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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

मनोज रूपड़ा का कहानी संकलन - एक समीक्षा

 
(हमारे समय के विशिष्ट कथाकार मनोज रूपड़ा का कहानी संकलन 'टावर आफ साइलेंस' प्रतिलिपि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. इस अद्भुत संकलन की एक समीक्षा जो अभी कथन के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है.)

अपने समय की शिनाख्त करती कहानियाँ
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       मनोज रूपड़ा हिन्दी के साहित्यजगत में अपनी तरह के कहानीकार हैं. बालीवुड से शब्द उधार लेकर कहूँ तो बिलकुल ‘हटके’. उनकी कहानियां न तो हिन्दी के चालू मुहावरे में कलावादी शिल्पकारी से निर्मित होती हैं और न ही कथ्य की सपाट प्रस्तुति से. सधी हुई संप्रेषणीय भाषा और बेहद कसे हुए महीन शिल्प के सहारे वह विषय के इर्द-गिर्द एक तनाव भरा वितान रचते हैं जो आपको न केवल अंतिम पन्ने तक बाँधे रखता है बल्कि उनके साथ अपने समय और समाज की यात्रा कराते हुए उस पूरी विडंबना से रु ब रु कराता है जिसने मनोज से कहानियाँ लिखवाई हैं. प्रतिलिपि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘टावर आफ द साइलेंस’ में संकलित इन तीन कहानियों में नव उदारवादी समय में मनुष्य के सामने खडी चुनौतियाँ अपने तमाम आयामों के साथ उपस्थित हैं. अतीत और भविष्य के बीच उलझा संकटग्रस्त समाज है, बाज़ार के कामन सेन्स से कदम मिला पाने में नाकामयाब यथार्थ और आभासी जगत के बीच झूलता इंसान हैं और बाज़ार की सत्ता के आगे विवश और अवश समय है. देखा जाय तो बाज़ार इन तीनों कहानियों के केन्द्र में है, लेकिन ये कहानियाँ उसका एकरस या एकांगी प्रतिपक्ष ही प्रस्तुत नहीं करतीं बल्कि समकालीन समाज में उसके हस्तक्षेप को बड़े कौशल और आत्मविश्वास से रेशा-रेशा उभरती हैं. किसी कुशल सर्जन की तरह उसकी चीरफाड़ करती हैं और पाठक के सामने उस नग्न सत्य को पेश कर देती हैं जिससे रोज दो-चार होते हुए भी अंजान बने रहने की कोशिश में लोग लगातार इसके शिकार होते चले जा रहे हैं. यह मनोज का कौशल ही है कि अरुंधती राय, मेधा पाटेकर, वरवर राव और ग़दर जैसे वास्तविक चरित्र कहानी के पात्र बन जाते हैं और उसे पढते हुए आपको लगता ही नहीं कि कहानी से बाहर की कोई चीज़ है. नोम चाम्सकी से लेकर इन भारतीय चरित्रों को वह कहानी में ऐसे पिरोते हैं कि अपनी पक्षधरता और वैचारिक अवस्थिति के बारे में अलग से कुछ कहे बिना वह प्रतिरोध की धारा के साथ संबद्ध हो जाते हैं. यह महीन मार और चरित्रों की विश्वसनीयता मनोज की कहानियों की सबसे बड़ी ताकत है.

संकलन की पहली कहानी ‘टावर आफ सायलेंस’ का प्रमुख पात्र है टेम्पटन दस्तूर. टेम्पटन और उनके पिता रोमिंगटन दस्तूर के बहाने यह कहानी एक तरफ पारसी समाज की अंतर्कथा को उद्घाटित करती है तो दूसरी तरफ इसी के सामानांतर एक बंद हो चुकी मिल के बहाने नब्बे के दशक में नई आर्थिक नीतियों के नाम पर इस देश में लागू हुई नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के बहुआयामी दुष्प्रभावों को भी रेशा-रेशा खोलती जाती है. कहानी के शुरू में जिस तरह से पारसी घरों के बारे में लिखते हुए वह कहते हैं ‘ उन बरसों पुरानी पत्थर की इमारतों में लगभग सभी घरों में एक जैसे लकड़ी के जीने, एक जैसी शीशम की रेलिंग और एक सामान बड़ी-बड़ी बरोठेदार खिडकियाँ थीं और उन खिडकियों में से हर वक़्त कुछ बूढ़े झांकते हुए दिखाई देते. इतने स्थिर और शांत मानो उन्हें खिड़की के साथ ही मढ दिया गया हो....आपाधापी, उलझी हुई किचकिच, मचलती हुई महात्वाकांक्षाओं और अति व्यस्तता से लथपथ शहर से वे उतने ही तटस्थ थे, जितना शहर उनकी स्टिल इमेज से’ और फिर उन घरों में रखी ऎसी चीजों के बारे में विस्तार से बताते हैं ‘जिनकी उम्र उनसे कई गुना बड़ी थी’ तो दोनों मिलकर एक अजीब सी विडम्बना रचते हैं और उनके बीच टेम्पटन का यह सवाल कि ‘उपभोक्ता चीजों की बाढ और यूज एंड थ्रो के तेज प्रवाह में ये सब पुरानी चीजें और पुरानी जीवन शैलियाँ और उनका अंतर्मुखी समुदाय अभी तक डूबने से कैसे बचा हुआ है’...पूरी कहानी को एक महाकाव्यात्मक बिम्ब प्रदान करता है. रोमिंगटन का अपने किशोर बेटे को पारसी समुदाय के बारे में बताना और फिर अंत में टावर आफ सायलेन्स (दख्मे) तक ले जाना और फिर उसके ठीक बाद अपनी बंद हो चुकी इम्प्रेस मिल को लौट जाना एक अजीब सी व्यंजना रचता है. उस बंद हो चुकी मिल के पास से जब टेम्पटन उन्हें ढूंढ कर लाते हैं और वापस जाने को कहते हैं तब उनके पिता का यह जवाब ‘...मैं उस भट्ठी को बुझने नहीं दूंगा’...पारसी समुदाय की पवित्र अग्नि के विश्वास से मिलजुलकर मनुष्य की अदम्य जीजिविषा का एक नया पाठ रचता है. यह सवाल कि ‘मशीनें जब चलन से बाहर हो जाती हैं तो उनके कल-पुर्जे अलग कर दिए जाते हैं, उन्हें तपाकर गलाया जा सकता है. और कोई दूसरा रूप भी दिया जा सकता है. लेकिन मनुष्य और उसका जीवन?’ इस कहानी का मूल स्वर है. उस मिल के बंद होने के बहाने मनोज ने एक पूरे आर्थिक व्यवस्था के बदलाव के क्रम में उससे जुड़े मनुष्यों के जीवन पर पडने वाले प्रभाव की गहरी पडताल की है. शेयर मार्केट की उड़ान और तेंदुलकर के कीर्तिमान के बीच वह चिमनी के मलबे में ‘ईंट और चूने के पलस्तर के साथ एक मानव शरीर के कंकाल को भी देख पाते हैं.

इस कहानी में एक और प्रमुख पात्र हैं रोमिंगटन की प्रौढ़ अविवाहित बहन हक्कू फई. हक्कू फई का चरित्र जिस आत्मीयता और मस्ती के साथ मनोज ने गढा है, वह इस कहानी को एक और आयाम देता है. दो जुडवा भाइयों के साथ प्रेम करने वाली दबंग हक्कू फई का रेमिंगटन की मृत्यु के बाद हमेशा के लिए चुप हो जाना और उसके साथ यह कि ‘उन सबके वापस मुंबई लौटने के बाद मिल के भग्नावशेषों के बीच खडी उस अकेली और उदास चिमनी के ऊपर कुछ दिनों कौए मँडराते रहे. फिर सबकुछ शांत हो गया’...एक कविता सी गहरी और उदासी भारी अभिव्यंजना रचता है.

संकलन की दूसरी कहानी ‘दूसरा जीवन’ एक ऐसे आदर्शवादी नाकाम प्रोफेशनल की कहानी है जो यथार्थ से तालमेल न बिठा पाने के कारण एक आभासी दुनिया में सुख तलाशता है. वह आभासी दुनिया जहाँ ‘ पतन और विनाश को कोई नहीं पहचानता और वर्जनाओं का प्रवेश भी वर्जित है...रिश्ते इतने तरल और पारदर्शी हैं कि उन्हें परिभाषित भी नहीं किया जा सकता....निरर्थकता और विसंगति को कोई जगह नहीं मिलाती क्योंकि गहन से गहनतर कामनाओं को भी स्वर मिल जाते हैं...इस अनूठे संसार में अगर कोई कमी है, तो सिर्फ सच की’ लेकिन लैपटाप और इंटरनेट से निकली इस ‘सेकण्ड लाइफ’ में भी यथार्थ घुस ही आता है और वह उसकी इस आभासी दुनिया की शान्ति और संतोष को भंग कर देता है. कहानी का नायक (?) अपने लिए जो शीर्षक तय करता है वह है ‘महाविकास के थपेडों में भटकता अकेलापन’! सेकण्ड लाइफ की वेबसाईट में भटकते इस अकेलेपन को जो वर्चुअल दुनिया मिलती है उसमें एक ‘मदर यूनिवर्स’ है जिसके गर्भ में संयुक्त राज्य के योजना विभाग के मुख्य सलाहकार मोजेज के बच्चे हैं...चार सौ यहूदी बच्चों के लिए थियेटर चलाने वाले एक चेकोस्लोवाई कामेडियन के, एक नीग्रो पायलट के , एक अफगानी शायर के जिसने तालिबानियों के हवस की शिकार बनाई गई लडकियों के लिए एक गैर धार्मिक मदरसा खोल रखा है और अनेक न्यायधीशों, प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों आदि के बच्चे हैं. मदर यूनिवर्स सिर्फ उन्हें पैदा करती है जो मार दिए गए, जिनके साथ अन्याय हुआ. वह बताती है कि ‘मृत्यु एक समतावादी तथ्य नहीं है. मरने के बाद भी असमानता पीछा नहीं छोडती. हर मौत में एक गुणात्मक अंतर होता है. कौन मरा और किसने मारा यह जानना बहुत ज़रूरी है.’ वह उस युवा के बच्चों की माँ बनने से इंकार कर देती है क्योंकि ‘उसके पास कोई विजन नहीं है’...उसे लेफ्टिस्ट कार्नर में ‘कार्ल मार्क्स की समाधि के पास बच्चों को जन्म देना है’! नौकरी से निकाला गया वह युवा इस वर्चुअल दुनिया में सेज के खिलाफ एक एंटी इकानामिक जोन बना लेना चाहता है. वह दुनिया भर के छापामारों को पैदा करना चाहता है लेकिन जब वह अपने इस विजन के साथ मदर यूनिवर्स से संपर्क करता है तो वह कहती है ‘तुम पहले प्यार करना सीखो और फिर अपने आप तुम्हें सब मिल जाएगा जो तुम चाहते हो’...बिना आंच के रोटी नहीं पकती और बिना ऊष्मा के जीवन...तुम्हें अपने हर काम को एक धडकती हुई गर्मजोशी के साथ संपन्न करना चाहिए’... इसे पढते हुए चे ग्वेरा के इस कथन की याद आना स्वाभाविक ही है कि ‘हर क्रांतिकारी प्रेम की तीव्र भावना से संचालित होता है। ऐसे सच्चे क्रांतिकारी की कल्पना करना असंभव है जिसमें इस गुण का अभाव हो। किसी नेतृत्वकर्ता के सामने सबसे बडी चुनौती यही होती है कि उसे उत्साहसिक्त भावनाओं को शांत मष्तिष्क के साथ संयोजित करना होता है और चूके बिना सही निर्णय लेने होते हैं।‘

इसके समानांतर उसका यथार्थ है जहाँ उसके साथ उसे बेइंतिहा प्रेम करने वाली उसकी लिव इन रीना है...काम के प्रति उसकी जिद और समर्पण को अपने हित में उपयोग करता बाज़ार है और उसकी असफलताएं हैं. लैंड सर्वे की उसकी सारी मेहनत जब किसानों के जमीनों के कब्ज़े में काम आती है तो उसका आदर्शवादी मन विद्रोह करता है और नतीजा उसकी अपनी बेदखली. यथार्थ और आभासी जगत के इस द्वंद्व में उसे प्रेम और सर्जना के लिए आवश्यक उष्मा यथार्थ से ही मिलती है, लेकिन उस उष्मा को झेल पाने भर की कुव्वत उसमें नहीं. इस कहानी की व्यंजना बहुत दूर तक जाती है.

संकलन की तीसरी कहानी ‘रद्दोबदल’ एक तरह की फैंटेसी की शैली में लिखी गयी है. इस फैंटेसी में मनुष्य तथा राष्ट्र के पूरे अस्तित्व पर कब्ज़ा जमाते जा रहे बाज़ार की तमाम तरतीब ओ तरकीब पर मनोज पूरे ब्यौरे के साथ नज़र डालते हैं. वह देख पाते हैं कि जहाँ एक और मुल्क में सब कुछ सामान्य था वहीं ‘ इस खामोशी, खैरियत और इत्मीनान की ऊपरी परतों के नीचे एक अनजानी सी बदशागुनी चक्कर काट रही थी और चारों तरफ कुछ ऎसी बद्सरिश्त कारगुजारियाँ चल रही थीं, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थीं...इनसे ‘ ऊंचे और निचले तबके को कोई खास फर्क महसूस नहीं हुआ लेकिन बीच वाले बेहद परेशान हो उठे क्योंकि वे ऎसी कारगुजारियाँ थीं, जिसका कोई आभासी चेहरा न था’.

लेकिन इनमें बारी-बारी से सबको आना था. तो इकरारनामों और चेकबुकों पर निचले तबके से लेकर ऊपरी तबकों और अफसरों के साथ प्राइवेट कंपनियों के मुलाजिमों से दुकानदारों तक सबको दस्तखत करने ही थे. बाज़ार हर किसी को अपनी गिरफ्त में लेता जाता है. जो आसानी से नहीं मानता उसे जबरदस्ती. चाहे वह कोई अखबारनवीस हो या शायर. वैसे भी उसे शायरी की कोई ज़रूरत नहीं. वह सारे समाज को अपने हिसाब से ढाल लेता है. सारी परम्पराएं, स्थानीयताएं और सामूहिकताएं उसकी शिकार होती हैं और वह विविधता को एक कास्मेटिक एकता में तबदील कर देता है अपने उत्पादों के सहारे. कोई ईश्वर उस बाज़ार के बिलौटे से अधिक मज़बूत नहीं. वह शहर से गाँव तक बेरोकटोक अपना अभियान चलाता है और विरोध की हर आवाज़ को कुचल देता है.

इस फैंटेसी के माध्यम से मनोज ने जिस कुशलता से इस कहानी को गढा है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है. इसे पढ़ते हुए यह सब हमारे इर्द-गिर्द घटता हुआ दिखाई देता है. श्रीमती लिबर्टी की देख रेख में दुनिया भर में बाज़ार का अश्वमेध, विरोध के महत्वपूर्ण स्वरों को खत्म करने के लिए उनकी हत्या की जगह उन्हें इतनी ऊँचाई पर पहुंचा देना की उनका अपने जन से कोई जुड़ाव ही न रह जाए और सारे समाज से उसकी स्मृतियाँ और परम्पराएं छीनकर उसे एक उपभोक्ता मात्र में तबदील कर देना क्या सच में हमारे सामने रोज ब रोज नहीं घट रहा? और यह सब पूरी जम्हूरियत सर झुकाए देख रही है क्योंकि ‘अवाम को भी पेप्सी, कोक या पेस्ट्री या बर्गर में कोई ऎसी दवा दी गयी थी जो हर चीज़ को चुपचाप सह लेने की क्षमता बढ़ा देती है’.

इस कहानी में शायर का उस खाली जगह से मुखातिब होकर, जहाँ कभी उसकी किताबें और लिखने-पढने की मेज हुआ करती थी, यह कहना कि ‘यह दुनिया चाहे कितनी भी क्यूँ न बदल जाए मैं दुनिया को टूटे आइनों के टुकड़ों में बने अक्सों की शक्ल में पेश करने को मज़बूर हूँ. बेशक कुछ टुकड़े लाजिमी तौर पर गायब हो जायेंगे और मुझे उन गायब हो चुके अक्सों के तसव्वुर को ज़िंदा रखना होगा क्योंकि मेरा यह फ़र्ज़ है कि मैं इस बदली हुई दुनिया पर अपना ख़्वाब लादता रहूँ और इस गडबडाए हुए करिश्मे को अपने ख़्वाबों ख्यालों से नई तर्ज़ दूं और बहुत बेमानी उम्मीद के साथ एक पुरानी कहावत को दुहराता रहूँ कि ढहना तमाम तानाशाहियों की फितरत में है जैसे बढ़ना एक नामुराद बेल की और खिलना एक नामुराद फूल की किस्मत में है’... इस अँधेरे समय में साहित्य की पूरी भूमिका को रेखांकित करता है.

रस्म तो किसी न किसी तरीके से किताब में से कुछ दोष निकाल लेने की ही है, और तुल ही जाएँ तो यह ऐसा मुश्किल काम भी नहीं. लेकिन मैं इस रस्म की निबाह की जगह आपसे इस किताब को बड़े धैर्य और आत्मीयता से पढने की सलाह देना बेहतर समझता हूँ. मनोज रूपड़ा का यह संकलन हमारे समय का एक बेहद विश्वसनीय दस्तावेज़ है और आने वाले समय की तैयारी के लिए एक महत्वपूर्ण औज़ार.


5 टिप्‍पणियां:

  1. .'' सधी हुई संप्रेषणीय भाषा और बेहद कसे हुए महीन शिल्प के सहारे वह विषय के इर्द-गिर्द एक तनाव भरा वितान रचते हैं जो आपको न केवल अंतिम पन्ने तक बाँधे रखता है बल्कि उनके साथ अपने समय और समाज की यात्रा कराते हुए उस पूरी विडंबना से रु ब रु कराता है जिसने मनोज से कहानियाँ लिखवाई हैं''अक्षरशः सत्य ..
    !मनोज रूपड़ा निस्संदेह एक सशक्त कथाकार हैं और अपनी एक अलग पहचान रखते हैं !मनोज जी के कहानी संकलन की बहुत सटीक समीक्षा !बधाई

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  2. सही समय पर बहुत ही सशक्त और जरुरी लेखन.
    जानकारी देने के बहुत-बहुत धन्यवाद. अगर इस कहानी संग्रह को लखनऊ में लेना हो तो कहाँ मिलेगी ?

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  3. santosh ji

    sankalan apko giriraj kiradoo se mil jayega. aap apna pata mujhe e-mail kar den.

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  4. मनोज की कहानियाँ .. क्या कहने ।

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  5. रद्दोबदल इधर पढ़ सकते हैं।

    अशोकजी, इधर सफ़ेद बैकग्राउंड पर आधे लेख को सफ़ेद ही फॉन्ट में दे दिया है।

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…