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मंगलवार, 6 मार्च 2012

मौजूदा इरान संकट: क्या करें वाम-जनवादी ताकतें?



  • शमशाद इलाही 'शम्स'


इरानी परमाणु कार्यक्रम के चलते उसके पश्चिम के साथ बढ़ते अन्तर्विरोधों के मद्देनज़र तीसरी दुनिया के देशों में इरान के प्रति बढ़ती हमदर्दी एक गंभीर वैचारिक समस्या है. खासकर भारत की प्रगतिवादी-जनतांत्रिक ताकतें, अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध के चलते इरानी सरकार के पक्ष में समर्थन जुटाने के ऐतिहासिक बोझ को ढोने का कार्य करती प्रतीत होती हैं. यही  काम उन्होंने इराकी तानाशाह सद्दाम के लिये किया था और यही लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफ़ी के लिये. इनके विरोधी सुरों के साथ  शिया इस्लामी बुनियाद परस्तों की आवाज़ें भी सुनी जा रही हैं, क्या यह नया राजनीतिक समीकरण है जिसमें वाम, लोकतांत्रिक शक्तियाँ राजनीतिक इस्लामी फ़ासीवादी शक्तियों के साथ एकजुट होंगी?

मौजूदा इरानी नेतृत्व को इरान की जनवादी और कम्युनिस्ट ताकतों को ठण्डे दिमाग से एक-एक कर कब्रिस्तान भेजने के गुनाह से क्या माफ़ कर दिया गया है? क्या इरानी सरकार अपनी परमाणु नीति के चलते अपने समाज के लोकतांत्रिकरण के किसी  ऐतिहासिक विशाल ऐजेण्डे पर काम कर रही है? क्या उसका परमाणु कार्यक्रम इरान में ज़मीदारी, इज़ारेदारी, बेरोज़गारी का खात्मा करने का कोई ऐसा दिव्य बल्यु प्रिंट तैयार कर रहा जिसे मानव जाति ने पहले कभी प्रयोग नहीं किया? क्या धर्म आधारित इरानी सरकार का जनविरोधी स्वरुप अब बदल गया है? क्या वहाँ की आवाम को जनवादी अधिकार, महिलाओं को  आत्मनिर्णय के अधिकार, समाज में व्यापक मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, जेलों में सड़ रहे हजारों राजनीतिक विरोधियों की मुक्ति, शरिया जैसे आदिम बर्बर कानूनों से मुक्ति जिनकी आड़ में राजनीतिक विरोधियों का अक्सर दमन (सरेआम फ़ांसियाँ देकर) किया जा रहा है, आर्थिक विषमतायें,स्वास्थ, परिवहन, शैक्षणिक विषमतायें, व्यापक भ्रष्ट्राचार, सरकारी खुफ़िया तंत्र/पुलिस से भयमुक्त समाज जैसे मूलभूत प्रश्नों को हल कर लिया गया है?

आईये आपको १९७९ की इरान की इस्लामी क्रांती के बाद हुए राजनीतिक दमन का एक नज़ारा करा दिया जाये, मुल्लाहों की सत्ता पर पकड़ मज़बूत होते ही इरानी ब्राण्ड के इस्लामी फ़ासीवाद ने अपने उस्ताद हिटलर के नक्शे कदम पर चलते सबसे  पहले अपने राजनीतिक विरोधियों की धर पकड़ शुरु की, जिसमें मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी सबसे पहले नंबर पर निशाना बनी, दोनों दलों के हजारों नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों को पकड़ कर ऐविन और गौहर दश्त नाम की जेलों में ठूँस दिया गया, यह घटना १९८२ की है जब इरानी नेतृत्व ने एक सोची समझी नीति के साथ पूरे देश में अपने राजनीतिक विरोधियों के सफ़ाये का राष्ट्रीय अभियान चलाया. ध्यान रहे मुजाहिदीने ख़ल्क की स्थापना १९६५ में हुई थी और उसके द्वारा चलाये गये राजशाही के खिलाफ़ संघर्षों और कुबार्नियों का एक बड़ा इतिहास रहा है, इरान की मुल्लाह सरकार ने जेलों में बंद इस दल के कार्यकर्ताओं से काग़ज़ी कार्यवाही के तहत जो फ़ार्म भरवाये थे, उनकी कुछ लाईनें आपके सामने  नीचे दी जा रही हैं:-

* क्या  तुम अपने पुराने सहयोगियों के सार्वजनिक त्रिस्कार की इच्छा रखते हो?
* क्या तुम यह काम कैमरे के सामने कर सकते हो?
* क्या तुम उन्हें पकड़वाने में सरकार की मदद करोगे?
* क्या तुम हमें अपने गुप्त समर्थकों की सूची दोगे?
* क्या तुम हमें उन सहयोगियों के नाम दोगे जिन्होंने सरकार के समक्ष दिखावटी पश्च्यताप किया है?
* क्या तुम दुश्मन के खिलाफ़ युद्ध के मोर्चे पर जाओगे और बारुदी सुरंगों वाले इलाके से भी गुजरोगे?

दूसरे नंबर के खतरनाक राजनीतिक कैदी थे, तुदेह पार्टी के नेता और उसके कार्यकर्ता, तुदेह पार्टी की कुर्बानियाँ, शाह पहलवी शासन के विरुद्ध उसके शहादत भरे संघर्ष शायद तीसरी दुनिया में चल रहे किसी भी मुक्ति संघर्षों और तहरीकों से कमतर नहीं थे. इरान में कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास १९०६-७ से आरंभ हुआ, १९१७ में  इन्हीं तत्वों ने अदालत पार्टी बनायी, १९२० में विधिवत रुप से इसका नाम बदल कर कम्युनिस्ट पार्टी इरान रख दिया गया था, १९२१ से ३० के बीच शाह शासन के दमन के चलते पार्टी को लगभग खत्म ही कर दिया गया था. १९४१ तक आते आते फ़िर इरानी समाज के क्रांतिकारी तत्वों ने करवट ली और तुदेह पार्टी को जन्म दिया. तुदेह पार्टी के सदस्यों को इरानी इस्लामी सरकार ने जेल में जो फ़ार्म भरने के लिये दिये, उनकी कुछ लाईनें ज़ेरे ग़ौर हैं:-

* क्या तुम मुसलमान हो?
* क्या तुम खु़दा में यकीन रखते हो?
* क्या पवित्र कुरान खुदा के वचन हैं?
* क्या तुम जन्नत और दोज़ख़ में यकीन करते हो?
* क्या तुम पैगंबर मौहम्मद को आखिरी रसूल मानते हो?
* क्या तुम ऐतिहासिक भौतिकवाद को सार्वजनिक रुप से खारिज करोगे?
* क्या तुम अपने पुराने विचारों को कैमरे के समक्ष खारिज कर सकते हो?
* क्या तुम रमज़ान रखते हो?
* क्या तुम नमाज़ पढ़ते हो, कुरान शरीफ़ पढ़ते हो?
* क्या तुम किसी मुस्लिम अथवा गैर मुस्लिम के साथ जेल की सेल में रहना पसंद करोगे?
* क्या तुम इस बात का हलफ़ उठाते हो कि तुम खुदा में, कुरान में, पैगंबर में और कयामत में भरोसा रखते हो?
* तुम्हारे बचपन में तुम्हारे माता पिता क्या रोज़ा रखते, नमाज़, कुरान आदि पढ़ते थे?

इन सवालों के मद्देऩज़र आप इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक प्रगतिशील दिमाग उपरोक्त मध्यकालीन, बेहूदा सवालों का क्या जवाब देगा? जेल में जवाब देने वाले कार्यकर्ताओं-नेताओं को यह भी नहीं मालूम था कि उनके द्वारा दी गयी जानकारियों को एक साक्षात्कार की शक्ल दे दी जायेगी. एकतरफ़ा अदालती फ़ैसला लेकर उन्हें सीधे फ़ांसी के तख़्ते पर भेजने का आयोजन इस्लामी फ़ासीवाद कर चुका था. सही गिनती कोई नहीं जानता, एमनेस्टी और दिगर मानवाधिकार संगठनों के अनुमान के मुताबिक १९८२-८३ में मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी के  १० से ३० हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को पूरे इरान में फ़ांसी दी गयी. इरानी सरकार ने  इन देशभक्त शहीदों को कहाँ दफ़न किया, यह एक साल के बाद उन परिजनों को ही बताया जिनसे हुकुमत ने एक खास समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिये. समझौते में यह सब धारायें थी कि आप सार्वजनिक रुप से कोई सोग अथवा प्रचार नहीं करेंगे, कोई धार्मिक आयोजन नहीं करेंगे आदि आदि. इस "राजनीतिक सफ़ाई" का नतीज़ा यह  हुआ कि आज इरान में किसी भी विपक्षी पार्टी का कोई नेता अपने देश में नहीं है, ये सभी निर्वासित जीवन बिताने को मजबूर हैं. इरान में इस वक्त जो विपक्ष की भूमिका निभा रहा है वह सरकारी पक्ष का वह खेमा है जिसे सुधारवादी कहा जाता है. आज लगभग ७.५ करोड़ इरानी आबादी का एक बडा हिस्सा अपना देश छोड़ कर दूसरे देशों में रहता है जिसकी संख्या तकरीबन ४० से ५० लाख के बीच आंकी जाती है.

इरान की इस्लामी क्रांति के बाद इस तथ्य से कौन वाकिफ़ नहीं कि इरानी नेतृत्व ने अपने किस्म के (शिया) इस्लामी इंकलाब लाने का खुलेआम आह्वान अपने पड़ौसी देशों (इराक, कुवैत, सऊदी अरब आदि) की जनता से नहीं किया? खुमैनी की तकरीरें आज भी इस बात की शहादत हैं कि उसके उत्तेजक विचारों ने अपने पड़ौस की हुकूमतों को असुरक्षित ही नहीं किया बल्कि तत्कालीन इराकी उप-प्रधानमंत्री तारिक अज़ीज़ पर कथित कातिलाना हमला करवा कर उन्हें अस्थिर भी करने की कोशिश की, इरान के इसी धार्मिक कट्टरवाद के चलते इरान-इराक का युद्ध १९८०-१९८८ तक चला जिसमें लगभग १० लाख इरानियों ने जानें गवाईं, इरानी जनता को इस भयंकर खूनी युद्ध में न केवल बेशकीमती इंसानी जिंदगियों की बर्बादी झेलनी पड़ी वरन उसे लगभग ६०० अरब डालर की आर्थिक हानी भी उठानी पडी.

इस्लामी इरान के उपरोक्त खूनी इतिहास के मद्देनज़र क्या उसकी परमाणु महत्वकाँक्षाओं को शक की नज़र से नहीं देखना चाहिये? अब जबकि इरान के चिर-परिचित दुश्मन इराक का सफ़ाया हो चुका है लेकिन इरान में अभी उसी इरानी किस्म के इस्लामी विस्तारवादी विचारधारा का सामुहिक सम्मोहन मौजूद है जिसे महमूदनिजाद और सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह खामनेई के भाषणों से  भलिभांति समझा जा सकता है. इरान का मौजूदा नेतृत्व शातिराना ढ़ग से तीसरी दुनिया के देशों से अपनी एकजुटता के नाम पर अपने परमाणु कार्यक्रम के बचाव में आम सहमति लेने में जुटा है, इसमें वह सफ़ल होता भी दिख रहा है. इरान की क्षेत्रिय ताकत बनने की महत्वकाँक्षा अभी दबी-छिपी नहीं हैं. यह बात संयुक्त अरब अमीरात (जिसके तीन द्वीपों को इरान अपना बताता है), सऊदी अरब, कुवैत, बाहरीन, कतर, यमन आदि को भी समझ में आती हैं, यही कारण है कि इरानी परमाणु कार्यक्रम से इस्राईल को इतनी परेशानी नहीं जितनी इन मध्य एशियाई शाही हुक्मरानों को है. इरानी कुटिल राजनीतिक चालों के तहत इस्राईल पर राजनीतिक हमला, द्वितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों के कत्लेआम को झुठलाने के पीछे उसके कुत्सित इरादे साफ़ हैं, और वह यह है कि उसे पूरी दुनिया के मुसलमानों का नेता बनना है. उसे दुनिया के मुसलमानों को सऊदी प्रभाव (वहाबी-सलफ़ी) से मुक्त करा कर उन्हें  शिया-सफ़विद छाप इस्लामी एजेंडे पर लाना है, इसका प्रमाण आप लेबनान में हिज़्बोल्लाह को २००६ से अब तक दी गयी मदद से देख सकते हैं. इसी एजेण्डे के तहत भारत-पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान में शिया मदरसों, शिक्षण संस्थाओं और काले मुसाफ़े लगाये शिया धार्मिक गुरुओं की आयी अचानक बाढ़ से अंदाज़ा लगा सकते हैं. यही नहीं अब इरानी प्रभाव को अफ़्रीकी महाद्वीप पर भी देखा जा सकता है. मिस्र से लेकर नाईजीरिया तक इरानी किस्म के इस्लाम की छाप और उससे जुड़ी गतिविधियों पर आँख मूँद कर  यदि कोई मौजूदा इरानी सरकार के परमाणु कार्यक्रम का बचाव करता हैं, तब इसे आत्महत्या का एक आसान राजनैतिक रास्ता ही कहा जायेगा.

आज यूरोप के कई देशों में जहाँ परमाणु सयंत्रों पर सवाल उठाये जा रहे हैं, जर्मनी जैसा देश परमाणु उर्जा सयंत्रों को बंद करने का ऐलान कर चुका है, जापान इसके दंश भुगत कर इससे तुरंत मुक्ति पाना चाहता है, वहाँ इरान जैसे पिछडे देश द्वारा परमाणु उर्ज़ा सयंत्रों को विकसित करने की कोशिश इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा करता है कि इसका मकसद उर्जा से संबंधित नहीं वरन परमाणु शक्ति बन कर क्षेत्रीय शक्ति बनना अधिक है. याद रहे भारत में परमाणु उर्जा के प्रश्न पर भारी बहस हुई थी, पिछली केंद्रीय सरकार जिसे वाम समर्थन हासिल था,  तत्कालीन भारत सरकार अमेरिकी  सरकार के साथ परमाणु संधि नहीं कर सकी थी क्योंकि इसका विरोध सहयोगी वाम दलों ने किया था, तब परमाणु उर्जा के विकल्प पर ही बडी बहस हुई थी, आज यही शक्तियाँ इरान द्वारा परमाणु उर्जा के सयंत्र की उपादेयता पर प्रश्न क्यों नहीं उठा रही हैं?
इराक से सद्दाम सरकार को उखाड़ देने के बाद इरान का अभी किसी पडौसी शक्ति से प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं रहा, अभी उसका पूरा ध्यान अपने किस्म के इस्लामी ब्राण्ड को प्रोत्साहित करने में लगा है. उसका इस्राईल के विरुद्ध बढ़ चढ़ कर बोलना, इस्राईल की बैसाखी पकड़ कर मुस्लिम जगत में स्वंय को नेता स्थापित करने का एक सचेतन प्रयास है. वह ऐसे किसी प्रसंग पर खामोश नहीं रहता जिसमें उसे इस्लामी जगत के मध्य खुद को एक विकल्प बताने का मौका मिलता है. मध्य ऐशिया में इरानी प्रभाव को सीमित करने की दिशा में स्थानीय राजाओं ने अपने तरीके से रणनीतियाँ बनायी हैं. सऊदी अरब में तीन  बड़े अमेरिकी फ़ौजी अड्डे हैं, अमीरात में अमेरिकी और फ़्रांसीसी सेना के स्थायी अड्डे हैं. बहरीन, यमन, कतर में अमेरिका के भारी सैन्य ठिकाने हैं. इरान के पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ किसी भी किस्म के सैन्य संघर्ष होने की स्थिती में इरान को सऊदी अरब, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर स्थित अमेरीकी सैन्य ठिकानों पर वार करना प्राथमिक एंव महत्वपूर्ण कार्यवाही होगा. ऐसी स्थिती में ये मध्य पूर्वी देश आसानी से इरान के किसी भी हमले को अपनी सरकारों के खिलाफ़ हमला बता कर पूरी दुनिया के मुसलमानों को यह संदेश दे सकते हैं कि इरान अपनी शिया विचारधारा को सुन्नी देशों के खिलाफ़ युद्ध के जरिये थोपना चाहता है. जाहिर है इरान के किसी भी प्रकार के हमले को अपनी अदम्य सैन्य क्षमता के चलते इस्राईल भलिभाँति झेलने की स्थिती में है, लेकिन अन्य अरब देशों पर यदि इरानी हमले होते हैं तब भारी जान माल के नुकसान की आशंका है. यहाँ यह तथ्य बताना प्रसांगिक है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों की संख्या का मात्र १० प्रतिशत तबका ही शिया अकीदे में यकीन रखता है.

साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इरान के विरुद्ध युद्ध के मंसूबों को रोकना एक बात है, इरानी की मौजूदा सरकार के परमाणु शक्ति और उसके अधिकार को समर्थन देना- दो परस्पर विरोधी बातें हैं. इरानी धर्मराष्ट्र का समर्थन करना, इसके बढ़ते भार को ढ़ोना वाम-जनवादी शक्तियों के कार्यभार कदापि नहीं हो सकते. वाम-जनवादी शक्तियाँ यदि ऐसा करती हैं तब उनके सरों पर इरान की मौजूदा सरकार द्वारा किये गये अपराधों को न केवल खुला समर्थन देने जैसा होगा बल्कि उन शहीदों के प्रति सरासर गद्दारी होगी जिन्होंने इरान को एक लोकतांत्रिक, जनवादी शक्ति बनाने का ख्वाब लिये अपने जीवन का बलिदान दिया. भला ऐसी स्थिती में कोई महमूदनिजाद की सरकार को कोई कैसे समर्थन दे सकता है? याद रहे, १९९१ के सोवियत पतन के बाद यही राजनीतिक इस्लाम अब पूँजीवाद के मुकाबिले खुद को एक विकल्प बताने में जुटा है, इस्लाम के जेहादी तत्व आज पूरी दुनिया में स्वयं को एक ग्रहणीय विकल्प बताने/साबित करने में जुटे हैं और किसी भी वक्त कम्युनिस्ट ताकतों के विरुद्ध संघर्ष में आने पर  यह तबका कोई रियायत नहीं बरतता. यह निर्ममता के साथ दुनिया भर में कम्युनिस्ट और वाम ताकतों को सूली पर चढ़ाता है. क्या हमारे साथी अफ़गान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की सरेआम फ़ांसी के दर्दनाक, बर्बर प्रसंग को भूल गये? क्या आप यह भूल गये कि कामरेड नजीबुल्लाह को मौत देने से पूर्व इन इस्लामी ताकतों ने उनके साथ क्या क्या किया था?

राजनीतिक इस्लाम के किसी भी स्वरुप चाहे वह शिया हो या सुन्नी, चाहे वह कितने भी क्रांतिकारी ढ़ग से अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ रहा हो, उसका समर्थन एक भारी राजनीतिक भूल होगी, महमूदनिजाद से लेकर नसरुल्लाह तक, कथा वाचक ज़ाकिर नायक से लेकर मिस्र के ब्रदरहुड तक, वाम ताकतों को न केवल वैचारिक स्तर पर स्वंय को उन्नत, बेहतर और सफ़ल विकल्प साबित करना होगा, बल्कि इन मज़हबी ताकतों के तमाम हथकण्डों और उनकी मानव विरोधी कारगुज़ारियों को बेनकाब करते हुये, इन्हें परास्त करना होगा. युद्ध का विरोध किसान, मज़दूर, छात्र, बुद्धीजीवी मेहनकश तबके की एकता के जरिये जनता के विशाल बहुमत द्वारा ही किया जा सकता है, हमारे लिये संघर्ष के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, सिर्फ़ संघर्ष के माध्यम से ही इन जन विरोधी शक्तियों का पर्दाफ़ाश किया जा सकता है. इरान की मेहनतकश आवाम ही उसके देश में सत्ता के शिखर पर बैठे मुल्लाह तंत्र को परास्त कर सकती है. वही उनके युद्दोंमादी ऐजेण्डे का भाण्डा फ़ोंड करेगी. वही शक्तियाँ पूरी मध्य ऐशिया में एक सच्चे लोकतांत्रिक विकल्प का रास्ता पैदा करेगी. हमें उन्हीं ताकतों को समर्थन देना है और उनका आह्वान करना है कि उनके इस मुक्ति युद्ध में हम बराबर के शरीक हैं, उन्हें ही हमें मज़बूत करना है, यही एक सच्चा वाम-जनवादी रास्ता है और यही उसके ऐतिहासिक कार्यभार भी हैं. राजनीतिक इस्लाम १४०० वर्ष पुराना एक असफ़ल प्रयोग है जिसे आज इस्लामी फ़ासीवादी ताकतें हथियारों के बल पर पूरी दुनिया को भयग्रस्त करके एक विकल्प बताते में जुटी हैं, साम्राज्यवाद के खूंखार चेहरे से अधिक भयानक इस्लामी फ़ासीवाद है जिसमें न कोई तर्क है न बुद्धि, बस अंधविश्वास के बूते उसमें पूरी दुनिया में हरी पताका फ़ैलाने का उन्मादी जुनून मौजूद है.

मौजूदा इरानी मुल्लाह सरकार की हिमायत करने से पूर्व कृपा करके उपर दिये गये इरानी प्रश्नों के उत्तर एक बार आप  खुद दें, फ़िर समझें कि आपकी दशा क्या होगी? मेरे-आपके उत्तर वही होते जो भगत सिंह के जवाब होते..मुझे और तुम्हें फ़ाँसी पर चढ़ा देने के ये प्रयाप्त सबूत हैं लिहाज़ा अगर जीना है और सचमुच किसी समाजवादी सपने को साकार होते देखना है तब इस्लामी ब्राण्ड के किसी भी राजनीतिक वाद के खिलाफ़ अपने म्यान में रखी तलवारें निकाल लें. आने वाली नस्लों को अफ़सोस नहीं होगा कि उनके बुज़ुर्गों ने हमेशा गोर्बाचेव की तरह गलतियाँ नहीं की.
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19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत हिम्मत और साफ़गोई के साथ ढेर सारे सवाल उठाए हैं, शम्स ने इस लेख में, जिनका उत्तर खोजे बिना परमाणु-शक्ति बनने के ईरान के मंसूबों के निहितार्थ और फलितार्थ नहीं समझे जा सकते. एक पूरा ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध कराके उन्होंने खतरे के प्रति आगाह किया है. वामपंथी-जनवादी शक्तियों के सामने उन्होंने दर-पेश चुनौती को भी खूबसूरती से शब्द दिए हैं. कम लोग हैं, अपने बीच, जो इस तरह का पूरा परिदृश्य सामने रखकर बहस छेड़ते हैं. शम्स को मुबारकबाद.

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  2. बहुत हिम्मत और साफ़गोई के साथ ढेर सारे सवाल उठाए हैं, शम्स ने इस लेख में, जिनका उत्तर खोजे बिना परमाणु-शक्ति बनने के ईरान के मंसूबों के निहितार्थ और फलितार्थ नहीं समझे जा सकते. एक पूरा ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध कराके उन्होंने खतरे के प्रति आगाह किया है. वामपंथी-जनवादी शक्तियों के सामने उन्होंने दर-पेश चुनौती को भी खूबसूरती से शब्द दिए हैं. कम लोग हैं, अपने बीच, जो इस तरह का पूरा परिदृश्य सामने रखकर बहस छेड़ते हैं. शम्स को मुबारकबाद.

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  3. हम उस दौर में है जब तानाशाहों के खिलाफ अलग अलग देशों में तथकथित जनतंत्र की लड़ाई को साम्राज्यवादी ताकते नियंत्रित कर पुनरुथान वादी ताक़तों को सत्ता में ला रही है ,वाम जनवादी ताक़तें वैश्विक स्तर पे इतनी कमजोर है कि ऐसे तमाम जन असंतोष का नेतृत्व करने में अक्षम है , यह इक ग्लोबल फिनोमिना है सिवाय इरान के जो बुनियादी तौर पे पुनुराथान्वादी शक्ति है और बेशक बहुत खतरनाक लेकिन चूँकि वह अमरीकी विरोध कि बुनियाद पे पैदा हुयी और अब तक उसी रास्ते पर चल रही है,अतः तीसरी दुनिया के तमाम देशं तथा अन्य जनवादी शक्तियों इस बात को लेकर लगातार भ्रमित रही है , मेरा ऐसा मत है कि इरान के साम्राज्यवाद विरोध कि अपनी सीमायें है जो सिर्फ वही तक सीमित है जहां तक साम्राज्यवाद उसकी महत्वकंषाओं के आड़े आ रहा है ,इरान के साम्राज्यवाद विरोध का कत्तई और कत्तई क्रांतिकारी या प्रगतिशील चरित्र नहीं है , इस भ्रम से फ़ौरन बाहोश हो जाने कि जरूरत है ....

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  4. जहां इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रगतिशील ताकतो का दमन कर ईरान को पूरी तरह से एक कटटर धार्मिक राज्‍य बनाने की साजिशों का एक लंबा दौर रहा है, लेकिन क्‍या इस तथ्‍य को अनदेखा किया जा सकता है कि अपने साम्राज्‍यवादी स्‍वार्थों को पूरा करने के लिए अमरीका तथा दूसरी साम्राज्‍यवादी ताकतों ने धर्मिक कटृटरता को हवा देने की हर साजिश की है।

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  5. शमशाद भाई, ईरान के अतीत, वर्तमान और यथार्थ से रुबरु कराने के लिए आपका साधुवाद। ईरान में किस तरह की शक्तियां अभी कार्यरत हैं और उनके मंसूबे क्‍या हैं, आपने उसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में उसे पेश किया।
    बहरलहाल, ईरान के खिलाफ अमेरिका और उसके सहयोगियों की मुहिम का सवाल है, हमें कुछ चीजों पर जरूर ध्‍यान देना चाहिए। पहला तो यह कि अमेरिकी हुक्‍मरान का कोई एजेंडा ईरान से मुल्‍लाओं के राज को उखाड़ने और वहां आधुनिक लोकतांत्रिक निजाम कायम करने का नहीं है। वह ईरान, ईरान के मेहनतकश अवाम और ईरानी संसाधनों के दोहन और शोषण के लिए वहां एक नव औपनिवेशिक शासन स्‍थापित करना चाहता है।
    ईरान से मुल्‍लों के राज को उखाड़ने और वहां एक जम्‍हूरी निजाम की जिम्‍मेदारी केवल ईरानी अवाम की है। लोकतंत्र की आड़ में हम अमेरिका को हरगिज लीबिया जैसा खूनी खेल ईरान में खेलने की इजाजत नहीं दे सकते। अमेरिकी साम्राज्‍यवाद ईरान के तेल के जखीरे पर कब्‍जा करने के साथ फारस की खाड़ी पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है जहां से वह पूरी दुनिया की तेल की आपूर्ति तय और डिक्‍टेट कर सके। इस तरह यह मामला सिर्फ ईरान का नहीं है।
    अमेरिकी साम्राज्‍यवादी आज हिटलर की तरह विश्‍व विजय और विश्‍व प्रभुत्‍व का सपना देख रहे हैं। वह पूर्ण-रूपेण किसी विश्‍व युद्ध में जाने की बजाय देशों को अकेले अकेले निशाना बना कर अपना मंसूबा पूरा करने की दिशा में सक्रिय हैं।
    निस्‍संदेह, अमेरिका के साम्राज्‍यवादियों से आज दुनिया को सबसे ज्‍यादा खतरा है और इससे लड़ना हमारे लिए जरूरी है। ऐसे में ईरान एक बिंदू है जहां आपको तय करना होगा कि हमारी क्‍या दिशा हो। और यह जरूरी नहीं कि हमारे पास बस यही विकल्‍प है कि या तो हम पूरी दुनिया पर नव औपनिवेशिक राज के सपने पाल रहे अमेरिकी शासकों के पक्ष में खड़े हों या उनका विरोध करते हुए हम ईरानी शासकों के गुणगान करने लगें।

    , जी, उनसे इतर भी हमारे पास विकल्‍प हैं..मुल्‍लाओं और साम्राज्‍यवादियों से परे आम अवाम हैं...मेहनतकश हैं...इन मेहनकशों की आकांक्षाओं को केन्द्रित कर हम अपनी नीतियां तय कर सकते हैं।

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  6. पूंजी या कार्पोरेट अपनी लड़ाई कट्टर्पंत धर्म की आड़ में और इस्लाम-हिन्दू , इस्लाम-क्रिस्चन लड़ाई करवाते हैं. जिससे लोग बंटते रहे और वो मस्त रहें . इरान उतना ही खतरनाक है जितना अमेरिका. इस्लाम और क्रिशानिटी या हिन्दू धर्म सभी सिखाते हैं 'आपस में बैर रखना '. पर इस समय शायद इरान ही सबसे अधिक खतरनाक है

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  7. ईरान के राजनीतक चरित्र के बारे में आप ने जो कुछ लिखा है , हर्फ़ हर्फ़ सही है .दूसरी तरफ दुनियावी सतह अमरीका का साम्राजी अजंडा भी जगजाहिर है .अगर हम दुनियावी सियासत के नज़रिए से देखें तो इस अजंडे की मुखालफत के सिवा कोई और सूरत नहीं है . यह जरूर है कि इस मुखालफत का मतलब मुख्तलिफ मुल्कों में कायम तमाम अवाम- दुश्मन निजामों की हिमायत नहीं है , यह साफ़ कर दिया जाना चाहिए. अगर हम अपने ही मुल्क की नजीर लें , तो बेशक हम अपनी सरकारों की कश्मीर से ले कर पूर्वोत्तर -छात्तीसगढ़ तक की दमनकारी नीतियों की नुक्ताचीनी करते हैं .उन की एटमी महत्वाकांक्षाओं की भी आलोचना करते हैं. लेकिन कल को अमरीका मानवाधिकारों या एटमी अप्रसार की नाम पर भारत के आर्थिक बहिष्कार का आह्वान करे या फौजी दखलंदाजी की धमकी दे , तो क्या हम उस का विरोध इस लिए न करेंगे कि वैसे भी भारत में एक अवाम -दुश्मन निजाम कायम है ?मुझे लगता है कि वाम -लोकतांत्रिक रास्ता यही है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का पूरमपूर विरोध करते हए अपने मुल्कों में जारी जनविरोधी नीतियों का भंडाफोड करना जारी रखा जाए , और यह दिखाया जाए कि इन नीतियों के रहते साम्राज्यवाद से मुकम्मल और एकजुट लड़ाई नहीं लड़ी जा सकेगी .

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  8. बहुत शानदार ,तर्कसंगत और सुविचारित लेख ! साथी शमशाद को इसके लिए बधाई !अपने शत्रु के शत्रु को मित्र मानने की नीति पर चलना अंधानुकरण ही कहा जा सकता है !हमें सोंच-समझ कर तय करना होगा हमारा प्रथम शत्रु कौन है --और वह है राजशाही ,सामंतवादी फासिस्ट !हमें बेहतर का चुनाव करना चाहिए और लोकतन्त्र चाहे वह कैसा भी हो ,का समर्थन करना चाहिए !मैं लेखक का समर्थन करता हूँ !

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  9. आप सभी प्रबुद्ध पाठको का धन्यवाद कि आपने लेख पढा और अपने कीमती विचार भी रखे. एकाधिकारी पूंजी चाहे तेक बेचे या सोना या हथियार...उसे बाज़ार चाहिये, अमेरिकी साम्राज्यवाद पर मेरे पाठक गण काफ़ी परिपक्व हैं लिहाजा इस पर उन्हें कोई राय देने की हैसियत में नहीं रखता, वो सब जानते हैं, मेरा प्रयास सिर्फ़ इतना भर है कि राजनीतिक इस्लाम के खतरे को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता..बिना राजनीति के इस्लाम लंगडा है, चल ही नहीं सकता और उसकी राजनीति में क्रांतिकारी तत्वों को खोजना भारतीय उपमहाद्वीप में एक बडा उपक्रम रहा है, मेरी निजी राय में यह काम व्यर्थ है और अपनी दिशा-दशा में प्रतिगामी है. इसके सभी रुप चाहे शिया हो या सुन्नी सभी मानव विरोधी हैं, १९९१ के सोवियत पतन के बाद और ९/११ परिघटना से तथाकथित इस्लामी तत्वों ने दुनिया भर में धूर्तता पूर्ण यह कहना शुरु किया है कि "इस्लाम इस दि सोल्यूशन" जो कि नितांत अवैज्ञानिक है, भारत जैसे मुल्क में बाकायदे इस विचार के मद्दे नज़र टी वी चैनल चल रहे हैं..ये झूठ है, इस्लाम ने दुनिया में किसी समस्या का हल नहीं किया न आज न पहले कभी इतिहास में, आखिर ये कहना कब सीखेंगे कि राजनीतिक इस्लाम अपने आप में वर्तमान साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक प्रवृतियों का ही पुरातन स्वरुप है. आज का इरान क्या यह सब काम नहीं कर रहा? इस्लाम के प्रगतिवादी तत्वों को ढूंढने में काफ़ी समय व्यर्थ किया है, अभी उसे खारिज करने का वक्त है और मुखालफ़त करने का भी..
    दुनिया का कोई भी धर्म वर्तमान विश्व की जटिल समस्याओं का हल प्रस्तुत नहीं कर सकता, उसे कोई मौलिक, निरंतर विकासमान और वैज्ञानिक चिंतन ही हल कर सकता है और यही मार्क्सवाद की प्रासंगिकता है.
    प्रतिक्रियावादी,फ़ासिस्ट और निम्न स्तर के फ़ैलाव वादी इरान के पक्ष में भारत के कम्युनिस्ट को क्यों खडा होना चाहिये? और अगर वह नहीं खडा होता तो क्या इसका मतलब यह निकाल लिया जाये कि वह अमेरिकी पक्ष में झुक गया? नहीं..ऐसा नहीं है, इरान को नंगा किये बिना उसका समर्थन करना आत्महत्या के फ़रमान पर दस्तखत करने जैसा है. इरानी-अमेरिकी संघर्ष का कारण ही यह है कि मौजूदा विश्व लूट तंत्र में इरानी मुल्लाह को हिस्सा नहीं मिल रहा...उसे अपना हिस्सा चाहिये. दूसरे मुस्लिम राष्ट्रों को इस लूट में हिस्सा मिल रहा है तब वे बाकायदे अमेरिकी एजेण्डे में शामिल हैं, सीरिया के खिलाफ़ अरव लीग का प्रस्ताव सऊदी अरब लाता है, कतर लीबिया में नाटो कार्यवाही का एक भरोसेमंद खिलाडी बनता है..सऊदी, बहरीन में फ़ौज भेजता है और उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ में कोई प्रस्ताव/चर्चा नहीं होती..
    हम अमेरिकी नीतियों और आक्रमण का विरोध वर्गीय संगठनों को मज़बूत करके ही कर सकते हैं, यही मूलत: युद्ध विरोधी शक्तियां हैं इरान में भी इन्हीं शक्तियों का समर्थन किया जाये न कि मुल्लाह तंत्र का...द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी पगला गया था, उसे आवामी ताकत भी हासिल थी, लाल सेनाओं ने जब बर्लिन पर बम बरसाये तब ऐसा नहीं था कि उसमे जनता न मरे सिर्फ़ फ़ौज ही मरे...लिहाजा युद्दोंन्माद पैदा करने वाली राजनीतिक शक्तियां और उससे संबद्ध समाज को भी अपने उन्माद की कीमत चुकानी होती है, इरान भी कल इस कीमत को चुकाये तो कोई अचरज की बात नहीं होगी. उसका बोझा प्रगतिवादी ताकतें ढोंये ये मंजूर नहीं.

    मूलत: अमेरिकी साम्राज्यवाद और इरानी मुल्लाह तंत्र दोनों शैतानी-जनविरोधी ताकतें हैं, अमेरिका में वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो अभियान चल सकता है, चोमस्की और माइकल मूर पैदा हो सकते हैं, इरानी तंत्र मे यह संभव नहीं..

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  10. bahut shandar or jandar lekh hai. bebaki se likha gaya. aankh kholane wala . jo sawal uthaye gaye hain un par awashya vichar kiya jana chahiye. wastaw main yah talawar ki dhar main chalane jaisa hai. wampanthiyon ko apana paksh bahut soch-samajhakar tay karana chahiye. koyi bhram janata ke samane nahi paida hona chahiye. samrajwadi shakti ho ya samnti shakti dono hi shaktiyan khatarnak or janwirodhi hain. dono ka purjor wirodh karate huye teesara sashakt vikalp janata ke samane rakha jana chahiye.yah bilkul sahi hai ki parmanu karykram ka kahin se kahin tak samarthan nahi kiya ja sakata hai.

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  11. ईरान-अमेरिका के सम्बन्ध के परिपेक्ष्य में तीसरी दुनिया की राजनीति और कूटनीति क्या अभी चल रही है,और यह कैसे चिंताजनक स्थिति में हैं, इस बाबत एक साफ नजरिया यहाँ रखा गया है और जो मुझे भी सही जंचता है. और कैसे ईरान में जो कुछ अच्छा था उसका खात्मा साम्प्रदायिक विचारों से चालित सत्ता ने वहाँ कर रखा है, उसको एकदम से फरिया और समझा कर आलेखक ने रख दिया है, यह भी ईरान की राजनीति और राजनितिक इतिहास को व्यवस्थित न जानने वालों के लिए अच्छी सिनोप्सिस का कम करता दिखता है.

    आलेख से पता लगता है कि ऐसे विकट प्रश्नों के हल तलाशना कितना मुश्किल काम है और यही स्थिति ईरान की अभी की दु:स्थिति बयान कर रही है.

    घर-परिवार के सीमित दायरे वाले लड़ाई-झगड़ों और उलझाव भरे संबंधों से पार पाने में ही कभी लोगों की साडी बुद्धिमत्ता और रणनीति चूक जाती है, यहाँ तो पहाड़ सा मामला और दुनिया के मेले का झमेला है!

    दुनिया में विज्ञान का हस्तक्षेप ज्यों ज्यों फैलाव होता जा रहा है, शक्तिशालियों-सत्तापाइयों की दृष्टि उतनी ही संकुचित होती जा रही है और विज्ञान को उतना ही घसीट कर धर्म-धन-बल की गुलामगिरी में लगा दिया जा रहा है. अमेरिका जैसा विज्ञान-उन्नत समाज भी बेलगाम स्वार्थ की खातिर विज्ञान और तर्क की मर्यादा को लांघने के ब्याज से मानवता को तार तार कर रहा है, एक बड़ा पेंच यहाँ भी फंसा है.

    बहरहाल, इस या ऐसे उलझावों पार सकारात्मक कुछ भी हल पाने की कोई सूरत यथाशीघ्र नजर आये, यही 'गोहरा' सकता हूँ.....

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  12. ईरान-अमेरिका के सम्बन्ध के परिपेक्ष्य में तीसरी दुनिया की राजनीति और कूटनीति क्या अभी चल रही है,और यह कैसे चिंताजनक स्थिति में हैं, इस बाबत एक साफ नजरिया यहाँ रखा गया है और जो मुझे भी सही जंचता है. और कैसे ईरान में जो कुछ अच्छा था उसका खात्मा साम्प्रदायिक विचारों से चालित सत्ता ने वहाँ कर रखा है, उसको एकदम से फरिया और समझा कर आलेखक ने रख दिया है, यह भी ईरान की राजनीति और राजनितिक इतिहास को व्यवस्थित न जानने वालों के लिए अच्छी सिनोप्सिस का कम करता दिखता है.

    आलेख से पता लगता है कि ऐसे विकट प्रश्नों के हल तलाशना कितना मुश्किल काम है और यही स्थिति ईरान की अभी की दु:स्थिति बयान कर रही है.

    घर-परिवार के सीमित दायरे वाले लड़ाई-झगड़ों और उलझाव भरे संबंधों से पार पाने में ही कभी लोगों की साडी बुद्धिमत्ता और रणनीति चूक जाती है, यहाँ तो पहाड़ सा मामला और दुनिया के मेले का झमेला है!

    दुनिया में विज्ञान का हस्तक्षेप ज्यों ज्यों फैलाव होता जा रहा है, शक्तिशालियों-सत्तापाइयों की दृष्टि उतनी ही संकुचित होती जा रही है और विज्ञान को उतना ही घसीट कर धर्म-धन-बल की गुलामगिरी में लगा दिया जा रहा है. अमेरिका जैसा विज्ञान-उन्नत समाज भी बेलगाम स्वार्थ की खातिर विज्ञान और तर्क की मर्यादा को लांघने के ब्याज से मानवता को तार तार कर रहा है, एक बड़ा पेंच यहाँ भी फंसा है.

    बहरहाल, इस या ऐसे उलझावों पार सकारात्मक कुछ भी हल पाने की कोई सूरत यथाशीघ्र नजर आये, यही 'गोहरा' सकता हूँ.....

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  13. ईरान-अमेरिका के सम्बन्ध के परिपेक्ष्य में तीसरी दुनिया की राजनीति और कूटनीति क्या अभी चल रही है,और यह कैसे चिंताजनक स्थिति में हैं, इस बाबत एक साफ नजरिया यहाँ रखा गया है और जो मुझे भी सही जंचता है. और कैसे ईरान में जो कुछ अच्छा था उसका खात्मा साम्प्रदायिक विचारों से चालित सत्ता ने वहाँ कर रखा है, उसको एकदम से फरिया और समझा कर आलेखक ने रख दिया है, यह भी ईरान की राजनीति और राजनितिक इतिहास को व्यवस्थित न जानने वालों के लिए अच्छी सिनोप्सिस का कम करता दिखता है.

    आलेख से पता लगता है कि ऐसे विकट प्रश्नों के हल तलाशना कितना मुश्किल काम है और यही स्थिति ईरान की अभी की दु:स्थिति बयान कर रही है.

    घर-परिवार के सीमित दायरे वाले लड़ाई-झगड़ों और उलझाव भरे संबंधों से पार पाने में ही कभी लोगों की साडी बुद्धिमत्ता और रणनीति चूक जाती है, यहाँ तो पहाड़ सा मामला और दुनिया के मेले का झमेला है!

    दुनिया में विज्ञान का हस्तक्षेप ज्यों ज्यों फैलाव होता जा रहा है, शक्तिशालियों-सत्तापाइयों की दृष्टि उतनी ही संकुचित होती जा रही है और विज्ञान को उतना ही घसीट कर धर्म-धन-बल की गुलामगिरी में लगा दिया जा रहा है. अमेरिका जैसा विज्ञान-उन्नत समाज भी बेलगाम स्वार्थ की खातिर विज्ञान और तर्क की मर्यादा को लांघने के ब्याज से मानवता को तार तार कर रहा है, एक बड़ा पेंच यहाँ भी फंसा है.

    बहरहाल, इस या ऐसे उलझावों पार सकारात्मक कुछ भी हल पाने की कोई सूरत यथाशीघ्र नजर आये, यही 'गोहरा' सकता हूँ.....

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  14. ईरान-अमेरिका के सम्बन्ध के परिपेक्ष्य में तीसरी दुनिया की राजनीति और कूटनीति क्या अभी चल रही है,और यह कैसे चिंताजनक स्थिति में हैं, इस बाबत एक साफ नजरिया यहाँ रखा गया है और जो मुझे भी सही जंचता है. और कैसे ईरान में जो कुछ अच्छा था उसका खात्मा साम्प्रदायिक विचारों से चालित सत्ता ने वहाँ कर रखा है, उसको एकदम से फरिया और समझा कर आलेखक ने रख दिया है, यह भी ईरान की राजनीति और राजनितिक इतिहास को व्यवस्थित न जानने वालों के लिए अच्छी सिनोप्सिस का कम करता दिखता है.

    आलेख से पता लगता है कि ऐसे विकट प्रश्नों के हल तलाशना कितना मुश्किल काम है और यही स्थिति ईरान की अभी की दु:स्थिति बयान कर रही है.

    घर-परिवार के सीमित दायरे वाले लड़ाई-झगड़ों और उलझाव भरे संबंधों से पार पाने में ही कभी लोगों की साडी बुद्धिमत्ता और रणनीति चूक जाती है, यहाँ तो पहाड़ सा मामला और दुनिया के मेले का झमेला है!

    दुनिया में विज्ञान का हस्तक्षेप ज्यों ज्यों फैलाव होता जा रहा है, शक्तिशालियों-सत्तापाइयों की दृष्टि उतनी ही संकुचित होती जा रही है और विज्ञान को उतना ही घसीट कर धर्म-धन-बल की गुलामगिरी में लगा दिया जा रहा है. अमेरिका जैसा विज्ञान-उन्नत समाज भी बेलगाम स्वार्थ की खातिर विज्ञान और तर्क की मर्यादा को लांघने के ब्याज से मानवता को तार तार कर रहा है, एक बड़ा पेंच यहाँ भी फंसा है.

    बहरहाल, इस या ऐसे उलझावों पार सकारात्मक कुछ भी हल पाने की कोई सूरत यथाशीघ्र नजर आये, यही 'गोहरा' सकता हूँ.....

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  15. शमशाद भाई ने बहुत साहस के साथ पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में आज के संकट को गहराई में जाकर देखा है। आम तौर पर प्रचलित सर्वलोकप्रियतावादी विश्‍लेषण के बरक्‍स इस प्रकार के वैचारिक मंथन हमें अपनी दृष्टि से सही दिशा में ले जाने का काम करते हैं। यह आलेख शायद हमारे वाम नेताओं को ही नहीं पूरी भारतीय विदेश नीति को भी एक नई दिशा देता है। शमशाद भाई ने जिसे बेबाकी के साथ इस्‍लामी कट्टरपंथ की आलोचना की है, वह स्‍तुत्‍य है और उनकी वैचारिक दृढ़ता को मैं सलाम करता हूं।

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  16. महेश पुनेठा, मुसाफ़िर भाई और प्रेम चंद गांधी जी, आपकी टिप्पणियां मेरी धरोहर हैं और संबल भी, मेरे लिखे का प्रमाण भी...आशा है आपका स्नेह यूं ही मिलता रहेगा. सादर

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  17. निश्चित रूप से यह एक जरुरी और पारदर्शी आलेख है ...|आज हम जिस ईरान को अमेरिका के खिलाफ लड़ते और जूझते हुए देख रहे हैं , वह जनतांत्रिक और मानवतावादी ईरान तो कत्तई नहीं है ..|हाँ अमेरिका की बारे में भी हमारी यही राय है , बेशक कि वह धर्म आधारित राज्य नहीं है ..|लेकिन इस आलेख में मुझे ऐसा लगता है कि ईरान की निर्मम आलोचना करते समय उसके पड़ोसियों और उस पर नजर गडाए गिद्धों को जरा बख्श दिया गया है ..|मसलन आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि ईरान -इराक युद्ध के लिए सिर्फ ईरान ही जिम्मेदार था ...?..और यह मानना भी भोलापन ही होगा कि उसके सारे पडोसी देशों में बड़ी जन तांत्रिक स्थितियां हैं ...|आप अपने लेख में ईरान से तो भारी अपेक्षाये रखते हैं , लेकिन वह जिस भूगोल से घिरा है , उसे कटघरे में नहीं रखते ...|ईरान ही नहीं पूरा अरब जगत ही धर्म आधारित, कट्टर और बंद समाज है , तो पड़ताल उस पुरे परिदृश्य की होनी चाहिए ..|अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में बिना परिदृश्य को समझे किसी एक देश पर कैसे कुछ कहा जा सकता है ...|
    सिर्फ शिया होने से ईरान के दाग अधिक तो नहीं हो जाते , और सुनी होने से उसके पड़ोसियों के कम ...|..बेशक ईरान में काफी दमन हुआ है , लेकिन सिर्फ ईरान ही क्यों , पुरे अरब जगत में ही जनतंत्र का दमन हुआ है ..|
    आप यह ना समझे कि इस आधार मैं ईरान का समर्थन कर रहा हूँ , वरन मैं तो स्वय ही यह चाहता हूँ कि पुरे अरब जगत में वामपंथी जनतांत्रिक शक्तियां मजबूत हों , जिसमे ईरान भी शामिल है ...
    अब यह काम तो अमेरिका करने से रहा ...इसलिए हमें ईरान के लोगों पर ही भरोसा करना चाहिए ...
    आपने यह बहस चलाई ...आपका शुक्रिया ...

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  18. रामजी, इरान का आंकलन जिस जाविये से किया गया है वही जाविया इसके अडौस पडौस के लिये भी है, बात इरान केन्द्रीत है तो हाल चाल उसका ही ठीक से बताया जाना था, आपने लेख के अंतिम दो पैरे ठीक से नहीं पढे़ शायद इसी लिये इस निष्कर्ष पर पहुँचे. शिया-सुन्नी, दोनों किस्म के राजनीतिक इस्लाम की भर्स्तना करना अब जरुरी बन गया है, पश्चिम के कुछ वाम तत्व इस्लामी ताकतों द्वारा किये जा रहे इस्राईल-अमेरिकी संघर्ष को मुक्ति युद्ध बता रहे हैं और ये इस्लामी पलटन पूरी दुनिया में, दुनिया की समस्याओं का समाधान इस्लाम और कुरान/शरिया बता रहा है, जिस पर वैचारिक हमला किया जाना आज के वक्त की सबसे बडी पुकार है. सादर

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  19. प्रश्न ये नहीँ है कि इरान क्या कर रहा है प्रश्न ये है कि मैँ कैसे इस्राइल जाकर इरान के खिलाफ़ लडूँ ताकि मुझे और मेरे आर्यन यानि इरानी बिरादरोँ को मुक्ति मिले

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…