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सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

अनिल अंकल और स्मृतियों का सामान



बचपन में पहली बार मृत्यु शब्द तब सुना था जब स्कूल में शोक सभा हुई थी. कोई ऑफिस कर्मचारी 'नहीं रहा' था. 'नहीं रहा' का अर्थ बहुत देर तक प्रश्न बनकर घेरे रहा. चूंकि मेरा बचपन काफी एकाकी रहा इसलिए...ऐसे तमाम सवाल जेहन में एकत्र होते रहे. इन दिनों लम्बे समय से जीवन और मृत्यु आपस में उलझ जाते हैं...जैसे रेशम के धागे हों...बड़े सलीके से सुलझाती हूँ वो फिर आपस में उलझे मिलते हैं...25 फ़रवरी को अनिल अंकल को गए एक साल हो गया. इन दिनों उन्हें कितना याद किया कह नहीं सकती लेकिन सिरहाने उनका कहानी संग्रह अक्सर आँखों से टकराता रहा. उसे देखते ही चंद पलों को मन वहीँ 'एक पीली दोपहर का किस्सा' के करीब ठिठक जाता. पहली बरसी मनाने देश भर से लोग आये थे. कामरेड को लाल सलाम कहने को न जाने कितने लोग बेताब थे. रितु, निधि, शाश्वत, दिव्या ( उनका बेटा-बहू जो वहां न होकर भी थे), अनुराग, अरशद, आशा आंटी और सबसे छोटा रेहान ये उनका परिवार था, जिसने पापा के जीवन से जुडी स्मृतियों को रोने के लिए नहीं साझा करने के लिए चुना. उनके इसी परिवार में आनंद स्वरुप वर्मा, आलोक धन्वा, अजय सिंह जी, शोभा जी, ताहिरा जी, कौशल अंकल, सुभाष जी, नरेश सक्सेना, राकेश जी, वीरेंद्र जी, रविन्द्र वर्मा, संजय जोशी जी, राजेश अंकल, नवीन जी, मेरे पापा भगवान स्वरूप कटियार भी मौजूद थे. बीएनए के सभागार में अनिल अंकल की बड़ी सी तस्वीर उनकी उपस्थिति को लगातार मजबूत कर रही थी. 'अनिल सिन्हा स्मृति पुरस्कार' पत्रकारिता के लिए दिल्ली के अजय प्रकाश को दिया जाना भी उन्हीं रास्तों को मजबूत करना सरीखा था, जिस पर अनिल अंकल हमेशा चले. श्रमिक बन्दोंपाध्याय का संस्कृति पर आख्यान हो या मौसमी भौमिक दी का संगीत या फिर अलोक धन्वा जी की भीगी सी आवाज से छलकती यादें...हर वक़्त यही लगा कि दूर जाकर व्यक्ति और करीब ही आ जाता है. लखनऊ में होने वाली तमाम सांस्क्रतिक गतिविधियों में उनका मुस्कुराता चेहरा नजर आता और वो हमेशा पूछते, ' क्या लिख रही हो प्रतिभा? खूब लिखो...' पिछले बरस उनके जाने की खबर ग्वालियर में मिली थी कविता समय में...यकीन ही नहीं आता कि एक साल हो गया. हाँ, एक बात समझ में आई कि किसी को याद करने का सबसे सुन्दर तरीका है, उसके काम को आगे बढ़ाना...अनिल अंकल एक व्यक्ति नहीं धरोहर थे, धरोहर हैं...उन्होंने जो लिखा वो जिया, जो जिया वही कहा. वो अक्सर कम और धीरे बोलते थे. जैसे उन्हें पता था कि समय सबसे ज्यादा मौन ही सुनता है...जब हम भाव से भरे होते हैं तो कुछ नहीं कह पाते...सिर्फ महसूस कर पाते हैं...अनिल अंकल आप हैं, हमेशा रहेंगे...लाल सलाम! अलोक धन्वा जी की वो कविता साझा कर रही हूँ, जो उन्होंने इस मौके पर सुनाई ...आलोक जी की आवाज की नमी को नहीं लिख पा रही हूँ...न अपनी...न आशा आंटी की...न किसी और की...बस याद कर रही हूँ...



घर से भागी हुई लड़कियां

- अलोक धन्वा

एक
घर की जंजीरें
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले!

क्या तुम यह सोचते थे
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था?

दो
तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीजों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन
उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार
अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पांच
लड़की भागती है
जैसे सफेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

छह
कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने
सिर्फ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ आज की रात भी रहेगी
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5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद आत्मीयता के साथ लिखा हुआ स्मरण-लेख. किसी को भी सच्ची श्रद्धांजलि का लोकमान्य रूप तो यही हो सकता है कि उसके अधूरे छोड़े कामों को एक दृढ संकल्प के साथ पूरा करने के लिए आगे बढ़ा जाए. कविताएं, आलोकधन्वा की, पहले पढ़ी हुई होने के बावजूद यहां नत्थी कर दिए जाने पर इस विशिष्ट संदर्भ में और अर्थवान हो उठी हैं. प्रतिभा ने अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए इतने सलीक़े से लिखा है कि स्मृति-प्रसंग के बावजूद उन्हें बधाई देने का मन है.क्योंकि पढ़नेवालों का मन वैसा ही बना पाना जैसा कि खुद का है, कठिन काम होता है.

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  2. बहुत ही आत्मीय ..भावभीना संस्मरण

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  3. वे हम सबके प्रिय थे और हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे ...

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