्चाताप में गले. उनके कुछ जाने-माने वाक्य हैं --'i was stupid, suburban anti-semaiic,.. i spoiled everything i touched.. i've always blundered..i was not a lunatic, but a moron." इस विलाप को देखते हुए पाउंड के काम को आज के किसी वक्तव्य को उचित ठहराने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है? जब पाउंड जैसी प्रतिभा की निंदा हुई तो कमलेश जी की थोड़ी सी आलोचना उनका वध करार दी जायेगी? किस तर्क से? अनुत्तरित ही रहा. इसके बदले में इस पूरी बहस को चरित्र हनन बताने का शोर मचता रहा.    
     
 सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजूहात हैं कि आज शीत युद्ध के इतने वर्षों बाद कमलेश जैसा व्यक्ति सी आई ए के प्रति समर्थन जताता है और ओम थानवी जैसे अज्ञेय भक्त उसके बचाव में सारी सीमाएं पार करते हैं? शीत युद्ध के दौरान सी आई ए की सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रियता अब सर्वज्ञात तथ्य है. कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के साथ साम्यवाद विरोधी लेखकों की एक टोली अज्ञेय के नेतृत्व में सक्रिय थी ही. उसी के एक सदस्य के हवाले से लिखा शंकर शरण का कुत्सा प्रचार का अनमोल नमूना ओम थानवी जनसत्ता के सम्पादकीय पन्नों पर पेश कर ही चुके हैं. ज़ाहिर है कि अपने उस पुराने आका के प्रति कृतज्ञता का भाव बार-बार सामने आता ही है. बहुत संभव यह भी है कि दुनिया भर में छाये आर्थिक संकटों और योरप सहित अलग-अलग जगहों पर सामने आये जन उभारों के मद्देनज़र सी आई ए को एक बार फिर अपने पुराने झंडाबरदारों की ज़रुरत महसूस हो रही हो. व्यक्तिगत तौर पर देखें तो ओम थानवी अपनी इकलौती साहित्यिक ‘उपलब्धि’ अज्ञेय वंदना को लेकर सी आई ए का नाम आने भर से असुरक्षित महसूस कर रहे हों तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. आखिर बरास्ता  कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम सी आई ए का भूत अज्ञेय वन्दकों को सताता तो होगा ही न?