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बुधवार, 5 मार्च 2014

शब्द हमेशा व्याकरण की कोख से ही पैदा नहीं होते- राकेश बिहारी

( राकेश बिहारी ने अपनी आलोचना पुस्तक 'केंद्र में कहानी' में 'भूमंडलोत्तर' पद का प्रयोग भूमंडलीकरण की नीतियाँ लागू होने के बाद के समय के लिए किया है जिसे लेकर फेसबुक पर एक बहस उठ खड़ी हुई है. यह टिप्पणी उसी बहस में हिस्सेदारी के रूप में है)
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उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर नब्बे के दशक में जिन संरचनात्मक समायोजन वाले आर्थिक बदलावों की शुरुआत हुई थी, उसका स्पष्ट और मुखर प्रभाव आज जीवन के हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। अधुनातन सुविधाओं और अभूतपूर्व चुनौतियों की अभिसंधि पर खड़ा यह कालखंड हिन्दी कहानी में एक नई कथा-पीढ़ी, जिसे संपादकों-आलोचकों ने बहुधा युवा पीढ़ी के नाम से पुकारा है, के आने और स्थापित हो जाने का भी गवाह है। चूंकि युवा शब्द अंतत: एक खास उम्र का ही द्योतक होता है और अब यह कथा-पीढ़ी एक महत्वपूर्ण आकार भी ग्रहण कर चुकी है, यह जरूरी हो गया है कि इसे एक ऐसा नाम दिया जाय जो उम्र और वय की परिसीमा से बाहर, इस कालावधि की विशिष्टताओं को भी अभिव्यंजित करे. भूमंडलीकरण जो एक राजनैतिक-आर्थिक एजेंडे के रूप में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिये ही मैने अपनी किताब केंद्र मे कहानी में भूमंडलोत्तर शब्द का प्रयोग किया है।

भूमंडलोत्तर शब्द अबतक किसी शब्द कोष का हिस्सा नहीं है, लिहाजा इस शब्द के प्रयोग पर आपत्तियाँ होनी ही थी। ऐसा नहीं है कि इसे गढ़ते हुये मैं किसी मुगालते या खुशफहमी में था कि इस पर होनेवाली संभावित आपत्तियों के बारे में सोचा ही नहीं। सच तो यह है कि इस संदर्भ में कई मित्रों और वारिष्ठों से लंबी अनौपचारिक बातचीत में भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिए कोई एक शब्द या पद न मिलने पर ही अपनी उन आशंकाओं के साथ मैंने भूमंडलोत्तर शब्द प्रस्तावित किया था।  जिन लोगों ने मेरी वह किताब अपने  पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर पढ़ी है, उनकी नज़र मेरी उन आशंकाओं पर भी गई होगी। इस मुद्दे पर एक रचनात्मक बहस की शुरुआत कथाकारआलोचक और मेरे प्रिय मित्र संजीव कुमार ने परिकथा के जनवरी-फरवरी 2014 अंक में की है। वे 'उत्तर-छायावाद' और 'छायावादोत्तर' शब्द का उदाहरण देते हुये भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोग में और सावधानी बरतने की बात करते हैं। अपनी आपत्तियों के बावजूद संजीव कुमार नए शब्दों की गढ़ंत में शुद्धतावाद किस हद तक बरता जाये को लेकर खुद को संभ्रम की स्थिति में पाते हैं और भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोज्य अर्थ पर सर्वानुमति की संभावनाओं की बात भी करते हैं। खुद को संभ्रम की स्थिति में कहने की उनकी विनम्रता को मैं नए शब्द के निर्माण और उसकी अर्थ-स्वीकृति की प्रक्रिया के संदर्भ मे उनका बौद्धिक और रचनात्मक खुलापन मानता हूँ।

इस बीच हमारे अग्रज कथाकार और 'भूमंडलीय यथार्थ' के विचारक रमेश उपाध्याय जी ने भी फेसबुक पर इस शब्द के प्रयोग को लेकर अपनी आपत्ति जताई है। संजीव कुमार की तरह किसी  नए शब्द के गढ़ंत को लेकर एक रचनात्मक बहस करने की बजाय तथाकथित जिज्ञासा की चाशनी में लपेटकर इसका लगभग उपहास करते हुये वे कहते हैं- यह “भूमंडलोत्तर” क्या है? यह किस भाषा का शब्द है? अगर हिन्दी का है, तो कोई हमें बताए कि यह शब्द कैसे बना और इसका अर्थ क्या है!

'भूमंडलोत्तर' शब्द के प्रयोग पर संजीव जी की तार्किक आपत्तियों तथा उनके बौद्धिक व रचनात्मक खुलेपन और रमेश उपाध्याय जी की उपहासपरक जिज्ञासाओं के बीच यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि शब्द हमेशा व्याकरण की कोख से ही पैदा नहीं होते। यह भी जरूरी नहीं कि नए शब्द हर बार कहीं से कोई पूर्वस्वीकृत अर्थ धरण करके ही प्रकट हों। बल्कि सच तो यह है कि नए शब्दों पर एक खास तरह के अर्थ का स्वीकृति बोध आरोपित करके उन्हें दैनंदिनी का हिस्सा बना लिया जाता है। चूंकि शब्दों का सिर्फ अर्थ संदर्भ ही नहीं उनका एक काल और भाव संदर्भ भी होता है, मैं शब्द निर्माण की प्रक्रिया को किसी तयशुदा खांचे या शुद्धतावाद के चश्मे से देखने का आग्रही भी नहीं हूँ।

जहां तक 'भूमंडलोत्तर' शब्द का प्रश्न है, इसको लेकर की जाने वाली आपत्तियों के दो मुख्य कारण हैं- एक भूमंडल शब्द में भूमंडलीकरण के उत्तरार्ध 'करण' के भाव-लोप का, तथा दूसरा- अँग्रेजी के 'पोस्ट' का हिंदी अनुवाद 'उत्तर' के प्रचलित अर्थ 'के बाद' के हवाले से भूमंडलीकरण के दौर के समाप्त न होने के भाव-बोध का। 'आधुनिकोत्तर', 'उत्तर आधुनिक', 'छायावादोत्तर' या 'उत्तर छायावाद' जैसे शब्दों/पदों  के उदाहरण इन्हीं संदर्भों में दिये जाते हैं। नए शब्द, पद या शब्द- युग्म के निर्माण की प्रक्रिया पर बात करते हुये इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि शब्दों की संधि के क्रम में किसी पद का विलोप कोई नई बात नहीं है। इस तरह के पद-विलोपों को स्वीकार कर न जाने कितने शब्दों को उनके प्रयोज्य अर्थ के साथ स्वीकृति मिलती रही है। यहाँ स्वातंत्रयोत्तर शब्द का संदर्भ लिया जाना चाहिए जिसका प्रयोग स्वतन्त्रता के बाद नहीं स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के समय का अर्थ संप्रेषित करने के लिए किया जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि `स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद' के अर्थ में स्वातंत्रयोत्तर शब्द की स्वीकार्यता भाषा या व्याकरण के बने-बनाए या कि रटेरटाए नियमों से नही बल्कि आम बोलचाल में उसके प्रयोज्य अर्थ के स्वीकृति-बोध से मिली है। इसलिए यदि स्वातंत्रयोत्तर का अर्थ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का समय हो सकता है तो भूमंडलोत्तर का अर्थ भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद का कालखंड क्यों नहीं हो सकता? भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिए एक निश्चित शब्द खोजते हुये मेरे जेहन में भूमंडलीकरणोत्तर भी आया था लेकिन उसके रुखड़ेपन के मुक़ाबले 'भूमंडलोत्तर' की संक्षिप्तता और लयात्मकता मुझे ज्यादा पसंद आई और 'स्वातंत्रयोत्तर' के उदाहरण ने मुझे इसका प्रयोग करने के लिए जरूरी आत्मविश्वास भी दिया।

किसी नए शब्द के उसके प्रयोज्य अर्थ के साथ स्वीकारने में होने वाली दिक्कतों का एक कारण यह भी है कि हम अपनी भाषा में नया शब्द गढ़ने की जरूरत पर ध्यान देने से ज्यादा अँग्रेजी शब्दों के सीधे-सीधे शाब्दिक अनुवाद खोजने में उलझ जाते हैं। 'पोस्ट ग्लोबलाइज़ेशन' का शाब्दिक अनुवाद 'भूमंडलीकरण के बाद' होगा, इससे किसको इंकार हो सकता है, लेकिन भूमंडलीकरण के बाद के समय के लिए एक शब्द, पद या शब्द-युग्म की खोज करते हुये उसके प्रयोज्य अर्थ बोध पर सामान्य सहमति की बात करना शाब्दिक अनुवाद की यांत्रिक प्रक्रिया से कहीं आगे की बात है, जिसे किसी लीक विशेष से बंध कर चलने वाली ठस अध्यापकीय वृत्ति या गुरुजी टाइप संटी का भय दिखाकर नहीं समझा जा सकता। किसी की भावना आहत हो इससे पहले यहाँ यह स्पष्ट कर देना मैं जरूरी समझता हूँ कि ऐसा कहते हुये अध्यापन पेशा या इससे जुड़े लोगों के प्रति मेरे मन में किसी तरह की अवमानना का कोई भाव नहीं है। मतलब यह कि नए शब्दों की गढ़ंत पर बात करते हुये हमें अपनी संवेदना-चक्षुओं पर लगे आचार-संहिताओं के जंग लगे तालों के भार से मुक्त होकर खुले मन से विचार करना होगा।

बचपन में हिन्दी व्याकरण की कक्षा में 'योगरूढ़ि' पढ़ाते हुये शब्दों का अपना मूल अर्थ छोडकर विशेष अर्थ धारण कर लेने की बात भी बताई गई थी। आज 'भूमंडलीकरण', 'बाजारीकरण', 'उदारीकरण' जैसे शब्दों को उनके मूल अर्थ संदर्भों तक सीमित कर के देखा जाना कितना हास्यास्पद या अर्थहीन हो सकता है, अलग से बताने की जरूरत नहीं है। एक अर्थ में `वसुधेव कुटुंबकम, और कार्ल मार्क्स की उक्ति 'दुनिया के मजदूरों एक हो'  के पीछे भी एक तरह के भूमंडलीकरण की अवधारणा ही है। लेकिन आज 'भूमंडलीकरण' शब्द से सिर्फ और सिर्फ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत एक ऐसे आर्थिक परिवेश के निर्माण की प्रक्रिया का बोध होता है जहां पूंजी बेरोक टोक आ-जा सके। और तो और, 'भूमंडलीकरण', 'वैश्वीकरण', 'बाजारीकरण' आदि के समानार्थी प्रयोगों को भी किसी शुद्धतावाद के चश्मे से देखने या शब्द कोश में उसकी पूर्व उपस्थिति के मानकों से जाँचने-परखने की कोशिश करें तो हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। ठीक इसी तरह यदि 'साठोत्तरी' शब्द के शाब्दिक अर्थ पर जाएँ तो मेरा कोई सहकर्मी जिसका हिन्दी कहानी के इतिहास से कोई रिश्ता नहीं, मुझे और खुद को उसी पीढ़ी में शामिल मान लेगा। लेकिन 'साठोत्तरी' शब्द के भाव और इतिहास-संदर्भों को देखते हुये यह कितना हास्यास्पद हो सकता है, सब समझते हैं। इसी क्रम में रमेश उपाध्याय जी द्वारा बहुप्रयुक्त पद 'भूमंडलीय यथार्थ' या फिर पंकज राग की कविता 'यह भूमण्डल की रात है' के ठीक-ठीक भाव को पकड़ने के लिए हम शब्द कोश में दिये गए भूमंडल शब्द के अर्थ का मुखापेक्षी भी नहीं हो सकते। मतलब यह कि शब्द जीवन में स्वीकृत होने के बाद ही शब्दकोशों में स्थान पाते हैं। इसलिए किसी नए शब्द के प्रयोग पर चौंकने या उसका उपहास करते हुये उसे शब्दकोशों में खोजने की बजाय उसके अर्थ-बोध की स्वीकृति की संभावनाओं पर एक रचनात्मक बहस की जरूरत है।

'भूमंडलोत्तर' शब्द के प्रयोग पर अपना पक्ष रखते हुये मैं व्यापक हिन्दी समाज से इस शब्द को इसके प्रयोज्य अर्थ संदर्भों (जिसमें निश्चय ही काल और भाव का संदर्भ भी जुड़ा हुआ है) के साथ स्वीकार करने की संभावनाओं पर विचार करने की अपील भी करता हूँ। किसी जरूरी और बहसतलब विषय पर बिना अपना पक्ष रखे दूसरों की फेसबुकिया टिप्पणी पर लाइक का बटन दबाकर उन्हें मुदित होने का मौका देते हुये निकट भविष्य में खुद के मुदित होने के अवसर का इंतज़ार करते अपने विद्वान मित्रों से इस बहस को आगे बढ़ाने की उम्मीद भी मैंने अभी नहीं छोड़ी है। 'भूमंडलोत्तर' जैसे किसी भी नए शब्द को खारिज या स्वीकृत करने के पहले यह बहुत जरूरी है।

राकेश बिहारी
जन्म                  :           11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)
शिक्षा                :           ए. सी. एम. ए. (कॉस्ट अकाउन्टेंसी), एम. बी. ए. (फाइनान्स)
प्रकाशन :           प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां एवं लेख प्रकाशित
             वह सपने बेचता था (कहानी-संग्रह)
             केन्द्र में कहानी, भूमंडलोत्तर समय में उपन्यास  (आलोचना)
सम्पादन            :           स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियाँ)
                                    अंतस के अनेकांत (स्त्री कथाकारों की कहानियों का संचयन)
पहली कहानी : पीढ़ियाँ साथ-साथ (निकट पत्रिका का विशेषांक)
समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी (संवेद पत्रिका का विशेषांक)
संप्रति                :           एनटीपीसी लि. में कार्यरत
संपर्क                 :           एन एच 3 / सी 76
                                    एनटीपीसी विंध्याचल
पो. -  विंध्यनगर
जिला - सिंगरौली
486885 (म. प्र.)
मो.                   :           09425823033
ईमेल                 :           biharirakesh@rediffmail.com



6 टिप्‍पणियां:

  1. एक आम पाठक के रूप में भूमण्डलोत्तर ऐसा शब्द नहीं लगा जिसका अर्थ समझ में न आये। वास्तव में इसे शब्द नहीं 'टर्म' कहना चाहिए जिसके पीछे नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में बदलते विश्व खास कर भारत में हो रहे तेजी से परिवर्तन की पूरी कहानी है। बाकी किताब पढ़ने के बाद।

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  2. post globalization, beyond globalization, cosmopolitan perspective of globalization by ulrich beck, for sociology or the student of critical studies the term globalisation refers more than economic policy, what he talks is already argued, not only argued by also the term as discourse is theorized by the writer like MANUEL CASTELLS, ULRICH BECK, BAUMAAN,, PODER. AND MANY POST MODERN THINKERS WHAT NEW IN IT. I DON'T KNOW . आज 'भूमंडलीकरण' शब्द से सिर्फ और सिर्फ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत एक ऐसे आर्थिक परिवेश के निर्माण की प्रक्रिया का बोध होता है जहां पूंजी बेरोक टोक आ-जा सके। और तो और, 'भूमंडलीकरण', 'वैश्वीकरण', 'बाजारीकरण' आदि के समानार्थी प्रयोगों को भी किसी शुद्धतावाद के चश्मे से देखने या शब्द कोश में उसकी पूर्व उपस्थिति के मानकों से जाँचने-परखने की कोशिश करें तो हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। gLOBALISATION IS NOT ONLY A ECONOMIC POLICY WHAT HE TALKED ABOUT

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  3. मैं अक्सर देखता हूँ कि आलोचक/समीक्षक ज्योहिं किसी कवि या लेखक की रचना में कोई नया शब्द देखते हैं उसके पीछे लट्ठ लेकर पड़ जाते हैं कि अमुक शब्द तो शब्दकोष में है ही नहीं, अमा नहीं है तो हो गया..उसे स्वीकार करो...शब्दकोष में शामिल करो | यहाँ पर भी 'भूमंडलोत्तर' एकदम स्पष्ट शब्द है...मेरे को यह समझ में नहीं आता कि क्या नये शब्द ईजाद करने का ठेका सिर्फ भाषा वैज्ञानिको के पास ही है क्या | क्या लेखकों/ कवियों को यह अधिकार नहीं की वे नया शब्द गढ़ सकें ?

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  4. मैं अक्सर देखता हूँ कि आलोचक/समीक्षक ज्योहिं किसी कवि या लेखक की रचना में कोई नया शब्द देखते हैं उसके पीछे लट्ठ लेकर पड़ जाते हैं कि अमुक शब्द तो शब्दकोष में है ही नहीं, अमा नहीं है तो हो गया..उसे स्वीकार करो...शब्दकोष में शामिल करो | यहाँ पर भी 'भूमंडलोत्तर' एकदम स्पष्ट शब्द है...मेरे को यह समझ में नहीं आता कि क्या नये शब्द ईजाद करने का ठेका सिर्फ भाषा वैज्ञानिको के पास ही है क्या | क्या लेखकों/ कवियों को यह अधिकार नहीं की वे नया शब्द गढ़ सकें ?

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  5. Rachnakar nai shabd talashta hai, baratta hai... yah hoga aur iski jaroorat bani rahegi aur nishchay hi is sandarbh mein is shabd ka aana uchit aur swagat yougya hai.shabd ka na sirf arth spasht hai balki yah aaj ke post globelization ke liye ek achcha shabd hai.shbdon ke prati ek tarah ke shudhatavad ke karn dictionary seemit hoti hai, isliye is shabd ke nakar ka virodh bhi lazmi hi.badhai rakesh ko is badhiya article ke liye.

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…