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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

दूधनाथ सिंह : एक प्रतिबद्ध स्वर


कुलदीप कुमार ने यह लेख आज द हिन्दू के अपने कॉलम "हिन्दी बेल्ट" लिए लिखा था...किसे पता था कि यह श्रद्धांजलि लेख में बदल जाएगा। जनपक्ष की ओर से हिन्दी के प्रतिबद्ध कहानीकार और आलोचक दूधनाथ सिंह जी को सादर श्रद्धांजलि। 

A committed voice
  • Kuldeep Kumar

News from Allahabad is very depressing as it tells us that top Hindi writer Doodhnath Singh, 81, is lying at home in a critical condition due to serious kidney failure. I have fond memories of a chance meeting with him in early February last year at Allahabad’s famous Indian Coffee House in Civil Lines. In the early 1970s, when I was acquiring familiarity with contemporary Hindi literature, Doodhnath Singh was one of the writers whom I read with great interest. A line from his early poems still resonates in my ears: “Lift ke andhere mein brain haimrej ho rahe hain” (Brain haemorrhages are taking place in the darkness of the elevator). Later, I came to know him as a friend although he was much older than me.  

Doodhnath Singh is a committed Left-wing writer and happens to be the national president of the pro-CPI (M) Janwadi Lekhak Sangh. When he exploded on the Hindi literary scene with his collection of short stories Sapaat Chehrewala Aadmi (Man with a Plain Face), published by Rajendra Yadav’s Akshar Prakashan in 1967, the new talent was viewed with awe and nearly all the short stories, be it Reechh (Bear), Raktapaat (Bloodletting), Duhswapna (Nightmare) or Iceberg, acquired near-iconic status. He also made his mark as a significant poet of his generation as well as a novelist, playwright and critic.

His book on great Hindi poet Suryakant Tripathi Nirala, published by Lokbharati Prakashan in 1972, was tantalisingly titled Nirala: Aatmahanta Aastha (Nirala: A Self-destructive Belief) and Doodhnath Singh had to explain in the introductory note that he did not mean that Nirala was suicidal. What he actually meant was that once a writer had devoted himself completely to his art, he had to go through the process of continuous self-annihilation, savouring the taste of his own blood on the tip of his tongue. One could discern in this formulation an unmistakable influence of T. S. Eliot but the book was in fact an intimate conversation between two poets. It was a collection of observations made on the margin of Nirala’s books as well as scattered entries in Singh’s diaries but they somehow formed an integrated whole and offered a palpably new interpretation of the great poet and his work.
In 1975, when the country’s politics was experiencing a paradigm shift, Doodhnath Singh brought out a literary journal of uncertain periodicity and appropriately christened it Pakshdhar (Partisan). Although it did not have a long life, the journal proved to be an effective political-literary intervention and confirmed Singh’s status as an important writer with a social conscience.
Most of his books have been published by Lokbharati Prakashan, Radhakrishna Prakashan and Rajkamal Prakashan and they include his novels Aakhiri Kalaam (Last Discourse), Nishkasan (Expulsion) and Namo Andhakaram (Salute to Darkness), collections of short stories Mai ka Shokgeet (The Sad Song of Mother), Sukhant (Happy Ending) and Katha Samagra (Collected Stories), play Yamgatha (The Story of Yama), poetry collections such as Tumhare Liye (For You) and Laut Aa O Dhaar (Return! O, Stream), and books of literary criticism like Muktibodh Sahitya Mein Nayee Pravrittiyan (New trends in Muktibodh’s writings). He has also edited great Hindi woman poet Mahadevi’s writings with his critical comments. And, this is by no means an exhaustive list of his works.

While Doodhnath Singh’s early work expressed the angst felt by the youth of the 1960s due to an all-pervasive collapse of social, moral, economic and political values, his later work voiced a powerful protest against the evolving realities. His short story “Mai ka Shokgeet” is a hair-raising document of domestic violence against women while “Aakhiri Kalaam” is a post-Babri masjid polemics involving our past as well as present. In fact most of his post-1990 writings are imbued with a sense of deep frustration, anguish, anger and protest against the formation of a political culture that is destructive by its very nature. Singh tries to marshal multi-layered history, myths, fables and cultural interpretations to express his deeply felt revulsion against an ideology that tears asunder the intricately woven fabric of our composite culture. And, being a creative writer, he accomplishes this feat without resorting to sloganeering or explicit portrayals. Little wonder that veteran theatre critic Romesh Chandra had this to say about Singh’s play “Yamgatha” in his review published in The Hindu on February18, 2005: “In the past we have seen quite a few plays that have tried to draw a parallel between mythology and the current socio-political scene with varying degrees of success but "Yama Gatha" brings the message home without being propagandist.”

His book on Muktibodh, published in 2013 by Rajkamal Prakshan, proved that the critical acumen that he displayed in his study of Nirala had become even sharper over the decades as he offered radically different interpretation of the iconic poet’s work and brought out several new facets of his poetry.

Doodhnath Singh’s writings have been translated into English, German, Marathi, Bengali, Gujarati, Punjabi and Malayalam. He is a recipient many literary awards including Bharat Bharati Samman, Bharatendu Samman, Sharad Joshi Samman and Kathakram Samman.

(द हिन्दू से साभार) 


बुधवार, 9 अगस्त 2017

संगीत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह : कुलदीप कुमार




पश्चिम के साथ साक्षात्कार की प्रक्रिया में उन्नीसवीं सदी में हिंदुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी अस्मिता को अपने “गौरवपूर्ण अतीत” के आलोक में समझने और परिभाषित करने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में स्वयं को न केवल सांस्कृतिक बल्कि एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भी पुनर्गठित किया। सांप्रदायिकता इसी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न विचारधारा है जिसकी बुनियाद अपने समुदाय के हितों को दूसरे समुदाय के हितों के खिलाफ समझने पर रखी गई है। ज़ाहिर है कि इस क्रम में अपने समुदाय का गौरवगान करने और दूसरे समुदाय से नफरत करने की प्रवृत्ति का पैदा होना बहुत स्वाभाविक है। 

भारतीय उपमहाद्वीप का संगीत उसमें रहने वाले सभी निवासियों के योगदान से बना संगीत है जिस पर किसी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ऐतिहासिक कारणों से किसी एक समुदाय का अल्प या दीर्घ अवधि के लिए वर्चस्व तो स्थापित हो सकता है लेकिन एकाधिकार कभी भी स्थापित नहीं हो सकता; और, यह वर्चस्व भी स्थायी नहीं होता क्योंकि दूसरा समुदाय स्थापित सत्ता-समीकरण को बदलने के लिए हमेशा सक्रिय रहता है। यदि इस सक्रियता के पीछे केवल बेहतर कलासृजन की प्रेरणा हो तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यदि इसके पीछे शुद्ध सांप्रदायिक आग्रह हो समस्या पैदा होती है। 

संगीतकार संगीत को ईश्वर की आराधना बताते हैं। अक्सर उन्हें यह कहते हुए भी पाया जाता है कि संगीत उनके लिए ईश्वर तक पहुँचने का साधन है। नाद को ब्रह्म भी माना जाता है और कहा जाता है कि संगीत देश, काल, जाति, धर्म और संप्रदाय---सभी सीमाओं का अतिक्रमण करता है क्योंकि वह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक है। संगीतकार का धर्म केवल संगीत है क्योंकि स्वरों का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यह आदर्श स्थिति का वर्णन है, वास्तविक स्थिति का नहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में जिस तरह सांप्रदायिकता की विषबेल फली-फूली है, उसके कारण देश का विभाजन करने वाली इस विचारधारा के जहरीले असर से संगीत भी अछूता नहीं रह सका है। 

पुरानी पत्रिकाएँ उलटने-पलटने के क्रम में ‘अकार’ का एक अंक (अगस्त 2013-नवंबर 2013) हाथ में आया जिसमें सैयद जुल्फिकार अली बुखारी की आत्मकथा ‘सरगुजश्त’ का एक अंश छपा है। सैयद जुल्फिकार अली बुखारी सैयद अहमद शाह बुखारी (उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार पितरस बुखारी) के छोटे भाई थे और आजादी के पहले इन दोनों भाइयों का ऑल इंडिया रेडियो पर ऐसा वर्चस्व था कि उसे मज़ाक में लोग बीबीसी (बुखारी ब्रदर्स कॉर्पोरेशन) कहने लगे थे। विभाजन के बाद जुल्फिकार बुखारी रेडियो पाकिस्तान में काफी समय तक काम करने के बाद उसके महानिदेशक भी बने। यह आत्मकथा उन्होंने पाकिस्तान में ही लिखी लेकिन इस अंश का संबंध 1930 के बाद के विभाजनपूर्व भारत से है। 

बुखारी लिखते हैं: “अब इनको कौन बताए कि मद्रास को छोड़कर बाकी तमाम हिंदुस्तान में अगर मौसिकी का इल्म है तो सिर्फ मुसलमानों को, मौसिकी हिंदुओं के नजदीक भी नहीं गई। मैं ये बात किसी तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की बिना पर नहीं कहता, इल्म के मामले में तअस्सुब कैसा? हकीकत ये है कि हमारे हिंदुस्तान में आने से कब्ल (पहले) यहाँ सिर्फ चार सुर रायज (प्रचलित) थे। मुसलमानों ने सात सुर यहाँ आकर रायज किए। ये तमाम मौसिकी मुसलमानों की आवरदा (लाई हुई) है। मद्रास में इस मौसिकी को अरब लाये और शुमाली (उत्तरी) हिंदुस्तान में ईरान के रास्ते से आने वाले मुसलमान।” विष्णु दिगंबर पलुस्कर--- जिनके ओंकारनाथ ठाकुर, विनायकराव पटवर्धन, नारायणराव व्यास, डी. वी. पलुस्कर और बी. आर. देवधर जैसे यशस्वी शिष्य हुए--- के बारे में बुखारी साहब के उद्गार कुछ यूं निकले हैं: “भाईजान मरहूम और मैं दोनों विष्णु दिगंबर के लाहौर वाले स्कूल में दाखिल हुए ताकि देखें तो सही कि ये लोग क्या करते हैं। मगर चंद ही दिनों में लाहौल पढ़कर बाहर आ गए। अब कौन बैठकर भजन गाता और वो भी बेसुरे उस्ताद की आवाज के साथ आवाज मिलाकर।” 

पाकिस्तानी फिल्मों के मशहूर संगीत निर्देशक खुर्शीद अनवर ने वॉइस ऑफ अमेरिका की उर्दू सर्विस के प्रमुख ब्रायन सिल्वर को दिये एक इंटरव्यू में भी यही बात कही थी कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मुसलमानों का है। कान्हड़ा का जिक्र आने पर उन्होंने कहा कि सभी तरह के कान्हड़े, चाहे वह दरबारी कान्हड़ा हो या कौंसी कान्हड़ा या हुसैनी कान्हड़ा या नायकी कान्हड़ा—ये सभी मुसलमानों के ही बनाए हुए हैं। यूं सभी यह जानते हैं कि दरबारी कान्हड़ा, मियां की तोड़ी, मियां की सारंग, मियां मल्हार जैसे मशहूर राग तानसेन के बनाए हुए हैं जिनके बारे में अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वे अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बने थे या नहीं। आचार्य बृहस्पति जैसे प्रकांड विद्वान और संगीतशास्त्री का मत है कि तानसेन ने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है और इसका पहले-पहल उल्लेख अठारहवीं सदी में मिलता है।

संगीत जगत हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं और उद्देश्यों से अछूता रहा हो, ऐसा भी नहीं है। विष्णु दिगंबर पलुस्कर और विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत-शिक्षण की जो संस्थाएं खोलीं, उनके द्वारा काफी हद तक इनकी पूर्ति हुई। पलुस्कर के यशस्वी शिष्यों ने उनकी परंपरा को देश भर में फैलाया और आज वह लगभग वर्चस्व वाली स्थिति में है। लेकिन यह भी एक विचारणीय विषय है कि उनकी शिष्य-परंपरा में एक भी ऐया मुस्लिम संगीतकार क्यों नहीं है जो संगीत सम्मेलनों के मंचों पर नज़र आता हो। जबकि सच्चाई यह है कि अगर ग्वालियर घराने के संस्थापक हद्दू खां-हस्सू खां अपनी गायकी हिन्दू शिष्यों को न सिखाते तो विष्णु दिगंबर पलुस्कर का उदय ही न होता। शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग में संगीत के प्रचार के उद्देश्य से पलुस्कर ने तुलसीदास, सूरदास, मीरा और नानक जैसे संत कवियों की पंक्तियां लेकर उन्हें रागों में बांधा, भजन के अतिरिक्त संगीत के अन्य प्रकारों को त्याज्य माना और इस तरह इस धारणा को बल प्रदान किया कि भारतीय संगीत मुख्यतः धर्म से जुड़ा है और मुस्लिम शासकों के दौर में संगीतकारों और संगीत, दोनों के (चारित्रिक) स्तर में गिरावट आई। 

सांप्रदायिक दृष्टि से संगीत को देखने के परिणामस्वरूप पाकिस्तान और भारत, दोनों में एक अजीब किस्म की कोशिश की गई और रागों के नाम बदले गए। सौभाग्य से यह कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। पाकिस्तान में रामकली, दुर्गा, भैरव, शंकरा, श्याम कल्याण जैसे उन रागों के नाम बदलने की कोशिश हुई जिनमें  हिन्दू देवी-देवताओं के नाम आते थे और बन्दिशों में भी ऐसे ही परिवर्तन किए गए लेकिन यह कोशिश विफल रही। भारत में ओंकारनाथ ठाकुर ने राग जौनपुरी को जीवनपुरी कहना शुरू किया जबकि यह सर्वमान्य तथ्य है कि इस राग की रचना जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी ने की थी। पुराने लोग अभी भी याद करते हैं कि ओंकारनाथ ठाकुर संगीत सम्मेलन के मंच को गंगाजल से शुद्ध करके और उस पर अपनी मृगछाला बिछाकर बैठने के बाद ही अपना गायन शुरू करते थे। इसी तरह यमन को केवल कल्याण कहने की परंपरा भी डाली जा रही है। लेकिन सौभाग्य से यह प्रयास भी परवान नहीं चढ़ पा रहा है। 

विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत के हिंदूकरण की कोशिश नहीं की, लेकिन उनका संस्कृत में लिखे गए प्राचीन संगीत ग्रन्थों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर था। जानकी बाखले ने अपनी पुस्तक “टु मेन एंड म्यूज़िक” में विस्तार से वर्णन किया है कि किस तरह वे मुस्लिम उस्तादों से संस्कृत ग्रन्थों के बारे में सवाल करते थे और यह सिद्ध करते थे कि उनकी गायकी का कोई प्रामाणिक सैद्धान्तिक आधार नहीं है। लेकिन इन्हीं उस्तादों की सहायता लेना उनकी मजबूरी थी और उनसे ही राग-चर्चा करके और बन्दिशें एकत्रित करके भातखंडे ने अपनी पुस्तकें लिखीं। यही नहीं, जब उन्होंने लखनऊ में संगीत शिक्षण के लिए मैरिस कॉलेज की स्थापना की तब खानदानी संगीतजीवी मुस्लिम संगीतकारों को अध्यापन के लिए नियुक्त करना पड़ा। मैक्स कैट्ज़ ने ‘सांस्थानिक सांप्रदायिकता’ पर लखनऊ में किए गए अपने शोध के आधार पर दर्शाया है कि किस तरह इस विद्यालय में, जिसे अब भातखंडे संगीत संस्थान के नाम से जाना जाता है और 2000 से जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा भी प्राप्त है, मुस्लिम उस्तादों और छात्रों की संख्या में लगातार कमी आती गई। यह प्रक्रिया इस विद्यालय में ही नहीं, समूचे संगीत जगत में चली है जिसके कारण मुस्लिम उस्तादों से संगीत सीखने वाले शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग के संगीतकारों की व्यापक उपस्थिति के कारण खानदानी मुस्लिम संगीतकार लगातार हाशिये की तरफ ठेले जाते रहे। इन संगीत विद्यालयों के कारण संगीत का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन ये एक भी बड़ा कलाकार देने में असमर्थ रहे। 

यह मान्यता भी फैलाई गई कि मुसलमानों के आगमन के कारण उत्तर भारत का संगीत दूषित हो गया लेकिन दक्षिण भारत का संगीत इससे बचा रहा। 1974 में प्रकाशित पुस्तक “मुसलमान और भारतीय संगीत” में आचार्य बृहस्पति ने इस धारणा का खंडन करते हुए सिद्ध किया कि किस तरह मुसलमानों के साथ आए ईरानी संगीत के साथ संपर्क में आने से भारतीय संगीत की श्रीवृद्धि हुई और उसमें परिवर्तन आए। मूर्छना-पद्धति के स्थान पर मेल-पद्धति आ गई और “संस्कृत के अनेक ग्रंथ मेल पद्धति के आधार पर लिखे गए”। भातखंडे ने भी मेल-पद्धति के आधार पर ही रागों का वर्गीकरण और रूप-निर्धारण किया। उन्होंने तो अपने विचारों को मनवाने के लिए ‘चतुर पंडित’ के छद्मनाम ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना भी कर डाली ताकि उन पर प्राचीनता की प्रामाणिकता का ठप्पा लग जाए। 

अब तो कैथरीन बटलर स्कोफील्ड जैसे शोधकर्ताओं ने निर्णायक रूप से सिद्ध कर दिया है कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संगीत को देशनिकाला नहीं दिया था, केवल पकी उम्र होने पर दरबार में उसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन आचार्य बृहस्पति ने तो 1974 में प्रकाशित इस पुस्तक में ही स्पष्ट शब्दों में लिख दिया था कि “1667-1668 में औरंगजेब ने आदेश दिया कि गायक लोग दरबार में आयें, पर गाना न गायें। इस आदेश के कारण विशुद्ध राजनीतिक थे। इटालियन इतिहासकर मनुक्कि के अनुसार इस प्रतिबंध के बाद भी औरंगजेब बेगमों और शाहज़ादियों के मनोरंजन के लिए गायिकाओं और नर्तकियों की नियुक्ति करता था और अंतःपुर में गाना-बजाना होता था”। लेकिन सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण औरंगजेब की संगीत-विरोधी कट्टर मुस्लिम शासक वाली छवि आज भी बनी हुई है जबकि आचार्य बृहस्पति उसके इस प्रकार के निर्णयों के पीछे विशुद्ध राजनीतिक कारण मानते हैं।  

इस सबके बावजूद अच्छी बात यह है कि इन सांप्रदायिक रुझानों के बावजूद अभी तक हिंदुस्तानी संगीत जगत में सांप्रदायिक सद्भाव बना हुआ है।  हालांकि इसके साथ ही यह भी सही है कि खानदानी घरानेदार मुस्लिम गायकों और वादकों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। खयाल के कुछ घरानों में तो मुस्लिम गायक लगभग विलुप्त-से होते जा रहे हैं। संगीत सम्मेलनों के मंच पर अब ग्वालियर, आगरा और जयपुर जैसे घरानों समादृत मुस्लिम कलाकार ढूँढने पर ही मिलेंगे। संगीत को समाज और राज्य की ओर से मिलने वाले आर्थिक-राजनीतिक समर्थन और संरक्षण की संरचनागत समस्याओं की भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे कभी चर्चा करेंगे। 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

Vignettes of literature then and now

Kuldeep Kumar, a well known writer and columnist use to write a regular column on Hindi Belt in The Hindu. In this piece he has concentrated on ALOCHANA, the literary magazine published by Rajkamal Prakshan. The intellectual bankruptcy of hindi literature coupled with the its sharp decline in terms of readers and critics has found a voice in this short note. 








A vivid account of the journey of ‘Aalochana’ from a magazine devoted primarily to literary criticism to its present avatar of catering to social sciences. Like individuals, magazines too re-invent themselves. And when an iconic Hindi magazine like “Aalochana” (Criticism) does it, the event is bound to stir the literary world because over the past seven decades, the magazine has become a veritable institution. Its first issue had come out in October 1951 under the editorship of progressive critic Shivdan Singh Chauhan. During those days, Cold War was raging between the capitalist camp led by the United States and the socialist camp headed by the erstwhile Soviet Union. Hindi literature was not immune to this all-pervasive political-ideological struggle. Against this backdrop, it was significant that Rajkamal Prakashan decided to bring out such a trend-setting journal devoted mainly to literary criticism. Chauhan ably edited the magazine and shaped it into a significant critical voice that was heard with seriousness. However, he could bring out only six issues of the quarterly as, in early 1953, the publishers thought it fit to hand over the magazine to an editorial board comprising Dharmvir Bharati, Vijaydev Narayan Sahi, Raghuvansh and Brajeshwar Verma and assisted by Kshemchandra Suman.

It was a tectonic shift as nearly all members of the new editorial board were Cold Warriors. Although they edited 11 issues, they could not steer the magazine well and after a mere five years of its publication, “Aalochana” got its third editor in well-known critic of chhayawad 
(romanticism) Nand Dulare Vajpeyi. In 1963, Shivdan Singh Chauhan was recalled to edit the magazine. Namwar Singh, who had acquired a formidable reputation as an intellectual and literary critic even in his youth, was called upon to take charge of “Aalochana” in 1967. Although he remains associated with it even today as its Chief Editor, it is well known that for the past nearly two decades, he has been more or less performing a supervisory role 
while the magazine was being successively edited by Parmanand Srivastava and Arun Kamal. Vishnu Khare, Nandkishore Naval, Prabhat Ranjan and R. Chetankranti have also been associated with it as Assistant Editors at various stages.

Apoorvanand, a professor at the Hindi Department of the Delhi University and a well-known commentator, is the newest editor of “Aalochana”. He has brought out two issues of the magazine together as they focus on an assessment of the Indian democracy made by social
scientists. This has given rise to a fierce controversy on the pages of Hindi daily “Jansatta” about the ideal nature of a literary journal.

On May 30, 2014, I had begun this column by bemoaning the fact that “for various reasons, Hindi has primarily been a language of literature and journalism and very little has been written in it on social or natural sciences”. While the situation has not undergone a sea change, it has certainly improved and books and articles have started being written in Hindi on issues of social sciences.

Last year, in collaboration with the Centre for the Study of Developing Societies (CSDS), Vani Prakashan had started a “peer-reviewed” journal “Pratiman” devoted to social sciences. Two of its issues were also devoted to the just concluded Lok Sabha elections. 
Decrying the metamorphosis of “Aalochana” from a journal of literary criticism into one focusing primarily on social sciences, Shambhunath, a retired Hindi professor, drew a parallel between it and “Pratiman” and saw a conspiracy to promote the ideological stance of the ‘subaltern school’.

Though the attack did not make much sense as Shambhunath lambasted something which deserved a hearty welcome, he was perhaps driven to it as “Pratiman” and “Aalochana” happen to share quite a few contributors. This has naturally resulted in sharing the way they look at social and political issues although raising the bogey of ‘subaltern school’ does not cut much ice. While both the issues are well edited and contain very interesting reading material, one feels amused to notice a regular column “Namwar Ke Notes” wherein former students of Namwar Singh present their class notes, or in their absence, notes prepared by Singh himself for his lectures.

One is reminded of Ferdinand de Saussure, the great French linguist whose collated lecture notes were published in 1916 after three years of his death in the form of an epoch-changing book titled “Cours de linguistique générale”. This book laid the foundation of Structuralism as well as Semiology as it offered a synchronic linguistic model that could be used to analyse and explain various phenomena. A man of sharp intellect and vast erudition, Namwar Singh is an excellent teacher but he is no Saussure. No new critical concept or theory (for example, “objective correlative” in the case of T. S. Eliot, “ostranenie” (defamiliarisation) in the case of Viktor Shklovsky and “analysis of creative process” in the case of our very own Muktibodh can be attributed to him.


रविवार, 29 मार्च 2015

श्रद्धांजलि : विजय मोहन सिंह - ‘तुझे हम वली समझते....’


कुलदीप कुमार



अगस्त 1973 में मैंने इतिहास में एम ए करने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सबसे पहले जिनसे भेंट और मित्रता हुई वे थे पंकज सिंह, विजयशंकर चौधरी, त्रिनेत्र जोशी, देवीप्रसाद त्रिपाठी, अनिल राय और आनंद कुमार। पंकज सिंह अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में शोध कर रहे थे और विजयशंकर चौधरी क्षेत्रीय विकास अध्ययन केंद्र में एम ए (द्वितीय वर्ष) कर रहे थे। शुरुआती दो-ढाई वर्षों के दौरान हम तीनों का अधिकांश समय एक साथ ही गुजरता था। पंकज सिंह ने जिन अनेक लोगों से मेरा परिचय कराया उनमें विजयमोहन सिंह, मंगलेश डबराल और गिरधर राठी भी शामिल थे। उन दिनों विजयमोहन सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में हिन्दी साहित्य पढ़ाते थे और पास ही आनंद निकेतन में रहते थे। मंगलेश और राठीजी प्रतिपक्ष साप्ताहिक के संपादक मंडल में थे। इसके प्रधान संपादक जॉर्ज फर्नांडीस और संपादक कमलेश थे।

पंकज सिंह विजयमोहन जी को तब से जानते थे जब वे आरा में पढ़ाया करते थे। उनके साथ मैं विजयमोहन जी के घर कई बार गया और मुझ पर भी उनका स्नेह हो गया। सितंबर या अक्तूबर की  बात होगी। विजयमोहन जी जेएनयू आए थे। हम लोग चाय पीकर क्लब बिल्डिंग से बाहर निकल रहे थे कि उन्होंने अचानक मेरी ओर मुड़ कर पूछा: आज प्रतिपक्ष में जिस कुलदीप कुमार की समीक्षा छपी है, वह क्या तुम ही हो?” मेरे हाँ कहने पर उन्होंने एक और सवाल किया: “तुम्हारी उम्र कितनी है?” मेरे यह बताने पर कि अठारह साल है, वे मुझे गौर से देखते हुए बोले, “तब तो तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है।” तब क्या पता था कि मैं 1980 के दशक के अंत तक आते-आते साहित्य से लगभग विरत होकर पत्रकारिता में ही डूब जाऊंगा। दरअसल मैंने गंगाप्रसाद विमल और विश्वेश्वर के दो छोटे उपन्यासों की समीक्षा लिखी थी। मंगलेश डबराल, गिरधर राठी और पंकज बिष्ट (उन दिनों वे आजकल के सह-संपादक थे) में एक विशेष गुण यह था कि वे युवाओं को बहुत प्रोत्साहित करते थे। मैं नया-नया दिल्ली आया था। एकदम अज्ञात कुलशील। फिर भी ये मुझ पर भरोसा करके समीक्षा के लिए किताबें दे देते थे। विजयमोहन जी ने मुझे जो शाबासी दी, उसका मुझ पर क्या असर हुआ, आज यह बताना असंभव है। मुझे लगा कि मैं तो सातवें आसमान पर हूँ।

उस समय हिन्दी जगत में विजयमोहन जी की धूम मची हुई थी। एक कहानीकार के रूप में तो वे प्रसिद्ध थे ही, नामवर सिंह द्वारा संपादित आलोचना में प्रकाशित उनकी कुछ समीक्षाओं ने उन्हें प्रखर आलोचकों की पहली पंक्ति में ला खड़ा किया था। उनसे मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रहा और मुझ पर उनका स्नेह बढ़ता गया। 1975 में वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ाने शिमला चले गए जहां डॉ बच्चन सिंह हिन्दी विभागाध्यक्ष और डीन थे। इमरजेंसी लग चुकी थी। अगले साल कुछ ऐसी स्थितियाँ बनीं कि मुझे जेएनयू छोडना पड़ा। अब सवाल यह था कि जाऊँ तो जाऊँ कहाँ। मुझे विजयमोहन जी की याद आई और मैं अचानक शिमला जा धमका। प्रवेश की तारीख निकल चुकी थी। लेकिन उन्होंने बच्चन सिंह जी पर जोर डाल कर मेरा दाखिला करवा दिया। हॉस्टल भर चुके थे। डेढ़ माह मैं उनके घर पर रहा और उनके प्रयासों के कारण ही मुझे हॉस्टल में जगह मिली। जब भी मैं इस दौर के बारे में सोचता हूँ तो मेरा मन विजयमोहन जी के प्रति अपार आदर से भर उठता है। कितने लोगों का हृदय इतना विशाल है जो थोड़े से परिचय के आधार पर एक लड़के को अपने घर डेढ़ महीने तक रखें, एकदम परिवार के सदस्य की तरह?

1975 में मैंने दाढ़ी रख ली थी। विजयमोहन जी भी दाढ़ी रखते थे। शिमला में बहुत-से लोग मुझे उनका छोटा भाई समझते थे। अगर किसी ने उनके सामने कहा तो उन्होंने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया। वे घर पर हों या न हों, मेरे लिए उनके घर के दरवाजे हमेशा खुले थे। शिमला में उनके पास एक रिकॉर्ड प्लेयर था और बहुत से एल पी और ई पी थे। मैं अक्सर वहाँ विलायत खां के खमाज का ईपी और अदा फिल्म के गाने सुनता था। टी एस एलियट का निबंध संग्रह द सेक्रेड वुड और मार्टिन टर्नेल की पुस्तक नॉवेल इन फ्रांस मैंने शिमला में उनके घर पर ही पढ़ी थीं।

हिन्दी फिल्मों और उनके संगीत के बारे में उनका ज्ञान बहुत विशद था। उनकी संगत में ही मैंने इस संगीत को गंभीरता से सुनना शुरू किया। वे गानों और उनके संगीत की बारीकियों को बहुत अच्छे ढंग से समझाते थे। जब वे और विष्णु खरे एक साथ होते थे, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता था कि फिल्म संगीत के बारे में किसका ज्ञान अधिक है। काशी विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने संगीत सीखा था और उन दिनों वे वायलिन बजाया करते थे। बागेश्री उनका प्रिय राग था। वहाँ बी वी कारन्त उनके सहपाठी थे और दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी। मुझे कारन्त जी से उन्होंने ही मिलवाया था।  शिमला में वे सबसे अधिक लोकप्रिय अध्यापकों में गिने जाते थे। जो लोग केवल उनके धीर-गंभीर रूप से ही परिचित हैं, उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि शायद ही कोई दिन जाता हो जब उनकी क्लास में हम सब लड़के-लड़कियां खिलखिलाकर न हँसते हों। वे बोलने में भी भाषा का रचनात्मक इस्तेमाल करते थे और अद्भुत हास्य-व्यंग्य पैदा करते थे। गोदान पढ़ाते समय वे लगभग अभिनय करके बताते थे कि मिस्टर मेहता कैसे मालती को नाला पार करा रहे हैं। उस समय भी वे गोदान को असफल उपन्यास मानते थे।

वे जितने सच्चे और खरे इंसान थे, उतने ही सच्चे और खरे आलोचक भी। लिखते समय वे भूल जाते थे कि किस पर लिख रहे हैं। साहित्य को देखने-परखने की उनकी दृष्टि विलक्षण थी। उनके सादगी भरे जीवन को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे कितने सम्पन्न परिवार से थे। उन्होंने दिल्ली में दो बार फ्रीलांसिंग की और संघर्ष के कई साल गुजारे। बहुत-से लोग आभिजात्य ओढ़े रहते हैं, लेकिन विजयमोहन जी के व्यक्तित्व में वह खुशबू की तरह रचा-बसा था। वे सामंती सोच के घोर विरोधी थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक सामंती ठसक थी जो स्वाभिमान के रूप में प्रकट होती थी। अपने और दूसरों के स्वाभिमान की रक्षा करना उनका स्वभाव था। मुझ पर उनके इतने अहसान थे, लेकिन कभी उन्होंने एक क्षण के लिए भी मुझे इसका अहसास नहीं कराया। प्रेमपूर्वक खातिरदारी करना उनके स्वभाव की एक और विशेषता थी।


उनसे आखिरी मुलाक़ात पिछले साल नवंबर में हुई थी जब मैं उनके घर अपनी बेटी की शादी का निमंत्रणपत्र देने गया था। उनका पेट बहुत खराब चल रहा था। शादी के दिन उनका फोन आया कि तबीयत ऐसी नहीं कि आ सकें। फिर दिसंबर में फोन आया कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना है। मैंने होली फेमिली में उनके लिए  एपाइंटमेंट लिया लेकिन फिर उन्होंने अपने बेटे वर्तुल के पास जाने का मन बना लिया। इस बीच कई बार वे आईसीयू आए-गए। तीन सप्ताह पहले आशा जी (विजयमोहन जी की पत्नी) ने फोन पर उनसे बात कराने की कोशिश की लेकिन वे बोल नहीं पाये। आखिरी बार जब मैंने फोन किया तो वर्तुल ने कहा कि पापा बस अब अंतिम सांस ले रहे हैं। पंद्रह-बीस मिनट बाद ही पता चला कि वे नहीं रहे। मुझ पर तो वज्रपात-सा हुआ। दुनिया के लिए वे एक लब्धप्रतिष्ठ कथालेखक और आलोचक थे लेकिन मेरे लिए सिर्फ विजयमोहन जी थे। मेरे मित्र, मेरे शिक्षक, मेरे बड़े भाई।
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(जनसत्ता से साभार)

रविवार, 11 जनवरी 2015

निनाद : शार्ली एब्दा पर हमला और उस पर उठे सवाल


(अपने नियमित कालम निनाद में इस बार कुलदीप कुमार ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले पर टिप्पणी की है)




फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दॉ पर हुए आतंकवादी हमले की जितनी भी भर्त्सना की जाए
, वह कम ही होगी। लेकिन इस हमले के कारण उठे मुद्दे बहुत जटिल हैं, और उनसे पत्रिका और उसके शहीद कार्टूनिस्टों के साथ एकजुटता दिखाते हुए भी इस सरलीकृत नारे द्वारा नहीं निपटा जा सकता कि मैं भी शार्ली हूँ। हम भारत में रहने वालों के लिए तो इस जघन्य हत्याकांड से उपजे सवालों के जवाब खोजना और भी अधिक कठिन है क्योंकि भारतीय समाज हर दृष्टि से एक बहुलतावादी समाज है जहां का राज्य अपने आपको धर्मनिरपेक्ष मानते हुए भी सर्वधर्म समभाव की नीति पर चलने की कोशिश करता है और इस कोशिश में अक्सर सभी धर्मों के कट्टरपंथियों के प्रति समभावयानी समान  नरमी के साथ पेश आता है। इस नरमी का सबसे पहला शिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही होती है। हमारे देश में  विभिन्न धार्मिक समुदाय ही नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रीय, जातीय और राजनीतिक समुदाय भी अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। इनमें कांग्रेसी भी हैं और संघी भी, समाजवादी भी हैं और कम्युनिस्ट भी। आज जो लोग शार्ली एब्दॉ की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में खड़े हैं, वे ही बीते हुए कल में अपने देश में स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कुचलते नजर आ रहे थे और आने वाले कल में भी आएंगे। लोग भूले नहीं हैं कि 2012 में संसद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, एआईएडीएमके और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया जैसे अनेक राजनीतिक दलों ने 28 अगस्त, 1949 को शंकर्स वीकलीमें प्रकाशित शंकर के एक कार्टून को एनसीईआरटी की एक पाठ्यपुस्तक में शामिल किए जाने पर कैसा जबर्दस्त हंगामा किया था। आरोप था कि कार्टून में दलित नेता एवं विचारक बाबा भीमराव अंबेडकर का अपमान किया गया है। मायावती ने तो यह मांग तक कर डाली थी कि पुस्तक तैयार करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएँ। सीपीआई के डी राजा भी अपना मार्क्सवादी क्रोध प्रकट करने में किसी से पीछे नहीं थे। मजे की बात यह है कि जब यह कार्टून छपा था तब किसी को भी उस पर कोई आपत्ति नहीं थी। न अंबेडकर को और न ही उनके अनुयायियों को। शोचनीय हकीकत यह है कि देश में असहिष्णुता का माहौल बनाने में सभी शामिल हैं। यहाँ गांधीवादी भी नाटक रुकवाते हैं और संघी भी कला प्रदर्शनियों में तोड़फोड़ करते हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की विधानसभा खुशवंत सिंह के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करती है क्योंकि उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को घटिया उपन्यासकार कह दिया था।

लेकिन फ्रांस इस मामले में हमसे बहुत अलग है। वहाँ धर्मनिरपेक्षता को ढुलमुल तरीके से नहीं
, सख्ती के साथ लागू किया जाता है। स्कूलों या किसी भी अन्य सार्वजनिक स्थल पर किसी भी धर्म के अनुयायी को अपने धार्मिक चिह्न प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है। ईसाई छात्र या छात्रा भी अपने गले में क्रॉस वाली चेन नहीं पहन सकते। फ्रांस में राज्य सर्व धर्म समभाव के रास्ते पर नहीं, धर्म के साथ पूर्ण विच्छेद के रास्ते पर चलता है। इसी तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वहाँ परम मूल्य माना जाता है। हमारे संविधान में जिस तरह उस पर विवेकसम्मत या मुनासिब बंदिश लगाने का प्रावधान है, वहाँ वैसा नहीं है। लेकिन इस ऐतिहासिक तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी क्रांति के समय, जब समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों का झण्डा बुलंद किया गया, फ्रांस लगभग पूरी तरह से ईसाई देश था। लेकिन आज वहाँ कि लगभग एक-चौथाई आबादी गैर-ईसाई है और उनमें भी मुस्लिम बहुसंख्या में हैं। ऐसे में यह सोचना जरूरी हो जाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं का विस्तार करने का प्रयास नफरत की अभिव्यक्ति तक न ले जाए।

शार्ली एब्दॉ पर कुछ साल पहले भी हमला हुआ था
, लेकिन उससे जुड़े पत्रकारों और कार्टूनिस्टों ने इससे हार नहीं मानी। उनके असाधारण साहस और मूल्यों के प्रति निष्ठा को सलाम करना और उनसे प्रेरणा लेना हम सब का कर्तव्य है ताकि आतंकवाद को परास्त किया जा सके। लेकिन इसके साथ ही इस घटना से सबक लेना भी हमारा कर्तव्य है। किसी भी बहुलतावादी समाज  में दूसरों की भावनाओं का खयाल रखते हुए कैसे अपनी बात कही जाए, इस पर सभी को सोचने की जरूरत है। इसके साथ ही संभवतः अनेक देशों में फैले व्यापक मुस्लिम समुदाय को भी सोचना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी में ईशनिंदा के बारे में उसे अपना रवैया बदलने की जरूरत है या नहीं।

मुस्लिम सूफी संत भी रसूल-ए-इस्लाम (अल्लाह की ओर से इस्लाम का संदेश लाने वाले) हजरत मुहम्मद का नाम लेने में बहुत सतर्क रहे हैं। प्रसिद्ध उर्दू कवि अली सरदार जाफरी ने अपनी  पुस्तक
कबीर बानी में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए फारसी की एक कहावत भी उद्धृत की है और बताया है कि मुसलमानों के बीच सर्वमान्य उसूल यह है कि “बा-खुदा दीवाना बाश ओ, बा-मुहम्मद होशियार यानी खुदा के साथ तो दीवानापन कर सकते हो पर मुहम्मद का नाम लेते वक्त सतर्क रहो)। मुसलमानों की अपने रसूल के प्रति सम्मान, श्रद्धा और भक्ति इतनी अधिक है कि शायद गैर-मुस्लिम लोग उसका अंदाज भी नहीं लगा सकते। उनकी नजर में वह आदर्श मानव थे और हर मुसलमान का यह कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में उनकी हर बात की नकल करने की कोशिश करे। किसी परिस्थितिविशेष में हजरत मुहम्मद ने जिस तरह का आचरण किया था, वह हर मुसलमान के लिए अनुकरणीय है। मुसलमानों की अपने पैगंबर के प्रति इतनी श्रद्धा है कि बहुत-से उनकी चाल-ढाल के बारे में मिलने वाले विवरणों के आधार पर अपनी चाल-ढाल भी वैसी ही बनाने की कोशिश करते हैं। इसीलिए वे हजरत मुहम्मद को लेकर अतिशय संवेदनशील हैं। राजनीतिक दल, और अब आतंकवादी भी, इस संवेदनशीलता का फायदा उठाते हैं। 1980 के दशक के आरंभ में कर्नाटक के एक अखबार में एक कहानी छपी थी जिसमें एक चरवाहे का नाम मुहम्मद था। इसे पैगंबर का अपमान माना गया और वहाँ दंगे भड़क उठे।
इस्लाम मूर्तिपूजा का निषेध करता है। संभवतः हजरत मुहम्मद को आशंका थी कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायी उनकी मूर्ति या चित्र बनाकर उसके प्रति श्रद्धा प्रदर्शित न करने लगें क्योंकि वह भी एक प्रकार की मूर्तिपूजा ही होगी। इसलिए उन्होंने अपना किसी भी तरह का चित्र बनाने से मना कर दिया। लेकिन यह मनाही केवल उन्हीं पर लागू होनी चाहिए जो उन्हें अल्लाह का रसूल मानते हैं। जो नहीं मानते, उन पर क्यों लागू की जाए। लेकिन इस समय स्थिति यह है कि इसे सभी पर लागू किया जाता है। पाकिस्तान जैसे कई इस्लामी देशों में ईशनिंदा के बारे में इतने कड़े कानून लागू हैं जिनके तहत किसी को भी मौत की सजा सुनाई जा सकती है। यदि किसी ने सजा पाये हुए व्यक्ति के प्रति सहानुभूति भी प्रकट कर दी, उसे अदालत नहीं बल्कि समाज ही मौत के घाट उतार देता है। पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर के साथ यही हुआ था। सऊदी अरब में पिछले दिनों एक युवा ब्लॉगर को दस साल की कैद और एक हजार कोड़ों की सजा सुनाई गई है। यह अलग बात है कि अपने जीवन में हजरत मुहम्मद बेहद सहनशील थे। उन्हें गालियां दी गईं, उन पर पत्थर फेंके गए और जानलेवा हमले किए गए, लेकिन वे धैर्य के साथ अपना संदेश प्रचारित करते गए। उन्होंने अपनी निंदा करने वालों से न बदला लिया और न अपने अनुयायियों से बदला लेने को कहा।
लेकिन कुछ लोग भारत को भी पाकिस्तान जैसा देश बनाना चाहते हैं। जब कुछ साल डेनमार्क के एक अखबार ने हजरत मुहम्मद के बारे में कुछ आपत्तिजनक कार्टून प्रकाशित किए थे, तब भी उस पर हमले हुए थे। उस समय बहुजन समाज पार्टी की सरकार में मंत्री याक़ूब कुरैशी ने उस व्यक्ति को 51 करोड़ रुपये का ईनाम देने की घोषणा की थी जो डेनिश कार्टूनिस्ट कुर्ट वेस्टरगार्ड की हत्या कर दे। ये सज्जन आज भी विधायक हैं और इन्होंने फिर शार्ली एब्दॉ के पत्रकारों की सामूहिक हत्या करने वालों के लिए ऐसा ही ईनाम घोषित किया है। एक समय मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता असदुद्दीन ओवेसी भी तसलीमा नसरीन का सिर कलम किए जाने का आह्वान कर रहे थे। सोचने की जरूरत है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।


गुरुवार, 8 जनवरी 2015

निनाद : नई सरकार, अच्छे दिन और मुगालते

(कुलदीप कुमार पिछले कोई चार दशकों से सक्रिय हमारे समय के अत्यंत महत्त्वपूर्ण पत्रकार हैं. डा हिन्दू और जनसत्ता सहित तमाम जगहों पर नियमित लिखने वाले कुलदीप जी समसामयिक मुद्दों के साथ इतिहास पर अधिकार के साथ लिखते हैं. पाठकों को समयांतर में की गयी उनकी बहस याद होगी. हमारे अनुरोध पर उन्होंने अपने कालम नियमित रूप से हमारे ब्लॉग को उपलब्ध कराना स्वीकार किया है. इसके लिए जनपक्ष उनका आभारी है.)







जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन हाशिये पर चले जाएंगे क्योंकि मोदी को पता है कि आर्थिक विकास तभी संभव है जब समाज में शांति हो, अब उनका यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए। अरुण शौरी और मधु किश्वार जैसे मोदी के प्रशंसकों का कुछ अन्य कारणों से मोहभंग हो रहा है और मोदीनामा लिखकर और मोदी के पक्ष में धुआंधार प्रचार करके (कु)ख्याति अर्जित करने वाली मधु किश्वार को अब यह संदेह होने लगा है कि मोदी पर काला जादू कर दिया गया है। जब विकासशील समाज अध्ययन केंद्र जैसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान में प्रोफेसर के पद पर आसीन व्यक्ति काले जादू की बात करे तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य तो होता ही है।

इस समय मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग रोज जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव की बातें करने वाले इन लोगों के असली उद्देश्य इनसे ठीक उल्टे हैं। अगर देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित कराना चाहती हैं और कह रही हैं कि इस बारे में केवल औपचारिक घोषणा होना ही बाकी है, तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी देश में संविधान का शासन है और संविधान भारत को एक प्रभुसत्तासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के रूप में परिभाषित करता है। भले ही आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, लेकिन अभी वह बना नहीं है। संविधान का पालन करने की शपथ लेकर मंत्री बनने वालों को इस बुनियादी सचाई को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि पिछली मई में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक कुछ इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं जैसे इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिला हो। इन दिनों नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया जाता है। ये लोग भूल जाते हैं कि भारतीय संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में जैसा जनादेश राजीव गांधी को मिला था, वैसा आज तक किसी को नहीं मिला। लेकिन जब भाजपा नेता संसद में और संसद के बाहर गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है के नारे लगाते थे, तब किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह प्रधानमंत्री पद का अपमान है। न तब जब लालकृष्ण आडवाणी मनमोहन सिंह को देश का सबसे निकम्मा प्रधानमंत्री बताया करते थे।

बहरहाल
, संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक समान हैं चाहे उनके धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग और समुदाय कुछ भी क्यों न हों। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है क्योंकि उसका आधार जन्म के आधार पर किसी जातिविशेष को नीच और अछूत मानना है। इसी तरह लिंग के आधार पर भी किसी को श्रेष्ठ या हीन नहीं माना जा सकता। लेकिन गीता में कृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं? “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।। (हे अर्जुन, मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अथवा अंत्यज आदि जो पापयोनि वाले हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।) यह कहने से पहले वे अर्जुन को यह बता चुके होते हैं:  "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (गुण कर्म के विभाग से मैंने ही चारों वर्णों को उत्पन्न  किया है). तो क्या हम अब मान लें कि  वर्णव्यवस्था ईश्वरीय विधान है और स्त्रियां, वैश्य एवं शूद्र पापयोनि में जन्मे हीन  लोग हैं?

भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ उसका संविधान है, किसी अन्य ग्रन्थ को उसकी जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शब्दछल का सहारा लेने में माहिर भाजपा के नेता अब यह दावा भी कर रहे हैं कि गीता किसी एक धर्म से जुड़ी पुस्तक नहीं है। वह तो सार्वजनीन है और दर्शन एवं कर्मयोग का ग्रंथ है। सुषमा स्वराज तो उसके जरिये अनेक मानसिक परेशानियों का इलाज करने की वकालत भी करती हैं। लेकिन क्या कोई बताएगा कि यदि गीता हिन्दू धर्म से जुड़ा ग्रंथ नहीं है तो फिर अदालतों में सिर्फ हिन्दू ही उस पर हाथ रख कर कसम क्यों खाते हैं, किसी और धर्म के अनुयायी क्यों नहीं?

शब्दछल के सहारे का एक और उदाहरण है धर्मपरिवर्तन को पुरखों के घर वापसी का नाम देना। एक समय था जब विश्व हिन्दू परिषद इसे परावर्तन कहा करती थी। आरएसएस के इस संगठन की भारत के अलावा लगभग नब्बे देशों में शाखाएँ हैं। संघ की तरह ही इसका अंतिम लक्ष्य भी भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना है। आगरा में जिस तरह से स्लम में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर उनकी घर वापसी का नाटक किया गया, वह उन सभी नाटकों की एक कड़ी भर है जो पिछले दो साल से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अलीगढ़ जैसे अनेक जिलों में खेले जा रहे हैं। इन सबका उद्देश्य विधानसभा चुनाव के पहले राज्य में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण है। वरना ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के दिन अलीगढ़ जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर में बड़े पैमाने पर मुसलमानों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का कार्यक्रम बनाने का मतलब क्या है?

यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि जनवरी 1989 में हुए धर्म संसद के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में विस्तार से उन कदमों की चर्चा की गई थी जो भारत में हिन्दू राष्ट्र की पुनर्स्थापनाके लिए उठाए जाने आवश्यक हैं। इस प्रस्ताव का अंतिम बिन्दु था: “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और योग की अनिवार्य शिक्षा और प्रशिक्षण शामिल किए जाएँ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस  पर किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यह संयोगवश नहीं है कि इसी के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाकर संस्कृत को ले आया गया है।

यह भी अकारण नहीं है कि मोदी सरकार की एक मंत्री  उन लोगों के लिए गाली का प्रयोग करती हैं जो रामजादोंके श्रेणी में नहीं आते। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज अपने दिल की बात जुबान पर ले आते हैं और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्तबताते हैं। आज संघ कुछ भी कहे, वह अपने उस इतिहास को मिटा नहीं सकता जो महात्मा गांधी के प्रति घृणा से भरा हुआ है। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन लक्ष्मीकांत वाजपेयी ताजमहल को हिन्दू राजा का महल बताते हैं और वही (कु)तर्क दुहराते हैं जो लगभग छह दशक पहले पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दिये थे और जिन्हें हिंदुत्ववादियों के अलावा दुनिया में कोई नहीं मानता। ओक अपने नाम के साथ प्रोफेसर लगाया करते थे और अपना परिचय विश्व इतिहास पुनर्लेखन संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देते थे। उनके अनुसार कुतुब मीनार विष्णुध्वज है और लालकिला एवं जामा मस्जिद जैसी सभी इमारतें हिंदुओं द्वारा बनवाई हुई हैं।


इन अच्छे दिनों में जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं प्राचीन भारत में आज से भी अधिक उन्नत विज्ञान और चिकित्सा होने का दावा कर रहा है, जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष कह रहा है कि रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सभी घटनाएँ वास्तव में ठीक वैसे ही घटी थीं, तब यदि ओक की मान्यताओं को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता साम्प्रादायिक राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?