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बुधवार, 25 अगस्त 2010

एक ब्लागिये का मुर्गावलोकन!

ब्लाग जगत : आभासी दुनिया और छाया युद्धों का संतोष
(समयांतर के ताज़ा अंक में प्रकाशित आलेख)

बीसवीं सदी क्रांतियों की सदी थी। दुनिया भर में नये और युगप्रवर्तक विचार अलग-अलग रूपों में आकार ले रहे थे, उन विचारों के आधार पर दुनिया भर में अनेक ध्रुव विकसित हो रहे थे और उन्हें ज़मीन पर लागू कर एक बेहतर दुनिया के निर्माण और मानव की मुक्ति के महान लक्ष्य से प्रेरित हो दुनिया भर के क्रांतिकारी अपनी ज़िंदगियां दांव पर लगा रहे थे। इस पूरी प्रक्रिया में ज्ञान-विज्ञान का जो विकास हुआ उसने रूपान्तरकारी भूमिका निभाई और समाज के बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले बुद्धिजीवियों ने यह लड़ाई कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी तथा कलम के इस क्रांतिकारी इस्तेमाल के ख़तरे भी उठाये। रूस, चीन, क्यूबा जैसे तमाम देशों में हुई इन क्रांतियों का असर केवल इनकी सीमाओं तक ही मेहदूद नहीं रहा बल्कि कमोबेश पूरी दुनिया में इसका असर सत्ता के प्रतिपक्ष के रूप में समाजवाद की विभिन्न धाराओं की मज़बूत उपस्थिति के रूप में दिखा। इस प्रतिपक्ष का एक हिस्सा अगर मज़दूरों-किसानों का हिरावल दस्ता था तो दूसरा और उतना ही ज़रूरी हिस्सा कलमकारों का भी था। दुनिया भर में अख़बारों, परचों, पुस्तिकाओं जैसे हथियारों के ज़रिये इन ताक़तों ने सत्ताधारी पूंजीपतियों के दुष्प्रचारों और असली मंतव्यों को बेपर्द करने के साथ-साथ अपने वैचारिक वर्चस्व को स्थापित करने के महत्वपूर्ण कार्य को अंज़ाम दिया। बौद्धिक जगत की इस प्रतिबद्धता का असर कितना था इसे इस तथ्य से ही समझा जा सकता है कि अमेरिका ने सी आई की मदद से इसका प्रतिकार करने और लेखकों को धन तथा सुविधाओं द्वारा तोड़ने के लिये कांग्रेस फ़ार कल्चरल फ्रीडम की स्थापना की थी।

सोवियत संघ के विघटन के बाद की परिस्थितियों में यह ख़तरा काफ़ी कम हो गया। पूरी दुनिया में नव उदारवाद का अश्वमेध जिस गति और आसानी से हुआ उसमें ऐसी ख़रीद-फ़रोख़्त की ख़ास ज़रूरत नहीं रही। इस नई सदी में बस एक ही क्रांति हुई- संचार क्रांति जिससे पूंजीवाद को कोई ख़तरा तो छोड़िये, दरअसल नई प्राणशक्ति ही मिली। इंटरनेट की इस नई दुनिया में सूचनाओं के सारी सीमायें टूट गयीं, आवारा पूंजी का आवागमन आसान हुआ और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नव साम्राज्यवाद के दौर में अपने व्यापार पर नियंत्र तथा उसका विस्तार करना भी आसान हो गया। ज़ाहिर है कि इस नई क्रांति का उपयोग केवल उन तक ही सीमित नहीं रहा। दुनियाभर में साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोगों ने सूचनाओं के आदान- प्रदान तथा अभिव्यक्ति के इस नये माध्यम का उपयोग शुरु किया- ब्लाग भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

ब्लाग यानि गूगल तथा दूसरी कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराया गया स्पेस जिस पर आप फिलहाल कोई अतिरिक्त ध ख़र्च किये स्वयं की लिखित अभिव्यक्ति कर सकते हैं, जिसे दुनियाभर के इंटरनेट उपयोग करने वाले लोग न केवल देख सकते हैं अपितु इस पर टिप्पणी भी कर सकते हैं। हिंदी में यह माध्यम साहित्यकारों, विशेषकर युवा साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ, हालांकि अब तो फिल्मी कलाकारों से लेकर मुख्यधारा के राजनेता और खिलाड़ी भी इसका प्रयोग कर रहे हैं।

आज अकेले हिंदी में कोई 10 हज़ार से अधिक सक्रिय ब्लाग हैं, जिन पर साहित्य, राजनीति, फिल्मों और दूसरे तमाम विषयों पर रोज़ लाखों पोस्टें लगाई जाती हैं, उन पर आने वाली टिप्पणियों को जोड़ लें तो यहां सक्रिय लोगों की संख्या और बड़ी हो जाती है। इस नये माध्यम से जुड़े लोगों का दावा है कि अब यही साहित्य और समाचार का भविष्य है, प्रिंट अब पुरानी चीज़ हो गया। कहा जाने लगा कि यह लोकतंत्र का विस्तार है और अब अपनी बात कहने के लिये किसी संपादक की कृपा की ज़रूरत नहीं रही। यही नहीं ब्लाग पोस्ट को एक विधा की तरह प्रस्तुत करते हुए इसे साहित्य के विकल्प के रूप में बताने वालों की भी कोई कमी नहीं।

लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्या ब्लाग के अंदर वह क्षमता है कि वह प्रिंट की जगह लेकर उसके अग्रगामी की भूमिका ले सके? क्या सचमुच यह अभिव्यक्ति के लोकतंत्र का विस्तार है और इसने उन सारी कमियों से मुक्ति पा ली है जो प्रिंटजगत में व्याप्त हैं। इस माध्यम में पिछले दो वर्षों की सक्रियता के बाद मेरे लिये यह कह पाना मुश्किल है। एक माध्यम के रूप में इसकी ख़ूवियां हैं- यह तेज़ है, इसकी पहुंच ज़्यादा है और यह हर आदमी को अपनी बात कहने का स्पेस भी देता है, लेकिन ऐसा कहते समय हम मान लेते हैं कि वे 90 प्रतिशत से अधिक लोग हमारी दृष्टि में आदमी (या औरत) हैं ही नहीं जो आज तक इंटरनेट का उपयोग नहीं करते, और यहां कृपया योग्यता का सवाल न उठायें- इस देश में 20 रुपये से कम में अपना दिन काट लेने वालों की संख्या अब सभी जानते हैं। यह दरअसल इस देश के उच्च मध्यवर्गीय लोगों तक ही मेहदूद है जो एक कम्प्यूटर ख़रीद सकते हैं और हर महीने हज़ार रुपये इंटरनेट पर ख़र्च कर सकते हैं और कम से कम 80-90 घंटे भी। जो यह कर पाने में सक्षम नहीं वे इस लोकतंत्र से अपनेआप बहिष्कृत हो जाते हैं।

दूसरा, यह माध्यम जिस लोकतंत्र की बात करता है वह दरअसल संपादक नाम की संस्था का विलोप है। ध्यान रहे कि टाइम्स आफ़ इंडिया पहले ही यह लोकतत्र स्थापित कर चुका है। इसका असर यह हुआ है कि ब्लाग जगत में अराजक, आत्ममोहग्रस्त और आलोचना के प्रति असहिष्णु प्रस्तोताओं या नियामकों की एक ऐसी पौध उग आई है जिसने साहित्य तथा बौद्धिक जगत में स्थापित मूल्य मानयताओं को त्याग कर असहमति होने पर अशालीन वक्तव्य दिये हैं, भाषा की तमाम मर्यादायें तोड़ी गयी हैं। बेनामी टिप्पणियों को छोड़ भी दें तो पिछले दिनों कम से कम दो ऐसी घटनायें हुई हैं जिससे यह चीज़ साफ़ उभर कर आई है। पहली घटना में एक युवा लेखक की कहानियॉ की थोड़ी सी आलोचना करने पर एक वरिष्ट साहित्यकार को अपशब्द कहे गये तो एक दूसरी घटना में फेसबक पर एक ऐसे वरिष्ठ साहित्यकार की ज़ाली प्रोफ़ाईल बना दी गयी जो इंटरनेट का प्रयोग ही नहीं करते! यहां यह वता देना विषयांतर नहीं होगा कि उक्त साहित्यकार भी एक पत्रिका में युवा कहानीकारों की थोड़ी आलोचना करने की ख़ता कर चुके थे। ये दो घटनाएँ इसलिये और भी महत्वपूर्ण हैं कि ऐसा ब्लाग के ज़रिये लेखन शुरु करने वाले किसी व्यक्ति ने नहीं किया है अपितु उन लोगों ने किया है जो साहित्य से जुड़े रहे हैं और स्थापित परंपराओं को जानते हैं। संपादक की अनुपस्थिति और किसी ज़िम्मेदारी के अहसास के लोप ने उनके लिये यह आसान कर दिया है। इसके पहले भी लोगों ने नामवर सिंह से लेकर तमाम लोगों को अत्यंत अभद्र भाषा में जो गालियां दी हैं उका उत्स इस वर्ग की प्रवृतियों में सहज खोजा जा सकता है। ब्लाग पर यह सुविधाजनक है क्योंकि आप कभी भी अपना कहा मिटा सकते हैं, असहमति में आई टिप्पणियों को माडरेट कर सकते हैं और अपने लिखे को संपादित कर सकते हैं!

प्रिंट के ऊपर इस माध्यम से जुड़े लोगों ने जो दूसरा सबसे बड़ा आरोप अक्सर लगाया है वह यह है कि वहां भाई- भतीजावाद बहुत ज़्यादा है, चमचागिरी के ही माध्यम से छपा जाता है और ग्रुप बने हुए हैं। देखा जाय तो यह एक अत्यंत सरलीकृत बयान है। तमाम विकृतियों के बावज़ूद रचना की उत्कृष्टता ही प्रकाशन का सबसे बड़ा आधार होती है और अगर कोई जुगाड़ से छप भी जाये तो वह लंबे समय तक टिक भी नहीं पाता। वैसे अगर इसके बरअक्स ब्लाग को देखा जाये तो यहां भी यह कमियां दिखाई देती हैं और वह भी अधिक गंभीर रूप में। अव्वल तो हर व्यक्ति ख़ुद को ही छाप रहा है और उस पर यह कि जो प्रस्तुतकर्ता और टिप्पणीकर्ता हैं वो इस भाई- भतीजावाद और खेमेबाजी के अधिक शिक़ार हैं। जितनी वीभत्स खेमेबाजियां यहां दिखतीं हैं उतनी प्रिंट में भी नहीं। ज्ञातव्य है कि ऊपर जिस घटना का ज़िक्र किया गया था वह वक्तव्य देने वाले सज्जन दरअसल कहानीकार महोदय के मित्र थे और अपने ब्लाग पर उन्हें तथा कुछ अन्य मित्रों को अक्सर छापा करतें हैं- अतिरंजित विशेषणों के साथ! ऐसी अनेक मित्र मंडलियां यहां मौज़ूद हैं।

चौथी बात ब्लाग की पहुंच से जुड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि ब्लाग की पहुंच प्रिंट की तुलना में बहुत ज़्यादा है। ब्लागवाणी के आंकड़ों और कुछ और स्रोतों से प्राप्ट जानकारियों के अनुसार ज़्यादातर ब्लागपोस्ट की पाठक संख्या 100-200 से ज़्यादा नहीं। अब इसकी तुलना किसी भी पत्रिका से की जा सकती है!

आख़िरी बात यह कि हम ब्लाग पर कितना इंकलाब कर लें यह अंततः एक पूंजीपति संस्थान की संपत्ति है जिसे वह जैसे और जब चाहे नियंत्रित कर सकता है यहां तक कि माऊस के एक क्लिक से इसे हमेशा-हमेशा के लिये मिटा सकता है। तो जिस पहुंच, जिस आसानि और जिस दीर्घजीविता की हम बातें सुन रहे हैं वह दरअसल उस पूंजीपति की सदाशयता पर अगाध विश्वास से उपजी हैं।

कुल मिलाकर एक माध्यम के रूप में ब्लाग एक अत्यंत सीमित उच्च-मध्यवर्गीय लोगों के हाथ लगा एक नया खिलौना है जिसके सहारे वे अपनी नात्मकता परोस रहे हैं जो उनकी सहज वर्गीय प्रवृतियों के अनुरूप ही हैं। अपवादों का होना अवश्यंभावी है लेकिन इससे किसी परिवर्तनकारी भूमिका की आस लगाना ख़ामख़्याली से ज़्यादा कुनहीं, हां इस पर सक्रिय लोग छायायुद्धों से मिलने वाले संतोष के सहारे कुछ करने का आभासी संतोष ज़रूर पा जाते हैं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    *** हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र की उन्नति।

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  2. सटीक मुर्गावलोकन
    प्रिंट मीडिया और ब्लोगिंग मे एक सबसे बड़ा अंतर इसी बात से आजाता है कि अपनी किसी भी अभिव्यक्ति को को माउस की एक क्लिक से बदला जा सकता है ऐसे मे वैचारिक अस्थिरता और अविश्वसनीयता ने अवसरवादिता के साये मे पनपना शुरू कर दिया है... लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसका दूसरा और उज्जवल पहलू कहा जा सकता है ... दुनिया छोटी भी हुई है !

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  3. इस पोस्ट के बहुत से मूल्यांकन सही हैं। लेकिन ब्लाग ने बहुत सारे लोगों को नियमित रूप से लिखने के लिए प्रोत्साहित किया है। अधिकांश पुस्तकें पहले हजार की संख्या में छपती थीं आजकल पांच सौ की संख्या में छप रही हैं जिस में पैसा भी खुद लेखक का लग रहा है, लघुपत्रिकाओं की भी यही स्थिति है।
    ब्लाग लेखन ने हजारों हजार लोगों को आप में जोड़ा है। उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया है। आपसी संवाद विकसित किया है। आज के युग का सब से आधुनिक श्रमजीवी कंप्यूटर और इंटरनेट पर काम करता है, जो भविष्य में नेतृत्वकारी शक्ति बनेगा।
    पूंजीवाद में सभी साधन पूंजीपति के हाथों में होते हैं। पूंजीवाद को आगे की सामाजिक अवस्था में बदलने वाली शक्तियों को उन्हीं साधनों का उपयोग करना होता है और करना होगा।

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  4. दिनेश राय जी की टीप से सहमत हूँ ....

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  5. कम से कम इतना तो ब्‍लाग कर ही रहा है कि इस माध्‍यम में जो लोग अपने को अभिव्‍यक्ति करना चाहते हैं इसका इस्‍तेमाल कर रहें हैं। उनकी बात जितने लोगों तक पहुंच सकती है पहुंचे। हां इस माध्‍यम को बेकारी की लफ्फाजी और एक दूसरे की वाही वाही की बीमारी से बचाकर कैसे रखा जाए इस पर विमर्श करना चाहिए।

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  6. दिनेश राय जी की टीप से सहमत ....

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  7. Har sikke ke 2 pehloo hote hain!! Lekin bahot ki achha lekh!! padh kar achha laga!! mai yahan par ek aur baat jodna chahunga, blog akelepan ka bhi paryay hota hai!! Baahot se log jo akelepan se gharsit hote hain wo aajkal blog ka sahara le rahe hain!!

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  8. सबसे पहले मैं कहूँ कि सौ रुपये मासिक में भी इन्टरनेट की सुविधा ली जा सकती है.

    कोई भी माध्यम दूसरे का स्थानापन्न नहीं हो सकता . ब्लॉग ने संपादक और अखबार मालिक के सेंसर को नष्ट किया है. सब जानते हैं कि अखबार में अपने ही रिपोर्टर को छापना मुश्किल होता है. रिपोर्टरों का यह आम रोना है.

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  9. इस पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं के लिये आप सबका आभार…ब्लाग का एक माध्यम के रूप में जो महत्व है उससे अगर अस्वीकार होता तो मैं ख़ुद इस पर इतना समय और ऊर्ज़ा नहीं लगा रहा होता। मेरी चिंतायें दूसरी हैं, जैसे कम्प्यूटर गेम्स ने बच्चों से बचपन छीन लिया वैसे ही यह कहीं हमसे हमारी संघर्ष क्षमता न छीन ले…पूंजीवाद के इस वर्चुअल साधन के साथ जो सबसे बड़ी दिक्कत मुझे लगती है वह यह है कि जहां किताब या अखबार एक बार छपने या बिकने के बाद ख़रीदने वाले की संपत्ति बन जाते हैं ( याद कीजिये हमने प्रतिबंधित कर दी गयी रचनायें कैसे पढ़ लीं) वहीं इस माध्यम पर उपस्थित सामग्री को गूगल का मालिक जब चाहे एक क्लिक से हमेशा के लिये डिलीट कर सकता है…

    सौ रुपये मासिक के किसी प्लान के बारे में मध्यप्रदेश में मुझे नहीं पता…ब्लाग जगत पर लगातार सक्रिय रह पाने के लिये जितने घंटे लगते हैं उसके अनुभव के आधार पर मैने वह आंकड़ा लिखा था। मोटे तौर पर आज भी इंटरनेट की सुविधा मध्यवर्गीय लोगों तक ही है और बड़ा तबका इससे बहिष्कृत है। संपादकीय हस्तक्षेप के बहुआयामी प्रभाव हैं इसे सिर्फ़ रिपोर्ट छापने की आज़ादी पर रिड्यूस करना उचित नहीं…चाहें तो मोहल्ला और भड़ास जैसे ब्लाग्स पर जाकर आप देख सकते हैं कि आज़ादी के नाम पर क्या-क्या गुल खिलाये जा रहे हैं…

    मेरा बस यह कहना है कि यह अपनेआप में एक उपयोगी माध्यम है लेकिन किताब, पत्रिका या फिर अख़बार का विकल्प नहीं…

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…