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मंगलवार, 22 मार्च 2011

अमेरीकी आका के घुटनों में भारतीय लोकतंत्र



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विकीलिक्स का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर आ गया है। एक अंग्रेज़ी दैनिक के विकीलीक्स के साथ हुए क़रार के बाद छप रहे खुलासों ने सत्ता वर्ग की नींद उड़ा दी है। विदेश नीतियों से लेकर घरेलू मामलों तक पर इसमें जो खुलासे सामने आये हैं, वे चौंकाते भी हैं और शर्मिन्दा भी करते हैं। उदारीकरण के बाद के एक ध्रुवीय विश्व में अमेरीकी तन्त्र किस तरह हमारी नीतियों को संचालित करता है, यह इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है। यही नहीं ये खुलासे हाल के दिनों में देश की नीतियों तथा पक्षधरताओं में आये परिवर्तन की और साफ़ इशारा भी करते हैं। श्रीलंका में एल टी टी ई के सफाये की कार्ययोजना को भारत के समर्थन को साफ़ करते हुए 15 अप्रैल 2009 को भेजे गये एक खुफ़िया संदेश में श्रीलंका में अमेरीकी दूतावास के अधिकारी पीटर बर्लेग ने लिखा है कि भारत एल टी टी ई के ख़िलाफ़ चल रहे सरकारी अभियान के ख़िलाफ़ बिल्कुल भी नहीं है और वह बातचीत तथा युद्धविराम के लिये पड़ रहे अंतर्राष्ट्रीय दबाव को कम करने में ही मदद कर रहा है। ऐसे नीतिगत परिवर्तनों के तमाम सबूत इन खुलासों में बिखरे पड़े हैं।

लेकिन सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला खुलासा चुनावों और दूसरी राजनीतिक प्रक्रियाओं में धन के खुले लेन-देन को लेकर है। एक खुलासे में पूरे दक्षिण एशिया में चुनावों के दौरान पैसों के बदले वोट खरीदे जाने का ज़िक्र है तो दूसरे खुलासे में परमाणु क़रार के समय सत्ता पक्ष द्वारा कुछ छोटी पार्टियों के सांसदों को खरीदने के लिये करोड़ो रुपये दिये जाने का। यहाँ यह याद कर लेना उचित होगा कि जिस समय परमाणु क़रार को लेकर सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव आया था, उसी वक़्त प्रमुख विपक्षी दल ने सरकार पर सांसदों के ख़रीद-फ़रोख़्त का आरोप लगाते हुए संसद के पटल पर नोटों की गड्डियाँ लहराई थीं। अंततः सरकार विश्वासमत जीत गयी थी और जैसा कि आम तौर पर होता है, सारा मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया था।  लेकिन इस हालिया ख़ुलासे से मुद्दा एक बार फिर गर्मा गया है और पहले ही भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोपों से घिरी केन्द्र सरकार को घेरने के लिये विपक्षी दलों एक नया मुद्दा मिल गया है।

विकीलीक्स के अनुसार 17 जुलाई 2008 को भेजे गये एक गोपनीय संदेश क्रमांक 162458 में अमेरीकी दूतावास के प्रमुख स्टीवन व्हाइट ने ‘कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और गांधी परिवार के करीबी’ सतीश शर्मा से एक मुलाकात में उनके द्वारा दी गयी जानकारियों का ज़िक्र किया है। इनके मुताबिक ‘सतीश शर्मा ने कहा कि वे और दूसरे कांग्रेसी नेता इस बात के लिये पूरे प्रयास कर रहे हैं कि सरकार परमाणु क़रार के मुद्दे पर 22 जुलाई, 2008 को होने वाला विश्वास मत किसी भी तरह जीत जाये।‘  भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल से बात करने के कांग्रेसी प्रयासों के ज़िक्र के बाद व्हाइट एक धमाकेदार ख़ुलासा करते हैं – ‘सतीश शर्मा के राजनीतिक सहायक नचिकेता कपूर ने दूतावास के एक कर्मचारी को कंकाल जुलाई के आसपास बताया कि अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्येक सांसद को दस करोड़ रुपये सरकार के समर्थन के लिये दिये गये हैं। कपूर ने यह भी कहा कि पैसा कोई समस्या नहीं है, ज़रूरी तो यह पक्का करना है कि जिन लोगों ने पैसे लिये हैं वे सरकार के पक्ष में वोट भी करें। कहीं दूतावास के सद्स्य को यह खाली शोशेबाजी न लगे इसलिये कपूर ने उसे अपने घर पर एक आलमारी में पड़े पचास-साठ करोड़ रुपये दिखाये भी।’

ऐसा भी नहीं कि सरकार वोट ख़रीदने के लिये सिर्फ़ सतीश शर्मा पर निर्भर थी। इस संदेश में एक और कांग्रेसी नेता का ज़िक्र है जिन्होंने पाल काउन्स से कहा था कि तत्कालीन वाणिज्य और उद्योग मंत्रि कमल नाथ भी इस काम में बहुत मदद कर रहे हैं। उसके शब्द थे – ‘पहले तो वह घूस के रूप में बस छोटे-छोटे जहाज दे सकते थे लेकिन अब वे वोट के बदले जेट दे सकते हैं।

साफ़ है कि ये खुलासे आने वाले समय में देश की राजनीतिक स्थितियों को गहरे प्रभावित करेंगे। यहाँ भ्रष्टाचार के आरोप के अलावा अमेरीकी दूतावासों के साथ भारतीय सत्ता वर्ग की करीबी पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। सभी जानते हैं कि तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश किसी भी हाल में भारत के साथ परमाणु क़रार को मान्यता दिलवाना चाहते थे। उस दौर में तमाम वामपंथी तथा समाजवादी विचारकों ने यह आरोप लगाया था कि इस समझौते से अमेरीकी पूंजीपतियों के हित जुड़े हैं और इसे मंजूरी देकर भारत सरकार अपने व्यापक हित दांव पर लगा रही है। हालत यहाँ तक पहुँचे थे कि सरकार ने अपना अस्तित्व ही दाँव पर लगा दिया था। वामपंथियों के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गयी थी और इस मुद्दे पर हुए विश्वास मत में बड़ी मुश्किल से जीत मिली थी। ऐसे में येन-केन प्रकारेण सरकार बचाने की जद्दोजेहद तो समझ आती है लेकिन अमेरीकी सरकार के नुमाईंदों को अपनी कोशिशों के सबूत उपलब्ध कराने और उसे गोपनीय दस्तावेज़ की तरह उन नुमाईंदों द्वारा अपनी सरकार को भेजे जाने को समझने के लिये हमें थोड़ा और गहरे उतरना होगा।

नयी आर्थिक नीतियों के लागू होने और एक ध्रुवीय विश्व बनने के बाद भारत के अमेरीकी साम्राज्यवाद के करीबी भागीदार बनने की ललक कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है। 1990 के दशक से ही भारत की आर्थिक और विदेश नीतियां अपने देश के आम आदमी के हितों की जगह देशी-विदेशी पूँजीपतियों और अमेरीकी साम्राज्यवाद के हितों के अनुरूप बन रही हैं। इस दौर में गुटनिरपेक्षता के दौर में बनी परंपरायें और सिद्धांत पूरी तरह बिसरा दिये गये हैं। कभी फिलीस्तीन के पक्ष में आवाज़ बुलन्द करने वाला भारत आज इजराईल के करीब आता जा रहा है। इराक युद्ध का मसला हो या फिर हालिया अरब जनउभार का भारत ने लगातार अमेरिका के पिछलग्गू की भूमिका निभाई है। आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में तो यह समर्पण बिल्कुल स्पष्ट है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की देखरेख में बनी नीतियों ने देश के किसानों और मज़दूरों को तबाह कर दिया है और पूँजीपतियों को आबाद। हालत यह है कि 2005-2006 के बीच कारपोरेट जगत के 3,74,937 करोड़ रुपये के कर माफ़ कर दिये गये जबकि इसी दौर में कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मदों में होने वाले खर्च में भारी कटौती की गयी है। अमेरीकी दूतावासों के प्रति भारतीय राजनायिकों और नेताओं का समर्पण इसी रौशनी में समझा जा सकता है। जहाँ अमेरीकी दूतावास किसी भी हाल में इस समझौते के लागू होने के लिये सारे प्रयास कर रहा था वहीं उसके भारतीय चाकर अपने आका को अपनी कोशिशों के पुख़्ता सबूत देने में लगे थे। इसी संदेश में व्हाइट ने सतीश शर्मा को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि ‘प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी इस समझौते के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उन्होंने अपना यह संदेश स्पष्ट शब्दों में पार्टी को दे दिया है।’ साफ़ है कि आका को ख़ुश करने में कोई पीछे नहीं था। अगर उस दौर को याद करें तो सत्ताधारी वर्ग और पूँजीवादी मीडिया इस समझौते के समर्थन में खुल कर सामने आये थे। ऐसा माहौल बनाया जा रहा था कि यह समझौता न हुआ तो देश हज़ार साल पीछे चला जायेगा। ज़ाहिर है कि यह सब जार्ज बुश को उनके विदाई का तोहफ़ा देने की कोशिश ही थी।

वैसे तो इन खुलासों के बिना भी हम सब भाजपा से लेकर कांग्रेस तक तमाम दलों के अमेरीका मोह के बारे में जानते ही हैं लेकिन इन खुलासों से यह और भी स्पष्ट हो गया है। आज जिस तरह अमेरिका के सामने हमारा पूरा तंत्र नतमस्तक है वह पूंजीपति वर्ग के लिये जितने संतोष की बात है आम जन के लिये उतनी ही चिंता की। मिस्र की अमेरिका-परस्त सरकार ने ही वह हालात पैदा किये कि जनता सड़कों पर आ गयी। अगर भारत में भी यह सब ज़ारी रहा तो वह दिन दूर नही जब जनता चुनावों में नहीं सड़कों से अपने सवालों का जवाब माँगेगी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. मिस्र,लीबिया के बाद शायद भारत का ही नंबर है।
    जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं उससे तो लगता है हम सब अमरीकी प्रशासन में ही जी रहे हैं। लोकतंत्र शायद बस कहने भर को ही है।

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  2. होशियार !!
    तीसरी दुनियाँ के मुल्क
    नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ गोलबंद हों ,
    विकसित देशों में पूंजीवाद अपने ही
    कारणों से विनाश के कगार पर आ गया है !

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  3. very nice and crisp post. I always wait for new post at your blog. Thank you.

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