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गुरुवार, 7 जून 2012

देखना अदम को यहाँ से


'कल के लिए' का 'अदम स्मृति विशेषांक' आ गया है. अंतिम पन्ने पर लिखे जाने वाले कालम की जगह मैंने इस बार अदम की शायरी और उसके बरक्स हिन्दी आलोचना की स्थिति और स्टैंड पर लिखने की कोशिश की है...


न रहना अदम का


सब चले जाते हैं एक दिन. अदम भी चले गए. जो उम्र थी उनकी वह जाने की नहीं थी. कुछ अपनी वजूहात, कुछ ज़माने की बेजारी. उन्हें जाना पड़ा. जैसे कोई भरी महफ़िल से अचानक उठे और भाड़ में जाओ जैसा कुछ कहकर गुस्से से पाँव पटकते चला जाय. सब दो पल के लिए ठहर जाय और फिर कारोबार चलने लगे अपनी गति से. अब चाहें तो इसे शो मस्ट गो आन की आशावादिता से देखें, या क्या फर्क पड़ता है की कृतघ्नता से. दरअसल यह अदम से ज़्यादा आपके सोचने के ढंग पर निर्भर करता है.

अदम से मेरा रिश्ता केवल पाठक का था. गोरखपुर के दिनों में देखा था एक-दो बार. सुना भी था. बाद में कथाक्रम से लेकर और जगहों के तमाम किस्से भी सुने. होटलों के शानदार कमरों में मंहगी शराब पीते हुए बड़े साहित्यकार लोग जब अदम की शराबखोरी की बात कर रहे होते थे तो मुझे उनका बेहद प्रसिद्ध शेर काजू भुने हैं प्लेट में याद आता था.रामराज विधायक निवास निवास तक ही महदूद नहीं है, उसके छीटें हम सब के घरों तक पहुंचे हैं. अदम को याद करते हुए मुझे भुवनेश्वर याद आते हैं, मजाज याद आते हैं, गोरख याद आते हैं...और भी कई-कई लोग जिन्हें इतना नाम भी नहीं मिला. यह आत्महंता प्रवृति अगर किसी संवेदनशील कलाकार में घर कर जाती है तो इसके लिए वह समाज ज़िम्मेदार है जो एक कलाकार को बेकार की चीज़ में तब्दील कर देता है. जो हर उस चीज़ को बढ़ावा देता है जो दुनिया को बदसूरत बनाने वाली होती है. दुनिया बदलती नहीं और उन आँखों की तकलीफ का समंदर और-और गहरा होता चला जाता है. मजाज और अदम जैसे लोग जिस रुमान को लेकर शायरी की दुनिया में आते हैं, हकीक़त से रोज-ब-रोज की जद्दोजेहद उसे रेशा-रेशा बदशक्ल करती और बिखेरती चली जाती है और हकीकी दुनिया से दूर एक नशा उसे सहारा देता है.

लेकिन अदम को पढते हुए यह तथ्य मुझे चौंकाता है कि ज़िंदगी में जो शराब उनकी अभिन्न हिस्सा बनती है वह कविता में पूरी तरह से गायब है. सत्तर-अस्सी के दौर का जो संघर्ष का व्याकरण है वह उनकी कविता में अपने पूरे अज्म के साथ मौजूद है. अदम की शायरी में कहीं कोई पलायन नहीं है. लगातार भिड़ते हुए, तंज करते हुए, टकराते हुए. हालत यह कि अन्ना के दौर में जब बड़े-बड़े स्तंभ भ्रम के चक्रवात में पूरी गति से परिक्रमा कर रहे थे उस दौर में भी अदम सवाल उठा रहे थे कि ये महाभारत है जिसके पात्र सारे आ गए/ योगगुरु भागे तो फिर अन्ना हजारे आ गए. और गौरतलब बात यह है कि वह अमेरिका या किसी ऎसी ताकत के खिलाफ वह जबानी संघर्ष ही नहीं कर रहे थे जिसमें दरअसल कोई खतरा नहीं होता. वह विधायक से लेकर स्थानीय प्रधान तक पर तंज कर रहे थे. यह सीधी लड़ाई साहित्य से गायब होती सी चीज़ है. इसीलिए अदम हमें एक चुनौती की तरह लगते हैं. इसीलिए मंगलेश डबराल की तरह वह मुझे नागार्जुन की परम्परा के लगते हैं. अपने शहर के कवि मुकुट बिहारी सरोज की तरह लगते हैं. गिर्दा या हरीश भादानी की तरह लगते हैं. उर्दू के उस तौर के तरक्की पसंद शायरों की जमात के लगते हैं जब हिन्दी कविता अपनी कूढ़मगजी में प्रेम और पलायन के वाहियात आख्यान रच रही थी. फैज़, मजाज, साहिर जैसे शायरों के साथ देखने पर अदम की शख्सियत के तमाम दरवाज़े खुलते हैं.

यहाँ यह मैं ज़रूर कहूँगा कि अदम को उर्दू शायरी के उस उरूज़ से देखने पर कई दुसरे तथ्य भी सामने आते हैं. मसलन वह उस ऊंचाई और गहराई के शायर नहीं थे. आप देखिये कि वह जिस बेवा के शिकन की बात करते हैं मजाज महल की आड़ से निकले पीले माहताब के बरक्स उसके सबाब को रखकर एक बड़ी बात कह चुके हैं. लेकिन मजाज के दौर से जदीदी दौर के बीच एक बड़ा फासला पैदा हो चुका है. गजल फिर से जाके महबूब की जुल्फों के पेंच-ओ-ख़म में उलझकर रह गयी है. अदम उसे अपने काबिल बुजुर्गों की तर्ज़ पर एक बार फिर गाँव की गलियों और बेवा के शिकन तक ले जाने की बात कर के उस रौशन तहरीक के अलम्बरदार बनते हैं और वह भी लगभग अकेले. वह हिन्दी के नहीं हो पाते कि उन्होंने एक ऎसी विधा चुनी जिसे दुष्यंत के बावजूद अब भी  उर्दू की माना जाता है और उर्दू के नहीं हो सके कि उन्होंने वह भावभूमि चुनी जिसकी आंच से उर्दू ग़ज़ल रोज-ब-रोज दूर होती चली जा रही है. हिन्दी और उर्दू के दोआब कहें या दोराहे पर खडा होकर अपनी बुलंद आवाज़ में गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्ष में आवाज़ लगाता यह कवि अपने श्रोताओं के साथ अकेला खड़ा नज़र आता है. शायद इसीलिए बहुत दूर से अलग दिखाई भी देता है. जो चीज़ मुझे खटकती है वह है उनके गज़लों की सीमित संख्या. मुझे हमेशा लगता है कि वह जिस पाए के शायर थे, जितनी विस्तृत उनकी नज़र थी और जैसा उनका अनुभव-संसार था, मुझे हमेशा लगता है कि उन्होंने खुद अपने साथ इन्साफ नहीं किया. 

अदम को खास बनाने वाली दूसरी चीज़ है उनके तेवर और लगातार मुख्यधारा से बाहर जा रहे गाँव-जवार की उनकी गहरी समझदारी. ऐसा नहीं कि गाँव हिन्दी कविता में नहीं रहा है. लेकिन नागार्जुन के विपरीत बाद की कविता में यह एक नास्टेल्जिक इमेजरी के रूप में आया है. वर्षों पहले गाँव से दूर हुए और अपने संस्कारों से व्यवहार तक में पूरी तरह शहरी हो चुके मध्यवर्गीय कवियों के यहाँ किसी दूरस्थ स्मृति में दर्ज गाँव जब आता है तो वह एक आभासी छवि की तरह दर्ज होता है या फिर पत्र-पत्रिकाओं में दर्ज कथाओं और आंकड़ों के आधार पर. इसका सीधा कारण है हिन्दी कवियों का मध्यवर्गीय परिवेश. आज हिन्दी कविता का पंचानवे फीसदी हिस्सा शहरों और महानगरों से आता है. ऐसे में अदम का गाँव में रहते हुए खेती-किसानी से जुड़े होकर लिखते रहना उन्हें एक विशिष्ट अवस्थिति प्रदान करता था जहां से वह बिना किसी पूर्वाग्रह या मोह के ग्रामीण सच को लिख पाते. और वह लिख रहे थे. चमारों की गली जैसी कविता उस परिवेश का हिस्सा हुए बिना लिखी ही नहीं जा सकती थी. लेकिन यहीं यह भी कह देना होगा कि ऎसी कविता सिर्फ उस परिवेश का हिस्सा हो जाने भर से ही नहीं लिखी जा सकती. उसके लिए एक और ज़रूरी चीज़ की दरकार है- वह है प्रतिबद्धता. यही वह विशिष्टता है जो ग्रामीण परिवेश पर लिख रहे तमाम दूसरे गीतकारों/गजलकारों और अक्सर कवियों से भी उन्हें अलग करती है. उनके यहाँ अगर जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में / परधान बन कर आ गए अगली कतार में जैसी पंक्ति आती है तो वह उनकी उस समझौताहीन प्रतिबद्धता के चलते ही. अदम का अदबी सफर इन प्रतिबद्धताओं के लगातार और मजबूत होते जाने और इसकी कीमत चुकाते चले जाने का गवाह है. उनकी गजलें सक्रिय प्रतिरोध की गजलें हैं, प्रगतिशील जीवन मूल्यों की गज़लें हैं और अवाम के दोस्त शायर की गजलें हैं. यही वह नुक्ता है जो उन्हें कई अन्य लोकप्रिय गीतकारों/गजलकारों से अलग खड़ा करता है. वह लोकप्रिय हैं लेकिन लोकप्रियतावादी नहीं हैं. वह नाजुक नब्जों को सहलाकर या फिर कुछ घिसी-पिटी लिजलिजी भावनाओं को उकसा कर मंच लूटने वालों में से नहीं. वह सीधे जनता से संवाद करते हुए उसके दुःख-दर्द को उभारकर बगावत का आह्वान करने वाले शायर हैं. महिलाओं को लेकर जिस कदर सम्मान उनके यहाँ दिखता है वह दुर्लभ है. शायरी में ओशो के दर्शन के परखच्चे उड़ाने वाले वह अकेले शायर दिखे मुझे. और इन सब के बावजूद अगर वह जनता के करीब पहुँच सके तो इसको विचारधारा की ताक़त और उनकी शायरी के अज्म की बुलंदी माना जाना चाहिए.



लेकिन अफ़सोस की हमारी मुख्यधारा की आलोचना के पास इस तरह की कविता के लिए कोई जगह नहीं है. कहा जा सकता है कि ऎसी कविता को आलोचना की ज़रूरत ही नहीं होती. वह खुद ही स्पष्ट होती है, जनता तक पहुंचती है. लेकिन मेरा सवाल है कि क्या आलोचना को ऎसी कविता की ज़रूरत नहीं होती? जिस तरह से एक तरह की कविता का वर्चस्व (hegemony) साहित्य के भीतर स्थापित कर दिया गया है क्या वह हमारी भाषा के साहित्य के लिए अच्छा है? जहां राजनीति से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश तक में हम विविधताओं के सम्मान की बात करते हैं वहीं साहित्य के भीतर एक खास तरह की संरचना को ही मान्यता देना और बाक़ी सबको खारिज कर देना क्या है? क्या यह एक तरह का वर्चस्ववादी व्यवहार नहीं? क्या पापुलर साहित्य की पूरी तरह से अनदेखी एक तरह के आभिजात्य की स्थापना नहीं करती? क्या इस तरह के साहित्य की अनुपस्थिति हिन्दी में नए पाठक तैयार करने के अभियान को बुरी तरह बाधित नहीं करती?

दुर्भाग्य से इन सवालों से जूझना हमारी आलोचना के लिए कभी कोई मुद्दा रहा ही नहीं.
तुलसी के काव्य में सामजिक चेतना से लेकर प्रेमचंद की कहानियों में ग्राम्य चेतना जैसे महाउबाऊ विषयों पर हर दुसरे-तीसरे संगोष्ठियां कराने वाली संस्थाएं और उनमें हिस्सेदारी करने वाले लेखक/कवि/आलोचक कभी इस सवाल से रु-ब-रू होना ही नहीं चाहते कि आने वाले बीस सालों में हिन्दी पढ़ने/लिखने वालों की क्या हालत होने जा रही है. अंग्रेजी किस तरह भारतीय भाषाओं का दम घोटे दे रही है. किस तरह हमारे पास नए पाठकों के लिए कोई साहित्य है ही नहीं. किस तरह हमारा पूरा साहित्यिक परिवेश एक तयशुदा फ्रेम में इस कदर बांध गया है कि उसके बाहर झांकना तक कुफ्र घोषित कर दिया जाता है. कभी-कभी जब कोई अदम, कोई दुष्यंत, कोई गिर्दा, कोई मुकुट बिहारी सरोज इसे तोड़ने की कोशिश करता है तो हम आध्यात्मिक चुप्पी के साथ उसका नकली एहतराम करते हैं और फिर अपनी गहरी नींद में सो जाते हैं. एक खास तरह के  आभिजात्य ने हमारे साहित्यिक परिदृश्य को पूरी तरह से ढक दिया है. अदम जैसे लोग उसके प्रतिपक्ष बनकर सामने आते हैं. इसीलिए उन पर बात करना, उनकी ग़ज़लों पर बात करना मुझे इस आभिजात्य पर सवाल खडा करना लगता है. इस अंक के लिए आये तमाम लेखों को पढते हुए मुझे यह संतोष हुआ कि इसके खिलाफ एक असंतोष तो दिखाई दे ही रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह आगे जाएगा. 

3 टिप्‍पणियां:

  1. अंक का बेसब्री से इन्तजार है ..इस लेख ने अंक की एक बानगी दे दी है ....

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  2. सही-संतुलित मूल्यांकन.
    अदम से बहुत थोड़ी अवधि का ही सही, लेकिन काफी अंतरंग रिश्ता था. बाद में उनकी रचनाओं के जरिये ही वह रिश्ता कायम रहा, और फिर अचानक उनका जाना.
    अंक देखूंगा.

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