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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांत - भूमिका के पहले

मित्रों इस पोस्ट के साथ ही जनपक्ष एक नई शुरुआत कर रहा है. हम यहाँ नियमित रूप से मार्क्सवाद का  सैद्धांतिक परिचय देने का प्रयत्न करेंगे. हमारा ज़ोर मार्क्स की शिक्षाओं को आसान तरीके से लोगों तक पहुंचाना है. अक्सर ऐसा होता है कि युवा और कई बार वरिष्ठ लोग भी मार्क्स की मूल शिक्षाओं के बारे में जानना चाहते हैं. इन दिनों इस विषय पर हिन्दी में  पुस्तकों के भारी अभाव के कारण उनके साथ लंबा संवाद संभव नहीं हो पाता. अध्ययन के अभाव में मार्क्सवाद की जो समझदारी विकसित होती है उसका आधार अक्सर पार्टियों की पत्रिकाएं और दूसरी जगहों पर समकालीन घटनाओं पर लिखी प्रतिक्रियाएं होती हैं. पार्टियों के भीतर भी सैद्धांतिक ट्रेनिंग का भयावह अभाव पैदा हुआ है.  इसी चिंता के मद्देनजर मैंने कोई दो साल पहले "मार्क्स-जीवन और विचार" लिखी थी, लेकिन अब वह भी आसानी से उपलब्ध नहीं है. इस प्रक्रिया में मैं उस किताब से भी काफी मदद लूँगा.

इस कवायद से पहले मैं युवा साथियों से सबसे पहले यह बात करना चाहूँगा कि वे यहाँ या कहीं और मार्क्सवाद को पढ़ें कैसे? मेरा यह मानना है कि मार्क्सवाद चूंकि एक विज्ञान है तो इसे पढ़ते समय अतिशय श्रद्धा या अंध भक्ति से वशीभूत होने की जगह लगातार एक तार्किक विवेचन की प्रक्रिया अपनाना सही होगा. आप इन सिद्धांतों को किसी अंतिम सत्य की तरह मानने की जगह लगातार समकालीन जीवन, समाज और राजनीति पर लागू करते हुए समझने की कोशिश कीजिए. साथ में जैसे-जैसे समझदारी विकसित होती जाय मूल किताबों की तलाश करने का प्रयास कर इसे विस्तार से समझने का प्रयास करें. साथ ही यह भी कि मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-स्टालिन-माओ तथा अन्य विद्वानों के जो उद्धरण दिए जायेंगे उन्हें उस देश-काल के परिप्रेक्ष्य में समझना बेहद ज़रूरी है जिसमें वे अपने निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे थे. वे कोई दैवी पुरुष नहीं बल्कि हमारी-आपकी तरह आम इंसान थे जिन्होंने अपने समय और राजनीति को समझने तथा उसका एक बेहतर विकल्प ढूँढने का सार्थक प्रयास किया. ज़ाहिर है, आज लगभग एक सदी बाद उनके बहुत सारे निष्कर्ष अधूरे लग सकते हैं.  दरअसल, एक सच्चे मार्क्सवादी का प्रयास यह होना चाहिए कि उन्होंने जो मौलिक सिद्धांत दिए हैं उनके आधार पर अपने समय-समाज-राजनीति को विवेचित करने के लिए नई पहल करे. 

इसके अलावा, मेरी कोशिश होगी कि इनके साथ जिन पुस्तकों से  उद्धरण दिए जाए वे या तो नेट पर उपलब्ध हों या फिर आसानी से बाज़ार में  मिल जाएँ. मेरी सलाह होगी कि उन्हें ज़रूर पढ़ा जाय. साथ ही ज़रूरत पड़ने पर कुछ उद्धरण ऎसी किताबों से भी देने पड़ सकते हैं जो अब लगभग अनुपलब्ध हैं. ऐसे में प्रकाशक मित्रों से उनके पुनर्प्रकाशन के अनुरोध के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता. भाषा के स्तर पर भी मैं सम्प्रेषण का पूरा ख्याल रखने की कोशिश करूँगा.

मैं चाहूँगा कि यह प्रक्रिया इकहरी न हो. यानि पढ़ने के बाद जो असहमतियाँ बनें या फिर जो नए सवाल उठें उन्हें यहाँ ज़रूर दर्ज किया जाय. बेहतर तो यही होगा कि उन सवालों को ही अगली पोस्ट का  प्रस्थान बिंदु बनाया जाय. एक महात्वाकांक्षी योजना यह हो सकती है कि जिन मित्रों की अभिरुचि जगे वे कभी कहीं एक साथ मिल बैठें. लेकिन यह आगे की बात है. 

अभी इतना ही. अगली पोस्ट जल्द ही.

37 टिप्‍पणियां:

  1. जी ..बिलकुल...हम सब इस बहस में आने के लिए तैयार हैं ...

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  2. इस जरूरी काम की शुरूआत का स्वागत !!

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  3. ये आपका बहुत महत्वपूर्ण काम होगा. बधाई एवं शुभकामनाएं

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  4. अशोक भाई ये आप का एक अच्छा प्रयास है हम जैसे लोग जो पूंजीवाद के समर्थक है वे भी इस विचारधारा से सही तरह से अवगत होंगे....आप ने प्रस्तावना में जिस तरह खुले दिलो-दिमाग से आप कि मंशा व्यक्त कि वो काबिले तारीफ़ है....हम भी आप के तर्कों एवं विचारो को खुले दिलो दिमाग से ग्रहण करेंगे...बिना किसी अहम...बिना किसी पूर्वाग्रह के..बधाई एवं शुभ कामनाएं...विवेक

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  5. बहुत अच्छी पहल. स्वागत, बधाइयाँ, शुभकामनाएं

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  6. अशोक, यह ठीक शुरुआत है।
    संयोग से मैं एक आयोजन में मुंबई जा रहा हूं और 1 मार्च को वापसी होगी। तब लौटकर यदि जरूरी लगा तो एक नोट विशेष तौर पर जनपक्ष के लिए लिखने का प्रयास रहेगा। तुम भी इत्‍मीनान से सुविचारित ढंग से लिखो, जल्‍दबाजी की आवश्‍यकता नहीं है।

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  7. yr prayas bahut accha hai. isse hame markswadi ko jaamme ka aur bhi awsar prapt hoga.

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  8. भूमिका के पहले की "भूमिका" अच्छी बाँधी है. शुरू करो, यह ज़रूरी काम है, बेहद. मेरी हर तरह की मदद उपलब्ध होगी. एमिल बर्न्स की एक कितबिया है, छोटी सी. वह बड़े ग्रंथों से ज़्यादा उपयोगी होगी, बुनियादी बातों के लिहाज़ से.
    प्रश्नोत्तरी की एक खिड़की अलग से खोल सकते हो, नई पोस्ट के साथ. नई पोस्ट को प्रश्नों से शुरू करना व्यावहारिक दृष्टि से न तो संभव होगा, और न उपयुक्त ही. फ़िलहाल इतना ही, शुभकामनाएं तो हैं ही.

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  9. भूमिका के पहले की "भूमिका" अच्छी बाँधी है. शुरू करो, यह ज़रूरी काम है, बेहद. मेरी हर तरह की मदद उपलब्ध होगी. एमिल बर्न्स की एक कितबिया है, छोटी सी. वह बड़े ग्रंथों से ज़्यादा उपयोगी होगी, बुनियादी बातों के लिहाज़ से.
    प्रश्नोत्तरी की एक खिड़की अलग से खोल सकते हो, नई पोस्ट के साथ. नई पोस्ट को प्रश्नों से शुरू करना व्यावहारिक दृष्टि से न तो संभव होगा, और न उपयुक्त ही. फ़िलहाल इतना ही, शुभकामनाएं तो हैं ही.

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  10. निसन्देह,यह एक अच्छा अनुभव और अवसर होगा मेरे लिए ,मैंने फैसल साहब से एक बार मार्क्सवाद पर पूरी जानकारी हिन्दी में चाही थी, अब यह पोस्ट मेरी उत्सुकता और जिज्ञासा को शांत करेगी ऐसा मुझे विश्वास है ...बधाई एवं शुभकामनाएं !!!

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  11. इस महत्वपूर्ण कार्य का स्वागत है।

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  12. अच्छी बात है...मजा आयेगा !

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  13. छोटी छोटी बातों पर सहज विमर्श करती हुई एक पुस्तिका काफी पहले कथाकार रमेश उपाध्‍याय ने 'कम्‍युनिस्‍ट नैतिकता' शीर्षक से लिखी थी जिसे नन्‍द भारद्वाज जी ने प्रकाशित किया था। इस प्रसंग में उस पुस्तिका का संदर्भ भी लिया जा सकता है।

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  14. छोटी छोटी बातों पर सहज विमर्श करती हुई एक पुस्तिका काफी पहले कथाकार रमेश उपाध्‍याय ने 'कम्‍युनिस्‍ट नैतिकता' शीर्षक से लिखी थी जिसे नन्‍द भारद्वाज जी ने प्रकाशित किया था। इस प्रसंग में उस पुस्तिका का संदर्भ भी लिया जा सकता है।

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  15. मार्क्सवाद की कुछ चीजें अच्छी हैं ..और उनसे असहमत हो पाना कठिन है ..मार्क्सवाद और इस्लाम इस मामले में बिलकुल समान हैं कि इन् दोनों ने ही दुनिया को २ बिलकुल तीक्ष्ण -विभाजित हिस्सों 'बिलीवर्स' और 'नॉन-बिलीवर्स'(काफ़िर) में बाँट दिया है ..दोनों में असहमतियों के लिए कोई स्पेस नहीं ...और दोनों को सबसे ज्यादा खतरा अपने कट्टर अनुयायियों (कठमुल्लों) से ही है ...

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  16. मार्क्सवाद में कुछ चीजें अच्छी हैं और उनसे असहमत हो पाना कठिन है ....मेरे विचार से मार्क्सवाद और इस्लाम दोनों इस मामले में बिलकुल सामान हैं कि दोनों ने दुनिया को दो बिलकुल तीक्ष्ण-विभाजित हिस्सों 'बिलीवर्स' और 'नॉन-बिलीवर्स'(काफ़िर) में बाँट कर रख दिया है ...दोनों में असहमतियों की तकरीबन कोई गुंजाईश नहीं ..और दोनों को सबसे बड़ा खतरा अपने धर्मांध कट्टर अनुयाइयों (कठमुल्लों )से ही दरपेश है

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  17. आपकी चिंता बिलकुल जायज है.

    हालांकि मैंने जो मार्क्सवाद पढ़ा-जाना है वह असहमतियों से गति पाता है. वह बहस में यकीन रखता है और तर्क में. लेकिन यह ज़रूर हुआ है कि उसके कुछ अनुयाइयों ने उसकी इस मूल प्रवृति को कुठाराघात पहुंचाया है. आज मेरे लिए मार्क्सवाद का अर्थ है "शान्ति, समृद्धि और समाजवाद" की गारंटी देने वाली विचारधारा जिसमें पूंजीवादी लोकतंत्र के सबसे बड़े बाधक असमानता के लिए जगह न हो.

    हाँ इस्लाम वाली तोहमत हर धर्म पर लगाई जा सकती है. क्रिश्च्यनिज्म तो "व्हाईट मेंस बर्डेन" के बोझ से आज तक दबा हुआ है. हिन्दूओं में विधर्मियों के लिए जो "स्नेह" है वह भी कोई छुपा नहीं. असल में जब भी आप किसी अन्य विचार को सहन करने की क्षमता खो देते हैं यह कठमुल्ला/कठपंडित वाद हावी होने लगता है.

    इस बहस में आपका स्वागत

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  18. स्वागत और शुभकामनायें आपके इस प्रयास के लिए. हम प्रतीक्षारत पढ़ने वालों में हैं.

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  19. यही हमारा मुख्य व्यवसाय होना चाहिए ! मार्क्सवाद पर निरंतर चर्चा और बहस खून की ताजगी के लिए बेहद ज़रूरी है ! इस सार्थक शुरूआत में सभी साथियों का स्वागत है !

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  20. logon ko samajh mein aane vali baten to hon lekin sarlikaran bhi na ho. aisa karna chunautipurn hoga. maine aapki kitab nahin padhi, phir bhi apka sankalp aasha jagane wala hai. kuchh anuvad bhi chhap saken to kaisa ragega? mahatvpurna aalekhon aur pustakon ki jankari dena bhi shayad thik rahega

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  21. logon ko samajh mein aane vali baten to hon lekin sarlikaran bhi na ho. aisa karna chunautipurn hoga. maine aapki kitab nahin padhi, phir bhi apka sankalp aasha jagane wala hai. kuchh anuvad bhi chhap saken to kaisa ragega? mahatvpurna aalekhon aur pustakon ki jankari dena bhi shayad thik rahega

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  22. मित्र अशोक, शिव वर्मा की मार्क्सवाद परिचयमाला के बाद हमारे पास इस तरह के साहित्य का पीढ़ियों से अकाल पड़ा हुआ है. सरल शब्द-बंध, छोटे-छोटे वाक्यों के विन्यास, समकालीन जीवन्त उदाहरण और बोधगम्य प्रवाहमयी शैली की रचना-श्रृंखला की अपेक्षा है. काम भारी चुनौती का है. सबसे कम समझदार पाठक तक इस जटिल विज्ञान को संप्रेषित कर ले जाने पर अदभुत उपलब्धि होगी. जो भी हो सकेगा मुझसे साथ दूँगा. शुभकामना - गिरिजेश

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  23. एक अच्छी जानकारी और सार्थक चर्चा की उम्मीद है। आपने ठीक कहा कि इस संपूर्ण चर्चा को अंधभक्ति के साथ और दूसरे सिरे पर अंधविरोध के साथ नहीं पढ़ा-समझा जाना चाहिए। दिक्कत सिर्फ वाद की है। दरअसल मनुष्यता सारी स्वस्थ चिंताओं और चिंतन के केंद्र में है। और यह चिंतन किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकता। उम्मीद है, आप भी मार्क्स को केंद्र में रखने के स्थान पर मार्क्स की उन शाश्वत चिंताओं और चिंतन को केंद्र में रखेंगे, जो सनातन हैं और जिसे मार्क्स ने दरअसल एक नयी भाषा और रूप में प्रस्तुत किया। मनुष्यता की प्रतिष्ठा सारे शाश्वत चिंतनों का साध्य है। साधन हर युग और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। वाद हमेशा साधन केंद्रित होते हैं। उम्मीद है, यह चर्चा भी साध्य केंद्रित रहेगी।

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  24. एक अच्छी जानकारी और सार्थक चर्चा की उम्मीद है। आपने ठीक कहा कि इस संपूर्ण चर्चा को अंधभक्ति के साथ और दूसरे सिरे पर अंधविरोध के साथ नहीं पढ़ा-समझा जाना चाहिए। दिक्कत सिर्फ वाद की है। दरअसल मनुष्यता सारी स्वस्थ चिंताओं और चिंतन के केंद्र में है। और यह चिंतन किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकता। उम्मीद है, आप भी मार्क्स को केंद्र में रखने के स्थान पर मार्क्स की उन शाश्वत चिंताओं और चिंतन को केंद्र में रखेंगे, जो सनातन हैं और जिसे मार्क्स ने दरअसल एक नयी भाषा और रूप में प्रस्तुत किया। मनुष्यता की प्रतिष्ठा सारे शाश्वत चिंतनों का साध्य है। साधन हर युग और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। वाद हमेशा साधन केंद्रित होते हैं। उम्मीद है, यह चर्चा भी साध्य केंद्रित रहेगी।

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  25. मैंने 'इस्लाम' शब्द का प्रयोग कट्टरता के पर्याय के तौर पर किया ...यहाँ भगवा तालिबानी भी हैं ..किसी धर्म-विशेष या उसके अनुयायी की आस्था को ठेस पहुचाना मेरा मकसद कतई नहीं था ..मेरे लिए "कट्टरता" वर्ज्य है ..वह चाहे किसी धर्म , नस्ल या रंग की हो ..आँख फोड देने वाले चटख रंग मुझे नहीं सुहाते ..वो चाहे भगवा हो , हरा हो या फिर लाल ही क्यूँ न हो ...

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  26. सार्थक पोस्ट, आभार.

    मेरे ब्लॉग meri kavitayen की नवीनतम प्रविष्टि पर आप सादर आमंत्रित हैं.

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  27. कार्ल मार्क्स इस्लामी विरोधी था

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  28. महोदय, एक जरूरी काम है कि मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के संपूर्ण साहित्य का निचोड़ उन्हीं के शब्दों में एक जगह प्रस्तुत किया जाए. इसे कई महीनों की मेहनत से मैंने पूरा किया है. आप केलिए इसका कोई उपयोग ? अमिताभ.

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  29. यह प्रयास शोध छात्र के लिए सहयोगी सिद्ध होगा

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…