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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

आल्हा-ऊदल - एक झलक

(मेरे प्रिय मित्र और युवा कहानीकार जितेन्द्र बिसारिया ने अभी हाल में ही आल्हाखंड पर एक लघु शोध कार्य पूरा किया है. इसे पढते हुए मुझे इस अद्भुत कथा परम्परा के बारे में बहुत कुछ नया पता चला तो सोचा आप सबसे भी इसे साझा किया जाय. आगे भी इसके टुकड़े यहाँ लगाए जायेंगे)




बुन्देली महाकाव्य आल्हाखण्ड के नायक आल्हा-ऊदल भी मूलतः दलित थे, जो राजपूती दंभ के शिकार रहे। ‘आल्हखण्ड’ में बावन गढ़ के राजपूत राजाओं द्वारा, ‘ओछी जाति बनाफर राय’ कहकर उन्हें बारबार अपमानित करते दिखाया गया है। समाज के निम्न तबके के प्रति उच्चवर्ग का कितना कू्रर रवैया था इसका अंदाज़ हम राजा परिर्मदेव द्वारा, दसराज-बच्छराज और ताल्हन सैयद को अपने दरबार में जगह देने और 52 गढ़ के राजपूत राजाओं द्वारा, उनसे रोटी-बेटी का सम्बन्ध समाप्त कर लेने में देख सकते हैं। ‘जाकी बिटिया सुन्दर देखी ता पर जाय धरी तलवार’ उक्ति को अधिकांश विद्वानों ने बनाफरों की विलासी और सांमतवादी प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर व्याख्या की है। कुछेक विद्वानों ने तो अपनी नासमझी का परिचय देते हुए, ‘आल्हाखण्ड’ को पुरूषों द्वारा स्त्रियों के लिए लड़ी गई लड़ाइयों का काव्य’ कहकर उसकी ग़लत व्याख्या ही कर डाली है।65 जबकि यह उनकी विलासिता न होकर 52 गढ़ के राजपूती दंभ के विरूद्ध समाज के निम्न वर्ग की एक प्रतिक्रिया थी।66 रक्त और वंश की श्रैष्ठता के विरूद्ध एक लड़ाई। जिसमें अंततः वे वीरगति को प्राप्त होते हैं। आल्हाखण्ड के एक भी प्रसंग में उनका विलासी होना सिद्ध नहीं होता। ऊदल जैसा रसिक वीर भी-‘‘क्वारे सेज पर पाँव न धरिहौं, मेरो रजपूती धर्म नसाय’ कहकर अपनी चारित्रक दृढ़ता का ही परिचय देता है, न कि विलासी और कामुक प्रवृत्ति का। 

चन्देलकालीन समाज और संस्कृति की एक झलक हमें अलबरूनी के वृत्तांतों से भी मिलती हैतत्कालीन धार्मिक जड़ता और श्रैष्ठ होने का दंभ किस तरह उनका पतन का कारण बना इसका उदाहरण अलबरूनी की निम्न पंक्तियों से होता हैै-‘हिन्दुओं का यह विश्वास है कि अन्य कोई देश उनके देश जैसा श्रैष्ठ नहीं है, इनके राजा के समान कोई राजा नहीं हैः उनके शास्त्रों के समान कोई शास्त्र नहीं। यदि वे यात्रा करके अन्य देशें के लोगों से मिलें तो उनका मत शीघ्र ही बदल जायेगा।’ पर यह संभव नहीं हुआ। हिन्दू धर्म के मठाधीशों ने पहले से ही इस जाति को कूपमंडूक बनाये रखने के लिए समुद्र यात्रा और अन्य देशें की यात्रा पर धार्मिक प्रतिबंध लगा दिया था। जिसका परिणाम इस देश को गुलामी की एक लम्बी अवधि का कारावास भुगत कर चुकाना पड़ा था। प्रोफेसर नीना सक्सेना के शब्दों में कहूँ तो, ‘तो राजपूतों में केवल संकुचित स्थानीय और पृथकतावादी भावनओं का प्रधान्य था।...राजनीतिक फूट, सांमतशाही, सैनिक संगठन, सामाजिक विश्रृंखलता तथा जनसाधरण की राजनीतिक उदासीनता ने इस देश को अतंतः आकृमणकारियों के लिए भारत सुन्दर क्रीड़ास्थल बना दिया। ’तुर्कों के आकृमण के बाद महमूद के हमलों ने देश में अशांति का वातावरण निर्मित कर दिया था। कल तक जो भारतीय राजा आपस में संघर्षरत थे। वह आश्चर्य चकित थे। उनके आपसी द्वंद उनके धर्म के आड़े नहीं आते थे। मगर महमूद के आकृमणों ने उनके अस्तित्व के साथ-साथ उनके धर्म के अस्तित्व को भी संकट में डाल दिया था। जिसके लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं थे। और उसी भय की कोख से जन्म लेता है उनके युद्ध में खेत रहने का आदर्श। जिसकी अभिव्यक्ति ‘आल्हाखण्ड’ में स्पष्ट मिलती है-
मानुस देही जा दुरलभ है आहे समै न वारंबार।
पात टूट कें ज्यों तरवर को कभउँ लौट न लागे डार।।
मरद बनाये मर जैबे को खटिया पर कैंै मरे बलाय।
खटिया पर कें जे मर जैहें नाउँ डूबि पुरखन कौ जाय।।
जे मर जैहें रन खेतन  मा साखों चले अँगारूँ जाय।

स्पष्ट है कि लोक में यह विश्वास था कि मानव शरीर पेड़ से टूटे पत्ते के तरह नश्वर है और दुबारा प्राप्त होंना कठिन है, अतएव युद्ध में लड़ते हुए प्राण देना यश का सीधा मार्ग है। आत्महत्या जघन्य पाप मानी जाती थी। इसी से जुड़ा नारी का आदर्श था-सतीत्व। अलबरूनी ने लिखा है कि ‘‘विधवाएँ या तो अपने पतिदेव की चिता पर अपने को झोंक देती हैं या तपस्विनी का जीवन व्यतीत करती हैं।’’ वत्सराज के रूपकषटकम् में सती का प्रमाण है। राजभक्ति और देश-प्रेम जैसे महत्वपूणर््ा मूल्य भी लोक में व्याप्त थे। अलबरूनी ने लिखा है कि ‘‘हिन्दुओं का विश्वास है कि यदि कोई देश है तो उनका, जाति है तो उनकी, यदि शासक हैं तो उनके।’’ इतिहासकार फरिस्ता ने इसी का समर्थन करते हुए नारियों की भावना को उजागर किया है-‘‘ हिन्दू वीरांगनाओं ने अपने जवाहारात बेच डाले और धर्म युद्ध के संचालन के लिए उन्होंने दूरस्थ देशों से भी अपनी सहायता भेजी।’’ इन सबसे कीमती मूल्य लोक मर्यादा का अनुसरण था, जिससे हर व्यक्ति लोक स्थिति की विशेष चिंता रखता था। सभी उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि तत्कालीन समाज में लोक की महत्ता था।




दलित आत्मकथाओं पर पी एच डी कर चुके जितेन्द्र एक संभावनाशील युवा कहानीकार हैं और दखल विचार मंच के सक्रिय साथी. नौकरी की तलाश कर रहे जितेन्द्र ने अभी संस्कृति विभाग की एक फेलोशिप के तहत आल्हा काव्यखंड की जनपदीय विवेचना की है. 

4 टिप्‍पणियां:

  1. संतोष कुमार पाण्डेय --- समाज के विकास के लिए निरंतर परिवर्तन आवश्यक है ! मध्य काल में हिन्दू समाज की जड़ता की वजह से विसंगतिया उत्पन्न हुई ! हालकि ये जड़ता किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान हैं और कई वर्ग उसे पोषित भी कर रहे हैं !जितेन्द्र जी ने अच्छा लिखा है , बस कहीं कहीं विषय की तारतम्यता टूट रही है ! आभार अशोक जी !

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  2. आप बुंदेल खंड का इतिहास पड़े काशी प्रसाद क

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  3. आप बुंदेल खंड का इतिहास पड़े काशी प्रसाद का नया शोध पड़े सब कुछ लिखा है मनगढ़ंत बातें ना लिखें एक तो वैसे ही हमारे इतिहास की हालत ख़राब हैै

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  4. Banafarrai jati yadavo m aati please galat itihaas n rakhe

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