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शुक्रवार, 11 जून 2010

जिंदे को ना पूछे बात...मरे को दूध और भात

पिछले दिनों मेरी कामवाली बाई ने जल्दी जाने की छुट्टी मांगी क्यूंकि उसे बैंक जाना था,मैंने यूँ ही हंस कर पूछ लिया... और पैसे जमा करने है?कहने लगी,..ना..पैसे निकाल कर घर भेजने हैं, दस हज़ार का इन्तजाम और करना है...मैं आश्चर्य में डूब गयी...अभी कुछ ही दिन पहले उसने सात हज़ार रुपये मुझसे गिनवा कर बैंक में जमा किये थे,मुझसे अपना पास बुक भी चेक करवाया था.उसके खाते में पहले से पांच हज़ार की रकम देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी...चलो दिन रात मेहनत करती है...कुछ पैसे तो जमा कर रखे हैं और आज वो सारे पैसे घर भेज रही थी ऊपर से क़र्ज़ लेने को भी तैयार....पता चला उसकी दादी गुजर गयीं हैं और उनके श्राद्ध के लिए पैसे चाहिए...इसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी ..और कोई भाई भी नहीं इसलिए माँ को पैसे भेजने की जिम्मेवारी उसकी है.

मुझे श्राद्ध के धार्मिक कृत्यों के बारे में ज्यादा मालूम नहीं. लोगों को भोज खिलाने..दान पुण्य करने से सचमुच उनकी आत्मा को शांति मिलती है या नहीं,पता नहीं. पर इतना जरूर पता है कि धरती पर बचे लोगों की ज़िन्दगी में कई बार घोर अशांति आ जाती है...इन पैसों से वो मेरी बाई कितना कुछ कर सकती थी और कितना कुछ करने का सपना उसने देखा होगा. मैंने उसे कितना समझाया.....माँ को ही अगर ये पैसे देने हैं तो वह इन पैसों से...अपने घर की मरम्मत करवा सकती है,एक गाय खरीद सकती है लेकिन वो मुझे उल्टा समझाने लगी...आपको नहीं मालूम,अगर पूरे गाँव को भोज नहीं खिलाया तो गाँव वाले हमें जात बाहर कर देंगे,हमारा हुक्का पानी बंद कर देंगे...हमारे घर का पानी कोई नहीं पिएगा,हमें किसी शादी ब्याह,जन्मोत्सव में नहीं बुलाएँगे. एक बार तो मैंने खिन्न मन से ये भी कह दिया,क्या फर्क पड़ता है,बस पांच पंडित को खिला दो और माँ को यहीं बुला लो.लेकिन मुझे पता था मेरे लिए कहना आसान है.पर अपनी जड़ों से कटकर कौन रह पाया है? ये लोग इतने कष्ट में यहाँ रहते हैं पर कभी बताना नहीं भूलते, घर में हमारा अपना मकान है,खेती बाड़ी है,..यह बताते हुए इनकी आँखों में जो चमक आ जाती है.उस से कैसे महरूम किया जा सकता है...शायद एक एक पैसे जोड़ते हुए इनकी ज़िन्दगी चली जाए पर मन में ये सपना जरूर पलता रहता है कि बहुत सारे पैसे जमा कर लेंगे फिर गाँव जाकर आराम की ज़िन्दगी बसर करेंगे,इसी सपने के सहारे ये इस महानगर की कड़वी हकीकत रोज झेलते हैं.

लेकिन इन आडम्बरों में अगर ये अपनी पसीने की कमाई ऐसे बहाते रहेंगे तो कैसे जोड़ पायेंगे पैसे?बचपन में गाँव जाना होता था,तो ऐसी बाते सुनने को मिलती थीं. इतने दिनों बाद भी, कहीं कुछ नहीं बदला,वही जन्म जन्मान्तर का क़र्ज़ जिसे दादा लेता है और पोते,परपोते चुकाते रहते हैं...ब्याज चुकाते ही सारी ज़िन्दगी चली जाती है,मूल तो वैसे ही अनछुआ पड़ा रहता है.फिल्मो में कुछ ज्यादा बढा चढा कर दिखाते हैं पर स्थिति सचमुच ज्यादा अलग नहीं..पर इस स्थिति को बदलने का बीडा कौन उठाएगा?ज्यादातर पढ़े लिखे लोग नौकरी की तलाश में शहर का रुख कर लेते हैं और जो एकाध शिक्षित घर होते हैं वे इन गरीबों को क़र्ज़ देने का काम करते हैं.वे तो उन्हें इस से दूर रहने की सलाह देंगे नहीं.कौन इसके विरूद्व अलख जगायेगा ?,ये सचमुच चिंता का विषय है.
बरसों पहले गोदान पढ़ी थी और उसके बरसों पहले वह लिखी गयी थी पर आज भी हर गाँव में ना जाने कितने 'होरी' और कितने 'गोबर' ज़िन्दगी की उसी पुरानी जद्दोजहद
से जूझ रहें हैं.

बाई यह भी बता रही थी कि बहुत सारी चीज़ें दान करनी पड़ेंगी. कहीं सुनी एक कहावत याद आ गयी."जिंदे को ना पूछे बात...मरे को दूध और भात' चाहे फटे चिथडों में ज़िन्दगी गुजरी हो,,टूटी चारपाई भी नसीब ना हो.पर मरने के बाद,नए कपड़े,चारपाई,गद्दे सब दान किये जाते हैं .कुछ बदले हुए रूप में ही सही पर ऐसा संपन्न घरों में भी खूब होता है.बचपन की ही एक घटना है,मेरे पड़ोस में एक वृधा रहती थीं.घर वाले उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं करते थे,खाने पीने,डॉक्टर दवा.सबका ख्याल रखते थे.पर इसके परे भी उन बूढे मन की भी कुछ ख्वाहिशें होती हैं,इससे निरपेक्ष थे. दादी की चप्पल टूट गयी थी,जिसे मोची से मरम्मत करवा दी गयी थी.उसने एक भद्दा सा कला रबर का टुकडा लगा दिया था.दादी को अपने भाई के पोते की शादी में जाना था.कई बार उन्होंने बेटे बहू से कहा,मुझे एक नयी चप्पल ला दो.पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.अक्सर दादी कोने में पड़ी चारपाई पर लेटी रहतीं,हम बच्चे आस पास खेलते रहते थे,ना जाने दादी को कितनी बार खुद से कहते सुना,'लोग हसेंगे कि बेटा माँ का ख्याल नहीं रखता' यहाँ भी उन्हें अपने बेटे की इज्जत की ज्यादा फिकर थी..आखिर उन्हें एक दिन मय साजो समान के शादी में जाते देखा..पैरों में वही टूटी चप्पल थी.काफी दिनों बाद वे बीमार पड़ीं.मैं भी माँ के साथ,उन्हें देखने हॉस्पिटल गयी,देखा बेड के नीचे वही टूटी चप्पल रखी है.दादी गुजर गयीं,बड़ी धूमधाम से उनका श्राद्ध हुआ.पूरा खानदान जुटा,सारे शहर को न्योता था और दान में पलंग,बर्तन,कपडों के साथ थी,एक चमचमाती हुई नयी चप्पल...

किसी शायर की ये पंक्तियाँ याद आती हैं.

"सारा शहर उसके जनाजे में था शरीक
तन्हाइयों के खौफ से, जो शख्स मर गया"

एक तरफ तो ये गरीब, अपनी सारी जमापूंजी खर्च करके,यहाँ तक कि क़र्ज़ लेकर भी सारे कर्मकांड निभाते हैं और दूसरी तरफ ये भी देखा कि लाखो कमाने वाले, साधारण औपचारिकता भी नहीं अपनाते.एक परिचित के पिता की मृत्यु हो गयी थी.जब वे बीमार थे पूरी सोसायटी के लोग उनका हालचाल पूछते रहते थे..पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने एक हवन रखा था.अपने कुछ रिश्तेदारों के अलावा सिर्फ हमें बुलाया था वो भी शायद इसलिए क्यूंकि मैं उन्हें दो बार हॉस्पिटल में देखने गयी थी.एक नौजवान पंडित हवन करवा रहा था.इतने लोगों को नतमस्तक, अपनी बाते सुनते देख शायद वह कुछ ज्यादा ही उत्साह में आ गया.बीच बीच में भजन गाने लगता और सबसे आग्रह करता कि 'एक पंक्ति मैं गाता हूँ,उसे आपलोग भी दुहरायें'.सबलोग तन्मयता से भजन गाते रहें.करीब ३ घंटे तक पूजा चली.फिर पंडित जी ने बोला सबलोग आकर प्रसाद ले लें.मैं बैठी रही,पहले घर वालों को लेना चाहिए.कुछ देर बाद पतिदेव ने इशारा किया...चलते हैं.हमने पति-पत्नी दोनों को दिलासा के दो शब्द कहे और इजाज़त मांगी...दोनों ने सर हिलाया.हाँ ठीक है.ये लोग मुंबई के नहीं हैं,इनके सारे नाते-रिश्तेदार अभी भी गाँव में ही हैं.पर यहाँ आकर,ये इतने बदल गए हैं.कैसी विडंबना है,कहीं तो कोई इसलिए परेशान है कि कोई मेरे घर का पानी नहीं पिएगा,और कहीं किसी को इतनी भी परवाह नहीं कि एक ग्लास पानी ही पूछ लें.

16 टिप्‍पणियां:

  1. कटु सत्य , समाज की कुरीतियों पर प्रतिघात, आवश्यक कदम , मन क्लांत हो जाता है ये सब देखकर. जरुरत है समाज को जागरूक करने की और इसमें ये पोस्ट सहायक होगी.

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  2. रश्मि ! आज तो एकदम मेरे दिल कि बात कह दी आपने ..इन कर्मकांडो से मरने वाले को तो शांति मिलती हो न हो पर जीवित लोगों कि शांति जरुर भंग हो जाती है ..और ये सब भारत में ही नहीं बल्कि हर जगह होता है यहाँ भी मरने वाला अपने कर्मकांडों के लिए अलग से पैसा जोड़ता है और आमतौर पर किसी शादी से ज्यादा खर्चीला मारना होता है .

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  3. सादर नमस्कार। बहुत ही यथार्थ और सटीक पोस्ट। आप हम जितने शिक्षित होते जा रहे हैं पर सोंच बदल नहीं रही है।

    हमारे यहाँ तो मैंने कई लोगों को देखा है कि खेत बेंचकर अपने लड़के की शादी में बकरी कटवाते हैं, शराब की नदी बहाते हैं...और आर्क्रेस्टा नचवाते हैं...
    बहुत ही उम्दा पोस्ट। सादर।।

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  4. हाँ रश्मि ये सच्चाई है, आज शहर में लोग इतने औपचारिक हो गए हैं. माँ बाप की जरूरी जरूरतों के लिए पैसे नहीं होते हैं और पत्नी के लिए नए फैशन के साड़ी और चप्पल होनी चाहिए. वाकई अगर बुजुर्ग जिन्दा है तो बोझ है न, और मर गए तो खुशी के मारे भोज और दान किये जाता है कि चलो बला टली. अब तो इनसे छुट्टी मिली. लोगों ने देखा औरवाहवाही हुई- रोज कौन देखने आता है? यहाँ पर कहा जाता है - 'जियत न देने कौरा , मरे उठाये चौरा' .

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  5. ब्राह्मणों ने जन्म से मृत्यु तक हर अवसर को कमाने का जो साधन बना रखा था समाज उसके जाल में ऐसा उलझा कि फिर निकल ही नहीं पाया…

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  6. सटीक पोस्ट....शहर में तो कुछ बदलाव आया भी है...पर गांव में तो मौत पर भी पुरे गांव को भोज देने की परम्परा है...काश लोग समझ पते की इस तरह से क़र्ज़ ले कर मरने वाले की आत्मा को कोई शांति नहीं मिलती...सब धर्म के नाम पर लूटने की कला है..प्रेमचंद की लिखी बूढी काकी याद आती है...जिन्दा रहते तो पूछना नहीं और बस अपनी शान के लिए भोज देना कहाँ की अकलमंदी है...
    विचारणीय पोस्ट

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  7. jamaana badal raha hai...gareeb dil se ameer hote jaa rahe hain aur ameer dil se gareeb ...

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  8. बहुत अच्छा लेख है। लोग जानते है,सम्झते भी है पर पहल करने से डरते हैं अकेले पड जाने से। पर आप यदि इसे सही मानकर अपनाते हैं तो सब पर भरी पड्ते हैं।

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  9. अशोक जी ने सही कहा है. सदियों पहले ब्राह्मणों ने अपनी कमाई के लिए ढेरों ऐसे ही नियम-क़ानून बना रखे थे... बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कार ही संस्कार... एक ओर समाज की चिंता और दूसरी ओर परलोक का भय... गाँवों में जहाँ लोग अब भी समुदाय से जुड़े हैं... इसी चिंता में रीति-रिवाज निभाते जाते हैं... अमीरों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर गरीब मारे जाते हैं... वे अगर ये कर्मकाण्ड किसी संवेदना के तहत करते तो बड़े-बूढों का ख्याल रखते ...पर वे तो डर से करते हैं ये सब... वो डर जो उन्हें सदियों से घेरे हुए है.

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  10. mujhe lagta hai ki ashok ji aur mukti ji ke kahne k bad baki kuch bacha hi nai kahne ke liye... unke katu satya se kaun asehmat ho sakta hai.....

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  11. चलिए एकबार फिर भाई-बहिन की सोच एक जैसी निकली.. :) इस कर्मकांड के विरोध में आजसे १३-१४ साल पहले एक कविता लिखी थी.. और तभी से त्रियोदशी भोज में जाना भी छोड़ दिया.. आपकी पोस्ट ने एकबार फिर याद दिलाया कि इसके लिए और लोगों को भी जागरूक किया जाये..

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  12. काफ़ी श्रम साध्य कार्य चल रहा है। अच्छा लगा।

    संवाद लोगों को वैचारिक रूप से आंदोलित करते हैं और उन्हें अधिक विचारसंपन्न होने को प्रेरित करते हैं। अधिक तार्किक होने के रास्ते खोलते हैं।

    शुक्रिया।

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