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गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

बीस बरस का छह दिसंबर : यादों से एक चेहरा

सल्वाडोर डाली की प्रसिद्ध पेंटिंग 'द परसिस्टेंस आफ मेमोरी' गूगल से साभार 

रात थी सुबह हुई..अँधेरा फिर भी तारी है!

वह एक ठंढी खामोश रात थी जिसके बाद निकलने वाले सूरज को हमेशा के लिए स्मृति में एक अँधेरे की तरह दर्ज़ हो जाना था. गोरखपुर में बस स्टेशन के ठीक बगल स्थित लड़कों के छात्रावासों में से एक नाथ चंद्रावत छात्रावास. विश्वविद्यालय ही नहीं शहर और शहर के बाहर भी किस्से मशहूर थे इसके. कैसे इस हास्टल में पुलिस ने रात भर घेराबंदी कर बोरों में भर-भर कर हथियार बरामद किये थे, किस नंबर के कमरे में लाश मिली थी, किस कमरे में फलां सिंह या अलां मिसिर को गोली मारी गयी थी. एक किस्सा यह भी था कि इसका नाम एक बार बी बी सी पर भी आया था. जी हाँ, वह उदारीकरण के दौर का शुरूआती साल था जहाँ बी बी सी हमारा इकलौता उपलब्ध ग्लोबल चैनल था, जिसका कहा पत्थर की लक़ीर था. खैर, इन सब किस्से-कहानियों के बावज़ूद वह सर्द रात इम्तिहान के दिनों के ठीक पहले वाली रात थी और इन किवदंतियों के साथ यह बात भी मशहूर थी हमारे छात्रावास की कि यहाँ से कोई फेल नहीं होता...रतजगे-पढ़ाई-भूख-बहसें....इन सबके बिना कोई हास्टल नहीं बनता. इन सबसे रौशन वह रात थी. इम्तिहान के पहले के दिनों की रात जब हास्टल में अखबार, रेडियो, अड्डेबाजी...सब बंद हो जाती थी...पढाई-पढाई...बस पढ़ाई. लेकिन उस बरस ख़बरें इस क़दर चक्रवात सी घूम रही थीं फिज़ा में कि बीच-बीच में कुछ न कुछ कहीं से आ ही जाता था...अयोध्या में पांच लाख कारसेवक (यह हम जैसे पूरबिहों के लिए नया शब्द था) पहुँच चुके हैं, पूरी मस्जिद के नीचे बारूद बिछा दिया गया है, कल्याण सिंह ने पुलिसवालों से कहा है कि कोई एक गोली नहीं चलाएगा, साध्वी ऋतंभरा ने अपने योगबल से सारी फ़ौज को वश में कर लिया है, उमा भारती ज़मीन के नीचे किसी सुरंग से एक लाख लोगों के साथ पहुँच रही हैं. सेना से बात हो गयी है और बहुत जल्द आडवाणी देश के प्रधानमंत्री बना दिए जायेंगे. ..वगैरह-वगैरह! ये अफवाहें थीं. देवरिया जैसे शांत इलाके में रहे मुझ जैसों के लिए योजनाबद्ध अफ़वाहों और भूमिगत प्रचार-तंत्र के गोएबली संस्करणों से मुठभेड़ का पहला अवसर, बाद में गुजरात में गोधरा और उसके बाद के दौर के पहले और बाद में इससे मेरा दूसरा साक्षात्कार हुआ. इन सबके साथ बजते ऋतंभरा और उमा भारती के भाषणों के कैसेट, चमकदार कवर वाली किताबें – ‘हिन्दू समाज के गौरव का प्रतीक – रामजन्मभूमि’, ‘ताजमहल एक हिन्दू मंदिर था’...वगैरह-वगैरह (इस वगैरह-वगैरह को बर्दाश्त कीजिए दोस्तों, कोई दो दशक बीत गए और स्मृतियों में जो दर्ज है उसका बड़ा हिस्सा वगैरह-वगैरह की शक्ल में ही).

थोड़ा पीछे घूम आयें? केवल तीन-चार हफ्ते पहले? जहाँ दो दशक की बात है वहां कुछ हफ़्ते और सही. रोज़ निकलते जुलूसों सा ही यह एक और जुलूस था देवरिया की मालवीय रोड पर ... रामलला हम आयेंगे-मंदिर वहीँ बनायेंगे...जिस हिन्दू की भुजा न फडकी/ खून न खौला सीने का/ भारत माँ का लाल न होगा/ होगा किसी कमीने का...जुलूसों में लाल पताका माथे पर बाँधे, लम्बे तिलक लगाए, मुट्ठियाँ लहराते एक गहरे काले रंग के बड़ी-बड़ी आँखों वाले लड़के को पहचानिए...पहचाना? यह वही है कुछ महीनों पहले जो शहर के राजकीय इंटर कालेज की सुबह की प्रार्थना के बीचो-बीच मंच पर मुट्ठियाँ लहराते पहुँच गया था और हाई-स्कूल में चौहत्तर परसेंट नंबर लेकर पास हुए भौतिकी के नामचीन प्रोफ़ेसर के इस लड़के को मंच से चिल्ला-चिल्ला के मंडल कमीशन के खिलाफ भाषण देते, कालेज बंद कराते, फिर घूम-घूम कर सारा शहर बंद कराते, जिलाधिकारी के कार्यालय के सामने कोई चार हज़ार लोगों की भीड़ के आगे भाषण देते, सड़कों पर धरना देते, लाठियाँ खाते, गिरफ्तारी देते देख कालेज के शिक्षक ही नहीं बहुत सारे लोग हैरान रह गए थे...पर इकलौता वही नहीं, मंडल के खिलाफ भीड़ में हिस्सेदारी करता युवाओं का पूरा जत्था इस समय इसी रूप में लाल पताका माथे पर बाँधे, लम्बे तिलक लगाए, मुट्ठियाँ लहराते मौजूद था ...बस नारे बदल गए थे...चेहरे वही. हम सब मध्यकालीन योद्धाओं में तब्दील हो गए थे...अपने ध्वस्त होते जातीय गौरव के बरक्स आर-पार की लड़ाई में सन्नद्ध. [उसके बाद का किस्सा थोडा व्यक्तिगत है. विवेकानंद छात्रावास के (जहाँ प्राचीन इतिहास के प्रोफ़ेसर शैल नाथ त्रिपाठी, सच्चिदानंद मिश्र उर्फ़ सनम के राज में ब्राह्मण राज था...लेकिन एम ए तक पहुँचते-पहुँचते मुझे और निर्भय पाण्डेय को अच्छे परसेंटेज के बावजूद वहां कमरा नहीं मिला कि हम ‘दिशा वाले’ बन चुके थे...कम्यूनिस्ट!) किसी कमरे में ए बी वी पी की बैठक, वहाँ मुसलमानों के लिए किए गए तंज, मेरा विरोध, उनके नेता मस्तराज शाही से तीखी बहस, फिर समाजवादी नाना से लम्बी बात, पिता द्वारा, जो अपनी तमाम ‘ब्राह्मणोचित’ प्रवृतियों के बावजूद कट्टर नहीं हो पाते थे, इस आन्दोलन से जुड़े लूम्पेन तत्वों के इतिहास का विस्तृत वर्णन और सबसे अधिक डा डी पी सिंह से, जो उस दौर में मेरे संपर्क में आये इकलौते लिबरल व्यक्ति थे, बेहद जहीन अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर, कीट्स के प्रेमी, नेहरूवादी सेकुलर (एक और चीज़ जोड़ दूं कि वह मेरे नाना के शिक्षक रह चुके थे) लम्बी बातचीत...सबका असर यह हुआ कि मैंने इन सब से खुद को अलग किया और परीक्षा देने का निर्णय लेकर सतुआ-पिसान ले हास्टल पहुँच गया.]  

तो फिर लौटते हैं उसी रात की ओर. कोई नौ बजे होंगे. हम खाना इसीलिए कम खाते थे कि कहीं नींद न आ जाए. हास्टल में मेस जैसी कोई चीज़ थी नहीं और सहारा था बस स्टेशन का कैंटीन, जहाँ कोई चालीस बरस का, ग़रीब तोंद और खिचड़ी मूंछों वाला ‘सुंदरी’ एक रुपये की चाय और उतने की ही सुहाली के साथ अपने आठवें-नवें सुर में गाने सुनाता और सीनियर्स के नींद भगाने के नुस्खे के रूप में खोजे  गए महान प्रयोग के अनुकरण में हम सिगरेट की राख चाय में डालकर पीते. ज़्यादा भूख लगने पर रेलवे स्टेशन का पूड़ी सब्जी का स्टाल था जहाँ मसले हुए उबले आलूओं के साथ आठ गरम पूरियाँ पांच रुपये में मिलतीं (बाद में दिशा से जुड़ने के बाद, जिसका आफिस स्टेशन के ठीक सामने था, यह भोजन वर्षों हमारा नियमित डिनर बना) या हास्टल गेट के ठीक सामने का भरपेट भोजनालय जहाँ आठ रूपये में पर्याप्त खाना मिलता, लेकिन वह दस बजे तक बंद हो जाता. उस रात भी हम बाहर निकले. अगर स्मृति ठीक साथ दे रही है तो साथ में थे आलोक सिंह (जो इन दिनों अन्ना आन्दोलन में सक्रिय हैं), निर्भय पाण्डेय और शायद एक-दो और मित्र. बस स्टैंड तक पहुंचे तो भयावह सन्नाटा था. हमेशा गुलज़ार रहने वाला जनता मार्केट ही नहीं बस स्टैंड भी बंद. हम रेलवे स्टेशन की ओर चले. कोई पचास कदम चले होंगे कि सामने से एक जीप ने रोका. अन्दर से निकले दरोगा साहब. कड़क आवाज़ में पूछा – कहाँ जा रहे हो? हमने जवाब दिया – हास्टल के हैं. फिर सवाल- लेकिन आज के दिन बाहर क्यों निकले. हमने कहा – भूख लगी थी. वैसे आज सब बंद क्यों है? उनका जवाब – तुम्हें नहीं पता क्या हुआ? अयोध्या में मस्जिद गिरा दी सालों ने. देश भर में बवाल मचा है. हमने कहा – लेकिन सुबह से कुछ नहीं खाया. बहुत भूख लगी है. उनका चेहरे के भाव बदले – इस समय खाना कहाँ मिलेगा? हमने कहा – स्टेशन पर पूरी-सब्जी मिल जायेगी. वह थोड़ी देर सोचते रहे फिर हमें जीप में बिठाया. मन ने कहा ल्लो बेट्टा गए जेल में. पर जीप स्टेशन पहुँची. निर्देश मिला दस मिनट में खा के लौटो. लौटे. उन्होंने हास्टल छोड़ा और कहा जल्दी से जल्दी घर निकल जाओ...आग लगेगी. साले सब जला के मानेंगे. हमने उनका बिल्ला पढ़ा – वह मुसलमान नहीं थे!

लौटकर बी बी सी लगाया गया. मस्जिद तबाह हो चुकी थी और देश जल रहा था. दंगों का पहला अनुभव था यह हमारे लिए. चौरासी में कुल नौ साल के थे और सिखों की लुटती दुकानें बस धुंधली स्मृति की तरह दर्ज थीं. दुकान वाले समृद्ध परिवार के गुरमीत को स्कूल छोड़कर दादाजी के साथ ठेले पर स्टोव सुधारते देखा तो था पर उस तरह महसूस नहीं कर पाते थे. पर इस बार महसूस किया. गनीमत यह थी कि उस दौर में भी गोरखपुर-देवरिया या पूर्वांचल के किसी ज़िले में दंगे नहीं हुए. वह आदित्यनाथ नहीं उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ का दौर था जो हिन्दू महासभा में होने के बावजूद बड़े काज़ी साहब के मित्र थे, उनके यहाँ टेनिस खेलते थे. इस इलाक़े में दंगों को अभी एक दशक और इंतज़ार करना था...आदित्यनाथ के परिदृश्य में आने तक का.

घर लौटकर मुसलमान दोस्तों को फोन किया पर घर जाने की हिम्मत बहुत देर से जुटा पाए. कर्फ्यू देखा पहली बार और गायत्री मंदिर पर बैठकर शान्ति धुनें सुनता रहा. शायद किसी भी मंदिर में वह मेरा अंतिम प्रवेश था. रातोरात देश की राजनीति को बदलते देखा. बहुत से लोगों के लिए जो साम्प्रदायिक होते जाने का प्रस्थान बिंदु था वह मेरे लिए इस साम्प्रदायिकता और जातिवाद के गठजोड़ को समझने और इसके लगातार खिलाफ़ होते जाने का था. साल बीतते न बीतते मार्क्सवादी हो चुका था. यह समाजवादी नाना, ‘अ-राजनीतिक’ पिता ही नहीं नेहरूवादी डी पी सर के लिए भी बड़ा झटका था..तब मैंने जाना कि लोहियावादी समाजवादी हो कि नेहरूवादी कांग्रेसी...कम्यूनिस्ट सबके लिए शत्रु पक्ष ही हैं. दंगे पहली बार मेरे लिए चिंता ही नहीं उत्कंठा का भी विषय बने. पढने का शौक पहले से ही था अब और बढ़ गया और दिशा से जुड़ाव के बाद यह एक नशे में तब्दील हो गया.

अजीब संयोग था कि बानबे में उत्तर-प्रदेश में था तो दो हज़ार दो में गुजरात में. इस बार बानबे की यादें साथ थीं ... सैंतालिस की एक समझ भी..तो उसे देखने का नजरिया बिलकुल अलग था...प्रतिक्रिया भी .. लेकिन वह किस्सा फिर कभी.          

19 टिप्‍पणियां:

  1. फेसबुक से ...

    Manish Tiwari : ufff! Inasaniyat...


    Syed Shahroz Quamar : Bhai Main Bhool Jana Chahta hun.


    Ashok Kumar Pandey : कौन कमबख्त याद रखना चाहता है शहरोज़ भाई...काश कि भूलना वश में होता...काश कि लोग भूलने देते...


    Samar Anarya : पर मूल मंत्र तो न भूलो न माफ़ करो का ही होना चाहिए.. एडवर्ड सईद के अंदाज में कहूं तो प्रतिरोध का मतलब ही है भुला देने को आमादा ताकतों के सामने स्मृतियों को जिन्दा रखना...


    Kumar Rahman : अशोक भाई.. महंत अवैद्य़नाथ और काजी साहब की जिस दोस्ती का आपने जिक्र किया... वही हमारी साझा शहादत और साझा विरासत पहचान है। लेकिन 6 दिसंबर को इस संसकृति का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ..

    Sukhvinder Singh : khoufnaak yaden Ashok Kumar Pandey ji aaj bhi dil dehal uthta hai


    Raavi Thenameoflife :
    अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा,
    दिल में तारिकी, दिमागों में अंधेरा ही रहा।
    मजाज़ लखनवी


    Akhilesh Pratap Singh: अवैद्यनाथ की छत्रछाया में ही आदित्यनाथ को तराशा गया था... आप जिस मित्रता की बात कर रहे हैं, वैसी तमाम अन्य मित्रताओं का हवाला देकर अटल बिहारी वाजपेयी को भी उदार बताया जाता रहा है

    Ashok Kumar Pandey : मैं उसे महिमामंडित नहीं कर रहा अखिलेश भाई...बस एक तथ्य. इन्हीं अवैद्यनाथ को हमने हिस्ट्री कांफ्रेस में घुसने नहीं दिया था..

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  2. फेसबुक से ही

    अकबर रिजवी

    बाबरी मस्जिद ढहा दी गई... दंगे हुए... बहुत से लोग मारे गए... उससे कुछ दिनों पहले मैंने हिन्दू हृदय सम्राट तोगड़िया का भाषण... दरभंगा के कुशेश्वर स्थान में दुर्गा मंदिर प्रांगण में सुना था.. स्कूल में सर से पूछा भी था.. उत्तर संतुष्टि वाला नहीं था... मैं जानना चाहता था कि तोगड़िया आखिर मुसलमानों का कहां भेजना चाहते हैं... खैर, 89 और 92 के दंगों से हमारी उतनी ही वाकफियत रही है, जितनी तब 6ठी और 8वीं कक्षा का छात्र अख़बारों से पढ़-समझ सकता है... वैसे उससे पहले हमलोग भी नारा लगाते थे- कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे।

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  3. यह स्मृति इसलिए और भी दुखदायी है , कि इसने साप्रदायिकता के उस खेल को न सिर्फ पुनर्जीवित कर दिया , वरन उसे और भी आसान बना दिया | हमारा आज भी उसके घाव से लगातार कराहता रहता है | शर्मनाक और निंदनीय था वह |

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  4. कोई पचास कदम चले होंगे कि सामने से एक जीप ने रोका. अन्दर से निकले दरोगा साहब. कड़क आवाज़ में पूछा – कहाँ जा रहे हो? हमने जवाब दिया – हास्टल के हैं. फिर सवाल- लेकिन आज के दिन बाहर क्यों निकले. हमने कहा – भूख लगी थी. वैसे आज सब बंद क्यों है? उनका जवाब – तुम्हें नहीं पता क्या हुआ? अयोध्या में मस्जिद गिरा दी सालों ने. देश भर में बवाल मचा है. हमने कहा – लेकिन सुबह से कुछ नहीं खाया. बहुत भूख लगी है. उनका चेहरे के भाव बदले – इस समय खाना कहाँ मिलेगा?हमने कहा – स्टेशन पर पूरी-सब्जी मिल जायेगी. वह थोड़ी देर सोचते रहे फिर हमें जीप में बिठाया. मन ने कहा ल्लो बेट्टा गए जेल में. पर जीप स्टेशन पहुँची. निर्देश मिला दस मिनट में खा के लौटो. लौटे. उन्होंने हास्टल छोड़ा और कहा जल्दी से जल्दी घर निकल जाओ...आग लगेगी. साले सब जला के मानेंगे. हमने उनका बिल्ला पढ़ा – वह मुसलमान नहीं थे!
    'हमने उनका बिल्ला पढ़ा – वह मुसलमान नहीं थे!'
    इससे बेहतर में कुछ नहीं कहूँगा इस पोस्ट के लिए।।।

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  5. उन दिनों मैं ११ साल का था, और जैसे आपने सिख विरोधी दंगा देखा था वैसे ही मैंने इस दौर को देखा. समझने लायक तो समझ नहीं ही थी. मगर कुछ मुस्लिम दोस्तों को महीनों कक्षा से गायब देख हैरत हुई थी. एक अजब किस्म का तनाव था उस शहर में जो अब झारखण्ड में है. संयोग से कुछ भी गलत नहीं हुआ वहां. शहर का नाम चक्रधरपुर है.

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  7. मै भी ये घटनाएं भुगत चुका हूँ. सिखों के खिलाफ दिल्ली में हुए दंगों से हम जयपुर को बचा ले गए थे या वह स्वयं बच गया था यह कहना मुश्किल है लेकिन उन दिनों का तनाव नहीं भूलता. हम उन दिनों गुरुनानकपुरा में रहते थे और हम लोगों ने तय किया था कि किसी बाहर वाले को यहाँ कुछ नहीं करने देंगे. उन दिनों रात में सब मिल कर गश्त लगाते थे, अफवाहों का विरोध करते थे. वह समय गुजार गया लेकिन मस्जिद ध्वंस ने यहाँ भी वह दंगे करवा दिए जो जयपुर में बंटवारे के दिनों में भी नहीं हुए थे. यह पहला दंगा था जो इस शहर ने देखा.गुजरात के दंगों ने और जहां भी जातीय / धार्मिक दंगे हुए हर बार एक नयी पीड़ा झेली और अभी पता नहीं कि साम्प्रादियक ताकतों के चलते कितनी पीड़ा, कितननी व्यथा और झेलनी पड़ेगी.मज़े की बात यह है कि कम्युनिस्ट न होते हुए भी साम्प्रादियकता और जाति-धर्म के विरोध के कारण यह लेबिल मुझे मुफ्त में मिल गया. ज़रूरी है कि इन सब का सशक्त विरोध जारी रखा जाए. हम कितने सफल होंगे यह तो पता नहीं लेकिन कोशिश तो जारी रखनी ही होगी.बहुत कुछ है लिखने को लेकिन फिलहाल इतना ही नहीं तो एक और आलेख बन जाएगा.

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  8. डॉ अंबेडकर की पुण्य तिथि पर 20 वर्ष पूर्व बाबरी विध्वंस उस समय किया गया था जब मनमोहन सिंह जी का उदरवाद एक वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया जा चुका था तब से अब तक सांप्रदायिकता पर रोक की आड़ मे साम्राज्यवादी शक्तियों को काफी मजबूत बना दिया गया है।

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    कामरेड अंजान ने यह भी स्पष्ट किया कि,'हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियाँ' तथा 'मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियाँ' परस्पर मिली हुई रहती हैं और केवल जनता को विभाजित करके अपने आर्थिक हितों को साधती रहती हैं। उदाहरण के रूप मे सांप्रदायिकता का नया मसीहा बनी ' पीस पार्टी' को गोरखनाथ धाम के योगी आदित्यनाथ द्वारा धन बल से सज्जित करने की बात उन्होने कही। उनका यह भी सुदृढ़ मत था कि,धार्मिक आधार पर आरक्षण हो ही नहीं सकता कोई भी ऐसा कानून असंवैधानिक घोषित हो जाएगा। ऐसी बातें करना भी सांप्रदायिकता भड़काना है।

    http://krantiswar.blogspot.in/2012/12/samprdayikta.html

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  9. आपने लौटकर बी बी सी लगाया, मस्जिद तबाह हो चुकी थी...मैंने टी वी लगाया था जिसके ठीक सामने बैठे मेरी भतीजी, दामाद और उनके अजीज दोस्त रफीक भाई बैठे खाना खा रहे थे। टी वी पर मस्जिद टूट रही थी...रफीक भाई भतीजी और दामाद को लेकर नैनीताल से दिल्ली आए थे और उसी समय खाना खाकर उन्हें लौटना था। पत्नी ने तीनों के माथे पर पिठियां (तिलक) लगाया। रफीक भाई ने भी घर के सदस्य की ही तरह खुशी से पिठियां लगवाया और फिर वे तीनों नैनीताल को लौट गए। अपने दोस्त के परिवार को सुरक्षित नैनीताल तक ले जाने की जिम्मेदारी रफीक भाई ने संभाली हुई थी।...मुझे दामाद ने बताया था कि रफीक भाई अपने एक हिंदू साथी टैक्सी ड्राइवर के दुर्घटना में निधन के बाद उसके परिवार की मदद कर रहे थे और बच्चों को पढ़ा रहे थे...दोनों परिवारों की जिम्मेदारी संभालने के लिए ही वे टैक्सी चला रहे थे।..बहुत खुशी होती है यह जानकर कि रफीक भाई ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की और आज उनके दोनों बच्चों के साथ ही उनके साथी के बच्चे भी अच्छी नौकरी में हैं, अपने पैरों पर खड़े हैं। रफीक भाई एक शांत एकांत जगह में घर बना कर रह रहे हैं।..आज फिर शिद्दत से उनकी याद आई। उनके जज़्बे को मेरा सलाम।

    देवेंद्र मेवाड़ी

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  10. आपने लौटकर बी बी सी लगाया, मस्जिद तबाह हो चुकी थी...मैंने टी वी लगाया था जिसके ठीक सामने बैठे मेरी भतीजी, दामाद और उनके अजीज दोस्त रफीक भाई बैठे खाना खा रहे थे। टी वी पर मस्जिद टूट रही थी...रफीक भाई भतीजी और दामाद को लेकर नैनीताल से दिल्ली आए थे और उसी समय खाना खाकर उन्हें लौटना था। पत्नी ने तीनों के माथे पर पिठियां (तिलक) लगाया। रफीक भाई ने भी घर के सदस्य की ही तरह खुशी से पिठियां लगवाया और फिर वे तीनों नैनीताल को लौट गए। अपने दोस्त के परिवार को सुरक्षित नैनीताल तक ले जाने की जिम्मेदारी रफीक भाई ने संभाली हुई थी।...मुझे दामाद ने बताया था कि रफीक भाई अपने एक हिंदू साथी टैक्सी ड्राइवर के दुर्घटना में निधन के बाद उसके परिवार की मदद कर रहे थे और बच्चों को पढ़ा रहे थे...दोनों परिवारों की जिम्मेदारी संभालने के लिए ही वे टैक्सी चला रहे थे।..बहुत खुशी होती है यह जानकर कि रफीक भाई ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की और आज उनके दोनों बच्चों के साथ ही उनके साथी के बच्चे भी अच्छी नौकरी में हैं, अपने पैरों पर खड़े हैं। रफीक भाई एक शांत एकांत जगह में घर बना कर रह रहे हैं।..आज फिर शिद्दत से उनकी याद आई। उनके जज़्बे को मेरा सलाम।
    देवेंद्र मेवाड़ी

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  11. उस काले दिन को फिर से जिन्दा कर दिया है आपने ...उस दिन सूरज का चेहरा काला पड़ गया था और रात सुबह ही हो गई थी ...आसमान आवाजों से भर गया था और हमारे पास सुनने के सिवा कोई चारा नहीं था !

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  12. कोई नौ साल की उम्र रही होगी उस वक़्त, पिताजी इलाहबाद गए हुए थे और घर में चाचाजी को बेटा हुआ था। कलकत्ता में हमारे इलाके में कुछ खास नहीं हुआ था, लेकिन कर्फ्यू पहली बार देखा था, या सच कहिये तो टी वी से निकलकर मेरे लिए फौजी सड़कों पर आ गए थे। मुझे अयोध्या की समझ उस समय न थी, लेकिन असगर चाचा हमारे घर से कई दिनों तक बाहर नहीं निकले थे, और बरसों बाद इंग्लिश की ट्यूशन में एक मुल्ला जी ने काफ़िर कहा था मुझे, बड़ी लम्बी बहस चली थी मेरी और उनकी, जबकि काफ़िर का मतलब मुझे उस वक़्त तक पता भी नहीं था। गाहे बगाहे वो जब भी मिल जाते मुझे तिरछे ही देखते थे। लेकिन जो सबसे बड़ी बात थी उस दौर की वो यह रही कि मुल्क बंट गया था, बंट गए थे लोग, अधर्मी और काफ़िर की मन में एक जमात खड़ी हो गयी थी, जो जब तब अपने आपको ढूंढने लग जाता था।
    फिर गोधरा भी देखा, तब तक सेक्युलरिज्म आ गया था, लेकिन मोदी होने वाले प्रधानमंत्री की राह पर हैं, कुल मिलाकर तबसे लेकर आज तक यही दिखा कि धर्म वर्म कुछ भी नहीं सब बातें हैं स्ट्रीमलाइन में आने की, अगर आपके आस पास कोई भी ऐसा कर रहा है तो पक्का मान के चलिए कि अपनी राजनीति की ज़मीन तैयार कर रहा है और कुछ नहीं।

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  13. एक गुलामी का प्रतीक ढहाने पर इतना बावेला .प्रतीकों को ध्वस्त करने की दीक्षा इस्लाम ने ही दी है चीज़ें बूम्रांग करतीं हैं भाई साहब .बहर सूरत आप लिखते अच्छा हैं .आदाब .

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  14. बहुत अच्छा आलेख पुरानी यादें पुराने जख्म दर्द ही देते हैं साझा करने के लिए आभार

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  15. कामरेड अंजान ने यह भी स्पष्ट किया कि,'हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियाँ' तथा 'मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियाँ' परस्पर मिली हुई रहती हैं और केवल जनता को विभाजित करके अपने आर्थिक हितों को साधती रहती हैं। उदाहरण के रूप मे सांप्रदायिकता का नया मसीहा बनी ' पीस पार्टी' को गोरखनाथ धाम के योगी आदित्यनाथ द्वारा धन बल से सज्जित करने की बात उन्होने कही। उनका यह भी सुदृढ़ मत था कि,धार्मिक आधार पर आरक्षण हो ही नहीं सकता कोई भी ऐसा कानून असंवैधानिक घोषित हो जाएगा। ऐसी बातें करना भी सांप्रदायिकता भड़काना है।बहुत अच्छा आलेख पुरानी यादें पुराने जख्म दर्द ही देते हैं साझा करने के लिए आभार

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  16. बहुत अच्छा आलेख पुरानी यादें पुराने जख्म दर्द ही देते हैं साझा करने के लिए आभार

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  17. आपका यह पोस्ट अच्छा लगा। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…