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गुरुवार, 23 अगस्त 2018

कुलदीप नैयर - एक क़द का उठ जाना

तस्वीर द हिन्दू से साभार 

ओम थानवी

कुलदीप नैयर का जाना पत्रकारिता में सन्नाटे की ख़बर है। छापे की दुनिया में वे सदा मुखर आवाज़ रहे। इमरजेंसी में उन्हें इंदिरा गांधी ने बिना मुक़दमे के ही धर लिया था। श्रीमती गांधी के कार्यालय में अधिकारी रहे बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है उन दिनों किसी के लिए यह साहस जुटा पाना मुश्किल था कि वह कुलदीप नैयर के साथ चाय बैठकर चाय पी आए!

कहना न होगा कि वे सरकार की नींद उड़ाने वाले पत्रकार थे। आज ऐसे पत्रकार उँगलियों पर गिने जा सकते हैं, जिनसे सत्ताधारी इस क़दर छड़क खाते हों। इसलिए उनका जाना सन्नाटे के और पसरने की ख़बर है।

कुलदीपजी का जन्म उसी सियालकोट में हुआ था, जहाँ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे। बँटवारे के बाद कुलदीप नैयर पहले अमृतसर, फिर सदा के लिए दिल्ली आ बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब के मोहल्ले बल्लीमारान में उन्होंने शाम को निकलने वाले उर्दू अख़बार 'अंजाम' (अंत) से अपनी पत्रकारिता शुरू की। वे कहते थे: "मेरा आग़ाज़ (आरम्भ) ही अंजाम (अंत) से हुआ है!"

बाद में महान शायर हसरत मोहानी की सलाह पर -- कि उर्दू का भारत में कोई भविष्य नहीं -- वे अंगरेज़ी पत्रकारिता की ओर मुड़ गए। पढ़ने अमेरिका गए। फ़ीस जोड़ने के लिए वहाँ घास भी काटी, भोजन परोसने का काम किया। पत्रकारिता की डिग्री लेकर लौटे तो पहले पीआइबी में काम मिला। गृहमंत्री गोविंदवल्लभ पंत और फिर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सूचना अधिकारी हुए।

आगे यूएनआइ, स्टेट्समैन, इंडियन एक्सप्रेस आदि में अपने काम से नामवर होते चले गए। एक्सप्रेस में उनका स्तम्भ 'बिटवीन द लाइंस' सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला स्तम्भ था। बाद में उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता की, जो आख़िरी घड़ी तक चली। वे शायद अकेले पत्रकार थे, जिनका सिंडिकेटेड स्तम्भ देश-विदेश के अस्सी अख़बारों में छपता था।

अनेक राजनेताओं और सरकार के बड़े बाबुओं से उनके निजी संबंध रहे। वही उनकी "स्कूप" ख़बरों के प्रामाणिक स्रोत थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य नियुक्त किया था। 

नैयर साहब मेरा काफ़ी मिलना-जुलना रहा। जब उन्होंने अपनी जमा पूँजी से कुलदीप नैयर पुरस्कार की स्थापना की, मुझे उसके निर्णायक मंडल में रखा। हालाँकि पुरस्कार अपने नाम से रखना मुझे सुहाया न था। पहले योग्य पत्रकार हमें (और उन्हें भी) रवीश कुमार लगे। पुरस्कार समारोह में नैयर साहब उत्साह से शामिल हुए, अंत तक बैठे रहे। 

उनसे मेरी पहली मुलाक़ात राजस्थान पत्रिका के संस्थापक-सम्पादक कर्पूरचंद कुलिश ने केसरगढ़ में करवाई थी। सम्भवतः १९८५ में, जब मुझे सम्पादकीय पृष्ठ की रूपरेखा बदलने का ज़िम्मा सौंपा गया था। कुलदीपजी का स्तम्भ अनुवाद होकर पत्रिका में छपता था। मैंने जब उन्हें कहा कि उनका बड़ा लोकप्रिय स्तम्भ है, उन्होंने बालसुलभ भाव से कुलिशजी की ओर देखकर कहा था -- सुन रहे हैं न?

मैंने उनसे पूछा कि आपको नायर लिखा जाय या नैयर? हम नायर लिखते थे। उन्होंने कहा कोई हर्ज नहीं। बाद में मुझे लगा कि नायर लिखने से दक्षिण का  बोध होता है, पंजाब में नैयर (ओपी नैयर) उपनाम तो पहले से चलन में था!

जब मैं एडिटर्स गिल्ड का महासचिव हुआ, तब उनसे मेलजोल और बढ़ गया। घर आना-जाना हुआ। गिल्ड की गतिविधियों में, ख़ासकर चुनाव के वक़्त, वे बहुत दिलचस्पी लेते थे। एमजे अकबर उन्हीं के प्रयासों से गिल्ड के अध्यक्ष हुए। जब गिल्ड द्वारा आयोजित जनरल मुशर्रफ़ की बातचीत के बुलावों में अकबर ने मनमानी की, मैंने (आयोजन के बाद) इस्तीफ़ा दे दिया था।

तब पहली बार गिल्ड की आपत्कालीन बैठक (ईजीएम) बुलाई गई। सम्पादकों की व्यापक बिरादरी ने -- विशेष रूप से बीजी वर्गीज़, अजीत भट्टाचार्जी, हिरणमय कार्लेकर, विनोद मेहता आदि -- ने मेरा ही समर्थन किया। पर नैयर साहब चाहते थे मैं इस्तीफ़ा वापस ले लूँ। हालाँकि बाद में अकबर ने ईजीएम में खेद प्रकट किया और बात ख़त्म हुई।

भारत-पाक दोस्ती के नैयर साहब अलमबरदार थे। उन्होंने ही सरहद पर मोमबत्तियों की रोशनी में भाईचारे के पैग़ाम की पहल की। इस दफ़ा वे अटारी-वाघा नहीं जा सके। पर उन्होंने अमृतसर के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से चली बस को रवाना किया। अमृतसर और सरहद के आयोजन में मुझे भी शामिल होने का मौक़ा मिला। मुझे दिली ख़ुशी हुई जब लोगों को हर कहीं नैयर साहब के जज़्बे और कोशिशों की याद जगाते देखा।

कुलदीप नैयर क़द्दावर शख़्स थे और क़द्दावर पत्रकार भी। बौनी हो रही पत्रकारिता में उनका न रहना और सालता है।
XX

(ओम थानवी जी की फेसबुक वॉल से साभार)

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

ब्रह्मराक्षस : ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी की तलाश

  • अशोक कुमार पाण्डेय


मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़ते हुए लगातार यह लगता है जैसे सिर्फ़ दो कविताओं को लिखने या पूरा करने के लिए वह लगातार लिख रहे थे – अँधेरे में’ और ब्रह्मराक्षस।’ यह अनायास नहीं है कि दोनों के बिम्ब और दृश्य उनकी दूसरी तमाम कविताओं में मिल जाते हैं। गहरी रहस्यमयी बावड़ी और खुली सार्वजनिक सड़क के दो पाटों के बीच जूझते मुक्तिबोध लोगों को दुरूह और अबूझ से लेकर अस्तित्वादी और इन दिनों अचानक आध्यात्मिक भी लगने लगे हैं। लम्बी कविता और लगभग फैंटसी का जो शिल्प उन्होंने अपनाया वह उनमें कुछ भी देख लेने की एक सुविधा तो देता ही है, अँधेरे के जुलूसों में शामिल लोगों के लिए थोड़ी देर बावड़ी में छुप कर प्रलाप कर लेने का भी अवसर प्रदान करता है। एक ऐसे समय में जब डोमाजी जुलूस के पीछे नहीं आगे है तो मुक्तिबोध के ऐसे कुपाठ साहित्यिक से आगे राजनीतिक बयान में तब्दील हो जाते हैं इसलिए आज उन कविताओं में दुबारा धँसने और उनके वैचारिक स्रोत तलाशने का काम भी कोई शुद्ध साहित्यिक कर्म नहीं हो सकता। इस लेख में भी मेरी कोशिश ‘ब्रह्मराक्षस’ के बहाने मुक्तिबोध के कवि कर्म के एक सक्षिप्त  सामाजिक-राजनैतिक अध्ययन की ही है।



ग्राम्शी : विचारधारा, वर्चस्व और ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी
 
मार्क्सवाद में हेजिमनी या वर्चस्व कोई नया पद नहीं था लेकिन इसका उपयोग ग्राम्शी से पहले राजनैतिक वर्चस्व के लिए ही किया जाता था और आर्थिक सवालों को मूलभूत प्रश्न माना जाता था। विचारधारा को सुपरस्ट्रकचर का हिस्सा माने जाने की मान्यता के चलते यह माना जाता था कि आर्थिक मूलाधार में परिवर्तन के साथ अपने आप बौद्धिक वर्चस्व का प्रश्न हल हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कामगार वर्ग के राजनीतिक नेतृत्व का रेखांकन हुआ था लेकिन ग्राम्शी ने इसे आगे बढ़ाते हुए नैतिक तथा बौद्धिक नेतृत्व तथा वर्गों के बीच ग़ैर आर्थिक सम्बन्धों के महत्त्व का रेखांकन किया। उनके अनुसार विचारधारा आर्थिक सुपरस्ट्रक्चर के बदलाव से अपने आप बदल जाने वाली कोई उपोत्पाद नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहारों, सिद्धांतों और रूढ़ियों में विन्यस्त ऐसा कारक है जो समाज में व्यक्तियों को पराश्रितों तथा सामाजिक अभिकर्ताओं में तब्दील कर देती है। यही सामाजिक अभिकर्ता उत्पादन कार्यों में भी अपनी भूमिका निभाते हैं और इस तरह आर्थिक तथा राजनैतिक संघर्ष के साथ विचाधारात्मक संघर्ष भी वर्ग संघर्ष का अहम हिस्सा बन जाता है। इस स्थापना से ग्राम्शी उस ‘सिविल सोसायटी’ को वर्ग संघर्ष के दायरे में ले आते हैं जो समाज में जनमत निर्माण में अहम भूमिका निभाती है। इस सिविल सोसायटी को लेकर ग्राम्शी की प्रस्थापना बेहद महत्त्वपूर्ण है। उनका मानना है कि विचारधारात्मक धरातल पर यानी कि सिविल सोसायटी में विचारधारात्मक आधार पर एक तरह का पुल निर्मित हो सकता है यानी ज़रूरी नहीं कि विचारधारात्मक तत्व एक ही वर्ग से सम्बन्धित हों।  विचारधारात्मक निकाय अपने विचारधारात्मक निष्कर्षों से परिभाषित होते हैं  और ये निष्कर्ष विचारधारात्मक तत्त्वों से। इस तरह वर्चस्व के लिए संघर्षरत विभिन्न वर्गों के भिन्न विचारधारात्मक विमर्शों में तत्व रूपायित होते हैं।



ग्राम्शी के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष था ‘ऑर्गेनिक विचारधारा’ का। विचारधारा वर्गीय शासन के निकाय यानी वर्चस्व के संदर्भ में ही परिभाषित होती है जिसमें एक एकीकृत व्यवस्था में सभी विचारधारात्मक तत्त्व व्यवस्थित होते हैं। यह जटिल व्यवस्था ही ‘ऑर्गेनिक विचारधारा’ है – एक वर्ग द्वारा अधिकृत राज्य व्यवस्था तथा तत्जनित सामाजिक वर्चस्व के भीतर एक समाज के सामुदायिक जीवन की अभिव्यक्ति। इस ऑर्गेनिक विचारधारा की व्याप्ति पूरे सिविल समाज में इसकी विभिन्न संस्थाओं और संरचनाओं जैसे, परिवार, धार्मिक संस्थाएं, मीडिया, शिक्षण संस्थान, विधि व्ययस्था, ट्रेड यूनियन आदि में होती है। यह व्याप्ति वर्चस्वशाली वर्ग के सामाजिक अभिकर्ताओं के माध्यम से होती है जिन्हें ग्राम्शी ‘ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी’ कहते हैं यानी लेखक, पत्रकार, शिक्षक, वक़ील, नेता, उद्योगपति, इंजीनियर आदि आदि। 

गौर से देखिये तो ‘अँधेरे में’ के जुलूस में चलते लोग इसी सिविल समाज के हिस्से हैं, रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध। इस पर आगे हम और विस्तार से बात करेंगे

कहना न होगा कि वर्चस्वशाली वर्ग के साथ साथ वर्चस्व के संघर्ष के संघर्ष में रत वर्ग के भी अपने ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी होते हैं। बहुत विस्तार में न जाते हुए यहाँ इतना बता देना काफी होगा कि ग्राम्शी वर्चस्व को दो तरह से परिभाषित करते हैं, पहला यह कि वर्चस्वशाली वर्ग उन वर्गों और समूहों के हितों को ध्यान में रखता है जिन पर उसका वर्चस्व है और इस प्रक्रिया में अपने अधीनस्थ वर्ग के साथ एक तरह का संतुलन बनाने के लिए वह अपने हितों के साथ कुछ समायोजन भी करता है तो दूसरे यह वर्चस्व नैतिक-राजनैतिक नेतृत्व के साथ आर्थिक वर्चस्व भी स्थापित करता है। यानी एक वर्ग के वर्चस्व में आर्थिक, राजनैतिक, नैतिक और बौद्धिक वर्चस्व शामिल है, इस प्रक्रिया में अपने कुछ निगमित हितों का बलिदान वस्तुतः एक ऐसा संतुलन बनाये रखने के लिए किया जाता है जो सर्वसहमति स्थापित कर अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को बनाए रखने में सहायक हो। इस तरह ‘सत्ता’ दो रूपों में अभिव्यक्त होती है, बलपूर्वक नियंत्रण और सर्वसहमति। ये दोप्रविधियाँ शासक और शासित के बीच एक संतुलन की स्थापना करती हैं। जबकि राज्य के नौकरशाही, पुलिस, सेना और दूसरे तंत्र बलपूर्वक नियन्त्रण में काम आते हैं सिविल सोसायटी और उसके सामाजिक अभिकर्ता यानी ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी वर्चस्वशाली वर्ग की विश्वदृष्टि को सर्वमान्य बनाकर सर्वसहमति की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं अर्थात वे विचारधारात्मक संघर्ष में विरोधी वर्ग की विश्व दृष्टि या विचारधारा के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर अपने वर्ग के विचारों को अपने अपने तरीक़े से जनसामान्य में प्रतिष्ठित करते हैं। इस प्रस्थापना से ग्राम्शी अपने महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कामगार वर्ग को राज्यसत्ता हासिल करने से पहले सत्ताधारी वर्ग के बरक्स राजनैतिक, सांस्कृतिक और नैतिक क्षेत्रों में नेतृत्व हासिल करना होगा।

यहाँ ग्राम्शी के विस्तृत विवरणों को छोड़ते हुए हम ‘ब्रह्मराक्षस’ की तरफ़ लौटते हैं।   

ऐसी ट्रेजेडी है नीच  : ब्रह्मराक्षस और उनका सजल उर शिष्य

कुबेरनाथ राय ‘ब्रह्मराक्षस’ को मुक्तिबोध की इकलौती शुद्ध अर्थ में फंतासी कहते हैं। इस लेख की विषयवस्तु को देखते हुए यह बहस विषयांतर होगी कि यह कविता क्या वाकई में कोई फंतासी रचती है! लेकिन इस पर बात शुरू करने से पहले यह कह देना प्रासंगिक होगा कि अपने पाठ में यह कविता ‘अँधेरे में’ या ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ और ‘भूल ग़लती’ की तुलना में न केवल छोटी है बल्कि अपने कथ्य और शिल्प में अधिक सहज और स्पष्ट है और एक निष्कर्षात्मक अंत तक पहुँचती है। यह उनकी इकलौती कविता है जिसके साथ उन्होंने इसी शीर्षक की कहानी लिखी। दोनों का प्रकाशन का समय एक ही है (1957) इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि कविता को समझाने के लिए कहानी लिखी गई या फिर कहानी की असंतुष्टि से कविता जन्मी। लेकिन इन्हें बार-बार पढ़ते हुए मुझे लगता है कहानी अपने रचाव और कथ्य दोनों ही में बेहद साधारण है जबकि कविता बेहद संश्लिष्ट। जैसे कहानी लिखने के बाद अनभिव्यक्त की बेचैनी ने उनसे यह कविता लिखवाई है।  कहानी का ब्रह्मराक्षस अपना अलौकिक होना प्रदर्शित करता है अंत में जबकि कविता में ‘वह कोठरी में किस तरह/अपना गणित करता रहा/औ’ मर गया।..इसके बाद का सवाल ‘यह क्यों हुआ! क्यों यह हुआ!!’ कविता का केन्द्रीय सवाल है. यह वह सवाल नहीं जिसके इर्द गिर्द कविता का वितान रचा जाता है बल्कि यह वह सवाल है जिसका जवाब ढूँढने का निश्चय कविता का वाचक ब्रह्मराक्षस का शिष्य है और इस तरह कविता की परिधि पर दिखने वाला सवाल उसके केंद्र में स्थापित हो जाता है।

गौर से देखें अगर तो यह सवाल अपने मूल में क्या है? उस ‘क्यों’ का जवाब किस विमर्श में अवस्थित है जिसे मुक्तिबोध लगातार दो बार पूछते हैं बढ़ते हुए विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ। यह विमर्श है समाज में बुद्धिजीवी की भूमिका की तलाश। मैं नहीं जानता कि 1946 में प्रकाशित हो पाई ग्राम्शी की जेल नोटबुक मुक्तिबोध पढ़ पाए थे या नहीं, हालाँकि इस बात की संभावना भी कम ही है और उनके लेखन में भी ग्राम्शी का कहीं कोई ज़िक्र नहीं आता लेकिन यह बिलकुल अस्वाभाविक नहीं है कि दुनिया के दो कोनों पर एक राजनैतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी तथा एक जनपक्षधर कवि नए बनते बिगड़ते समाजों में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका को लेकर एक जैसी गंभीर चिंताओं और सवालों से जूझ रहे थे। जैसा कि मैंने पहले भी इंगित किया है अपनी बेहद महत्त्वपूर्ण कविता ‘अँधेरे में’ कवि अपनी अपूर्ण अभिव्यक्ति की घायल प्रतिमूर्ति के साथ प्रोसेशन में जिस मृत्यु दल की सी शोभायात्रा को देखता है उसमें प्रत्यक्ष शासन के सैन्य अधिकारी, मंत्री, उद्योगपति ही नहीं बल्कि ग्राम्शी जिसे सिविल समाज के ऑर्गेनिक निकाय कहते हैं उसके हिस्से लेखक, कवि, आलोचक, विचारक, चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक, चिकित्सक, पत्रकार सब शामिल हैं। वह इन्हें ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध’ कहते हैं। रक्तपायी वर्ग, यानी समाज, संस्कृति और राजनैतिक सत्ता पर काबिज़ वर्चस्वशाली वर्ग। वे इस वर्चस्व अपने सामाजिक-सांस्कृतिक निगमनों से जनता के लिए स्वीकार्य और सह्य बनाने की अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रहे हैं। इसी कविता में मुक्तिबोध और स्पष्ट करते हुए कहते हैं – ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास।’  ज़ाहिर है पूँजीवादी वर्ग के वर्चस्व में वह इन ‘ऑर्गेनिक बुद्धिजीवियों’ की सहकारी भूमिका को बहुत स्पष्ट लक्षित कर पा रहे हैं और इसके समक्ष वह अपनी आत्म-सम्भवा ‘परम अभिव्यक्ति अनिवार’ की तलाश में हैं। यहाँ वह परम अभिव्यक्ति उनकी गुरु है। यह परम अभिव्यक्ति ‘अनखोजी निज समृद्धि का परम उत्कर्ष’ है। और इस निजी समृद्धि की राह उस बदले हुए समय के स्वप्न में है जिसमें प्रतिकार के उजले दृश्य हैं, जिसमें कहीं आग लग गई है कहीं गोली चल गई है और इस निश्चय के साथ कि ‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता’ मुक्ति का मन और जन आंदोलित हैं। चंद्रकांत देवताले के शब्दों में यहाँ ‘फैंटेसी और बाह्य अनुभव जगत के मध्य छलाँगे’ लगती रहती हैं जबकि ब्रह्मराक्षस में सब कुछ फैंटेसी के भीतर घटित होता है। क्या सच में? इस सवाल पर आने से पहले ज़रा देखें की फैंटेसी किसे कहा जा रहा है? उस प्रोसेशन को या अपनी अनिवार अभिव्यक्ति के साक्षात्कार को या फिर प्रतिरोध के उस स्वप्न दृश्य को? फैंटेसी यानी एक अवास्तविक और आधारहीन स्वप्न, अपनी सुविधा या दुविधा से चुनी हुई एक ऐसी दुनिया जिसका अस्तित्व न हो, जो अनिवार नहीं दुर्निवार हो। क्या अँधेरे में का कोई भी स्वप्न या दृश्य अपने अभिधार्थ में इस तरह की फंतासी रचता है? क्या ब्रह्मराक्षस का प्रतीक उस फैंटेसी के पात्र में अविश्वसनीयता की हद तक जाता है? मुक्तिबोध ख़ुद अपनी कविताओं के शिल्प को फंतासी कहते थे, लेकिन क्या किसी कवि की कविताओं के पाठ के लिए हम उसके ही मानकों और पर्यवेक्षणों पर निर्भर होंगे? ऐसा करते हुए हम न्यूनाधिक डॉ रामविलास शर्मा की उस मनोविश्लेषक पद्धति के समीप ही पहुँचेंगे जिसमें मुक्तिबोध के भीतर ब्रह्मराक्षस के स्रोत तलाशते हुए वह उनके बचपन में पहुँचते हैं और अंततः उनमें व्यक्तिवाद ढूँढ कर अस्तित्ववाद का लेबल चिपका देते हैं। कभी किसी अन्य लेख पर उस पर विस्तार से बात होगी लेकिन अभी इतना कि यह समझ अपने आप में दिक्कततलब है कि वाह्य संघर्ष ‘मार्क्सवादी’ हैं और ‘आतंरिक संघर्ष’ ग़ैर मार्क्सवादी। असल सवाल यह है कि इन संघर्षों का उद्देश्य क्या है और इसमें कवि की पक्षधरता किस ओर है। यानी ग्राम्शी की शब्दावली उपयोग करूँ तो वह किस वर्ग का सामाजिक अभिकर्ता या ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी है।


‘ब्रह्मराक्षस’ वर्चस्वशाली वर्ग का हिस्सा नहीं है। आप देखिये कि कहानी में तमाम प्रसिद्ध गुरुओं के बीच वह अलक्षित और उपेक्षित है तो कविता में ज्ञान के लिए भटकते ब्रह्मराक्षस को योग्य गुरु न मिलने के कारण हैं कि बदले हुए युग में ‘धन-अभिभूत अंतःकरण’ से युक्त ‘कीर्ति व्यवसायी’ उपस्थित हैं। ज़ाहिर है वह धन-अभिभूत नहीं है। वह ज्ञान का शोधक है, सत्य का निःस्वार्थ शोधक। यह साधना वह अपने स्तर पर करता है। दुनिया भर का ज्ञान हासिल करता है। देखना रोचक है कि ‘सुमेरी-बैबिलोनी जन कथाओं से मधुर वैदिक ऋचाओं तक’ यानी विश्व के इतिहास के ज्ञान से वह मार्क्स, एंगेल्स, बर्ट्रेंड रसेल, टाएनबी, हिडेगर, स्पेंगलर, सार्त्र और गाँधी तक पहुँचा है। यानी मनुष्य की मुक्ति के सभी आख्यानों का अध्ययन किया है उसने। यह चुनाव यों ही नहीं है। बहुत स्पष्ट है कि उसकी दिशा मनुष्य की मुक्ति की दिशा है। लेकिन अगर मुक्तिबोध के ही एक बेहद मानीखेज़ पद का प्रयोग करें तो जो नहीं है उसके पास वह है –जनसंगउष्मा। इस जनसंगउष्मा का अभाव उसके ज्ञान को मनुष्य की मुक्ति के मार्ग का सहधर्मी बनाने की जगह एक आत्ममुग्ध और असफल व्यक्ति में तब्दील कर देता है। यहाँ हम रुककर माओ त्से तुंग का अत्यंत महत्त्वपूर्ण लेख ‘ज्ञान के बारे में’ याद कर सकते हैं तो थोड़ा अलग संदर्भों में पाउलो फ्रेरे की किताब ‘एजुकेशन फॉर क्रिटिकल कंसशनेस’ में समझाया गया मनुष्य होने का मतलब भी – ‘मानव होने का मतलब  अन्यों और दुनिया के साथ रिश्ता रखना है। इससे व्यक्ति यह अनुभव करता है कि दुनिया व्यक्ति से अलग, समझे जाने योग्य वस्तुपरक वास्तविकता है। वास्तविकता के भीतर डूबे जानवर इससे रिश्ते नहीं रख सकते; वे केवल संपर्क रखने वाले प्राणी हैं। लेकिन मनुष्य की दुनिया से विलगता और खुलापन उसे रिश्ते रखने वाले प्राणी के रूप में अलगाती है... मनुष्य आलोचनात्मक तरीके से अपनी दुनिया से रिश्ते बनाते हैं... चूंकि वे प्राकृतिक (जैवीय) क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं बल्कि सृजनात्मक आयाम में भी हिस्सा ले सकते हैं, इसलिए वास्तविकता को बदलने के लिए मनुष्य उसमें हिस्सा ले सकते हैं।’ कहना न होगा कि फ्रेरे ख़ुद ग्राम्शी से बहुत प्रभावित थे।

जनसंगउष्मा का यह अभाव उसे उस बावड़ी में क़ैद करता है, अपने अस्तित्व के प्रति शंकालु बनाता है और उसकी संवेदना को स्याह करता है। यह उसके ‘उर’ को शुष्क बना डालता है और उसे अपने प्रचंड ज्ञान के बावज़ूद समाज के लिए एक अनुपयोगी तथा भयोत्पादक प्रेत में तब्दील कर देता है। शिष्य का ‘सजल उर’ हो उसकी वेदना के स्रोतों को संगत निष्कर्षों तक पहुँचाना उस जनसंगउष्मा से लैस हो ज्ञान की सामाजिक संपत्ति को समाज तक लौटाना तथा परिवर्तन के संघर्ष में धन-अभिभूत क्रीतदास बौद्धिक वर्ग के बरक्स सर्वहारा वर्ग के आर्गेनिक बुद्धिजीवी की तरह व्यवहृत होने का संकल्प है। इसे मुक्तिबोध के अपने आन्तरिक संघर्षों की तरह बहुत विवेचित किया गया है लेकिन मुझे यह कविता अपनी सामाजिक उपस्थिति में एक संक्रमणकालीन समय में बुद्धिजीवी के पक्ष चयन और लोक व्यवहार की संकेतक कविता लगती है और इसीलिए आज के समय के लिए बेहद प्रासंगिक।       

इन झीलों में मुग्ध खिली हैं लाल पंखुरियाँ

ब्रह्मराक्षस के ठीक पहले मुक्तिबोध के जीवनकाल में अप्रकाशित रह गई और अपूर्ण सी एक सुदीर्घ कविता है। यह कविता जितनी अभिधा में है उतनी ही अभिव्यंजना में। पढ़ते हुए लगता है जैसे मुक्तिबोध तय ही नहीं कर पा रहे कि उन्हें इसमें कहना क्या है। गौर से देखें तो यह ब्रह्मराक्षस और अँधेरे में, दोनों की तैयारी कविता लिखती है। किसी बड़ी पेंटिंग को बनाने से पहले का अभ्यास जहाँ बेहद अवसादजनक दृश्य हैं तो ‘लम्बी सड़कें चली आ रही हों/लपेटने तुमको बरबस/चीख़ो, चीख़ो, ‘फ़ायर-फ़ायर’/ गोली दागो, गोले दागो’/.../इस नगरी में अच्छे अच्छे/ लोग हुए जाते हैं देखो/ शैतानों के झबरे बच्चे’ जैसी बेचैनी और गुस्सा भी है। यहाँ भी ‘दुखते हिय से भीष्माचार्यों की मज़बूरी/कौरवों के घर’ के बाद दो विस्म्याधिबोधक चिह्न है। यह विस्मय बौद्धिक वर्ग के वर्चस्वशाली जनशत्रु के दास हुए जाने का विस्मय है। यह किसी शोधक की बेचैनी है जो लगातार उस समूह की भूमिका और पक्षधरता को लेकर बेचैन है और उसे हल करने का प्रमेय तलाश रहा है। इसके एक हिस्से का शीर्षक उन्होंने ‘डूबता चाँद कब डूबेगा’ दिया था। स्पष्ट है कि यह डूबता चाँद पतनशील पूँजीवादी व्यवस्था है जिसके डूबने की चिंता उनकी प्राथमिक चिंता है और डूबने की इस प्रक्रिया में अपने समूह की भूमिका की तलाश उनका प्रमुख कार्यभार। यह तलाश उन्हें उन झीलों के पास ले जाती हैं जिनमें ‘मुग्ध खिली हैं/ लाल पंखुरियाँ/ जन अनुभव की कमल-श्रेणियाँ’ और ‘देश-देश की ऐतिहासिक पीड़ाओं की बातों’ के सिलसिले में मिला यह निष्कर्ष एक बार फिर उन्हें विस्मय से भर देता है। लेकिन इस विस्मय में हर्ष है और ये बातें भी ख़ुद से नहीं की हुई हैं बल्कि यहाँ हम है, हम यानी उनका समूह, बौद्धिकों का समूह।

यही शोध ब्रह्मराक्षस में जाकर अपनी तार्किक निष्पत्ति तक पहुँचता है। दूसरों से उनकी पॉलिटिक्स पूछने वाला कवि ख़ुद से भी अपनी पॉलिटिक्स के बारे में निर्मम सवाल पूछता है और सरल उत्तरों में फँसने की जगह अपने समय, समाज और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भीतर और बाहर भटकता अपनी सच्ची अभिव्यक्ति तलाशता वह जहाँ पहुँचता है वह एकदम स्पष्ट जनसंगउष्मा से दीप्त होकर मनुष्य की मुक्ति की राह में अपनी भूमिका लक्षित करने की दिशा है। 
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पहल-110 में प्रकाशित  


शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

दूधनाथ सिंह : एक प्रतिबद्ध स्वर


कुलदीप कुमार ने यह लेख आज द हिन्दू के अपने कॉलम "हिन्दी बेल्ट" लिए लिखा था...किसे पता था कि यह श्रद्धांजलि लेख में बदल जाएगा। जनपक्ष की ओर से हिन्दी के प्रतिबद्ध कहानीकार और आलोचक दूधनाथ सिंह जी को सादर श्रद्धांजलि। 

A committed voice
  • Kuldeep Kumar

News from Allahabad is very depressing as it tells us that top Hindi writer Doodhnath Singh, 81, is lying at home in a critical condition due to serious kidney failure. I have fond memories of a chance meeting with him in early February last year at Allahabad’s famous Indian Coffee House in Civil Lines. In the early 1970s, when I was acquiring familiarity with contemporary Hindi literature, Doodhnath Singh was one of the writers whom I read with great interest. A line from his early poems still resonates in my ears: “Lift ke andhere mein brain haimrej ho rahe hain” (Brain haemorrhages are taking place in the darkness of the elevator). Later, I came to know him as a friend although he was much older than me.  

Doodhnath Singh is a committed Left-wing writer and happens to be the national president of the pro-CPI (M) Janwadi Lekhak Sangh. When he exploded on the Hindi literary scene with his collection of short stories Sapaat Chehrewala Aadmi (Man with a Plain Face), published by Rajendra Yadav’s Akshar Prakashan in 1967, the new talent was viewed with awe and nearly all the short stories, be it Reechh (Bear), Raktapaat (Bloodletting), Duhswapna (Nightmare) or Iceberg, acquired near-iconic status. He also made his mark as a significant poet of his generation as well as a novelist, playwright and critic.

His book on great Hindi poet Suryakant Tripathi Nirala, published by Lokbharati Prakashan in 1972, was tantalisingly titled Nirala: Aatmahanta Aastha (Nirala: A Self-destructive Belief) and Doodhnath Singh had to explain in the introductory note that he did not mean that Nirala was suicidal. What he actually meant was that once a writer had devoted himself completely to his art, he had to go through the process of continuous self-annihilation, savouring the taste of his own blood on the tip of his tongue. One could discern in this formulation an unmistakable influence of T. S. Eliot but the book was in fact an intimate conversation between two poets. It was a collection of observations made on the margin of Nirala’s books as well as scattered entries in Singh’s diaries but they somehow formed an integrated whole and offered a palpably new interpretation of the great poet and his work.
In 1975, when the country’s politics was experiencing a paradigm shift, Doodhnath Singh brought out a literary journal of uncertain periodicity and appropriately christened it Pakshdhar (Partisan). Although it did not have a long life, the journal proved to be an effective political-literary intervention and confirmed Singh’s status as an important writer with a social conscience.
Most of his books have been published by Lokbharati Prakashan, Radhakrishna Prakashan and Rajkamal Prakashan and they include his novels Aakhiri Kalaam (Last Discourse), Nishkasan (Expulsion) and Namo Andhakaram (Salute to Darkness), collections of short stories Mai ka Shokgeet (The Sad Song of Mother), Sukhant (Happy Ending) and Katha Samagra (Collected Stories), play Yamgatha (The Story of Yama), poetry collections such as Tumhare Liye (For You) and Laut Aa O Dhaar (Return! O, Stream), and books of literary criticism like Muktibodh Sahitya Mein Nayee Pravrittiyan (New trends in Muktibodh’s writings). He has also edited great Hindi woman poet Mahadevi’s writings with his critical comments. And, this is by no means an exhaustive list of his works.

While Doodhnath Singh’s early work expressed the angst felt by the youth of the 1960s due to an all-pervasive collapse of social, moral, economic and political values, his later work voiced a powerful protest against the evolving realities. His short story “Mai ka Shokgeet” is a hair-raising document of domestic violence against women while “Aakhiri Kalaam” is a post-Babri masjid polemics involving our past as well as present. In fact most of his post-1990 writings are imbued with a sense of deep frustration, anguish, anger and protest against the formation of a political culture that is destructive by its very nature. Singh tries to marshal multi-layered history, myths, fables and cultural interpretations to express his deeply felt revulsion against an ideology that tears asunder the intricately woven fabric of our composite culture. And, being a creative writer, he accomplishes this feat without resorting to sloganeering or explicit portrayals. Little wonder that veteran theatre critic Romesh Chandra had this to say about Singh’s play “Yamgatha” in his review published in The Hindu on February18, 2005: “In the past we have seen quite a few plays that have tried to draw a parallel between mythology and the current socio-political scene with varying degrees of success but "Yama Gatha" brings the message home without being propagandist.”

His book on Muktibodh, published in 2013 by Rajkamal Prakshan, proved that the critical acumen that he displayed in his study of Nirala had become even sharper over the decades as he offered radically different interpretation of the iconic poet’s work and brought out several new facets of his poetry.

Doodhnath Singh’s writings have been translated into English, German, Marathi, Bengali, Gujarati, Punjabi and Malayalam. He is a recipient many literary awards including Bharat Bharati Samman, Bharatendu Samman, Sharad Joshi Samman and Kathakram Samman.

(द हिन्दू से साभार) 


बुधवार, 9 अगस्त 2017

संगीत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह : कुलदीप कुमार




पश्चिम के साथ साक्षात्कार की प्रक्रिया में उन्नीसवीं सदी में हिंदुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी अस्मिता को अपने “गौरवपूर्ण अतीत” के आलोक में समझने और परिभाषित करने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में स्वयं को न केवल सांस्कृतिक बल्कि एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भी पुनर्गठित किया। सांप्रदायिकता इसी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न विचारधारा है जिसकी बुनियाद अपने समुदाय के हितों को दूसरे समुदाय के हितों के खिलाफ समझने पर रखी गई है। ज़ाहिर है कि इस क्रम में अपने समुदाय का गौरवगान करने और दूसरे समुदाय से नफरत करने की प्रवृत्ति का पैदा होना बहुत स्वाभाविक है। 

भारतीय उपमहाद्वीप का संगीत उसमें रहने वाले सभी निवासियों के योगदान से बना संगीत है जिस पर किसी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ऐतिहासिक कारणों से किसी एक समुदाय का अल्प या दीर्घ अवधि के लिए वर्चस्व तो स्थापित हो सकता है लेकिन एकाधिकार कभी भी स्थापित नहीं हो सकता; और, यह वर्चस्व भी स्थायी नहीं होता क्योंकि दूसरा समुदाय स्थापित सत्ता-समीकरण को बदलने के लिए हमेशा सक्रिय रहता है। यदि इस सक्रियता के पीछे केवल बेहतर कलासृजन की प्रेरणा हो तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यदि इसके पीछे शुद्ध सांप्रदायिक आग्रह हो समस्या पैदा होती है। 

संगीतकार संगीत को ईश्वर की आराधना बताते हैं। अक्सर उन्हें यह कहते हुए भी पाया जाता है कि संगीत उनके लिए ईश्वर तक पहुँचने का साधन है। नाद को ब्रह्म भी माना जाता है और कहा जाता है कि संगीत देश, काल, जाति, धर्म और संप्रदाय---सभी सीमाओं का अतिक्रमण करता है क्योंकि वह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक है। संगीतकार का धर्म केवल संगीत है क्योंकि स्वरों का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यह आदर्श स्थिति का वर्णन है, वास्तविक स्थिति का नहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में जिस तरह सांप्रदायिकता की विषबेल फली-फूली है, उसके कारण देश का विभाजन करने वाली इस विचारधारा के जहरीले असर से संगीत भी अछूता नहीं रह सका है। 

पुरानी पत्रिकाएँ उलटने-पलटने के क्रम में ‘अकार’ का एक अंक (अगस्त 2013-नवंबर 2013) हाथ में आया जिसमें सैयद जुल्फिकार अली बुखारी की आत्मकथा ‘सरगुजश्त’ का एक अंश छपा है। सैयद जुल्फिकार अली बुखारी सैयद अहमद शाह बुखारी (उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार पितरस बुखारी) के छोटे भाई थे और आजादी के पहले इन दोनों भाइयों का ऑल इंडिया रेडियो पर ऐसा वर्चस्व था कि उसे मज़ाक में लोग बीबीसी (बुखारी ब्रदर्स कॉर्पोरेशन) कहने लगे थे। विभाजन के बाद जुल्फिकार बुखारी रेडियो पाकिस्तान में काफी समय तक काम करने के बाद उसके महानिदेशक भी बने। यह आत्मकथा उन्होंने पाकिस्तान में ही लिखी लेकिन इस अंश का संबंध 1930 के बाद के विभाजनपूर्व भारत से है। 

बुखारी लिखते हैं: “अब इनको कौन बताए कि मद्रास को छोड़कर बाकी तमाम हिंदुस्तान में अगर मौसिकी का इल्म है तो सिर्फ मुसलमानों को, मौसिकी हिंदुओं के नजदीक भी नहीं गई। मैं ये बात किसी तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की बिना पर नहीं कहता, इल्म के मामले में तअस्सुब कैसा? हकीकत ये है कि हमारे हिंदुस्तान में आने से कब्ल (पहले) यहाँ सिर्फ चार सुर रायज (प्रचलित) थे। मुसलमानों ने सात सुर यहाँ आकर रायज किए। ये तमाम मौसिकी मुसलमानों की आवरदा (लाई हुई) है। मद्रास में इस मौसिकी को अरब लाये और शुमाली (उत्तरी) हिंदुस्तान में ईरान के रास्ते से आने वाले मुसलमान।” विष्णु दिगंबर पलुस्कर--- जिनके ओंकारनाथ ठाकुर, विनायकराव पटवर्धन, नारायणराव व्यास, डी. वी. पलुस्कर और बी. आर. देवधर जैसे यशस्वी शिष्य हुए--- के बारे में बुखारी साहब के उद्गार कुछ यूं निकले हैं: “भाईजान मरहूम और मैं दोनों विष्णु दिगंबर के लाहौर वाले स्कूल में दाखिल हुए ताकि देखें तो सही कि ये लोग क्या करते हैं। मगर चंद ही दिनों में लाहौल पढ़कर बाहर आ गए। अब कौन बैठकर भजन गाता और वो भी बेसुरे उस्ताद की आवाज के साथ आवाज मिलाकर।” 

पाकिस्तानी फिल्मों के मशहूर संगीत निर्देशक खुर्शीद अनवर ने वॉइस ऑफ अमेरिका की उर्दू सर्विस के प्रमुख ब्रायन सिल्वर को दिये एक इंटरव्यू में भी यही बात कही थी कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मुसलमानों का है। कान्हड़ा का जिक्र आने पर उन्होंने कहा कि सभी तरह के कान्हड़े, चाहे वह दरबारी कान्हड़ा हो या कौंसी कान्हड़ा या हुसैनी कान्हड़ा या नायकी कान्हड़ा—ये सभी मुसलमानों के ही बनाए हुए हैं। यूं सभी यह जानते हैं कि दरबारी कान्हड़ा, मियां की तोड़ी, मियां की सारंग, मियां मल्हार जैसे मशहूर राग तानसेन के बनाए हुए हैं जिनके बारे में अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वे अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बने थे या नहीं। आचार्य बृहस्पति जैसे प्रकांड विद्वान और संगीतशास्त्री का मत है कि तानसेन ने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है और इसका पहले-पहल उल्लेख अठारहवीं सदी में मिलता है।

संगीत जगत हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं और उद्देश्यों से अछूता रहा हो, ऐसा भी नहीं है। विष्णु दिगंबर पलुस्कर और विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत-शिक्षण की जो संस्थाएं खोलीं, उनके द्वारा काफी हद तक इनकी पूर्ति हुई। पलुस्कर के यशस्वी शिष्यों ने उनकी परंपरा को देश भर में फैलाया और आज वह लगभग वर्चस्व वाली स्थिति में है। लेकिन यह भी एक विचारणीय विषय है कि उनकी शिष्य-परंपरा में एक भी ऐया मुस्लिम संगीतकार क्यों नहीं है जो संगीत सम्मेलनों के मंचों पर नज़र आता हो। जबकि सच्चाई यह है कि अगर ग्वालियर घराने के संस्थापक हद्दू खां-हस्सू खां अपनी गायकी हिन्दू शिष्यों को न सिखाते तो विष्णु दिगंबर पलुस्कर का उदय ही न होता। शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग में संगीत के प्रचार के उद्देश्य से पलुस्कर ने तुलसीदास, सूरदास, मीरा और नानक जैसे संत कवियों की पंक्तियां लेकर उन्हें रागों में बांधा, भजन के अतिरिक्त संगीत के अन्य प्रकारों को त्याज्य माना और इस तरह इस धारणा को बल प्रदान किया कि भारतीय संगीत मुख्यतः धर्म से जुड़ा है और मुस्लिम शासकों के दौर में संगीतकारों और संगीत, दोनों के (चारित्रिक) स्तर में गिरावट आई। 

सांप्रदायिक दृष्टि से संगीत को देखने के परिणामस्वरूप पाकिस्तान और भारत, दोनों में एक अजीब किस्म की कोशिश की गई और रागों के नाम बदले गए। सौभाग्य से यह कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। पाकिस्तान में रामकली, दुर्गा, भैरव, शंकरा, श्याम कल्याण जैसे उन रागों के नाम बदलने की कोशिश हुई जिनमें  हिन्दू देवी-देवताओं के नाम आते थे और बन्दिशों में भी ऐसे ही परिवर्तन किए गए लेकिन यह कोशिश विफल रही। भारत में ओंकारनाथ ठाकुर ने राग जौनपुरी को जीवनपुरी कहना शुरू किया जबकि यह सर्वमान्य तथ्य है कि इस राग की रचना जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी ने की थी। पुराने लोग अभी भी याद करते हैं कि ओंकारनाथ ठाकुर संगीत सम्मेलन के मंच को गंगाजल से शुद्ध करके और उस पर अपनी मृगछाला बिछाकर बैठने के बाद ही अपना गायन शुरू करते थे। इसी तरह यमन को केवल कल्याण कहने की परंपरा भी डाली जा रही है। लेकिन सौभाग्य से यह प्रयास भी परवान नहीं चढ़ पा रहा है। 

विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत के हिंदूकरण की कोशिश नहीं की, लेकिन उनका संस्कृत में लिखे गए प्राचीन संगीत ग्रन्थों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर था। जानकी बाखले ने अपनी पुस्तक “टु मेन एंड म्यूज़िक” में विस्तार से वर्णन किया है कि किस तरह वे मुस्लिम उस्तादों से संस्कृत ग्रन्थों के बारे में सवाल करते थे और यह सिद्ध करते थे कि उनकी गायकी का कोई प्रामाणिक सैद्धान्तिक आधार नहीं है। लेकिन इन्हीं उस्तादों की सहायता लेना उनकी मजबूरी थी और उनसे ही राग-चर्चा करके और बन्दिशें एकत्रित करके भातखंडे ने अपनी पुस्तकें लिखीं। यही नहीं, जब उन्होंने लखनऊ में संगीत शिक्षण के लिए मैरिस कॉलेज की स्थापना की तब खानदानी संगीतजीवी मुस्लिम संगीतकारों को अध्यापन के लिए नियुक्त करना पड़ा। मैक्स कैट्ज़ ने ‘सांस्थानिक सांप्रदायिकता’ पर लखनऊ में किए गए अपने शोध के आधार पर दर्शाया है कि किस तरह इस विद्यालय में, जिसे अब भातखंडे संगीत संस्थान के नाम से जाना जाता है और 2000 से जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा भी प्राप्त है, मुस्लिम उस्तादों और छात्रों की संख्या में लगातार कमी आती गई। यह प्रक्रिया इस विद्यालय में ही नहीं, समूचे संगीत जगत में चली है जिसके कारण मुस्लिम उस्तादों से संगीत सीखने वाले शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग के संगीतकारों की व्यापक उपस्थिति के कारण खानदानी मुस्लिम संगीतकार लगातार हाशिये की तरफ ठेले जाते रहे। इन संगीत विद्यालयों के कारण संगीत का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन ये एक भी बड़ा कलाकार देने में असमर्थ रहे। 

यह मान्यता भी फैलाई गई कि मुसलमानों के आगमन के कारण उत्तर भारत का संगीत दूषित हो गया लेकिन दक्षिण भारत का संगीत इससे बचा रहा। 1974 में प्रकाशित पुस्तक “मुसलमान और भारतीय संगीत” में आचार्य बृहस्पति ने इस धारणा का खंडन करते हुए सिद्ध किया कि किस तरह मुसलमानों के साथ आए ईरानी संगीत के साथ संपर्क में आने से भारतीय संगीत की श्रीवृद्धि हुई और उसमें परिवर्तन आए। मूर्छना-पद्धति के स्थान पर मेल-पद्धति आ गई और “संस्कृत के अनेक ग्रंथ मेल पद्धति के आधार पर लिखे गए”। भातखंडे ने भी मेल-पद्धति के आधार पर ही रागों का वर्गीकरण और रूप-निर्धारण किया। उन्होंने तो अपने विचारों को मनवाने के लिए ‘चतुर पंडित’ के छद्मनाम ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना भी कर डाली ताकि उन पर प्राचीनता की प्रामाणिकता का ठप्पा लग जाए। 

अब तो कैथरीन बटलर स्कोफील्ड जैसे शोधकर्ताओं ने निर्णायक रूप से सिद्ध कर दिया है कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संगीत को देशनिकाला नहीं दिया था, केवल पकी उम्र होने पर दरबार में उसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन आचार्य बृहस्पति ने तो 1974 में प्रकाशित इस पुस्तक में ही स्पष्ट शब्दों में लिख दिया था कि “1667-1668 में औरंगजेब ने आदेश दिया कि गायक लोग दरबार में आयें, पर गाना न गायें। इस आदेश के कारण विशुद्ध राजनीतिक थे। इटालियन इतिहासकर मनुक्कि के अनुसार इस प्रतिबंध के बाद भी औरंगजेब बेगमों और शाहज़ादियों के मनोरंजन के लिए गायिकाओं और नर्तकियों की नियुक्ति करता था और अंतःपुर में गाना-बजाना होता था”। लेकिन सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण औरंगजेब की संगीत-विरोधी कट्टर मुस्लिम शासक वाली छवि आज भी बनी हुई है जबकि आचार्य बृहस्पति उसके इस प्रकार के निर्णयों के पीछे विशुद्ध राजनीतिक कारण मानते हैं।  

इस सबके बावजूद अच्छी बात यह है कि इन सांप्रदायिक रुझानों के बावजूद अभी तक हिंदुस्तानी संगीत जगत में सांप्रदायिक सद्भाव बना हुआ है।  हालांकि इसके साथ ही यह भी सही है कि खानदानी घरानेदार मुस्लिम गायकों और वादकों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। खयाल के कुछ घरानों में तो मुस्लिम गायक लगभग विलुप्त-से होते जा रहे हैं। संगीत सम्मेलनों के मंच पर अब ग्वालियर, आगरा और जयपुर जैसे घरानों समादृत मुस्लिम कलाकार ढूँढने पर ही मिलेंगे। संगीत को समाज और राज्य की ओर से मिलने वाले आर्थिक-राजनीतिक समर्थन और संरक्षण की संरचनागत समस्याओं की भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे कभी चर्चा करेंगे। 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का पलायन : कुछ तथ्य


·         अशोक कुमार पाण्डेय

1-     1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद के चरम के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया. पहला तथ्य संख्या को लेकर. कश्मीरी पंडित समूह और कुछ हिन्दू दक्षिणपंथी यह संख्या चार लाख से सात लाख तक बताते हैं. लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत अधिक है. असल में कश्मीरी पंडितों की आख़िरी गिनती 1941 में हुई थी और उसी से 1990 का अनुमान लगाया जाता है. इसमें 1990 से पहले रोज़गार तथा अन्य कारणों से कश्मीर छोड़कर चले गए कश्मीरी पंडितों की संख्या घटाई नहीं जाती. अहमदाबाद में बसे कश्मीरी पंडित पी एल डी परिमू ने अपनी किताब “कश्मीर एंड शेर-ए-कश्मीर : अ रिवोल्यूशन डीरेल्ड” में 1947-50 के बीच कश्मीर छोड़ कर गए पंडितों की संख्या कुल पंडित आबादी का 20% बताया है. (पेज़-244) चित्रलेखा ज़ुत्शी ने अपनी किताब “लेंग्वेजेज़ ऑफ़ बिलॉन्गिंग : इस्लाम, रीजनल आइडेंटीटी, एंड मेकिंग ऑफ़ कश्मीर” में इस विस्थापन की वज़ह नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा लागू किये गए भूमि सुधार को बताया है (पेज़-318) जिसमें जम्मू और कश्मीर में ज़मीन का मालिकाना उन ग़रीब मुसलमानों, दलितों तथा अन्य खेतिहरों को दिया गया था जो वास्तविक खेती करते थे, इसी दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और राजपूत ज़मींदार भी कश्मीर से बाहर चले गए थे. ज्ञातव्य है कि डोगरा शासन के दौरान डोगरा राजपूतों, कश्मीरी पंडितों और कुलीन मुसलमानों के छोटे से तबके ने कश्मीर की लगभग 90 फ़ीसद ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया था. (विस्तार के लिए देखें “हिन्दू रूलर्स एंड मुस्लिम सब्जेक्ट्स”, मृदु राय) इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों का नौकरियों आदि के लिए कश्मीर से विस्थापन जारी रहा (इसका एक उदाहरण अनुपम खेर हैं जिनके पिता 60 के दशक में नौकरी के सिलसिले में शिमला आ गए थे) सुमांत्रा बोस ने अपनी किताब “कश्मीर : रूट्स ऑफ़कंफ्लिक्ट, पाथ टू पीस” में यह संख्या एक लाख बताई है,( पेज़ 120)  राजनीति विज्ञानी अलेक्जेंडर इवांस विस्थापित पंडितों की संख्या डेढ़ लाख से एक लाख साठ हज़ार बताते हैं, परिमू यह संख्या ढाई लाख बताते हैं. सी आई ए ने एक रिपोर्ट में यह संख्या तीन लाख बताई है. एक महत्त्वपूर्ण तथ्य अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आई ए एस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति श्रीनगर की 7 अप्रैल, 2010 प्रेस रिलीज़ के हवाले से बताते हैं कि लगभग 3000 कश्मीरी पंडित परिवार स्थितियों के सामान्य होने के बाद 1998 के आसपास कश्मीर से पलायित हुए थे. (देखें, पेज़ 79,माई कश्मीर : द डाइंग ऑफ़ द लाईट, वजाहत हबीबुल्ला). बता दूँ कि कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इन भयानक स्थितियों के बाद भी कश्मीर से पलायित होने से इंकार करने वाले पंडितों का संगठन है. अब भी कोई साढ़े तीन हज़ार कश्मीरी पंडित घाटी में रहते हैं, बीस हज़ार से अधिक सिख भी हैं और नब्बे के दशक के बाद उन पर अत्याचार की कोई बड़ी घटना नहीं हुई, हाँ हर आम कश्मीरी की तरह उनकी अपनी आर्थिक समस्याएं हैं जिस पर अक्सर कोई ध्यान नहीं देता. हाल में ही तीस्ता सीतलवाड़ ने उनकी मदद के लिए अपील जारी की थी. साथ ही एक बड़ी समस्या लड़कों की शादी को लेकर है क्योंकि पलायन कर गए कश्मीरी पंडित अपनी बेटियों को कश्मीर नहीं भेजना चाहते.

गुजरात हो कि कश्मीर, भय से एक आदमी का भी अपनी ज़मीन छोड़ना भयानक है, लेकिन संख्या को बढ़ा कर बताना बताने वालों की मंशा तो साफ़ करता ही है.  

2-     उल्लिखित पुस्तक में ही परिमू ने बताया है कि उसी समय लगभग पचास हज़ार मुसलमानों ने घाटी छोड़ी. कश्मीरी पंडितों को तो कैम्पों में जगह मिली, सरकारी मदद और मुआवज़ा भी. लेकिन मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं मिला (देखें, वही) सीमा क़ाज़ी अपनी किताब “बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन” में ह्यूमन राईट वाच की एक रपट के हवाले से बताती हैं कि 1989 के बाद से पाकिस्तान में 38000 शरणार्थी कश्मीर से पहुँचे थे. केप्ले महमूद ने अपनी मुजफ्फराबाद यात्रा में पाया कि सैकड़ों मुसलमानों को मार कर झेलम में बहा दिया गया था. इन तथ्यों को साथ लेकर वह भी उस दौर में सेना और सुरक्षा बलों के अत्याचार से 48000 मुसलमानों के विस्थापन की बात कहती हैं. इन रिफ्यूजियों ने सुरक्षा बलों द्वारा, पिटाई, बलात्कार और लूट तक के आरोप लगाए हैं. अफ़सोस कि 1947 के जम्मू नरसंहार (विस्तार के लिए इंटरनेट पर वेद भसीन के उपलब्ध साक्षात्कार या फिर सईद नक़वी की किताब “बीइंग द अदर” के पेज़ 173-193) की तरह इस विस्थापन पर कोई बात नहीं होती.

3-     1989-90 के दौर में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के लेकर भी सरकारी आँकड़े सवा सौ और कश्मीरी पंडितों के दावे सवा छः सौ के बीच भी काफ़ी मतभेद हैं. लेकिन क्या उस दौर में मारे गए लोगों को सिर्फ़ धर्म के आधार पर देखा जाना उचित है.

परिमू के अनुसार हत्यारों का उद्देश्य था कश्मीर की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और प्रशासन को पंगु बना देने के साथ अपने हर वैचारिक विरोधी को मार देना था. इस दौर में मरने वालों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद युसुफ़ हलवाई,  मीरवायज़  मौलवी फ़ारूक़, नब्बे वर्षीय पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी मौलाना मौदूदी, गूजर समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित नेता क़ाज़ी निसार अहमद, विधायक मीर मुस्तफ़ा,  श्रीनगर दूरदर्शन के डायरेक्टर लासा कौल, एच एम टी के जनरल मैनेज़र एच एल खेरा, कश्मीर विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफ़ेसर मुशीर उल हक़ और उनके सचिव अब्दुल गनी, कश्मीर विधान सभा के सदस्य नाज़िर अहमद वानी आदि शामिल थे (वही, पेज़ 240-41) ज़ाहिर है आतंकवादियों के शिकार सिर्फ़ कश्मीरी पंडित नहीं, मुस्लिम भी थे. हाँ, पंडितों के पास पलायित होने के लिए जगह थी, मुसलमानों के लिए वह भी नहीं. वे कश्मीर में ही रहे और आतंकवादियों तथा सुरक्षा बलों, दोनों के अत्याचारों के शिकार होते रहे.

जगमोहन के कश्मीर में शासन के समय वहाँ के लोगों के प्रति रवैये को जानने के लिए एक उदाहरण काफी होगा. 21 मई 1990 को जब मौलवी फ़ारूक़ की हत्या के बाद जब लोग सड़कों पर आ गए तो वह एक आतंकवादी संगठन के ख़िलाफ़ थे लेकिन जब उस जुलूस पर सेना ने गोलियाँ चलाईं और भारतीय प्रेस के अनुसार 47 (और बीबीसी के अनुसार 100 लोग) गोलीबारी में मारे गए तो यह गुस्सा भारत सरकार के ख़िलाफ़ हो गया. (देखें, कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर, बलराज पुरी, पेज़-68) गौकादल में घटी यह घटना नब्बे के दशक में आतंकवाद के मूल में मानी जाती है. इन दो-तीन सालों में मारे गए कश्मीरी मुसलमानों की संख्या 50000 से एक लाख तक है. श्रीनगर सहित अनेक जगहों पर सामूहिक क़ब्रें मिली हैं. आज भी वहाँ हज़ारो माएं और व्याह्ताएं “आधी” हैं – उनके बेटों/पतियों के बारे में वे नहीं जानती कि वे ज़िंदा हैं भी या नहीं, बस वे लापता हैं.  (आप तमाम तथ्यों के अलावा शहनाज़ बशीर का उपन्यास “द हाफ़ मदर” पढ़ सकते हैं.)

4-     कश्मीर से पंडितों के पलायनों में जगमोहन की भूमिका को लेकर कई बातें होती हैं. पुरी के अनुसार जगमोहन को तब भाजपा और तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के कहने पर कश्मीर का गवर्नर बनाया गया था. उन्होंने फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार को बर्ख़ास्त कर सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे. अल जज़ीरा को दिए एक साक्षात्कार में मृदु राय ने इस संभावना से इंकार किया है कि योजनाबद्ध तरीक़े से इतनी बड़ी संख्या में पलायन संभव है. लेकिन वह कहती हैं कि जगमोहन ने पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए प्रेरित किया.  वजाहत हबीबुल्लाह पूर्वोद्धरित किताब में बताते हैं कि उन्होंने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहाँ सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनकी पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी. लेकिन जगमोहन ने मना कर दिया, इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि “पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पस में जा सकते हैं, जो कर्मचारी घाटी छोड़ कर जायेंगे उन्हें तनख्वाहें मिलती रहेंगी.” ज़ाहिर है इन घोषणाओं ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया. (पेज़ 86 ; मृदु राय ने भी इस तथ्य का ज़िक्र किया है). कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पत्रकार बलराज पुरी ने अपनी किताब “कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर” में जगमोहन की दमनात्मक कार्यवाहियों और रवैयों को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुख्य ज़िम्मेदार बताया है.(पेज़ 68-73). ऐसे ही निष्कर्ष वर्तमान विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपनी किताब “बिहाइंड द वेल” में भी दिए हैं. (पेज़ 218-20) कमिटी फॉर इनिशिएटिव ऑन कश्मीर की जुलाई 1990 की रिपोर्ट “कश्मीर इम्प्रिजंड” में नातीपुरा, श्रीनगर में रह रहे एक कश्मीरी पंडित ने कहा कि “इस इलाक़े के कुछ लोगों ने दबाव में कश्मीर छोड़ा. एक कश्मीरी पंडित नेता एच एन जट्टू लोगों से कह रहे थे कि अप्रैल तक सभी पंडितों को घाटी छोड़ देना है. मैंने कश्मीर नहीं छोड़ा, डरे तो यहाँ सभी हैं लेकिन हमारी महिलाओं के साथ कोई ऐसी घटना नहीं हुई.” 18 सितम्बर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार अफ़साना में छपे एक पत्र में के एल कौल ने लिखा – “पंडितों से कहा गया था कि सरकार कश्मीर में एक लाख मुसलमानों को मारना चाहती है जिससे आतंकवाद का ख़ात्मा हो सके. पंडितों को कहा गया कि उन्हें मुफ़्त राशन,घर, नौकरियाँ आदि सुविधायें दी जायेंगी. उन्हें यह कहा गया कि नरसंहार ख़त्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा.”  हालाँकि ये वादे पूरे नहीं किये गए पर कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला प्रति माह मुआवज़ा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवज़े से अधिक है. समय समय पर इसे बढ़ाया भी गया, आख़िरी बार उमर अब्दुल्ला के शासन काल में. आप गृह मंत्रालय की वेबसाईट पर इसे देख सकते हैं. बलराज पुरी ने अपनी किताब में दोनों समुदायों की एक संयुक्त समिति का ज़िक्र किया है जो पंडितों का पलायन रोकने के लिए बनाई गई थी. इसके सदस्य थे – पूर्व हाईकोर्ट जज मुफ़्ती बहाउद्दीन फ़ारूकी (अध्यक्ष), एच एन जट्टू (उपाध्यक्ष) और वरिष्ठ वक़ील ग़ुलाम नबी हग्रू (महासचिव). ज्ञातव्य है कि 1986 में ऐसे ही एक प्रयास से पंडितों को घाटी छोडने से रोका गया था. पुरी बताते हैं कि हालाँकि इस समिति की कोशिशों से कई मुस्लिम संगठनों, आतंकी संगठनों और मुस्लिम नेताओं से घाटी न छोड़ने की अपील की, लेकिन जट्टू ख़ुद घाटी छोड़कर जम्मू चले गए. बाद में उन्होंने बताया कि समिति के निर्माण और इस अपील के बाद जगमोहन ने उनके पास एक डीएसपी को जम्मू का एयर टिकट लेकर भेजा जो अपनी जीप से उन्हें एयरपोर्ट छोड़ कर आया, उसने जम्मू में एक रिहाइश की व्यवस्था की सूचना दी और तुरंत कश्मीर छोड़ देने को कहा! ज़ाहिर है जगमोहन ऐसी कोशिशों को बढ़ावा देने की जगह दबा रहे थे. (पेज़ 70-71)

कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर काला धब्बा है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि क़ाबिल अफ़सर माने जाने वाले जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल के रूप मे लगभग 400000 सैनिकों की घाटी मे उपस्थिती के बावज़ूद इसे रोक क्यों न सके? अपनी किताब “कश्मीर : अ ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स” में तवलीन सिंह पूछती हैं – कई मुसलमान यह आरोप लगाते हैं कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रेरित किया. यह सच हो या नहीं लेकिन यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए.”

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मित्रों से अनुरोध है कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति और उसके कर्ता धर्ता संजय टिक्कू के बयान और साक्षात्कार पढ़ लें। मिल जाएंगे इंटरनेट पर बिखरे। 

असल मे जैसा कि एक कश्मीरी पंडित उपन्यासकार निताशा कौल कहती हैं - कश्मीरी पंडित हिंदुत्व की ताक़तों के राजनीतिक खेल के मुहरे बन गए हैं। विस्तार के लिए वायर में छपा उनका 7 जुलाई 2016 का लेख पढ़ लें। जब निताशा ने अल जज़ीरा के एक प्रोग्राम में राम माधव का प्रतिकार किया तो कश्मीरी पंडितों के संघ समर्थक समूह के युवाओं ने उनको भयानक ट्रॉल किया। दिक़्क़त यह है कि भारतीय मीडिया संघ से जुड़े पनुन कश्मीर (पूर्व में सनातन युवक सभा) को ही कश्मीरी पंडितों का इकलौता प्रतिनिधि मानता है। वह दिल्ली में रह रहे बद्री रैना जैसे कश्मीरी पंडितों के पास भी नहीं जाना चाहता। 
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ये बस कुछ तथ्य हैं, लेकिन इनके आधार पर आप चीज़ों का दूसरा चेहरा दिखा सकते हैं.
एक सवाल और है – क्या कश्मीरी पंडित कभी घाटी में लौट सकेंगे?

अभी मै दो सवाल छोड़कर जा रहा हूँ –

क्या कश्मीरी पंडित घाटी लौटना चाहते हैं?
क्या दिल्ली और श्रीनगर चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित घाटी में लौटें?

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लेखक इन दिनों “कश्मीरनामा : भविष्य की क़ैद में इतिहास” नामक किताब लिख रहे हैं)



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