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रविवार, 4 नवंबर 2012

बराबरी के बिना विकास कैसा?


अरुण माहेश्वरी




 ‘गैर-बराबरीआखिर अर्थशास्त्र का मुद्दा बना

नवउदारवाद के लगभग चौथाई सदी के अनुभवों के बाद मुख्यधारा के राजनीतिक अर्थशास्त्र को बुद्ध के अभिनिष्क्रमण के ठीक पहलेदुख हैके अभिज्ञान की तरह अब यह पता चला है कि दुनिया मेंगैर-बराबरी है’, और, इस गैर-बराबरी से निपटे बिना मुक्ति नहीं, अर्थात लगातार घटती अवधि के आर्थिक-संकटों के आवर्त्तों में डूबने से बचने का रास्ता नहीं है।

इकोनामिस्टपत्रिका के ताजा (13-19 अक्तूबर 2012) अंक में विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में उन्नीस पन्नों की एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।इकोनामिस्टमें आम तौर पर किसी भी खास विषय पर चौदह पन्नों की विशेष रिपोर्ट प्रकाशित करने की अपनी परंपरा है। उसकी जगह इस रिपोर्ट का थोड़ा बढ़ा हुआ कलेवर मात्र इसके महत्व को नहीं बढ़ाता है। इसके अलावा विश्व-अर्थव्यवस्था को अपनी विशेष रिपोर्ट का विषय बनाना भीइकोनामिस्टके लिये कोई खास बात नहीं है। लेकिन, इस उन्नीस पन्नों की रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि शायद पहली बारइकोनामिस्टके पृष्ठों पर सिर्फगैर-बराबरीकी समस्या को केंद्र में रख कर विश्व अर्थ-व्यवस्था का सिहांवलोकन किया गया है।

1989 में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद के पराभव और  ‘इतिहास के अंतके विचारों से तैयार हुई जमीन पर जब अमेरिका ने एक-ध्रुवीय विश्व कायम करने के उद्देश्य से अपने वैश्वीकरण का अश्वमेघ यज्ञ शुरू किया था, तब आईएमएफ, विश्वबैंक, और परवर्ती डब्लूटीओ से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह के सारे बहु-स्तरीय विश्व-संगठनों की बड़ी सी सेना पूरे दम-खम के साथ उसकी इस विश्व विजय की लड़ाई में उतर गयी थी। मान लिया गया था कि अब रास्ता पूरी तरह से साफ है, घोड़ा दौड़ाना भर बाकी है और सभी स्वतंत्रताओं के मूल, ‘वाणिज्यिक स्वतंत्रताके ध्वजाधारी अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया को संवरते देर नहीं लगेगी; जैसे अमेरिका के पास कभी साधनों की कोई कमी नहीं रही, उसी प्रकार अब पलक झपकते दुनिया की सारी समस्याओं के समाधान में कोई बाधा नहीं रहेगी। आनन-फानन में साल भर के अंदर ही, 1990 में ढेर सारी प्रतिश्रुतियों के साथ यूएनडीपी की ओर से पहली मानव विकास रिपोर्ट आई।समाजवादनहीं रहा तो उसका गम क्या? गरीबों के परवरदीगार और भी है! उल्टे, समाजवाद के नाम परविचारधाराओंका एक निरर्थक बतंगड़, शीतयुद्ध का झूठा तनाव था जिसके चलते अरबो-खरबों प्रभुत्व को खोने-पाने की थोथी आशंकाओं की भेंट चढ़ जाता था! इसीलिये कहा गया कि आर्थिक विकास को मानव विकास में बदलने का रास्ता किसी विचारधारा का मुहताज नहीं है, इसके लिये बस जरूरी है ठोस प्रश्नों की ठोस पहचान और उनके समाधान की ठोस कोशिशें। मानव विकास रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में उसी दिशा में उठाया एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया। 

1990 में मानव विकास की अवधारणा को परिभाषित करने और उसे मापने के मानदंडों को निर्धारित करने के उद्देश्य से जो पहली मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित हुई उसमें तत्कालीन दुनिया की ठोस परिस्थिति का जायजा लेते हुए पहली बात यह लक्षित की गयी कि पिछले तीन दशकों में विकासशील देशों ने मानव विकास की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। दूसरी, यह कि आमदनी के मामले में खाई बढ़ने पर भी मूलभूत आर्थिक विकास के मामले में उत्तर-दक्षिण के बीच का फासला काफी कम हुआ है। तीसरी, मानव विकास में प्रगति के औसत आंकड़ों से विकासशील देशों के अंदर - शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच, आदमी और औरत के बीच, धनी और गरीब के बीच - भारी विषमताओं पर पर्दादारी होती है। इसीप्रकार, उसका चौथा अवलोकन यह था कि कम आमदनी के बावजूद मानव विकास का सम्मानजनक स्तर प्राप्त करना संभव है। साथ ही यह भी कहा गया कि आर्थिक विकास और मानव प्रगति के बीच कोई स्वचालित संबंध नहीं है; गरीबों को सामाजिक क्षतिपूर्ति की जरूरत है; विकासशील देश इतने भी गरीब नहीं हैं कि वे आर्थिक विकास के साथ ही मानव विकास की कीमत चुका सके; समायोजन के लिये मानव कीमत अनिवार्य नहीं, बल्कि चयन की बात है; मानव विकास की नीतियों की सफलता के लिये अनुकूल बाहरी परिवेश जरूरी है; कुछ विकासशील देशों, खास कर अफ्रीका के कुछ देशों को विदेशी सहायता की आवश्यकता है; विकासशील देशों में मानव क्षमताओं को बढ़ाने के लिये तकनीकी सहयोग देना होगा; मानव विकास के कामों में सफलता के साथ गैर-सरकारी संगठनों को शामिल करना होगा; आबादी में वृद्धि को रोकना जरूरी है; तेजी के साथ लोग शहरों में जमा हो रहे हैं तथा भावी पीढ़ियों की जरूरतों के साथ कोई समझौता किये बगैर आज की पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिये विकास की एक टिकाऊ नीति तैयार करनी होगी। इन्हीं, कुल सोलह अवलोकनों और निष्कर्षों के आधार पर मानव विकास की अवधारणा और उसको मापने के मानदंड तय किये गये। 

आगे इसी अवधारणा और माप के मानदंड के आधार पर दुनिया की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के नाना पक्षों के बारे में पिछले 21 वर्षों से हर साल एक के बाद एक मानव विकास रिपोर्ट आरही है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, पहली रिपोर्टमानव विकास की अवधारणा और उसके आकलनके अलावामानव विकास के लिये जरूरी वित्तीय संसाधनों को जुटाने के बारे में थी, फिर  ‘मानव विकास के वैश्विक आयाम’, ‘जनभागीदारी के सवाल’, ‘मानव सुरक्षा के नये आयाम’, ‘लैंगिक प्रश्न और मानव विकास’, ‘आर्थिक अभिवृद्धि और मानव विकास’,‘गरीबी निवारण’, ‘उपभोग’, ‘मानवीय चेहरे के साथ वैश्वीकरण’, ‘मानव अधिकार’, ‘नयी तकनीकों के प्रयोग’, ‘विखंडित विश्व में जनतंत्र की जड़ों को गहरा करने’, ‘नयी सहस्त्राब्दि के लिये मानव समाज से गरीबी को दूर करने का राष्ट्रों का संकल्प’, ‘आज के विविधतापूर्ण विश्व में सांस्कृतिक स्वतंत्रता’, ‘अन्तरराष्ट्रीय सहयोग’, ‘ऊर्जा, गरीबी और जल का वैश्विक संकट’, ‘बदलते मौसम की समस्या से निपटने’, ‘मानव गतिशीलता’, ‘राष्ट्रों की वास्तविक संपदा’, ‘सबके लिये बेहतर भविष्य के लिये टिकाऊ विकास और न्यायजैसे 21 विषयों  पर क्रमश: एक के बाद एक, अब तक कुल 21 रिपोर्टें आचुकी हैं।

गौर करने लायक बात यह है कि इन सभी रिपोर्टों में किसी किसी रूप में, प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से राष्ट्रों के बीच और राष्ट्रों के अंदर गैर-बराबरी से जुड़े ढेरों तथ्य प्रकाशित हुए हैं। लेकिन गैर-बराबरी का सवाल मानव विकास के भौतिक और आत्मिक, दोनों पक्षों के लिये एक सबसे अहम और केंद्रीय सवाल होने पर भी मजे की बात यह है कि आज तक मुख्यधारा के सामाजिक-आर्थिक विमर्श में इसे अलग से किसी विचार का विषय नहीं बनाया गया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की तर्ज पर ही दुनिया के और देशों में भी सरकारी स्तर पर मानव विकास संबंधी रिपोर्टें तैयार करने का सिलसिला शुरू होगया। खुद संयुक्त राष्ट्र ने भी क्षेत्र विशेष के लिये ऐसी अलग-अलग रिपोर्टें तैयार की। इन सबको एक प्रकार के नये दृष्टिकोण के आधार पर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से रूबरू होकर उनके समाधान की नयी रणनीतियों की दिशा में बढ़ने का उपक्रम कहा जा सकता  है। इन सांस्थानिक और सरकारी उपक्रमों के साथ ताल मिलाते हुए ही अर्थनीति के अध्येताओं की भी एक नयी फौज सामने आयी। इनमें विशेष तौर पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफी अन्नान के विशेष सलाहकार जैफ्री सैक्स की किताब एंड आफ पावर्टी’(2005) और 2011 में प्रकाशित अभिजीत वी. बनर्जी और एस्थर दुफ्लो की एक बेस्टसेलर किताबपूअर इकोनामिक्सकी चर्चा की जा सकती है। गरीबी में फंसे लोगों को उससे उबारने के लिये दुनिया के अलग-अलग कोनों की ठोस समस्याओं के ठोस उपायों को बताने वाली बनर्जी-दुफ्लो की इस बेहद आकर्षक और उत्तेजक किताब के पहले अध्याय में ही पूरे निश्चय के साथ इस किताब के मूल संदेश की इस प्रकार घोषणा की गयी है कि इस किताब का संदेश गरीबी के फंदों से कहीं परे जाता है। जैसाकि हम देखेंगे कि विशेषज्ञजन, राहतकर्मी अथवा स्थानीय नीति नियामकों में अक्सर तीन आई - आइडियोलोजी, इग्नोरेंश और इनर्शिया (विचारधारा, अज्ञान और अंतर्बाधा) - से इस बात को जाना जा सकता है कि नीतियां (अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में) क्यों विफल होती है और क्यों किसी सहायता का कांक्षित फल नहीं मिल पाता है।
  
यहां हमारे कहने का यह तात्पर्य कत्तई नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं अथवा अर्थशास्त्रियों की नयी फौज के इन अध्ययनों में कोई सचाई नहीं है और विश्व अर्थ-व्यवस्था के विकास की समस्याओं में इन अध्ययनों का कोई महत्व नहीं है। उल्टे, वास्तविकता यह है कि इस प्रकार के छोट-छोटे स्तरों तक जाकर नाना प्रकार के विषयों की ठोस और गहन अध्ययन की कमियों ने दुनिया में समाजवाद की पूरी परिकल्पना का जितना नुकसान पहुंचाया उसकी थाह पाना मुश्किल है। यहां तक कहा जा सकता है कि समाजवादी प्रकल्प की विफलता के मूल मेंतथ्यों से सत्य को हासिल करनेकी वैज्ञानिक पद्धति की अवहेलना ने प्रमुख भूमिका अदा की  थी। छोटी-छोटी सचाईयों को विचारधारा के भारी-भरकम कालीन के नीचे दबा कर समाजवादी दुनिया की नौकरशाहियां अपना उल्लू सीधा कर रही थी।

इसीलिये, अर्थनीति का दुनिया के कोने-कोने की ठोस सचाइयों की ओर मुखातिब होना, सिर्फ सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिये ही नहीं, अर्थनीतिशास्त्र को भी अपनी आत्मलीनता से उबारने के लिये बेहद जरूरी है और इस दिशा में होने वाली हर कोशिश का स्वागत ही किया जाना चाहिए। इसके बावजूद, कोई माने या माने, यह बात बेझिझक कही जा सकती है कि गैर-बराबरी को दूर करने अर्थात समानता का प्रश्न अन्तत: एक विचारधारात्मक प्रश्न ही है। इस विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य को गंवा कर मानव विकास की यात्रा किसी लंबी दूरी को तय नहीं कर सकती है, समाजवाद के पराभव के बाद के इन बाईस वर्षों के अनुभवों से इतना तो जाहिर है। पूंजीवादी परिप्रेक्ष्य से चिपक करगैर-बराबरीको खत्म करने की अपेक्षा करना एक प्रकार से अर्थनीतिशास्त्र से इच्छा-मृत्यु की अपेक्षा करने के समान है। 

समाजवाद ने सभ्यता के विकास की प्रक्रिया में आदमी की अकूत सर्जनात्मकता के उन्मोचन के अलावा जिस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर मनुष्यता का ध्यान खींचा था वह समानता का प्रश्न था, गैर-बराबरी को दूर करने का प्रश्न था। यह प्रश्न आर्थिक आधार से लेकर अधिरचना के पूरे ताने-बाने, सबसे अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ प्रश्न है। फ्रांसीसी क्रांति के झंडे पर स्वतंत्रता और भाईचारे को जोड़ने वाली अनिवार्य कड़ी के तौर पर समानता की बात कही गयी थी, लेकिन कालक्रम में देखा गया कि समानता की लड़ाई सिर्फ समाजवाद की लड़ाई बन कर रह गयी। और, कहने की जरूरत नहीं कि समाजवाद के पराभव के बाद, इसी समानता के सवाल को, गैर-बराबरी को दूर करने के सवाल को आर्थिक चर्चाओं की किसी सुदूर पृष्ठभूमि में डाल दिया गया। गरीबी को दूर करने की बात होती है, पिछड़ेपन के दूसरे सभी रूपों से मुक्ति की चर्चा की जाती है, लेकिन जब गैर-बराबरी का सवाल आता है तो उसे लगभग एक ध्रुव और अटल सत्य मान कर उसके निवारण की चर्चा से सख्त परहेज किया जाता है। इसीलियेइकोनामिस्टजैसी मुख्यधारा की आर्थिक पत्रिका के ताजा अंक में गैर-बराबरी को अध्ययन का विषय बनाया जाना कुछ हैरतअंगेज, और कुछ विचारणीय बात भी लगती है।

इकोनामिस्टने अपनी इस पूरी चर्चा कोसच्चा प्रगतिवादबताया है। इसके सार-संक्षेप में कहा गया है कि 19वीं सदी के अंत तक वैश्वीकरण के प्रथम युग और अनेक नये आविष्कारों ने विश्व अर्थ-व्यवस्था को बदल दिया था। लेकिन वहसुनहरा युग’ (गिल्डेड एजभी गैर-बराबरी के लिये प्रसिद्ध था जब अमेरिका के लुटेरे शाहों (रौबर बैरोन्स) और यूरोप केकुलीनों’ (डाउनटन एबेने भारी मात्रा में धन इकठ्ठा किया था : 1899 से हीउत्कृष्ट उपभोग’ (कॉन्सपीक्यूअस कंजम्प्शनकी अवधारणा आगयी थी। अमीर और गरीब के बीच बढ़ती हुई खाई (और समाजवादी क्रांति के भय) ने थियोडर रूजवेल्ट केन्यास भंजन’ (ट्रस्ट बस्टिंग)4 से लेकर लॉयड जार्ज के जनता के बजट तक के सुधारों की एक धारा पैदा की। सरकारों ने प्रतिद्वंद्विताओं को बढ़ावा दिया, प्रगतिशील कर-प्रणाली लागू की और सामाजिक सुरक्षा के जाल के प्रथम धागों को बुना।प्रगतिशील युग के रूप में अमेरिका में जाने जानेवाले इस नये युग का उद्देश्य था उद्यम की ऊर्जा को बिना कम किये एक न्यायसंगत समाज तैयार करना।

इसी संदर्भ मेंइकोनामिस्टका कहना है कि आधुनिक राजनीति को इसीप्रकार के एक पुनआर्विष्कार की, आर्थिक विकास को बिना व्याहत किये गैर-बराबरी को दूर करने के मार्ग के साथ सामने आने की जरूरत है।
सबसे गौर करने की बात यह है कि यह समूची चर्चा आज राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर अमेरिका की राजनीति का एक केंद्रीय विषय बनी हुई है। ओबामा समर्थक रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी को लुटेरा शाह कह रहे हैं, तो रोमनी समर्थक ओबामा कोवर्ग योद्धाकह कर कोस रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रासवां सोलेड ने अमीरों पर आयकर की दर को बढ़ा कर 75 प्रतिशत कर देने की मांग की है। तमाम साजिशों को धत्ता बताते हुए समाजवाद की शपथ लेकर फिर एक बार वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाले शावेज कहते हैं कि अगर वे अमेरिका में होते तो आगामी राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा का समर्थन करते।
अमेरिका और यूरोप की राजनीति और अर्थनीति के क्षेत्र में चल रहा यह उल्लेखनीय विमर्श राजनीति के किसी भी विद्यार्थी के लिये गहरी दिलचस्पी का विषय हो सकता है। नोम चोमस्की ने एकबार कहा था कि आज की विश्व परिस्थितियों में अमेरिकी सत्ता की नीतियों में मामूली परिवर्तन भी दुनिया की राजनीति में भारी परिवर्तनों का सबब बन सकती है। इसलिये भी इसओर खास नजर रखने की जरूरत है।


       
1.‘सुनहरा युग’ (गिल्डेड एज) अमेरिका में गृहयुद्ध (1877 से 1893) के बाद के काल को कहते है जब एक नये युग, ‘प्रगतिशील युगका श्रीगणेश हुआ बताया जाता है। अमेरिकी लेखक मार्क ट्वैन और चाल्‍​र्स डुड्ले वार्नर की पुस्तक गिल्डेड एज : टेल आफ टुडेसे यह पद प्रचलन में आया था।

2.‘डाउनटन एबेएक बेहद प्रसिद्ध ब्रिटिश-अमेरिकी टेलिवीजन सीरियल का शीर्षक है जिसमें इंगलैंड के राजा एडवर्ड सप्तम के काल (1901-1910) के समय केडाउनटन एबेके एक काल्पनिक स्थल यार्कशायर कंट्री एस्टेट में बसे हुए एक कुलीन परिवार की कहानी है।

3.‘कान्सपिक्युअस कंजम्प्शनपद को प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थोरस्ताईन वेबलेन ने अपनी पुस्तक थ्योरी आफ लेजर क्लास : इकोनॉमिक स्टडी इन इवोल्यूशन आफ इंस्टीट्यूशन्स’ (1899) में नवधनाढ्यों के व्यवहार को दर्शाने के लिये किया था जो अपनी ताकत और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने के लिये अपने धन का महंगी और ऐश की चीजों की खरीद के लिये प्रयोग किया करते थे।

4.‘ट्रस्ट बस्टर’ : अमेरिका के 26वें राष्ट्रपति थियोडर रूजवेल्ट (1901-1909) की पहचान अमेरिकी इतिहास में एक प्रगतिशील सुधारक के रूप में की जाती है जो इजारेदारी के सख्त खिलाफ था और उसने अपने काल में 
40 इजारेदार निगमों को भंग कर दिया था। उनके शासनकाल कोप्रगतिशील युगके नाम से जाना जाता है और रूजवेल्ट कोट्रस्ट बस्टरअर्थातन्यास भंजक   
 

साभार जनसत्ता 

6 टिप्‍पणियां:

  1. A very pertinent and eye-opening article relevant to this issue ,though primarily confined to insurance sector yet very much vindicating the stand taken by JANAPAKSHA , featured in frontline

    http://www.frontlineonnet.com/fl2921/stories/20121102292101100.htm

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  2. Sorry to disappoint Comrades but I do not see these developments as a criticism/defeat of the capitalism nor vindication of Communism/Socialism. Rather I put it as a evolution of the world economy which largely in principle terms bears the foot prints of the Capitalism. Needless to say that Capitalism has taken a long leap after the Adam Smith. The dynamism and accommodative nature of capitalism makes it alive and it continues to thrive. It started with the imperialism that resulted in the Colonialism and after the advent and spread of Democracy throughout the planet , it changed the strategy and now advocating Free market concept & Globalization. The same Capitalsit forces those are now criticizing the era of Colonialism though they simply overlook the fact that it was done to largely serve to the economy of dominant countries of capitalism. It is not that only Capitalist Or Imperialist countries did that, but the Communist states too were involved in the process. From the perspective of International trade, there were bifurcation of the International trade on world level i.e. one among capitalist states and another among Communist states. Here falls the third category like

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  3. India though inclined towards the Communism but kept their option opens for others too. However, the voice of these non-aligned countries were weak and apparently their affiliations were visible to all. After the fall of Communism ( I prefer to say as communist states rather than communism) , the world becomes uni polar in nature and players of capitalism got free access to play. They simply forget that the Communist state has fallen down ( we can discuss the reasons for that in some other time) but the essence of communism was never been vanished. The real essence was the ownership of the wealth and role of working class in the economy. Sorry to say that the place of poor was not properly addressed in the Communism also and even if it was done then never taken into the practice. So, after the spread of democracy(though it has its own and dangerous limitations) , the Capitalism focused on practicing the concept of free market. Free Market concept is also like communism. Meaning there by—Excellent in principle but almost impossible to practice. I will spare communism for now. So, Free Market can be operative only in equal level of playing and this world is not equal. This issue of inequality in terms of economy OR social economy has been consistently raised by the various economists including our Amartya Sen, a pioneer in the Welfare Economy. However, The focus of Amartya Sen was also to find a place of welfare state in to a democratic set up and not in any communist state. After, the fall of USSR and giving space for free Market for 30-40 years , the people and state have started to see the limitation of the Free market and sign of resistance also started to visible in developing and developed state. Even, In US, the Obama’s Health care law and Occupy Wall Street movement were a great debating point on this issue and that indicates shift into the priorities of the people ( some people call it ‘realization’) . Hence transformation of capitalist state into a Welfare state is a welcome move and I see it in principle that it is the endorsement of the one of the element of communism / socialism by Capitalism. AND that’s the sinner beauty of the Capitalism. See Friends, In Most of the African Countries and latin America(under developed countries), the capitalists are taking full advantage of this free market weapon and countries like India, China (developing countries)have started to see its limitations. Further, people of the US, France( i.e. developed countries) started making noise against this and demanding for more welfare measures. It’s very interesting and I have firm belief that soon India will also join to ask for that and off course the under developed countries will take time to realize it. I love Capitalism as it gives an individual to explore his/herself ( Friends must be knowing that it is the age of individualism as freedom of speech, expression, profession and to live are sign of that and each democratic state has endorsed it) and at the same time I hate Capitalism as it gives an uncanny power to an individual so that it can affect a society or group of individuals up to the level of destruction of the individualistic character of such society or group. It means one individual can snatch away the individualism of another. It can channelize the freedom of all sorts suitable to one individual possessing immense wealth. That’s my real objection to Capitalism. Hence, I welcome such evolution of capitalism. Needless to say there is another factor and very big factor i.e. CLIMATE CHANGE (almost a topic of absence in the political & social economic discussion of nowadays) , that is going to decide the structure and essence of the world economy in coming years. So, Comrades..Stalin type of Communism is not going to come back, the Colonialism is also not going to come back…Lets accept it and we must strive to make a state where an individual can explore freely without hindering the development of class. It means..Let’s make a welfare state. Thanks Ashok Ji for sharing such thought provoking material on ‘Janapaksh’.

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    1. Dear Pandeyji,
      The role played and being played by capitalism, i.e., its dynamism in the development of productive forces and webbing social formations around the same need not to mention. Marx-Engels in their manifesto of communist party have brilliantly portrayed it and is still valid in all the senses. Even the mainstream economists take recourse to none other to have a concrete and historical understanding the process of globalisation of this era. I would like to quote the relevant portions from the manifesto to have a better understanding of dynamism of capitalism:
      “...The bourgeoisie, historically, has played a most revolutionary part.
      “... The bourgeoisie has disclosed how it came to pass that the brutal display of vigour in the Middle Ages, which reactionaries so much admire, found its fitting complement in the most slothful indolence. It has been the first to show what man’s activity can bring about. It has accomplished wonders far surpassing Egyptian pyramids, Roman aqueducts, and Gothic cathedrals; it has conducted expeditions that put in the shade all former Exoduses of nations and crusades.
      “The bourgeoisie cannot exist without constantly revolutionising the instruments of production, and thereby the relations of production, and with them the whole relations of society. Conservation of the old modes of production in unaltered form, was, on the contrary, the first condition of existence for all earlier industrial classes. Constant revolutionising of production, uninterrupted disturbance of all social conditions, everlasting uncertainty and agitation distinguish the bourgeois epoch from all earlier ones.
      “...The need of a constantly expanding market for its products chases the bourgeoisie over the entire surface of the globe. It must nestle everywhere, settle everywhere, establish connexions everywhere.
      “... The bourgeoisie, by the rapid improvement of all instruments of production, by the immensely facilitated means of communication, draws all, even the most barbarian, nations into civilisation. The cheap prices of commodities are the heavy artillery with which it batters down all Chinese walls, with which it forces the barbarians’ intensely obstinate hatred of foreigners to capitulate. It compels all nations, on pain of extinction, to adopt the bourgeois mode of production; it compels them to introduce what it calls civilisation into their midst, i.e., to become bourgeois themselves. In one word, it creates a world after its own image.”
      Then comes the question of contradictions developing in capitalism itself, and the manifesto speaks:
      “... there breaks out an epidemic that, in all earlier epochs, would have seemed an absurdity — the epidemic of over-production. ... The productive forces at the disposal of society no longer tend to further the development of the conditions of bourgeois property; on the contrary, they have become too powerful for these conditions, by which they are fettered, and so soon as they overcome these fetters, they bring disorder into the whole of bourgeois society, endanger the existence of bourgeois property.
      “...The weapons with which the bourgeoisie felled feudalism to the ground are now turned against the bourgeoisie itself.”
      Here lies the importance of Marxism as a weapon in the hands of proletariat. Marxism is a philosophy of contradictions, and that is the secret of its unfailing status. So far the revival of any form of ‘failed socialism’ is concerned, that is no where a subject of my article.
      Further, when in the last, I call to keep a watch on the latest developments in the field of economics, as well as in politics, that is nothing but endorsing the evolutionary phenomenon world over, which is the main contention of your comment.

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  4. समानता के पहरुए -अरुण महेशवरी जी का यह लेख जनसता में छपा जिसे अशोक भाई ने हमसे 'जनपक्ष ' में शेयर किया है . अरुण जी ने ' द इकोनामिस्ट ' पर्त्रिका में एक 14 पेज के आर्टिकल को अपने लेख को आधार बनाया है इस पत्रिका ने आर्थिक विकास के साथ ,विश्व में फैली गैर- बराबरी को दूर करने का रास्ता बनाने की जरुरत जो सामने रखा है। इस पूरी चर्चा को पत्रिका ने 'सच्चा प्रगतिवाद ' कहा है - जैसा अरुण जी अपने लेख में कहते हैं ..और बीसवीं सदी में विकसित फ़्रांस की क्रांति के मूल्यों , समाजवादी क्रांति के मूल्यों , पूंजीवाद के ठस्से प्रगतिशील युग की एतिहासिक प्रक्रिया में विचरण करते हैं। अरुण जी इस लेख में, पूंजीवाद को अपने अंदरुनी तौर पर , अब समानता के इस सच्चे प्रगतिवाद की क्यों जरुरत पड़ रही है , इस पर हमारे सामने समझने के लिए कोइ ठोस चीज़ नहीं रखते हैं . बस लेख के अंत में शावेज़ द्वारा ओबामा के लिए जीत का समर्थन करवा देते हैं .... इस बात पर तो शायद मैं भी ऐसा ही करता ...
    मेरे लिए यहाँ सोचने विषय यह है कि इस पूंजीवाद की समर्थक पत्रिका को गैर -बराबरी के विषय पर चर्चा कराने की जरूरत क्यों पड़ी ...चर्चा तो हुई ही साथ इसे ' सच्चा प्रगतिवाद 'भी कहा गया। मतलब समाजवादी विचार जिस प्रगतिवाद को अपनी धाती बनाए था वह झूठा था -शुद्ध खालिस तो हम देंगें ..(. बेचारे ! एडम स्मिथ की चेले मिल्टन फ्रीडमन साहब सर पीट रहें होंगे )
    लेकिन इसमें 'हैरत' भरी बात क्या है -पूंजीवाद और उससे जुड़े संस्थानों द्वारा इस तरह के प्रयास लगातार होते रहे हैं ...जिसमे केन्स को लगातार आधार बनाकर इस तरह से अपनी व्यवस्था को आगे बढाने की बात होती रही है। पूंजीवाद जब भी संकट में आता है इस तरह के दांव-पेज खेलता है। 1930 से लेकर 1970 का एक लंबा दौर रहा है। जब पूंजीवाद व समाजवाद का अंतर्विरोध अपने गहरे रूप में था।
    समसामयिक विश्व की परिस्थितियाँ व पूजीवाद की अपनी वर्तमान आवश्यकता , जो 1970 के बाद वितीय पूंजी की बढ़ोतरी के बाद , पिछले बीस सालों में अमीर गरीब की खाई को चौड़ी करती हुई , 2008 के सब प्राईम संकट में आ फंसी। युरोप के हालात बुरे हैं ..तमाम प्रयास किये हैं अपने तरीके से जल्दी इस संकट से निपटा जाए पर कोइ ठोस हल आ नहीं पा रहा।
    असमान विकास के चलते साम्राज्यवादी देशों के बीच ,साथ ही तीसरी दुनिया के देशों में अन्तेर्विरोध गहरा रहा है। पूंजी व श्रम के बीच के अन्तेर्विरोध भी तेज हो गए हैं ' आक्पाय वाल स्ट्रीट ' आन्दोलन में 1% वर्सेज 99% की समझ का साफ़ विश्व मत बना है। स्पेन व ग्रीस में विरोध एकदम मुखर होकर सामने आ रहे है....गल्फ, जो पूंजीवाद के खिलाफ आम तौर पर अभी तक शांत ही रहा है ...वहां भी मजदूर वर्ग- चेतस हो गया है .

    अब नव-उदार वाद क्या करे - तो चलो फिर बाबा केन्स के पास ......नयी जुगत भिडाई जाए ...
    कारपोरेट्स द्वारा कुछ धर्म कर्म के कार्य करवाएं जाएँ ताकि वर्ग-विरोध बढ़ने की बजाय वर्ग-सहयोग का कुछ मामला बने ....

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  5. After reading few comments over here , I have to say something about Soviet Union.

    Many times,I find that we often and sarcastically talk a lot about contradictions and failures of Soviet Union. We talk very little about its achievements ,its big role in human development ..Why!?
    In may view, the 20th century period from 1945 to 1970 is the most glorious period in human history for the betterment of mankind , till now. That Soviet Union had the most valuable role in making of that period remarkable.
    Forget about third world countries even west plus Japan societies were much prosperous in comparison of before and after, their govts. were compelled to adopt social welfare policies in pressure of Soviet Union.

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…