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रविवार, 31 अक्तूबर 2010

अरुंधती कश्मीर क्यूं नहीं जातीं?

(अरुंधती का ताज़ा बयान विवादों के घेरे में है…इस बहाने तमाम लोग मार्क्सवाद को गरिया रहे हैं…अरुंधती को ज़ेल भेजने की बात कर रहे हैं और फेसबुक आदि पर अपनी 'देशभक्ति' का जांबाज प्रदर्शन कर रहे हैं…यहां हम स्तंभकार अंशुमाली रस्तोगी का बयान इस वीर-बालक मुद्रा के प्रतिनिधि के रूप में दे रहे हैं…यह बयान पढ़कर आप इस वीरता प्रदर्शन के स्रोत जान सकते हैं…मज़ेदार बात यह है कि अंशुमाली अरुंधती को कश्मीर जाने की सलाह दे रहे हैं…मानों ये सब वीर सीधे ग्राउण्ड ज़ीरो से कमेन्ट्री कर रहे हैं…जबकि उन्हें यह भी नहीं पता कि अरुंधती ने वहां से लौटने के बाद भी एक बयान दिया है…हम अरुंधती का बयान और उनके दिल्ली में दिये गये बयान पर वरवर राव के बयान का एक हिस्सा हाशिया से साभार लगा रहे हैं…आप सब इस बहस में आमंत्रित हैं। )


अरुंधति रॉय की घोषित प्रगतिशीलता के मायने
अंशुमाली रस्तोगी

मार्क्सवादी अरुंधति रॉय की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें अपने भगवान का सा दर्जा देते हैं। उनकी निगाह में अरुंधति बेहद तरक्की-पसंद लेखिका हैं। अरुंधति जो लिख व कह देती हैं उनके लिए वो 'पत्थर की लकीर' सा हो जाता है। मेरे विचार में अभी हाल अरुंधति ने भारत-विरोधी जो बयान दिया है उसे भी मार्क्सवादी प्रगतिशीलों ने 'पत्थर की लकीर' ही माना होगा!जिस कश्मीर के लिए इतने लंबे समय से संघर्ष चल रहा है, जिस संघर्ष के बीच न जाने कितने लोग शहीद हो चुके हैं, न जाने कितने बेघर उनके संघर्ष और शाहादत को अरुंधति ने एक पल में अपने बयान से 'ध्वस्त' करके रख दिया। बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में उन्होंने कह दिया कि कश्मीर भारत का अंग है ही नहीं। कश्मीर के बहाने भारत को देखने की उनकी निगाह को अगर 'राष्ट्र-विरोधी' नहीं माना जाए तो क्या माना जाए!

यह सही बात है कि अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बहुत बड़ा है लेकिन इतना भी बड़ा नहीं है कि आप उस दायरे को ही तोड़ने लग जाएं। जब कश्मीर के प्रति अरुंधति का यह रूख है तो ऐसा ही कुछ कभी वो भारत की स्वतंत्रता के खिलाफ भी कह-लिख सकती हैं। हम देख चुके हैं कि पिछले दिनों वे माओवादियों के संघर्ष को जायज ठहरा ही चुकी हैं। और माओवादियों के प्रति अपने दिल में 'खास हमदर्दी' भी रखती हैं। उन्हें शायद उस पीड़ा का एहसास है ही नहीं जो शहीदों के परिवारों को माओवादियों के अत्याचारों से मिला है। माओवादी देश के भीतर एक नए तरह के आतंकवाद को रचने की तैयारियों में संलग्न हैं, जिसे अरुंधति अपना नैतिक व वैचारिक समर्थन देती हैं। वाह! अपने ही देश में रहकर उसके खिलाफ कुछ भी बोल देना क्या अरुंधति की महान प्रगतिशीलता ने उन्हें यही सिखाया है?

साथ ही इस मामले में यह देखना भी बेहद दिलचस्प है कि अरुंधति के ऐसे बेतुके बयान पर प्रगतिशील मार्क्सवादी अपनी जुबानें खामोश रखे हुए हैं। मतलब साफ है कि अरुंधति को उनका मन ही मन मौन समर्थन हासिल है। अरुंधति के माओवादी-प्रेम पर भी प्रगतिशील उनके पक्ष में उतर आए थे। अरुंधति को 'प्रगतिशीलता की देवी' बनाने के लिए उन्होंने क्या नहीं कहा-लिखा था। यह मान लेने में कोई शक नहीं कि प्रगतिशील अपनी छद्म प्रगतिशीलता को स्थापित रखने के लिए किसी भी हद से गुजर सकते हैं। फिर चाहे वो कश्मीर को भारत से अलग कर दें या गुजरात को। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

इतनी भोली अरुंधति भी न होंगी कि उन्हें मालूम ही न हो कि कश्मीर की रंगत को बिगाड़ने में किन अलगाववादियों और किस देश का हाथ रहा है। क्या उन्हें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनकी तकलीफों का एहसास है? कश्मीर की अवाम किस तरह से हर पल खतरों के साये में अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रही है, क्या अरुंधति इस सच को जानती हैं? माओवादियों के बीच रहकर उनकी वाह वाही का समर्थन हासिल करने वाली अरुंधति प्रयास करें कुछ दिनों कश्मीर में रहने का भी वहां के जो संगीन हालात हैं, उसकी हकीकत उन्हें मालूम चल जाएगी। ठीक है कि आप बहुत उम्दा प्रगतिशील लेखिका हैं, तो अपनी प्रगतिशीलता अपने गुट और अपने हितैषियों के मध्य रखिए न, उसे आप पूरे देश पर क्यों थोपना चाहती हैं?

दरअसल, अरुंधति रॉय जैसे प्रगतिशील जिस वर्ग से आते हैं, उसमें न संवेदना होती है न ही कुछ सोचने-समझने की ताकत। बस,एक जिद्द बनी रहती है कि कैसे भी हमें अपनी प्रगतिशीलता को दूसरे पर थोपना है। अगर सामने वाला उनकी प्रगतिशीलता को सहृय स्वीकार लेता है, तो वो उनकी निगाह में महान है और जो उनसे जरा भी नाइत्तेफाकी रखे वो उनका 'सबसे बड़ा दुश्मन'। यह हम मकबूल फिदा हुसैन के मामले में बेहतर देख व जान चुके हैं।

बहरहाल, अरुंधति के बयान पर हाय-तौबा जारी है। इसके अभी कुछ और दिन जारी रहने की संभावना भी है। मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। इस पर अलग-अलग तरह के बयानों व कथनों की रोटियां सिकना भी शुरू हो चुकी हैं। पर,बड़ी बात यह है कि देश के प्रति हमारे जो सरोकार व संवेदनाएं होनी चाहिए वो समाप्त हो गई हैं। क्योंकि हम मुद्दों को अपने-अपने फायदे व नुकसान के हिसाब से उठाते हैं और वैसे ही खत्म भी कर देते हैं। शायद अरुंधति के इस बयान का मकसद भी यही रहा हो!
अब देखना यह है कि इस मामले में अरुंधति रॉय की 'घोषित प्रगतिशीलता' की जीत होती है या 'सरकार की सख्ती' की


अरुंधति रॉय का बयान

मैं यह श्रीनगर, कश्मीर से लिख रही हूँ. आज सुबह के अख़बारों ने लिखा है कि मैं कश्मीर पर आयोजित एक आमसभा में कही गयी अपनी बातों के लिए देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो सकती हूँ. मैंने वह कहा जो यहाँ दसियों लाख लोग रोज कह रहे हैं. मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं. मेरे भाषणों को पढने की ज़हमत उठानेवाले यह देखेंगे कि मैंने बुनियादी तौर पर इंसाफ की मांग की है. मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं, उन कश्मीरी पंडितों के लिए, जो आपने घरों से उजाड़ दिए जाने की त्रासदी में जी रहे हैं, उन दलित सैनिकों के लिए, कूड़े के ढेर पर बनी कब्रों को मैंने कुड्डालोर में उनके गांवों में देखा, भारत के उन गरीबों के लिए जो इस कब्ज़े की कीमत चुकाते हैं और एक बनते जा रहे पुलिस राज के आतंक में जीना सीख रहे हैं.

कल मैं शोपियां गयी थी- दक्षिणी कश्मीर के सेबों के उस शहर में जो पिछले साल 47 दिनों तक आसिया और नीलोफर के बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में बंद रहा था. इन दोनों युवतियों की लाशें उनके घरों के पास की एक पतली सी धारा में पाई गयी थी और उनके हत्यारे अब भी क़ानून से बहार हैं. मैं नीलोफर के पति और आसिया के भाई शकील से मिली. मैं वेदना और गुस्से से पागल उन लोगों के साथ एक घेरे में बैठी जो भारत से इंसाफ पाने की उम्मीद को खो चुके हैं, और अब यकीन रखते हैं कि आज़ादी उनकी अकेली उम्मीद है. मैं पत्थर फेंकनेवाले उन नौजवानों से मिली जिनकी आँखों में गोली मारी गयी थी. मैंने एक नौजवान के साथ सफ़र किया, जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्त हिरासत में लिए गए और पत्थर फेंकने की सजा के तौर पर उनके नाखून उखाड़ लिए गए.

अख़बारों में कुछ लोगों ने मुझ पर नफ़रत फ़ैलाने और भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है. इसके उलट, मैंने जो कहा है उसके पीछे प्यार और गर्व की भावना है. इसके पीछे यह इच्छा है कि लोग मारे न जाएँ, उनका बलात्कार न हो, उन्हें कैद न किया जाये और उन्हें खुद को भारतीय कहने पर मज़बूर करने के लिए उनके नाखून न उखाड़े जाएँ. यह एक ऐसे समाज में रहने की चाहत से पैदा हुआ है जो इंसाफ के लिए जद्दोजहद कर रहा हो. तरस आता है उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं.


वरवर राव का बयान

आत्मनिर्णय के अधिकारों का पक्ष लेते हुए राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. वामपंथियों को गाली देना तो आजकल फैशन बन गया है. कोई कश्मीरी अवाम का समर्थन करे या माओवादियों के साथ न्याय और बातचीत का, गाली वामपंथियों को दी जाती है. इस पोस्ट में दिए गए अरुंधती के बयान से लगता है कि उन्होंने कश्मीरी जनता के दुःख को देखकर भावुक होकर कहा है कि कश्मीर भारत का अंग नहीं है. लेकिन राजनीतिक और भूसामरिक वास्तविकता भावुकता से काम नहीं लेती. उन्हें ये समझना चाहिए कि कश्मीर का भारत के लिए कितना महत्त्व है और वहीं भारत के नीति-निर्माताओं और वामपंथियों को गाली देने वालों को ये समझना चाहिए कि राष्ट्र केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं होता, वहाँ के लोग होते हैं. उनकी समस्याओं और मजबूरियों की ओर ध्यान देना चाहिए.
    अरुंधती की मंशा चाहे जो हो, पर उनका ये बयान अगर कश्मीरी अवाम के बारे में एक नयी बहस को जन्म दे तो ये अच्छी बात है.

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  2. मेरी राय भी कुछ कुछ मुक्ति की तरह ही है।

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  3. बेवजह गाली देने या दुत्कारने के बजाय तथ्य और यथार्थ पर ध्यान देना चाहिए. तथाकथिक राष्ट्रहित भावना से राष्ट्र का विकास नहीं होगा. अरुंधती के बयां ने सिस्टम को सोचने पर विवश किया है, और हम सोच में शामिल होने के बजाय नकारात्मक प्रतिक्रिया कर रहे हैं. कश्मीर को यदि आज़ाद नहीं करना चाहते तो कश्मीर को आबाद कीजिये. वरना आज़ादी ही उनका आखिरी विकल्प है. उसके बाद वो अपने हाल के लिए खुद ज़िम्मेदार होंगे. अभी तो पूरा राष्ट्र ज़िम्मेदार है.

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