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शनिवार, 23 मार्च 2013

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह

तेईस मार्च भारतीय क्रांतिकारी मनीषा के प्रतीक शहीद भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु तथा सुखदेव का शहादत दिवस है तो उसके कोई आधी सदी बाद उसी दिन पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश भी शहीद हुए थे. इस बार हत्यारे देश के भीतर के थे. वही धार्मिक कट्टरपंथ, जिसकी शिनाख्त और तीव्रतम आलोचना भगत सिंह ने अपने समय में की थी छप्पन सालों बाद उन्हें आदर्श मानने वाले पाश का हत्यारा बना. आज जब देश के भीतर धार्मिक कट्टरपंथी अलग-अलग रूपों में सर उठा रहे हैं और पूरा देश उन्माद के गिरफ्त में है तो उन्हें याद करना इसके ख़िलाफ़ होना भी है. आज इस अवसर पर पाश की कुछ कवितायें...पहली कविता उन्होंने शहीद भगत सिंह के लिए लिखी है..उनकी शहादत के लिए. इससे अधिक गौरवशाली क्या होगा कि उसी दिन वह भी वैसी ही महान शहादत को हासिल कर सके...

चित्र यहाँ से साभार 

23 मार्च 
उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग 
किसी दृश्य की तरह बचे 
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की 
देश सारा बच रहा बाक़ी

उसके चले जाने के बाद 
उसकी शहादत के बाद 
अपने भीतर खुलती खिडकी में 
लोगों की आवाज़ें जम गयीं 

उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने 
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी 
गला साफ़ कर बोलने की 
बोलते ही जाने की मशक की 

उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद 
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया 

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था

मैं पूछता हूँ 

मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक्त इसी का नाम है
कि घटनाए कुचलती चली जाए
मस्त हाथी की तरह 
एक पुरे मनुष्य की चेतना?
कि हर प्रश्न 
काम में लगे जिस्म की गलती ही हो?

क्यूं सुना दिया जाता है हर बार 
पुराना चुटकूला 
क्यूं कहा जाता है कि हम जिन्दा है
जरा सोचो -
कि हममे से कितनो का नाता है 
जींदगी जैसी किसी वस्तु के साथ!

रब की वो कैसी रहमत है 
जो कनक बोते फटे हुए हाथो-
और मंडी बिच के तख्तपोश पर फैली हुई मास की 
उस पिलपली ढेरी पर,
एक ही समय होती है?

आखिर क्यों 
बैलो की घंटियाँ
और पानी निकालते ईजंन के शोर अंदर 
घिरे हुए चेहरो पर जम गई है
एक चीखतीं ख़ामोशी?

कोन खा जाता है तल कर 
मशीन मे चारा डाल रहे 
कुतरे हुए अरमानो वाले डोलो की मछलिया?
क्यों गीड़गड़ाता है 
मेरे गाव का किसान 
एक मामूली से पुलिसऐ के आगे?
कियो किसी दरड़े जाते आदमी के चीकने को 
हर वार
कवीता कह दिया जाता है?
मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क़ैद करोगे अन्धकार में?



क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें
अनुवाद : प्रमोद कौंसवाल

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. सचमुच
    वह इश्वर की तरह निस्तेज नहीं था

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त

    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

    उत्तर देंहटाएं

  4. कल दिनांक25/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्यूं सुना दिया जाता है हर बार
    पुराना चुटकूला
    क्यूं कहा जाता है कि हम जिन्दा

    बेहतरीन !

    उत्तर देंहटाएं

स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…