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शनिवार, 31 जुलाई 2010

कुरान में औरत

धर्म के दायरे में नारी मुक्ति का सवाल

तैयब हुसैन

जुलैखा जबीं का लेख (समयांतर, अप्रैल 2010 अंक) ‘महिला आरक्षण और पुरुष सत्ता’ के पूर्वार्द्ध से तो मैं सहमत हूं किंतु उत्तरार्द्ध में कई बातें आधी-अधूरी, विवादास्पद और विरोधाभासी हैं। मजहब (धर्म) चाहे कोई भी हो, वह मर्दों की देन है और हंसिया जब भी खींचेगा, अपनी ओर ही खींचेगा। (‘मर्दों ने बनाई जो रस्में, उनको हक का फरमान करा’ -साहिर)। इसलिए कोई मजहबी औरत अगर अपने मजहब के दायरे में मुक्ति या पुरुषों से बराबरी की पड़ताल करती है तो सबसे पहले उसकी दृष्टि सिर्फ इंसान की होनी चाहिए न कि हिंदू-मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी नारी की। लेखिका ने तो ‘मैं कोई इस्लाम की जानकार नहीं हूं और न ही इस्लाम बघारने की जुर्रत की जा रही है’ कहकर यह लड़ाई ही कमजोर ढंग से लड़ने की कोशिश की है। यह कुछ वैसी ही बात है, जैसे मुस्लिम नारियों का ‘मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ इस्लाम के दायरे में कुछ अधिकार की मांग करता है और पुरुष वर्चस्व वाला मुस्लिम-समाज उसे नक्काड़खाने में तूती की आवाज समझकर उस पर ध्यान ही नहीं देता। यह एक कैदी का जेल के अंदर ही कुछ सुविधाओं की मांग जैसी भी लगती है जिससे मुस्लिम औरतों की बेड़ियां नहीं कटने वाली।

जुलैखा जबीं को समझना चाहिए कि भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति तो दोयम दर्जे की है ही, इनकी दुर्दशा तब और बढ़ जाती है जब ये दलित और मुस्लिम भी हों। बकौल मुक्तिबोध, ‘मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते हैं। उसे सामाजिक मुक्ति के व्यापक सवाल से जोड़कर देखना ही पड़ेगा।

औरत की गुलामी का इतिहास अगर मजहबों के परे देखें तो एंगेल्स के ‘परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में कहा गया है कि ‘‘पाषाण युग में खेती का अधिकारी पूरा कबीला होता था। हल और फावड़े अविकसित अवस्था में थे। पुरुष को खेती करनी पड़ती थी और औरत बागवानी संभालती थी। श्रम के इस आदिम विभाजन के काल में स्त्री और पुरुष पारस्परिक समानता के आधार पर समाज को संगठित करते थे। वस्तुतः अधिक शारीरिक शक्ति की अपेक्षा वाले काम पुरुष और कम शारीरिक शक्ति वाले काम स्त्रियां करती थीं।

धातुओं के संबंध में जानकारी बढ़ने के साथ विकास की संभावनाएं अधिक व्यापक हुईं। जंगलों को काट-काटकर मैदानों में बदलने के लिए ज्यादा कठिन श्रम की आवश्यकता पड़ने परआदमी ने दूसरों को अपनी ताकत से गुलाम बनाना शुरू कर दिया। व्यक्तिगत संपत्ति के लोभ से पुरुष स्वामित्व की भावना विकसित हुई। वह जमीन का मालिक था, वह गुलामों का मालिक था और अब बना स्त्री का मालिक। यहां से औरत की गुलामी की कहानी शुरू होती है।

जिस स्थिति ने घरेलू काम-काज संभालने के कारण औरत को परिवार में सर्वोच्च सत्ता के सिंहासन पर बैठाया था, वही अब औरत की गुलामी का आधार बन गई। व्यक्तिगत संपत्ति के साथ पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय हुआ। इस प्रकार के परिवार में औरत की एक अधीनस्थ स्थिति ही संभव थी।’’

इस्लाम में तो औरत आदम की पसली से बनाई गई है। शैतान के बहकाने पर जन्नत में उसने आदम को वर्जित फल चखने को मजबूर किया और शैतान की बेटी कहलाई। फिर अगर मां (औरत) के कदमों के नीचे जन्नत है तो अल्लाह के बाद औरत को अगर किसी के आगे झुकने की इजाजत होती तो यह दर्जा उसके शौहर का होता, कहकर ‘एक हाथ से (कम) दे तो दूसरे हाथ से (ज्यादा) ले’ जैसी कहावत ही चरितार्थ की गई है। क्या इस अधिकार में गैर बराबरी नहीं है कि मर्द तलाक देता है, औरत तलाक (खुला) मांगती है?

मुझे तो यहां विश्व प्रसिद्ध लेखक बाल्जाक की औरत पर की गई एक टिप्पणी याद आ रही है कि ‘औरतों से नौकरानी की तरह काम लेना चाहिए मगर समझाकर रखना चाहिए कि वह महारानी है।
इस्लाम से पूर्व के धर्मों में भी औरतों के प्रति लगभग ऐसा ही पक्षपातपूर्ण रवैया देखने में आता है।

सिनगाॅग में नारियां गैलरी में अलग बैठती हैं, पुरुषों के साथ नहीं। भारत की तत्काल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जब इजराइल-यात्रा के क्रम में येरूशलम गईं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि वहां की प्रधानमंत्री (जो उस समय संयोगवश कोई नारी ही थी) नारी होने के नाते उन्हें लेकर बालकनी में बैठीं जबकि वहां का संपूर्ण पुरुष समुदाय मुख्य हाॅल में रहा

स्त्रियों को संघ में शामिल करने में बुद्धदेव तक को आपत्ति थी। वर्द्धमान महावीर को तो स्त्री के शरीर से किसी के निर्वाण (परम मुक्ति) का रास्ता ही नहीं सूझा था

मुस्लिम औरतें भी मस्जिद में नहीं जा सकतीं। भले काबा जा सकती हैं। फिर औरतें खेती हैं, उसे जोतो! लिबास है, पहनो! कुरआन की ही उक्ति है।

मोहतरमा जबीं ढूंढ़ें तो ‘मनुस्मृति’ की तरह उनका पवित्र कुरआन भी कहता मिलेगा कि पुत्र हमेशा पुत्री की तुलना में प्राथमिकता पाता है क्योंकि ‘‘पुरुष स्त्रियों के निगरां और जिम्मेदार हैं, इसलिए कि अल्लाह ने एक दूसरे पर बड़ाई (तरजीह) दी है। …नेक स्त्रियां आज्ञा का पालन करने वाली होती हैं। सरकश स्त्रियों को समझाओ, बिस्तरों पर उन्हें तन्हा छोड़ो और न मानने पर पीटो। यह खुदा की ख्वाहिश है और अल्लाह सबसे उच्च और महान है।’’

और भी कि, ‘पुरुष स्त्रियों का पोषक है।’ ‘ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठ गुणों के कारण पुरुष स्त्रियों से श्रेष्ठ हैं।’ ‘पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है।’
(‘कुरआन मजीद’: अनु. – मुहम्मद फारख खां: प्रकाशक, अलहसनात, दिल्ली,: 1994: क्रम चार अन-निसा, आयत 34: पृष्ठ-80 और 84) तथा (‘हिंदुस्तान के निवासियों का जीवन और उनकी परिस्थितियां’: प्रकाशक-शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, 1969: पृ. 169)

असल में ये उक्तियां समय-समय पर परिस्थितिवश आई हैं, इसलिए स्वभावतः परस्पर विरोधाभासी भी हो गई हैं। कहना नहीं होगा कि जुलैखा जबीं को औरतों के पक्ष में कुरआन के उद्धरण एकांगी हैं, क्योंकि वे सिक्के का एक पहलू ही बयान करते हैं।

चलते-चलते एक दृष्टांत की याद दिलाना प्रासंगिक लगता है। याद होगा कि अक्सर अरबियन सेठ हैदराबाद के होटलों में ठहरकर गरीब मां-बाप की कमसिन लड़कियों से दैन मोहर के रूप में अच्छी रकम देकर एक साथ निकाहनामा और तलाकनामा दोनों के कागज साथ तैयार कराते हैं फिर जब तक चाहते हैं बीवी के रूप में ऐश-व-आराम करते हैं और फिर तलाक देकर चले जाते हैं। यात्रा के क्रम में यह विवाह जायज है। एक बार एक सेठ ने बारह साल की नाबालिग लड़की के साथ यही कारनामा अंजाम दिया था और बलात्कार जैसा मामला बन गया था लेकिन वह सजा नहीं पा सका क्योंकि इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद ने भी अपनी सबसे छोटी बीवी आयसा से तब किया था जब वह मात्र नौ साल की थीं। सेठ की इस ज्यादती पर मुसलमान चुप रहे मगर ‘बाजार’ फिल्म ने इस आक्रोश को कला के स्तर पर वाणी देने की कोशिश की है।

निष्कर्षतः धर्म की भूमिका अपने समय में सार्थक रही होगी लेकिन बदलते समय में स्थिर रहकर उसने वह उपयोगिता खो दी है। फिर मजहब इंसान के लिए बना है, इंसान मजहब के लिए नहीं।

इसलिए नारी-शोषण पर पुनः एंगेल्स का यह कथन महत्वपूर्ण लगता है कि ‘‘जिस समाज में उत्पादक तथा उपभोक्ता इकाई एक ही होगी, उसमें स्त्री-पुरुषों के बीच पराधीनता के संबंध विकसित होने की संभावना नहीं होगी। …स्त्रियों की पराधीनता निजी संपत्ति के विकास तथा आर्थिक वर्गों के उदय से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है और इन दोनों बातों के कारण ही स्त्रियों को सार्वजनिक उत्पादन कार्यों से हटकर घरेलू सेवा में प्रवृत्त होना पड़ा।’’
(‘द आॅरिजन आॅफ द फैमिली, प्राइवेट प्राॅपर्टी एंड द स्टेट’, पृ. 35)।

चीजें वैज्ञानिक और ऐतिहासिक संदर्भ में ही साफ दिखाई देंगी, किसी रंगीन चश्मे की आंख से नहीं।


(समयांतर से साभार)

8 टिप्‍पणियां:

  1. aapne jwalant vishay uthaya aur seedhe seedhe sawaal poochhe .bahut achchha laga . badhaayi ..

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  2. अच्छा आलेख! जितनी पढ़ी है कुऱआन। वह केवल मर्दों के लिए लिखी गई है। वहाँ औरत केवल वस्तु है, इंसान नहीं।

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  3. दिनेशराय द्विवेदी जी कुरआन के बारें में लिखी उपरोक्त बातें सत्य नहीं है, या फिर आधा सत्य हैं. लेखक या आप चाहे तो हम एक-एक बात पर विस्तृत चर्चा कर सकते हैं, ताकि सत्य सब के सामने आए. बिना पूरी तरह समझे किसी भी बात के बारे में यह समझना कि हमने समझ लिया है, ना समझी कहलाती है. आशा है मेरी बातो को अन्यथा नहीं लेंगे.

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  4. औरत चाहे इस्लाम में हो या हिन्दू में हो सबसे पहली बात ये है कि वो स्त्री है और उसे नियंत्रित करने के तरीके सभी धर्मों में बेशक अलग अलग हों पर नियंत्रित करने की मंशा लगभग इक सी है. ऐसा क्यों और किसलिए है बहस का मुद्दा ये है नाकि ये के किसने कम या किसने ज्यादा प्रतिबन्ध लगायें हैं. जहाँ तक कुरआन का प्रश्न है और जहाँ तक मैंने इस्लाम को पढ़ा और समझा
    है वहां मां के पैरों में जन्नत जरूर है किन्तु इक स्त्री के लिए सारे नियम कानून हिन्दू धर्म ग्रंथों से बहुत अलग नहीं हैं. फिलहाल ये कमेन्ट लिखते वक्त मेरे पास बहुत से रेफेरेंस नहीं हैं किन्तु मैं इस विषय में मैं आप सभी को जरूर अवगत करना चाहूंगी

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  5. Allah said in Quran "When the female (infant), buried alive, is questioned, for what crime she was killed (Quran 81:8-9)

    Allah said in Quran " When news is brought to one of them, of (the birth of) a female (child), his face darkens, and he is filled with inward grief! ith shame does he hide himself from his people, because of the bad news he has had! Shall he retain it on (sufferance and) contempt, or bury it in the dust? Ah! what an evil (choice) they decide on? (Quran16:57-58)


    We start with the first proof, and some might fight this amazing, but the Quran came up with a new ruling that BANNED THE KILLING OF FEMALE DAUGHTERS, the Quran essentially made a law granting female children the right to live! This might sound quite surprising to some, but during the pre-Islamic days of Arabia, the people used to practice a very backward barbaric tradition of burying their female daughters alive! Many of the people did not want to have a female daughter, but rather a male son who would continue the line of the family, and it was something like a shame and dishonor to have a female child. So the Quran got rid of this barbaric act when it mentioned above quotes from Quran.....


    Allah said in Quran :19 "O ye who believe! Ye are forbidden to inherit women against their will. Nor should ye treat them with harshness, that ye may Take away part of the dower ye have given them,-except where they have been guilty of open lewdness; on the contrary live with them on a footing of kindness and equity. If ye take a dislike to them it may be that ye dislike a thing, and Allah brings about through it a great deal of good. (4:19)

    So according to the above verse, Muslim men were forbidden from inheriting women against their will, and not only were they forbidden from inheriting against their will, they were also forbidden from treating them harshly, meaning badly! On the contrary they were commanded to treat the women with kindness and equity! Hence a clear set of established rules were made 1) women should not be forced into a marriage, 2) women have the right to be treated properly and kindly within the marriage, and it is forbidden to treat them badly.

    Also logically if a man cannot inherit a women against her will, he cannot keep her in marriage against her will, thus granting her the right of a divorce. With the ruling of divorce, Islam established new laws and rights for women, for instance in the pre-Islamic days of Arabia, women were not entitled to an alimony, there was no set fixed law or rule that established this. An alimony is basically the maintenance of a women after the divorce, that the former husband still looks after her in a reasonable manner etc. The Quran established alimony in several verses:

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  6. This article is a perfect example of how incomplete knowledge distort facts and contexts.Tayyab Husain has quoted discarded aHadith and has called it 'Quraan'. Pity!!!
    The writer does not qualify between the two and is giving verdict on Quraan. The whole piece reflects his confusion on Quraan and Hadith, no wonder he use and refer them interchangeably.

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  7. मैनें कुरान पढी है लेकिन काफ़ी दिन हो गये इसलिये यहां कुछ भी कुरान और इस्लाम के हवाले से न हीं कहूंगी.....मैं जब भी भारत के संदर्भ में इस्लाम में स्त्री को लेकर सोचती हूं तो मेरे सामने अनगिनत चेहरे उभरने लगते हैं जो बराबरी से अलग न्याय के लिये रोते हुए दिखते हैं .... कई बार लगता है कि इन औरतों के साथ होने वाली नाएंसाफ़ी पर कोई भी चुप कैसे रह सकता है ? कैसे कोई यह कह सकता है कि सरकार और न्यायालय इसमें दखल नहीअम दे सकती ? नुझे याद है ....अभीए हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक पर एक संस्था द्वारा कराये गये एक सेमिनार में मैने शिरकत की इसमें डयस पर लखनऊ विश्व्विद्यालय की एक पूर वी सी, एक नामचीन महिला लेखिका तथा मुस्लिम महिलाओं पर काम करने वाली एक वरिष्ठ समाज सेवी बैठी हुईं थीं ...........चर्चा के दौरान मैं कहा कि एक देश की महिलाओं के लिये एक सा कानून क्यों नहीं होता ? एक ही देश में दो बेटियों के साथ दो तरह का न्याय यह बात समझ में नहीं आ्ती .............उन सभी का जवाब था कि तीन तलाक के बहाने हम उनिफ़ोर्म सिविल कोड की इज़ाज़त नहीं दे सकते ...........जबकि वहां तीन तलाक , हलाला और अन्य मुद्दों पर खूब चरचा हो रही थी और लेखिका महोदया बडे जोर शोर से मुस्लिम महिलाओं के हक की लडाई लड रही थीं ...... मुझे लगता है इस्लाम के अन्दर महिलाओं की दो समस्या है वो देश की समस्या महिलाओं के नागरिकता की समस्या है इसलिये इसे किसी टापू पर खडे होकर नहीं लडा जा सकता ........... आप देखें शनि शिघना देव की लडाई में मुस्लिम मुल्ला हिन्दू चरम पंथियों के साथ खडे थे ......मतलब यह कि कम से कम हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम धर्म के ठेकेदार स्त्रियों क्र खिलाफ़ एक हैं

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…