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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सीढ़ियां तलाशता कवि - राजू रंजन प्रसाद

छुटपन में जब गांव में था तो अग्रज मित्रों से सुना करता था कि भूत-प्रेत आदि का डर लगे तो ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना चाहिए। मेरा मन कभी इसे मानने को तैयार न होता और सहज ही हंसी फूट पड़ती। बालमन को तब यह कहां पता था कि कुछ ‘बुद्धिमान’ लोग भी इसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके हैं और रह-रहकर कविता की शक्ल में पुनर्सृजन करेंगे। संजय कुंदन का काव्य-संग्रह ‘चुप्पी का शोर’ पढ़ते हुए लग रहा है, मानो बगल में बैठा मित्र बचपन का वही रटा-रटाया चालीसा बक रहा हो।

चुप्पी वैसे कई बार महत्वपूर्ण और अर्थवान होती है। बेढंगा बोलेंगे तो बेवजह शोर पैदा करेंगे आप! फिर भारतीय दर्शन में मौन की बड़ी महिमा है। बहुतेरे मौनी लोग अपनी ‘आत्मा’ तक के साथ ‘संवाद’ स्थापित कर लेते हैं। नामवर सिंह की ऊंचाई अगर मुझे मिली होती तो झट इसे ‘आत्मालोचना’ घोषित कर डालता। अर्थात् आत्मा के साथ चलनेवाला अंतहीन संवाद आत्मालोचना है। अलबत्ता, संवाद के बहाने अगर ‘संभावना’ और ‘समझौते’ के सूत्र तलाशे जा रहे हों तो चुप्पी ही भली!

धूमिल के यहां जाना था कि मोची के लिए प्रत्येक आदमी एक जोडा जूता है। मोची और जूते का बिंब फिर भी हमें श्रम की दुनिया से बाहर निकलने नहीं देता। ऐसा इसलिए भी संभव हुआ कि धूमिल ग्रामीण परिवेश से गहरे जुड़े थे। ‘दिल्ली’ की राह न पकड़ी थी, जहां कवि के अनुसार आदमी ‘जूते’ न रहकर ‘सीढ़ियों’ में तब्दील हो चुका है और प्रत्येक आदमी को अपने-अपने तरीके से सीढ़ियों की तलाश है। मेरे इस विश्वास के लिए कि कवि शायद इसमें शामिल न हो, कोई आधार नहीं मिलता। कवि ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी खुद ही मारी है। सीढ़ियां चढ़ना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि सीढ़ियां भी तो कोई साधारण नहीं हैं! बिल्कुल सर्कस की सीढ़ियां हैं, जिस पर कुशल नट ही चढ़ सकता है। ऊंचा चढ़ने के लिए अपना ‘वजन’ कम करना होता है, गुरुत्व-बल की दिशा ठीक करनी होती है। ‘दिमाग’ का साथ छोड़ना होता है। जरूरत पड़ने पर स्मृतियों तक से पीछा छुड़ाना पड़ सकता है। किंतु भारत की सामाजिक संरचना ही कुछ ऐसी है कि ‘द्विज’ अथवा ‘ब्राह्मण’ होने की बात दिमाग के किसी-न-किसी कोने में रह ही जाती है। कवि का यह अपराध क्षम्य है, क्योंकि ब्राह्मणत्व का भूत उसे सिर्फ बहन की शादी के समय सताता है। फिर धूत कहौं, अवधूत कहौ का मंत्रोच्चार करनेवाले तुलसी का मन जब इसके पार नहीं जा सका तो अपनी पीढ़ी के कवि से ऐसी अपेक्षा रखना ‘सामाजिक न्याय’ के सिद्धांत के विरुद्ध है।

कवि ने अपने समय की एक भयावह किंतु कल्पित तस्वीर प्रस्तुत की है। यह भयावहता सिर्फ चेतना के स्तर पर है और इसीलिए इसकी संरचना में एक अद्भुत कृत्रिमता है। कवि के अनुसार,
‘अब शहर में
सबसे सुरक्षित थे हत्यारे
इसलिए लोग चाहते थे हत्यारों की तरह दिखें
पर जब किसी को मार न पाया तो सोचा सबसे आसान है
अपने-आपको मार डालना
और उसने ऐसा ही किया
सुरक्षित होने के लिए।’

ऐसी कौन-सी हत्यारी संस्कृति है जिसमें हत्यारा किसी की हत्या करने की बजाय आत्महत्या पर उतर आता है ? क्या यही है आलोक धन्वा की ‘कुलीन हिंसा’ ? दरअसल यह मध्यवर्ग की असुरक्षा की चेतना है जिससे कवि कई तरह की मानसिक दुर्बलताओं का शिकार होता है। वह अपने पात्र इसी वर्ग से उठाता है। टी.वी. पर हत्या की खबरों को देख-सुनकर खुद के मारे जाने की कल्पना कर लेता है और विलाप करती हुई स्त्री पत्नी लगती है। जिसे रात की नींद के लिए शराब और दवा की जरूरत है। जरा गौर करें-

‘टीवी पर समाचार देखते हुए
उसने ड्रिंक्स बनाकर पी
फिर गहरी नींद में सो गया।’

संजय कुंदन का भय समय और समाज से कटे हुए आदमी का भय है और उसका दुख एक अकेले आदमी का असहाय प्रलाप है। मध्यवर्गीय कवि प्रतिपक्ष रचना नहीं चाहता, व्यवस्था के विरुद्ध वह नहीं जा सकता क्योंकि ऐसा करने से पहचान का संकट पैदा हो सकता है। कवि की पंक्तियां हैं-

‘वह घबराया
उसे पहली बार अहसास हुआ
कि उसकी आवाज अनसुनी भी की जा सकती है
उसे पहचानने से इंकार किया जा सकता है।’
यह जवाब है कवि केदारनाथ सिंह के उस सवाल का-‘वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा ?’ संजय कुंदन को डर है कि अगर कहीं उसे अपना होना प्रमाणित करना पड़ा तो सिर्फ उसका ईश्वर ही उसके पक्ष में बयान दे सकता है, क्योंकि महानगरों की सोसायटी महज एक अपार्टमेंट की आबादी के बूते बनती है। उस अकेले अपार्टमेंट के लोगों का आपसी सरोकार भी किस स्तर का होता है, कवि उससे अनजान नहीं है। इसी संग्रह की एक कविता है-‘पड़ोसी’, जो व्यक्तिकेंद्रित जीवन जी रहे लोगों की त्रासदी बयान करती है।
ठीक ऊपर की मंजिल पर रह रहे व्यक्ति का कवि के साथ कोई सीधा संवाद स्थापित नहीं होता या कहें कि कवि की अपनी जो विशिष्टता है, वह उसे लोगों से हिलने-मिलने, मिलने-जुलने से रोक देती है;
‘कोई बेचैन चक्कर लगा रहा है कमरे में
उसकी बेचैनी एक दीवार से छन-छन कर
आ रही मुझतक
बस एक मंजिल ऊपर चल रहा
अलग तरह से जीवन
जिसकी आहट दखल देती रहती
मेरे जीवन में भी।’
पड़ोसी का कवि के जीवन में दखल महज इतना भर है कि देर रात तक जब कवि सो नहीं पाता, तो नल चलने की तेज आवाज सुनायी पड़ती है या फिर कुकर की तेज सीटी। कभी तेज पुरुष-स्वर तो कभी एक स्त्री की सिसकी। कवि को लगता है जैसे
‘यहां इस फ्लैट की हर कोठरी में
एक न एक आदमी झेल रहा है
किसी न किसी तरह की यातना।’
यह अकेले पड़ चुके आदमी की यातना है। यह पीड़ा की अभिव्यक्ति भी नहीं, क्योंकि पीड़ा की सच्ची अभिव्यक्ति पीड़ा से मुक्ति के लिए प्रयास में है। केवल तभी पीड़ा साहित्यिक मूल्य बन पाती है।

प्रकाशन: प्रभात खबर, दिल्ली, 19 मार्च, 2005.

1 टिप्पणी:

  1. इस पोस्ट में सम्मलित सारी कविताओं की टुकड़ी बड़ी अच्छी लगी । एक दूसरे से अलग मगर जुड़ी हुई...

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