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बुधवार, 14 जुलाई 2010

जन्मशती वर्ष में शमशेर पर पहला विशेषांक आ चुका है…

हिन्दी कविता के लिये यह उत्सव का वर्ष है और साथ ही अपनी प्रगतिशील परंपरा की स्मृति ताज़ा कर अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप के लिये शक्ति जुटाने का। शमशेर, नागार्जुन,केदार नाथ अग्रवाल और फैज अहमद फैज की जन्मशताब्दियों के इस वर्ष में होने वाले तमाम आयोजन बस उत्सव बनकर न रह जायें, इसके लिये ज़रूरी है कि उन सरोकारों और उन स्वप्नों तक पहुंचने के प्रयास किये जायें जिनसे उन्हें अपनी कविता के लिये प्राणशक्ति मिलती थी।

इस साल कवि शमशेरकी जन्मशती पर उन पर केन्द्रित पहला अंक आ गया है। भोपाल से हरि भटनागर के संपादन में निकलने वाली पत्रिका रचना समय के इस अंक का सम्पादन किया है बोधिसत्व ने।

अंक पूरी तरह कविताओं पर केन्द्रित है… अंक की ख़ासियत है कि यहां शमशेर के समकालीनों, अज्ञेय,रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, मलयज से लेकर कुंअर नारायण, विष्णु खरे,अशोक बाजपेयी, प्रभात त्रिपाठी, उदय प्रकाश,राजेश जोशी,मंगलेश डबराल,अरुण कमल,देवी प्रसाद मिश्र,एकांत श्रीवास्तव से होते हुए सुंदर चंद ठाकुर ,शिरीश मौर्य, विशाल श्रीवास्तव, अशोक कुमार पाण्डेय ,रविकांत तक की बिलकुल युवा पीढ़ी तक के कवियों ने 'अपने' कवि शमशेर को समझने-बूझने तथा उनकी कविताई से जूझने का प्रयास किया है। यहां तीन या चार पीढ़ी के कवि एक साथ उपस्थित हैं और शमशेर की कविता पर कवियों का लिखा निश्चित तौर पर आलोचना को समृद्ध करेगा।

इसके अलवा शमशेर की मलयज, नेमिचन्द्र जैन, तथा विनोद दास से बातचीत है, उनकी डायरियों के अंश …और भी बहुत कुछ।

100 रु मूल्य की इस पत्रिका को हरि भटनागर 197, सेक्टर-बी,सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड, भोपाल(म.प्र.)-42 से मंगाया जा सकता है। उनका फोन नंबर है -9424419567 और मेल आई डी है - haribhatnagar@gmail.com

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

विष्णु नागर- ग़लत को पहचानने और सही को कहने के साहस की कविता


(यह लेख संबोधन के विष्णु नागर पर केन्द्रित अंक में छपा है, जिसका कुशल संपादन युवा कवि हरेप्रकाश उपाध्याय ने किया है। )

मेरे लिए किसी प्रिय अग्रज कवि पर लिखना हर बार समकालीन कविता के निकट अतीत की यात्रा करने जैसा होता है। इस यात्रा के कई आत्मीय पड़ाव मुझे हौसला देते हैं कि मैं जो कर रहा हूँ वह सही के पक्ष में एक राजनीतिक और सामाजिक कृत्य है। ऐसी यात्राएं मुझे समृद्ध करती हैं। विष्णु नागर के नवीनतम कवितासंग्रह पर लिखना भी एक ऐसी ही रचनात्मक यात्रा है, जिसे आलोचना या समीक्षा के परम्परागत या बौद्धिक ढांचे में जोड़ना तो शायद मुमकिन नहीं होगा पर यह मेरे भीतर के कवि की दुनिया में बहुत कुछ जोड़ देगी। बड़ों से प्रभावित होने के कई उदाहरण युवा कविता में दिखाई देते हैं लेकिन मेरे लिए यह प्रभावित होना एक सरल पद है - मैं महज प्रभावित नहीं होता, सीखता भी हूँ। प्रभाव तो भाषा, विषयचयन और डिक्शन पर दिखाई देता है और थोथा अनुकरण ही लगता है, जिससे मुझे नहीं लगता कि युवा कविता का कुछ भला होगा। सीखना दरअसल अपने थोड़ा पहले के समय को जानना भी है। मेरे लिए यह `सीखना´ सिर्फ़ कविता तक सीमित नहीं है। कुछ वर्ष पहले युवा कवि-आलोचक (अब सम्पादक `समास´ भी) व्योमेश शुक्ल ने पत्र लिखकर जैसे मेरे भीतर के जल को नापते हुए मुझसे पूछा था कि एक युवा कवि को किस तरह की कविता पढ़नी चाहिए? मैंने जवाब दिया था कि भइये कविता तो बाद में, पहले हमें हरिशंकर परसाई को बहुत ध्यान से पढना चाहिए। वह एक ऐसा लेखक है जो जनता के पक्ष में हमारे भीतर की ज़मीन को बार-बार जोतकर उर्वर बना देता है। मेरा मानना है कि हर सच्चे कवि को जनता के पक्ष में सही राजनीति से दीक्षित होना चाहिए और वह राजनीति उसकी कविता में साफ़ दिखाई देनी चाहिए। जनता का पक्ष कवि को राजनीति सिखा ही देता है। कुछ कवि मित्र जो जाहिर तौर पर `राजनीति´ जैसे शब्द से परहेज करते हैं, भले ही वे स्वीकार न करें पर उनकी भी बेहद अच्छी कविताएं दरअसल कहीं न कहीं `सही´ की इसी राजनीति को व्यक्त करती हैं- इसी से वे सफल कविता बनती हैं। कविता के कुछ अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवनमूल्य होने चाहिए। जाहिर है कि इन जीवनमूल्यों की अभिव्यक्ति हर कवि में अलग तरह से होगी पर उन्हें वहां होना ज़रूर चाहिए। अपने भीतर की चीज़ों को खंगालना भी कवि के लिए ऐसा हो कि तुरत उससे बाहर की दुनिया से जुड़ जाए। बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की यह सम्बद्धता मेरे लिए बहुत ज़रूरी है। इसी को `प्रतिबद्धता´ कहा जाना चाहिए है- `वैचारिक´ तो अपनेआप जुड़ जाएगा। पिछले कुछ दिनों से अपने समय की कविता के बारे में इस तरह के सोच-विचार के बीच नागर जी के नए संग्रह का नाम `घर के बाहर घर´ मेरे मन में बार-बार आता है। यह मुझे अपनी धारणाओं के बहुत निकट लगता है। यह किसी कविता का शीर्षक नहीं, एक बहुत छोटी-सी कविता के शब्द हैं -

मेरा घर
मेरे घर के बाहर भी है
मेरा बाहर
मेरे घर के अन्दर भी

घर को घर में
बाहर को बाहर ढूंढते हुए
मैंने पाया

मैं दोनों जगह नहीं हूँ

मैंने जिस बात को कहने में एक पूरा अनुच्छेद लिया, उसी को यह कविता चन्द शब्दों में कह लेती है। घर और बाहर को ढूँढने के रूढ़ और ग़लत तरीके की शिनाख़्त करती है। चाहे जीवन हो या विचार, भीतर को बाहर भी खोजिए और बाहर को भीतर भी - दोनों जगह ख़ुद को पायेंगे वरना किसी एक से भी जायेंगे।

मैं बार-बार सही राजनीति के पक्ष जाता रहा हूँ या कहें कि जाते रहने का दम भरता हूँ। आख़िर कौन-सी राजनीति है, जिसे हम सही कहेंगे सही को खोजने से पहले यदि ग़लत को पहचान लिया जाए तो यह खोज बहुत आसान हो जायेगी। विष्णु नागर की कविता ठीक यही करती है। वह लगातार एक धुन में ग़लत को रेखांकित करती जाती है। अभी ही नहीं, पिछले सभी संग्रहों में भी। मैं इस बात से बहुत कुछ सीखता हूँ। दरअसल सही कहना उतना जोखिमभरा नहीं होता, जितना ग़लत पर हमला करना। क्या होना चाहिए यह बता कर आप वाहवाही लूट सकते हैं पर क्या नहीं होना चाहिए यह कहकर आप दुश्मन बनाते हैं। हमारे देश में तथाकथित स्वकल्पित समुन्नत राष्ट्रवाद की ऊंची `शाखाओं´ में जीनेवाले प्राणियों से छेड़छाड़ करना कितना घातक हो सकता है, इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। विष्णु नागर की कविता बार-बार जोखिम लेती है - राजनीतिक रूप से भी और कविता के बेहद सांकेतिक होते जा रहे आधुनिक शिल्प से विद्रोह कर सपाटबयानी करते हुए भी। आलोचकों के लिए कविता बने न बने, जनता के लिए एक सीधा-सच्चा बयान बनना चाहिए, यह संकल्प अनमोल है। `क्योंकि मैं मुसलमान हूँ ´ एक ऐसी ही असाधारण कविता है। इसमें हम चाहें तो एम.एफ. हुसैन प्रकरण की गूँज भी सुन सकते हैं और हमें सुननी भी चाहिए। इस कविता को पिछले दिनों धीरेश सैनी ने अपने ब्लॉग `एक ज़िद्दी धुन´ पर लगाया था और वहां पर काफी बहस भी हुई।

भारतीय कवियों के सामने राजनीतिक संकटों की फेहरिस्त में पूंजीवाद निराला के समय से मौजूद है। हमारे समय में इसका रूप अधिक जटिल और लुभावना होता गया है। सत्ताकेन्द्र इसे अब बहुत आसानी के साथ विकास से जोड़ देते हैं और जनता के सामने लगातार एक कुहासा पैदा करते जाते हैं। आम पढ़ालिखा होशियार हुनरमन्द नौजवान स्वाभाविक रूप से इसे ही अपना `नयापथ´ मानता है और इससे लाभ उठाने की पूरी कोशिश करता है। मैंने देखा है कि चन्द्रकान्त देवताले, लीलाधर जगूड़ी, वीरेन डंगवाल, ज्ञानेन्द्रपति, मंगलेश डबराल जैसे अग्रजों की कविता लगातार इस कुहासे के बीच रोशनी की ज़रूरी तलाश करती है। विष्णु नागर के इस संग्रह में भी यह तलाश अपनी पूरी बैचेनी के साथ उपस्थित है और एक अन्तर्निहित अनिवार्य व्यंग्य उसे चमकाता जाता है। `पूंजीवाद´ और `अमरीकीकरण´ ऐसी ही दो कविताएं हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने काफ़ी पहले स्पष्ट कर दिया था कि सभ्यता के विकास के साथ उस पर पड़े आवरणों को हटाते हुए कविकर्म और भी कठिन होता जायेगा। पूँजीवाद भी अब सभ्यता पर पड़े आवरणों की कई-कई परतों में भीतर कहीं मौजूद है और जाहिर है कि इन परतों के नीचे हत्यारी सभ्यताओं को समझना और उसका एक सबल प्रतिपक्ष सम्भव करना एक दुष्कर कार्य है। विष्णु नागर इसे करते हैं। पूँजीवाद शीर्षक कविता की ये पंक्तियां इन सभ्यताओं के नए प्रतिपादित हत्यारे सिद्धान्तों की शिनाख़्त करती हैं -

बहरहाल पूँजीवाद एक कर्मयोगी है
मन, वचन, कर्म से
वह यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है
कि वह पूँजीवाद होकर भी पूँजीवाद नहीं है, शोषण वह नहीं करता
लोगों को ग़रीबी की ओर वह नहीं धकेलता
वह तो रोज़ी-रोटी देता है, आगे आने के अवसर देता है,
समृद्धि लाता है लेकिन आलसी लोगों का कोई क्या करे?

आख़िर दुनिया में वहीं लोकतन्त्र है, जहां पूंजीवाद है
वही है जो मानवाधिकारों की रक्षा करता है
वही है जो तीसरा विश्वयुद्ध नहीं होने दे रहा
(और जो वह होने दे रहा है, उसे विश्वयुद्ध नहीं कहा जा सकता)
वही है जो पूँजी का वैश्विक प्रवाह सुगम बनाए हुए है
सट्टेबाज़ी से कमाने के अवसर देता है

इसी कविता का अन्त बींसवी सदी के आख़िर में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के `मनमोहन´ प्रयत्नों और `अटल´ सम्भावनाओं के बीच से निकलता और हमें अन्तिम रूप से सावधान करता है-

वैसे इस देश में पूँजीवाद
इसलिए भी है कि ईश्वर की ऐसी ही मरज़ी है
और कौन है जो आज तलक उसकी मरज़ी के खिलाफ़ जा सका है?

अनायास नहीं है कि अपने कविजीवन के हर वक़्त में विष्णु नागर ने `हत्यारे´ पर कविता लिखी हैं पर इसे दुहराव नहीं कहा जा सकता। `हत्यारा´ किसी भी कवि का प्रिय पद नहीं हो सकता लेकिन देखिए कि आधुनिक समाज में इस शब्द का फैलाव किस तरह बढ़ता गया है साथ ही उसे बार-बार रेखांकित करने की ज़रूरत भी। समूची सभ्यता और समाज ही हत्यारे में बदलते गए हैं और उदाहरण के लिए अमरीका अपने दुर्दान्त मानवविरोधी कारनामों के साथ सदैव दृश्य पर उपस्थित है। मुझे याद पड़ता है अपने किसी व्यंग्य निबंध में हरिशंकर परसाई ने किसी पश्चिमी विचारक को उद्धृत करते हुए लिखा था कि कोई भी मानवसमाज स्वाभाविक रूप से असभ्यता से सभ्यता और सभ्यता से बर्बरता की तरफ जाता है लेकिन अमरीकी समाज एक ऐसा समाज है जो असभ्यता से सीधे बर्बरता की तरफ गया है - उसने सभ्यता का पड़ाव देखा ही नहीं। विष्णु नागर के इस संग्रह में अमरीका पर भी कविता है और हत्यारे पर भी, जिनके आशय बहुत स्पष्ट और वही हैं जो परसाई जी के उस निबंध के। इसी क्रम में एक कविता `बमाबम´ भी है। यह विषय मुझे येहूदा आमीखाई की एक बेहद संजीदा कविता `बम का व्यास´ की याद दिलाता है, जो अपनी तरह की अनोखी और अकेली कविता है। विष्णु नागर भी इस पर कुछ गम्भीर बातें कहते हैं पर अपने ख़ास वक्रोक्तिप्रकाश में।

इस संग्रह में कुछ कविताएं स्त्रियों और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के तानेबाने में क़दम रखती हैं। इनमें `तुम्हें हंसता देखकर´ जैसी छोटी-सी नाज़ुक कविता भी शामिल है जो दरअसल बहुत कम शब्दों में एक पूरे विधान को व्यक्त करने की क्षमता रखती है -

तुम्हें हंसता देखकर
अचानक यह दुष्ट ख़याल आया
कि तुम रोते हुए कैसी लगोगी

और तब भी मैंने तुम्हें हंसते पाया

इसी क्रम में एक कविता मर्द के रोने पर भी है। `कौन है वह मर्द´ शीर्षक कविता में रोने का ख़ास ज़िक्र तो है ही, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की एक ज़रुरी और मानवीय व्याख्या भी है-

है कोई ऐसा मर्द
जो कभी फूट-फूटकर नहीं रोया

कौन होगा ऐसा अभागा
जिसके आंसू कभी किसी औरत ने नहीं पोंछे
जिसे अपने सीने से नहीं लगाया, जिसे पानी नहीं पिलाया
जिसका सिर नहीं सहलाया, जिसे चुप नहीं कराया
जिसके लिए औरत कभी किसी से लड़ी नहीं ?

ज़रा `है कोई ऐसा मर्द´ से फूट पड़ती चुनौती को देखिए। मुझे तो इन पंक्तियों तक आते-आते आलोक धन्वा की विख्यात कविता `भागी हुई लड़कियां´ का अन्त भी याद आने लगता है, जहां कवि पूछना शुरू करता है कि `तुमसे नहीं कहा कभी किसी स्त्री ने / आज की रात रूक जाओ? ´ साथ ही स्त्रीविषयक इन कविताओं से गुज़रते मनमोहन की कुछ कविताएं भी भीतर कहीं गड्ड-मड्ड होने लगती हैं, जिससे पता लगता है कि हमारे ये अग्रज महज समकालीन ही नहीं, संवेदनात्मक धरातल पर किस हद तक समानधर्मा भी हैं।

हर बड़ा और विचारवान कवि एक विशिष्ट कालबोध रखता है और अपने ढंग से उसे व्यक्त करता है। विष्णु नागर के यहां भी इस तरह की अभिव्यक्ति का होना स्वाभाविक है -

मैं अपना बचपन भूल रहा हूँ
अपने बच्चों का बचपन भी

इतना ज़्यादा वर्तमान हो रहा हूँ
कि मुझे इतिहास होने में देर नहीं लगेगी!

इस कालबोध में एक ज़रूरी राजनीतिक स्वर छुपा हुआ होकर भी मुखर है। पूंजीवादी तात्कालिकता के खिलाफ़ समय के जुड़ने-टूटने का द्वन्द्व यहां साफ़ पहचाना जा सकता है। यह पूरा संग्रह दरअसल छोटी-बड़ी कविताओं से बना हमारे समय का एक बड़ा कोलाज है, जिसे सम्पूर्णता में देखने पर ही उसकी अर्थवत्ता का पता चलता है। फिर कहूंगा कि यह अर्थवत्ता उसी राजनीति में निहीत है, जिसे विष्णु नागर की कविता पूरे साहस के साथ अपना स्वर देती रही है। उम्मीद करता हूँ कि हमारी पीढ़ी भी ज़रूर अपने साथ विष्णु जी जैसे अग्रजों की इस `समकालीनता´ का अहसास करते हुए मनुष्यता के पक्ष में सही राजनीति का संधान करेगी।

***



पत्रिका का यह अंक कमर मेवाड़ी जी को 09829161342 पर फोन करके मंगाया जा सकता है।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

काशीनाथ सिंह से बतकही

( वरिष्ठ कहानीकार काशीनाथ सिंह जी का जनपक्ष की साथी प्रतिभा कटियार द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार पल्लव द्वारा संपादित बनास के ताज़ा अंक में छपा है। उन्हीं पर केन्द्रित इस अंक में आप इस बहुआयामी कथाकार के जीवन और रचनाकर्म के तमाम रंगो की पड़ताल कर सकते हैं। 'काशी का अस्सी' के अंश तो है ही साथ में हिमांशु पण्ड्या, राजीव कुमार,निखिलेश,वैभव सिंह,विनोद तिवारी, गौतम सान्याल आदि के इस उपन्यास पर लिखे महत्वपूर्ण आलेख भी हैं। राजकमल चौधरी, धूमिल, राजेन्द्र यादव,भीष्म साहनी, कमला प्रसाद,कुमार सम्भव, मूलचन्द गौतम,उदय प्रकाश, स्वयंप्रकाश, दिनेश कुशवाह आदि के साथ उनके पत्र-व्यवहार लेखक की ज़िन्दगी में पाठकों का प्रवेश कराते हैं तो रमाकांत श्रीवास्तव,श्रीवल्लभ शुक्ल,वरुण ग्रोवर के संस्मरणात्मक लेख इस झरोखे में पर्याप्त रोशनी भरते हैं।
295 पन्नों की इस संग्रहणीय किताबनुमा ख़ूबसूरत पत्रिका की क़ीमत है मात्र 75 रु और आप इसे pallavkidak@gmail.com पर मेल करके मंगा सकते हैं। )


प्रश्न- काशी का अस्सी अनायास लिखा गया उपन्यास है. आपने तो कथा रिर्पोताज लिखे थे, क्या तब आपने यह सोचा था कि कभी ये कथा रिर्पोताज उपन्यास का रूप ले लेंगे. कथा रिर्पोताजों की उपन्यास तक की यात्रा कैसे हुई और कैसी रही?
- असल में पूरे उपन्यास में पांच कहानियां हैं. शुरुआत में जो दो हैं देख तमाशा लकड़ी का और संतो घर में झगड़ा भारी ये दोनों कथा रिर्पोताज हैं. तीसरा संतो और घोंघा बसंतों का अस्सी संस्मरण के रूप में छपा था. चौथा व पांचवां खंड पांडे कौन कुमति तोहे लागे और कौन ठगवा नगरिया लूटल हो कहानी के रूप में छपा था. जब इसका पहला खंड छपा था, तब इसके प्रारूप को लेकर मेरे और संपादक राजेन्द्र यादव दोनों के बीच मतभेद था. राजेन्द्र जी को लग रहा था कि यह रिर्पोताज है जबकि मैं इसे कहानी मानता था. आखिर काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने इसे कथा रिर्पोताज का नाम दिया. जब मैंने लिखना शुरू किया था तब मैंने यह नहीं सोचा था कि जो मैं लिख रहा हूं इसका स्वरूप क्या होगा. मेरे सामने जो काशी के अस्सी का लोकेल था, मैं उस लोकेल को अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता था. मैं यह लोकेल उन्हें पढ़ाना नहीं, दिखाना चाहता था. अस्सी सिर्फ एक जगह नहीं है. यह नगर भी है गांव भी, कस्बा भी है. यहां जो चाय की दुकान है वहां रिक्शेवाले, दूधवाले, विद्यार्थी, गायक, कवि, पत्रकार, प्रोफेसर सब इकट्ठे होते हैं. यह ऐसी जगह है जहां ढेर सारी विविधताएं एकत्र होती हैं. प्रजातंत्र का असली चेहरा भी यहीं नजर आता है. एक रिक्शेवाला भी अपनी बात को प्रोफेसर साहब को समझाते हुए नजर आता है, तो एक विद्यार्थी बिना किसी डर के अपने विचार व्यक्त कर रहा होता है. कहीं कोई डर नहीं, घबराहट नहीं. सच्चा लोकतंत्र यही है. इसीलिए उपन्यास में मैंने इसे संसद का नाम भी कई जगह दिया है. लोकेल एक है चाय की दुकान. पात्र भी एक ही है जो पांचों लंबी कहानियों में फैले हुए हैं.


प्रश्न-काशी का अस्सी ने शिल्प के स्तर पर नये प्रयोग किये हैं और यह पाठकों ने पसंद भी किये हैं. क्या पारंपरिक शिल्प में यह नहीं लिखा जा सकता था?
- कई बार जब हम लिखने बैठते हैं तो प्रचलित प्रारूपों की सीमाओं के पार जाना पड़ता है. यूं भी जिस दौर में काशी का अस्सी लिखा गया था तब विधाओं की एक-दूसरे में आवाजाही शुरू हो गयी थी. कविता कहानी में, कहानी कविता में, वैचारिक बहसें कहानियों में चहलकदमी करने लगी थीं. शायद इसीलिए इसमें भी विधाओं के टूटने या किसी नयी विधा या शिल्प के जन्म लेने की गुंजाइश बन पाई. यूं मेरा उद्देश्य कतई नहीं था कि इसे उपन्यास ही माना जाए. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि मैंने यह तय करके लिखा ही नहीं था कि यह किस विधा की कौन सी चीज होगी. मेरे हिसाब से विधाओं का प्रारूप रचनाओं के आधार पर तय होना चाहिए न कि रचनाएं विधा के प्रारूप पर लिखी जानी चाहिए. मेरे लिए महत्वपूर्ण था उस लोकेल को दिखाया जाना. जो मैंने दिखाया भी है. इसलिए अगर इसमें उपन्यास का ढांचा टूटा है तो उसे लेकर मुझे कोई गुरेज नहीं है.


प्रश्न-काशी का अस्सी से पहले बहती गंगा जैसा क्लासिक नॉवेल लिखा जा चुका है, उसके साथ तुलना करें तो आपका पक्ष क्या होगा?
- मैंने बहती गंगा पढ़ा जरूर था, लेकिन लिखते समय वह मेरे ज़ेहन में कहीं नहीं था. बहती गंगा में पुराना और पूरा काशी है. यह उन्नीसवीं सदी का काशी है. जबकि मेरे यहां बीसवीं सदी के आखिरी दशक का काशी न$जर आता है. मेरे यहां पूरा काशी नहीं काशी का एक मोहल्ला भर दिखता है. इस मोहल्ले को तुलसीदास के कारण जाना जाता है. नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विद्यासागर नौटियाल, विजयमोहन सिंह, त्रिलोचन, विश्वचंद्र शर्मा, चंद्र बली सिंह, शिवप्रसाद सिंह, जारी प्रसाद द्विवेदी, धूमिल आदि के कारण जाना जाता रहा है. यहां इन लोगों का आना-जाना रहा है. आजादी के इतिहास की कई कडिय़ां यहां मिलती हैं. काशी का अस्सी का समय बीसवीं सदी का आखिरी दशक था. उस समय सोवियत रूस का विघटन हो चुका था. उदारीकरण पांव पसार रहा था. बाबरी मस्जिद, राम मंदिर विवाद जोरों पर था, मंडल की आग में देश जल रहा था. कांग्रेस की सत्ता खंडित हो रही थी. अस्सी घाट पर विदेशियों का आना बढऩे लगा था. ग्लोबलाइजेशन का आमजन पर क्या असर पड़ रहा है और उसकी प्रतिक्रिया क्या उसे बताने के लिए मैंने इसे लिखा.

बहती गंगा और काशी का अस्सी में समानता बस इतनी है कि दोनों की संरचना औपन्यासिक नहीं है. बहती गंगा में भी अलग-अलग कहानियां है. गुंडों की कहानियां, पंडों की कहानियां, गायकों की, कोठों की कहानियां वगैरह. बहती गंगा में लोकतंत्र नहीं है. ग्लोबलाइजेशन नहीं है. बदलाव नहीं है. इसमें और काशी का अस्सी में काफी अंतर है.

प्रश्न-काशी का अस्सी पर आरोप है कि वह राजनीति का माखौल उड़ाता है. लेकिन क्या परिवर्तन कभी राजनीति के बिना हो सकता है?
- नहीं, परिवर्तन राजनीति के बिना तो नहीं हो सकता. मैंने काशी का अस्सी में राजनीति का माखौल उड़ाया भी नहीं है. मैंने राजनैतिक पार्टियों का माखौल उड़ाया है. इसमें राजनीतिक महत्व पर टिप्पणियां $जरूर हैं लेकिन मेरी दृष्टि सामाजिक जीवन पर है. कौन ठगवा नगरिया लूटल हो में $जरूरी भौतिक सुविधाएं हैं फिर भी उल्लास, हंसी, खुशी सब दुर्लभ होती जा रही है. यह अस्सी का हमारा लोकेल है. यह एक तरह से म्यूजियम होता जा रहा है. यहां की सारी चीजें हंसी, खुशी, उल्लास, लोकतंत्र, उन्मुक्तता सब धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है. हम असामाजिक और अलोकतांत्रिक होते जा रहे हैं.


प्रश्न- दूधनाथ जी कहते हैं कि काशी का अस्सी को नामवर जी ने इसलिए आगे बढ़ाया, ताकि उनके आखिरी कलाम को महत्व मिल सके. इस बारे में आपकी क्या राय है?
-दूधनाथ सिंह महत्वपूर्ण कथाकार हैं. इस मामले में वे नामवर सिंह को बेवजह घसीट रहे हैं. अगर वे मेरे कहने से संतुष्ट हों तो मैं कहे देता हूं कि काशी का अस्सी आखिरी कलाम के आगे कौड़ी का तीन है. वैसे मैं अपनी रचनाएं आलोचकों के लिए नहीं पाठकों के लिए लिखता हूं. और पाठकों ने इसे बेहद सराहा है. इसलिए बाकी टिप्पणियों से मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता.

प्रश्न-काशी का अस्सी को लेकर कोई अलग सा अनुभव जो आप शेयर कर सकें?
-अनुभव तो बहुत सारे हैं. जब ये छपता था तो उस चाय की दुकान पर कई दिनों तक इसकी चर्चा होती रहती थी. दूधवाले, रिक्शेवाले, सब्जीवाले सब आकर यहां जमा होते थे. हंस की प्रतियां सुरक्षित रखी जाती थीं. उनका पाठ होता था. जो लोग पढऩा नहीं जानते थे, वो दूसरों से पढ़वाया करते थे. इसे लेकर मुझे काफी धमकियां वगैरह भी मिलीं. कुछ लोगों ने तो कुलपति को पत्र लिखकर यह तक कहा कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने लायक ही नहीं हूं. लेकिन यहां चाय की दुकान पर हमेशा मुझे सम्मान मिला. साहित्य की दुनिया में तो इसे स्वीकृति काफी बाद में मिली लेकिन अस्सी पर इसे शुरू से ही अपनाया गया
.

एक किस्सा जरूर बताना चाहूंगा. जब काशी का अस्सी का शायद दूसरा एपिसोड आया था, तब की बात है. यहां एक संस्कृत पाठशाला हुआ करती थी. यहां ब्राह्मणों के बच्चे पढ़ते थे. उनकी उम्र यही कोई 13-14 साल की रही होगी. वे रोज गंगा स्नान करके निकलते थे. यह बताना जरूरी है कि वह भाजपा का दौर था. तो एक दिन वे बच्चे जनेऊ वगैरह चढ़ाये हुए नहा-धोकर उधर से निकले और उन्होंने पत्थर उठाकर पप्पू चायवाले की दुकान पर उठाकर फेंकने शुरू कर दिये. यह प्रतिक्रिया थी मेरे लिखने को लेकर. पप्पू को काफी चोटें आई थीं. उसे प्लास्टर वगैरह चढ़वाना पड़ा था. राजेन्द्र यादव ने कहा कि इस मुद्दे को मीडिया में लाना चाहिए. इस पर बहस चलाई जानी चाहिए. हमने पप्पू से बात की कि तुम हिम्मत से पूरे मामले का सामना करो और अपनी बात रखो. लेकिन वो बेचारा डर गया. उसने हाथ जोड़ दिये कि भैया, हम इलाज करा लेंगे लेकिन अब और इस मामले को आगे नहीं बढ़ा पायेंगे. दुकान बंद न करवाइये. फिर यह पूरा मामला शान्त हो गया.

प्रश्न- काशी का अस्सी की भाषा को लेकर काफी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं. खासकर इसमें हुए गालियों के प्रयोग को लेकर. महिला पाठकों की प्रतिक्रिया कैसी रही?
- महिला पाठकों की प्रतिक्रिया तो बहुत अच्छी रही. उन्हें इसकी भाषा से कोई आपत्ति नहीं हुई. कइयों ने तो यह तक कहा कि जिस तरह की गालियां इसमें हैं उससे ज्यादा फूहड़ गालियां तो हमें व्यवहारिक जिंदगी में सुननी पड़ती हैं. महिला पाठकों से काफी सराहना मिली काशी के अस्सी को.



प्रतिभा कटियार कवि और पत्रकार हैं। आपने पहले भी कई साहित्यकारों के महत्वपूर्ण साक्षात्कार लिये हैं। ब्लाग जगत में भी वह ख़ासा दखल रखती हैं और दो किताबें भी आ चुकी हैं।