(ये हमारे समय के एक महत्वपूर्ण कवि एकांत श्रीवास्तव की पंक्तियां हैं, रचना समय के हालिया प्रकाशित शमशेर जन्मशती विशेषांक में छपे उनके लेख की अंतिम पंक्तियां। पत्रिका मिलने के बाद पता नहीं कितनी बार पढ़ गया हूं इसे…और हर बार और-और व्यग्र हुआ हूं। एक कवि अग्रज इससे बेहतर क्या बता सकता है? न उनसे मिला हूं न कभी बात ही हुई … पर इन पंक्तियों के बाद इच्छा तीव्र हो गयी है…आप भी देखिये)
शायद कोई कवि जान-बूझकर और सायास कवि होने का विकल्प नहीं चुनता। यह एक स्थिति है जो जन्म के साथ मिलती है। कवि बस इसे विकसित करता है- एक साधारण जीवन जीते हुए- क्योंकि कवि एक साधारण मनुष्य है और साधारण जीवन जीकर ही कविता को पाया जा सकता है। असाधारण होते ही कविता बस मायावी सरोवर की तरह अदृश्य हो जाती है और हाथ में बस मिट्टी और रेत रह जाती है। हम चाहें तो इस मिट्टी और रेत को कविता मानने की खुशफ़हमी पाल सकते हैं। पर सच्ची कविता का मार्ग तो कठिन है, कांटों भरा, दुर्गम और सर्पगंधा भी और 'कवि का बीज' बकौल शमशेर 'कटु तिक्त'।


