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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

वेरा निकोलाई की कैद से निकल भागी है...

(प्रतिभा कटियार का यह आलेख एक ब्लाग पर अपने संक्षिप्त रूप में प्रकाशित हुआ था। तब भी इसने मुझे गहरे प्रभावित किया था और अब जब उन्होंने इसे मुझे अपने मूल रूप में भेजा तो जनपक्ष के पाठकों से शेयर करने का लोभ कैसे संवरित होता। असल में यह लेख निकोलाई चेर्निशेव्य्स्की के प्रसिद्ध उपन्यास 'क्या करें' की नायिका वेरा के बहाने न केवल स्त्री की मुक्ति के आख्यान में सकारात्मक हस्तक्षेप करता है अपितु कुछ साल पहले आये आलोक श्रीवास्तव के कविता संग्रह 'वेरा उन सपनों की कथा कहो' के रास्ते उसकी समकालीन व्याख्या भी करता है। न तो आप इसे समीक्षा कहकर टाल सकते हैं न किसी विमर्श का ठप्पा लगाकर ख़ारिज़ कर सकते हैं)

वेरा अब समय, काल, इतिहास की कैद से मुक्त हो चुकी है. वेरा निकोलाई की कैद से निकल भागी है. निकोलाई चेर्नीवेश्की जिसने उसे अपने उपन्यास की नायिका बनाया. हालांकि वेरा निकोलाई के भी साधे सधी नहीं. वो उपन्यासकार को अपने ही इशारों पर नचाती रही, जबकि जिंदगी उसे. बहरहाल, वेरा उस काल खंड को पार कर, देशकाल को पार कर पूरी दुनिया में विचरण कर रही है. दिल्ली, मुंबई की सड़कों पर वेरा भागती-फिरती है. कहीं टैक्सी पकड़ती कहीं, सिटी बस तो कहीं मेट्रो ट्रेन. 8 फरवरी 1863 को एक बंद लिफाफे से शुरू हुई वेरा की दास्तां यूं तो निकोलाई के उपन्यास में सिमट गयी लेकिन उसके सपनों का विस्तार किन्हीं भी पन्नों में सिमटने वाला नहीं था. वेरा ने अपनी पहचान का सपना देखा. खुद को महसूस किया. अपने भीतर के आंदोलन को समझा. व्यैक्तिक स्वतंत्रता, समानता के अर्थ उसके लिए बड़े थे. तब भी जब उसने अपने लिए मुट्ठी भर अस्तित्व भी नहीं गढ़ा था. गरीबी, कुंठा, निराशा से भरे बचपन में भी उसकी आंखों में मुक्त व्यक्तित्व का सपना लगातार पलता रहा. उसने वक्त आने पर गलत का पुरजोर विरोध किया.
वेरा को पढ़ते हुए महसूस होता है एक चेतन व्यक्तित्व का होना क्या होता है. हिम्मत क्या होती है और सपनों का अर्थ क्या होता है. प्रेम क्या होता है, संघर्ष क्या होता है. नैतिकता, परंपरा, वर्जना जैसे शब्द वेरा के विराट व्यक्तित्व के आगे बेहद बौने नजर आते हैं. वेरा हर बंधन से आजाद स्त्री मुक्ति का सपना है. वेरा प्रेम का विस्तार है. प्रेम की नई, खुली हुई परिभाषाओं का निर्माण करती वह स्त्री युगों-युगों तक के लिए स्त्रियों को संदेश देती है कि खुद को समझो. अपना समय, अपना देश और अपना मन सबका कितना महत्व है. विवाह का अर्थ उसके लिए व्यक्तित्व का विकास है न कि बंधन. प्रेम को समझने के प्रयास में वेरा यह नि:संकोच मानती है कि किसी की मदद, सहयोग, पारस्परिक समझ, सहानुभूति, मित्रता का मिलाजुला रूप, जिसे हम प्रेम समझ लेते हैं असल में वह पे्रम नहीं होता. प्रेम तो इन सारे तत्वों से बहुत दूर कहीं होता है. तारों की छांव में...दूर तक फैले सरसों के खेतों में...अमराइयों में...बच्चों की खिलखिलाहट में. किसी की एक बूंद आवाज में भी हो सकता है प्रेम. किसी के तिरस्कार में भी. किसी की जिद में, किसी से हार में. वेरा वेदना के तंतुओं से गुंथी है लेकिन फिर भी सुख में,जीवन में, उसकी अटूट आस्था है. दु:ख को लेकर वह विचलित नहीं होती बल्कि उसे पार कर उससे शक्ति लेती है. वह सच्ची है अपनी भावनाओं को लेकर. इतनी सच्ची कि कई बार उसकी बेबाक बयानी यह भ्रम भी देती है कि कहीं वह घमंडी तो नहीं. लेकिन नहीं, वेरा झूठ को चिपकाये रहकर उसके साथ जीते जाने और परंपराओं का पालन करते जाने से बेहतर मानती है झूठ से मुक्ति पाना. वह सच से साक्षात्कार करने को कभी भी तैयार रहती है.

निकोलाई की वेरा से साक्षात्कार करते समय महसूस होता है कि वेरा सिर्फ वो नहीं जो किरदार में है उसके भीतर की वेरा ज्यादा महत्वपूर्ण है. उसकी जीवन को जीने की उत्कट इच्छा उसे आम से खास बनाती है. वह न तो सौंदर्य की देवी है न ऐसी कि एक बार में किसी का मन मोह ले. लेकिन जैसे-जैसे हम उसके करीब जाते हैं, उसका मन खुलता है, उसका दिमाग खुलता है, हमें वेरा से प्यार होने लगता है. एक समय के बाद वेरा का नशा छाने लगता है. कहीं भी वेरा अपने स्त्री होने के कारण, सौंदर्य के कारण, कमनीयता के कारण, स्त्रियोचित आकर्षण के कारण नहीं खींचती. उसका सोचने का ढंग ही उसे खास बनाता है. निकोलाई की वेरा उस दौर में विवाह के बाद भी अपनी स्वतंत्रता की पक्षधर है और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भी. इसके लिए वह कैसा भी और कितना भी संघर्ष करने को तैयार रहती है.

निकोलाई की इस वेरा से दुनिया भर के न जाने कितने नवयुवकों ने प्रेम किया होगा. न जाने कितनी लड़कियों ने वेरा के सपनों में अपना दिल भी धड़कते हुए महसूस किया होगा. भाषा, संस्कृति और भौगोलिक सीमाओं से परे वेरा हर दिल की धड़कन बन गई. हर उस दिल की जो वेरा के करीब से होकर गुजरा और जो नहीं गुजरा वो वेरा जैसी किसी की तमन्ना को दिल में दबाये अपनी अनजानी तलाश को अंजाम देने को बेताब फिरता रहा सदियों तक. आलोक श्रीवास्तव ने भी वेरा में अपने सारे सपने, सारी भावनाएं तिरोहित करते हुए एक ऐसे समय ऐसी दुनिया का स्वप्न देखा जहां सिर्फ और सिर्फ प्रेम का साम्राज्य हो. जहां दुख, प्रेम पर विश्वास की अग्नि में तपकर पिघल जाये. जहां देह का अर्थ बहुत पीछे छूट जाये और बेहद आसान हो जाए आत्माओं को देख पाना, जैसे कोई देखता है अपनी खिड़की से सामने जाने वाली सड़क को. अपने पहले कविता संग्रह में आलोक वेरा की आंखों से न जाने कितने सपने देखते हैं. शोषण से मुक्त समाज का सपना, धरती पर छाई हरियाली का सपना. स्त्री को उसके सर्वस्व के साथ महसूस करने का सपना. उनके ढेर सारे सपने इस देश, समाज और प्रेम के वास्ते देखे गये, वेरा की खूबसूरत आंखों से. वेरा को प्रेम करना अपने अस्तित्व को प्रेम करना है, अपने अस्तित्व से सारी अकराहटों-टकराहटों को उठाकर फेंक देना है. आत्मा के संगीत को प्रवाह देना है, उसे महसूस करना है. 1996 में आया आलोक का संग्रह वेरा उन सपनों की कथा कहो के बाद आलोक के दो संग्रह और आये. जब वसंत के फूल खिले और यह धरती तुम्हारा ही स्वप्न है. लेकिन चाहते न चाहते उनकी हर कविता में कहीं न कहीं कम या ज्यादा वेरा झांकती रही. इस संग्रह की कविताओं को पढऩे को देते समय वे जानबूझकर कहते हैं, ये कविताएं वेरा से अलग हैं. मानो वे खुद को बता रहे हों कि वेरा से मुक्त होने की कोशिश है. लेकिन पहला प्रेम क्या इतनी आसानी से हाथ छोड़ता है. जिसका वजूद धड़कनों में शामिल हो, उससे किनारा करने की कोशिश में भी बेपनाह प्यार ही तो होता है. हर पल दूर जाते कदम और करीब ले जाते हैं. शब्द अपने अर्थ बदलने लगते हैं. दूर जाने में पास आने का अर्थ दिखने लगता है. होता भी यही है. दूर होने की हर कोशिश प्यार के समंदर में एक और डुबकी सी मालूम होती है. पाब्लो नेरूदा का पहला प्रेम हो या चेखव का सब यही सच उजागर करते हैं कि जिससे लागे मन की लगन उसे क्या बुझायेगी चिता की अगन. मुस्कुराहटों में या आंसुओं में, इंतजार में या मिलन में, प्रेम में या आक्रोश में बात वही है बस प्यार...

वेरा शब्द ही प्रेम का पर्याय है जो आलोक के पहले कविता संग्रह में हर शब्द में समाहित है. यूं वेरा को उसके समग्र में वैसे का वैसा समझ पाना भी कोई बहुत आसान काम नहीं है. इस दृष्टिकोण से निकोलाई की वेरा और आलोक की वेरा दोनों ही खुशकिस्मत रहीं. उन्हें हर उस वक्त वो व्यक्ति मिले जो उसे उसकी उत्कट आकांक्षाओं, समझ, विचार समेत स्वीकार करे. उसकी मन की गिरहों को न सिर्फ खोलता चले बल्कि उसका वैचारिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यैक्तिक विकास भी करता चले. उसके प्रेम के इनकार को भी जो प्रेमी सिर आंखों पर सहेज ले. दखल न दे उसकी अंदर की दुनिया में. उसे ठीक वक्त पर एक ऐसी दोस्त मिले जो उसे ताकीद करे कि बिना प्रेम के एक चुंबन भी किसी को मत देना. इससे बेहतर होगा मर जाना. भले ही यह ताकीद देने वाली वेरा की यह दोस्त एक वेश्या ही क्यों न हो. लेकिन प्रेम की प्रग्राढ़ता का कैसा अनमोल संदेश मिलता है वेरा को कदम कदम पर. कभी अपने भीतर से तो कभी बाहर से.

वेरा पाव्लोवेना को अपने पहले प्रेम को लेकर भले ही भ्रम हुआ लेकिन यह रिश्ता कमजोर नहीं था. तभी तो समझ और सच्चाई से सींचा गया रिश्ता मुझे तुमसे प्रेम नहीं है जैसी साफगोई को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है. कहीं कोई हाय-हाय किच किच नहीं. वेरा के सपने में उसे पता चलता है कि जिस सद्भाभावना, दया, मदद, वैचाारिक परिपक्वता को वह प्रेम समझ बैठी असल में वह तो प्रेम था ही नहीं. प्रेम की जगह खाली थी और कोई ढेर सारे मौसम, सूरज की किरनें, चांदनी, खिलखिलाहटें, नर्माहटें, गर्माहटें लेकर आया और उस खाली जगह पर उसका अधिकार हो गया. लगा कि प्रेम पूरा हो गया. ऐसा ही तो होता है. ऐसा ही तो होता रहा है. लेकिन नहीं, ऐसा ही नहीं होता हमेशा. वेरा को समझ में आया. जिसने उसकी मदद की उसी से उसे प्रेम हो जाये यह कोई जरूरी नहीं है. प्रेम को लेकर सबसे पहले हमें भ्रम ही तो होता है. किशोर वय में (या किसी भी उम्र में) जब हम दु:खों में आकंठ डूबे हों, जब निराशाओं का समंदर लहरा रहा हो, जब अंधेरा स्थाई हो चुका हो, जब जीवन से विश्वास उठ चुका हो ऐसे में जो हाथ मदद को बढ़ता है, जो अंधेरे को चीरने में मदद करता है, जो जीवन को उम्मीदों की सौगात देता है, जो निर्जन मन की दुनिया को आशाओं के फूलों से पाट देता है, उसे ही प्रेम समझ बैठने का भ्रम भला किसके हिस्से नहीं आया होगा. लेकिन प्रेम ऐसे नहीं आता. ढेर सारी परिभाषाओं, इच्छाओं, सद्भाावनाओं को रौंदता हुआ, सौंदर्य के उपमानों को भंग करता हुआ बेफिक्री, बेलौसी और ढिठाई के साथ आता है एक रोज. पकड़ता है हाथ और चल पड़ता है हमें साथ लेकर...सारी जद्दोजेहद, बचने की हजारों कोशिशें सब बेकार.

वेरा की जिंदगी में भी ऐसे ही प्रेम दाखिल होता है. पहले भ्रम बनकर फिर सच बनकर. वेरा के करीब जाकर जिंदगी खुलती है पर्त दर पर्त. आलोक की वेरा समझ से गढ़ी गई वेरा है. उससे भी ज्यादा समझ से गढ़ी गयीं हैं कविताएं. मासूम भी परिपक्व भी. समझ भी, नासमझ भी. हर कविता प्रेम का इसरार है. इंतजार है. समर्पण है लेकिन कोई घनी अपेक्षा नहीं है नायिका से. कविताएं प्रेम को अपने भीतर जज्ब करते हुए प्रेम को कैनवास को लगातार बड़ा करती चलती हैं. कई बार ये सामाजिक कविताएं, क्रांतिकारी कविताएं बन जाती हैं प्रेम कविताएं नहीं रहतीं. लेकिन यहीं हम भ्रमित होते हैं. प्रेम से बड़ी क्रांति और चेतना का कोई और स्वर है संसार में. सांसारिक चलन से दूर अपनी अलग ही दुनिया के दिवास्वप्न देखती वेरा के प्रेम में डूबी कविताएं पूरे देशकाल को नये सिरे से गढऩा चाहती है. वेरा के लिए. जहां शोषण का नामोनिशां न रहे. जहां अवचेतन में भी दु:ख का ख्याल तक न आये. पहले संग्रह में कवि वेरा के प्रेम में निमग्न है जबकि वेरा लगभग निर्विकार है. लेकिन चौथे संग्रह तक आते-आते वेरा निर्विकार नहीं रही. दु:ख से उबर चुकी वेरा अधिक परिपक्व हो चली है. वो मुक्ति की नई इबारतें गढ़ रही है. कवि न जाने कितने मौसम, न जाने कितने शब्द, न जाने कितने पहाड़, नदियां, सेहरा लिये उसका इंतजार कर रहा है, कई बार उसके साथ चल रहा है. कहीं कोई आकांक्षा नहीं मिलन की, बस साथ चलने की तमन्ना. बस साथ-साथ सफर को काटने की इच्छा. एक साथ दुनिया से दु:खों को मिटाने की जिजीविषा...उसे एकटक देखते जाने की इच्छा भी कभी-कभी. कविताओं में उसके मन को (जो न जाने किसकी प्रतीक्षा में कबसे उदास है) बस हौले से सहला देने की भोली सी इच्छा दिखती है. लेकिन कोई भी वेरा (स्त्री) किसी भी पुरुष को नहीं सौंपती अपना दु:ख. मुस्कुराहटें वो सबसे आसानी से सौंपती है. दु:ख को गहरे छुपाकर रखती है. तभी तो जीवन भर साथ होकर भी कोई पुरुष नहीं ही पहुंच पाता अपनी स्त्री के पास. उसके दु:खों को ग्रहण करने की योग्यता ही प्रेम की योग्यता है. दिखना तुम सांझ तारे को...संग्रह की कविताओं को पढऩे से पहले आलोक की ताकीद कि ये वेरा से अलग हैं मुझे अब तक याद है. सचमुच हर कविता यह सोचकर पढ़ती गई कि ये वेरा से अलग हैं लेकिन हैं क्या...संग्रह पाठकों के हाथ में है...निर्णय भी उन्हीं का.

प्रतिभा कटियार
मुझे तो बस वेरा का लहराता आंचल दिख रहा है जो 1863 से, रूस से, निकोलाई के उपन्यास से निकलकर सरहदों की तमाम सीमाओं को पारकर, धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति के तमाम बंधनों को तोड़कर हर स्त्री का आंचल बन गया है. लहरा रहा है यहां से वहां तक. वो स्त्री जो देख रही है ढेर सारे स्वप्न और दरवाजे की ओट में आंसुओं को सुखाते हुए चांद में अपने दु:ख छुपा रही है..

3 टिप्‍पणियां:

  1. अरे, मैंने तो आपको पढऩे को दिया था अशोक जी. यह लेख बना रहे बनारस पर पहले ही आ चुका है.

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

    हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…