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शनिवार, 10 जुलाई 2010

मुक्त बाजार अमीरों के लिए 'समाजवाद' है - नोम चोम्स्की

तस्वीर यहां से

(नोम चोम्सकी का यह लेख लंदन में दिये गये उनके भाषण का संक्षिप्त अंश है और मुक्त बाज़ार को समझने के लिये बेहद ज़रूरी सूत्र उपलब्ध कराता है। अनूप सेठी द्वारा अनूदित यह आलेख हम पाठकों की सुविधा के लिये क़िस्तों में पेश कर रहे हैं. मूल आलेख यहां देखें)






कितना मुक्त है मुक्त बाज़ार?
मुक्त बाजार अमीरों के लिए 'समाजवाद' है : जनता कीमत अदा करती है और अमीर फायदा उठाता है - गरीब गुरबों के लिए बाजार और अमीरों के लिए ढेर सारा संरक्षण।

जिस दौर में हम दाखिल हो रहे हैं उसके बारे में एक पारंपरिक सा सिद्धांत है, और पूरे किए जा सकने वाले कुछ वादे हैं। मुख्तसर कहानी यह है कि इन बेहतर इंसानों ने शीत युद्ध जीत लिया है और जीन कस के घोड़े पर सवार हैं। हो सकता है आगे रास्ता ऊबड़ खाबड़ हो, पर ऐसा नहीं कि फतह न किया जा सके। वे सूर्यास्त के पीछे पीछे दौड़े चले जाते हैं कि उज्ज्वल भविष्य ढूंढ निकालेंगे। साथ में आदर्श क्या हैं जिनके इन्होंने हमेशा गुण गाए हैं?वे हैं - लोकतंत्र, मुक्त बाजार और मानवाधिकार।

असल दुनिया में मानवाधिकार, लोकतंत्र और मुक्त बाजार न सिर्फ अग्रणी औद्योगिक समाजों में बल्कि, बहुत से देशों में बुरी तरह खतरों में फंसे हुए हैं। सत्ता उत्तरोत्तर ऐसे संस्थानों में केंद्रित होती जा रही है, जो जवाबदेही से परे हैं। अमीर और शक्तिशाली बाजार के अनुशासन और दबाव को मानने का इच्छुक नहीं रह गया है, जबकि पहले वह इनसे बाहर नहीं था।

बात मानवाधिकार से शुरू की जाए, क्योंकि यहां से बात करना आसान है। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने 1948 में मानवाधिकारों को वैश्विक घोषणा में दर्ज कर लिया था। अमरीका में इस घोषणा की वैश्विकता के सिद्धांत के पक्ष में बहुत बढ़िया ढंग से राग अलापा जाता है और सांस्कृतिक सापेक्षवाद की वकालत करने वाले तीसरी दुनिया के लोगों और पिछड़ों के सामने इसे उचित ठहराया जाता है।

यह सारा मसला लगभग साल भर पहले वियना कान्फ्रेंस में चरम पर पहुंच गया था। लेकिन वैश्विक घोषणा की असलियत का इस राग पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा। मसलन इसकी धारा 25 में कहा गया है, 'हरेक को खुद के लिए और अपने परिवार के स्वस्थ रहने के लिए उचित जीवन स्तर रखने का अधिकार है। इस स्तर में रोटी, कपड़ा, मकान, दवा-दारू और जरूरी सामाजिक सेवा शामिल है। इसमें बेरोजगारी, बीमारी, अपंगता, वैधव्य, बुढ़ापा या अन्यथा रोजी रोटी का साधन न होने पर सुरक्षा का अधिकार भी शामिल है।'

ये बातें दुनिया के सबसे अमीर देश में कैसे सही ठहरती हैं। देश भी ऐसा जो अतुलनीय है और जिसके पास इन बातों को सही न ठहराने का कोई बहाना भी नहीं है। औद्योगिक जगत में अमरीका का गरीबी का रिकॉर्ड सबसे खराब है। इंगलैंड से दुगना। लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं। इनमें लाखों बीमार और कुपोषण के शिकार बच्चे भी शामिल हैं। न्यूयॉर्क शहर में 40% बच्चे गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं। वो ऐसी न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित हैं जो उन्हें तंगहाली, निराश्रयता और हिंसा से बचने की उम्मीद भी दे सकें।

धारा 23 को देखें, जो कहती है, 'हरेक को न्यायोचित और अनुकूल परिस्थितियों में काम करने का अधिकार है।' आईएलओ की हाल ही में एक रिपोर्ट छपी है, जिसमें सारी दुनिया की बेरोजगारी का अंदाजा लगाया गया है। जनवरी 1994 में जीवन निर्वाह के लिए जिनके पास काम नहीं है, ऐसे लोग 30% हैं। इस रिपोर्ट में ठीक ही कहा गया है कि यह 1930 के दशक से भी ज्यादा विकट मामला है। इतना ही नहीं, दुनिया भर में मानव अधिकारों की दुर्दशा का यह एक पहलू भर है। यूनेस्को का अनुमान है कि करीब 5 लाख बच्चे हर साल सिर्फ कर्ज चुकाने के चक्कर में मरते हैं। कर्ज चुकाने का अर्थ है कि बैंकों ने अपने आकाओं को कर्ज देकर डुबो दिए और अब वो गरीब लोग इन्हें चुका रहे हैं, जिनका ऐसे कर्जों से कुछ भी लेना देना नहीं है। अमीर देशों में भी करदाता ऐसे कर्ज चुकाते हैं क्योंकि कर्जों का सामाजीकरण कर दिया जाता है। ऐसा अमीरों के समाजवाद में होता है जिसे हम मुक्त उद्यम (फ्री एंटरप्राइज़) कहते हैं। कोई बैंक से यह अपेक्षा नहीं करता कि डूबंत ऋण की भरपाई बैंक खुद करेगा। वो तो मेरा और आपका काम है।

इधर विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि एक करोड़ से ऊपर बच्चे हर साल ऐसी बीमारियों से मर जाते हैं जिनका इलाज बहुत आसान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख इसे एक गुम हत्याकांड कहते हैं। इसे रोज थोड़े थोड़े पैसे जोड़ कर रोका जा सकता है।

अमरीका में इधर हालात थोड़ा सुधरे हैं। लेकिन रफ्तार बहुत धीमी है। पिछली वृद्धि की तुलना में एक तिहाई से भी कम। इतना ही नहीं, जो नौकरियां निकल रही हैं, उनमें से एक चोथाई से ज्यादा, अस्थाई हैं और वो भी अर्थव्यवस्था के उत्पादक हिस्से में नहीं हैं। अर्थशास्त्री लेबर मार्केट में लचीलेपन में सुधार कहकर अस्थाई रोजगार में हुई इस वृद्धि का स्वागत कर रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जब आप रात को सोएं तो आपको यह पता नहीं होगा कि सुबह उठने पर काम सलामत रहेगा या नहीं। यह फायदा कमाने के लिए अच्छा है, लोगों के लिए नहीं, जिसका अर्थ है कि यह अर्थव्यवस्था के लिए तकनीकी दृष्टि से ही ठीक है।

रोजगार में आए सुधार का एक और पहलू है - काम ज्यादा पैसा कम। काम बढ़ता जाएगा, मजदूरी घटती जाएगी। सुधार के लिए यह बात बेमिसाल है। प्रति इकाई उत्पादन की मजदूरी के हिसाब से अमरीका में मजदूरी ब्रिटेन को छोड़कर औद्योगिक जगत में सबसे कम है। 1991 में अमरीका में यह इंग्लैंड से भी कम हो गई लेकिन इंग्लैंड ने अपनी स्थिति सुधारी और गरीबों और कामगारों को कुचलने की स्पर्धा में फिर से पहला स्थान प्राप्त कर लिया। अमरीका में जो मजदूरी 1983 में दुनिया में सबसे ऊंची थी (सबसे अमीर देश में यह अपेक्षित भी है) वो आज जर्मनी से कम है और इटली से 20%कम है। इस बदलाव के बारे में वाल स्ट्रीट जरनल ने कहा, 'अतीव महत्व का स्वागत योग्‍य परिवर्तन। आम तौर पर यह दावा किया जाता है कि ऐसे स्‍वागत योग्‍य परिवर्तन प्रकृति के नियमों की तरह बाजार की शक्तियों के स्‍वाभाविक परिणाम-स्‍वरूप होते हैं। और इसके लिए दो कारकों की पहचान की जाती है – अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार और ऑटोमेशन। विनम्र निवेदन है कि यह गुमराह करने वाली बात है। न व्‍यापार न ऑटोमेशन, बाजार की शक्तियों का दोनों से ही खास लेना देना नहीं है।'

व्यापार को लीजिए। व्यापार के बारे में एक जाना माना तथ्य है कि व्यापार को अत्यधिक सब्सिडी दी जाती है जिससे बाजार में काफी हद तक बिगाड़ पड़ता है। मेरे ख्याल से आज तक किसी ने इसकी जांच करने की कोशिश नहीं की है। सब यह मानते हैं कि हर प्रकार के परिवहन को बहुत ज्यादा सब्सिडी दी जाती है, चाहे वह समुद्री यातायात हो, हवाई हो, सड़क का या रेल का माध्यम हो। चूंकि व्यापार के लिए परिवहन की जरूरत होती ही है इसलिए परिवहन के खर्च को व्यापार की क्षमता के खर्च में जोड़ दिया जाता है। लेकिन परिवहन की लागत को कम करने के लिए बहुत सब्सिडी रहती है जो ऊर्जा के खर्च के रूप में और सौ तरह के बाजार बिगाड़ के रूप में होती है। इसका हिसाब करना आसान नहीं है।
अमरीकी सेना पैंटागान को लीजिए। यह एक बड़ा मसला है। पैंटागान का बहुत बड़ा भाग उस फोर्स का है जो खौफनाक अस्त्र शस्त्रों की नोक मध्य पूर्व की ओर ताने खड़ी है। जो यह सुनिश्चित करती है कि यदि अमरीका हस्तक्षेप करना चाहे तो कोई बीच में न आ पड़े। इसका बड़ा मकसद है तेल की कीमतों को एक हद तक काबू में रखना। कीमतें बहुत कम भी नहीं की जा सकतीं, क्योंकि अमरीकी और ब्रितानी कंपनियों ने मोटा फायदा कमाना होता है। इन देशों ने भी लाभ कमाना होता है ताकि वे लंदन और अमरीका में अपने मालिकों को भेज सकें। इसलिए कीमतें बहुत कम भी नहीं। लेकिन बहुत ज्यादा भी नहीं क्योंकि व्यापार को भी तो चुस्त दुरुस्त रखना है। मैं बाहरी प्रभावों, प्रदूषण आदि का तो नाम ही नहीं ले रहा हूं। अगर व्यापार के असली खर्च का हिसाब लगाया जाए तो बाहरी तौर पर दिखने वाली व्यापार की यह कुशलता काफी हद तक गिर जाएगी। कोई नहीं जानता किस हद तक।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप और अशोक जी: जरूरी प्रयास. सार्थक लेख. धन्यवाद.पर एक जो बात खुल नही रही है कि यहाँ वियेना के किस सम्मेलन का जिक्र है? दरअसल वियेना का विश्व के आर्थिक इतिहास के ढांचे में काफी महत्व है. वहाँ 1819 से 2007 तक कुल दस सम्मेलन हुए है और दसों के विषय अलग अलग रहे हैं ..

    कृपया इस क्रम को जारी रखें, ब्लॉग की चंचलमना इस दुनिया में यह बहुत महत्वपूर्ण काम होगा.

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  2. 'सारा मसला लगभग साल भर पहले वियना कान्फ्रेंस में चरम पर पहुंच गया था।' इस पंक्ति और इस तथ्य कि यह भाषण 2009 में दिया गया था…से तो यही निकलता है कि 2007 के सम्मेलन का ज़िक्र है।

    आपकी टिप्पणी का आभार…हम निश्चित तौर पर इस क्रम को ज़ारी रखने का प्रयास करेंगे…आप सबके सहयोग की हमेशा दरकार रहेगी

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  3. बाजार ने दुनिया को बद से बदतर बनाया है।

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  4. अशोक,
    आपकी यह पक्षधर सक्रियता मेरे मन में आपके प्रति अधिक प्रेम उपजाती है।

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  5. अम्बुज जी, आपका यह प्रेम ही हमें लगातार सक्रिय रहने की प्रेरणा देता है…

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…