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रविवार, 27 अप्रैल 2014

गुजरात माडल : मीडिया की लहर में दबी सच की इबारतें


·        अशोक कुमार पाण्डेय

नोम चाम्सकी ने अमेरिकी सत्ता वर्ग द्वारा सूचनाओं पर नियंत्रण करके जिस “सहमति विनिर्माण” (consent manufacturing) की बात की थी उसके सन्दर्भ में सोचने की प्रक्रिया पर नियंत्रण के सन्दर्भ में उनका कहना था कि तानाशाही में जो काम (सत्ता पर नियंत्रण तथा विरोधियों का क्रूर दमन) हिंसा से किया जाता है, लोकतंत्र में वह काम “प्रोपोगेन्डा” से होता है.  उनका कहना था कि अमेरिका में लोकतंत्र को लोगों को सूचना और विचारों की पूरी छूट देकर उनकी रचनात्मकता को बढ़ाने की आदर्श व्यवस्था की जगह “जनता की राय के लिपमैन माडल” के तहत चलाया जा रहा है, , जिसमें लगभग बीस फ़ीसदी विशिष्ट वर्ग, जो खुद भी प्रोपोगेंडा का शिकार होता है, लोकतांत्रिक व्यवस्था को नियंत्रित करता है. यह असल में उन शक्तिशाली कुलीनों के हाथ में है जिनका सभी संस्थाओं पर नियंत्रण है. चाम्सकी आगे कहते हैं कि जनता का बहुसंख्यक हिस्सा (अस्सी फ़ीसद) वंचना का शिकार है और उसे “आवश्यक संभ्रम” के सहारे भटकाया और बरगलाया जाता है. यह “आवश्यक संभ्रम” उसी प्रोपगेंडा द्वारा पैदा किया जाता है  जिसके सबसे बड़े और प्रभावशाली माध्यम हैं सूचना के आधुनिक साधन, टीवी चैनल, अखबार आदि. मीडिया का पूरी तरह से नियंत्रण इस दौर में बड़े और शक्तिशाली निजी पूँजीपतियों के हाथों में हो जाता है जो अपने निजी लाभों के लिए काम करते हुए यथास्थिति को बनाए रखने के लिए इसका उपयोग करते हैं. चाम्सकी बताते हैं कि इसके तहत भिन्न विचार रखने वाले या फिर असहमति की आवाज़ों के लिए स्पेस ख़त्म कर दिया जाता है. बहसों के आयाम सीमित कर दिए जाते हैं. आधिकारिक स्टैंड्स को ही अंतिम और एकमात्र सही स्टैंड बनाकर इतनी बार दिखाया/बताया जाता है कि वही जनता की स्मृति में हमेशा के लिए दर्ज हो जाए और लोगों का ध्यान ऐसे विषयों और मुद्दों से भटका दिया जाता है जिस पर विद्रोह या असहमति की कोई गुंजाइश हो. इस तरह उपजाए गए “आवश्यक विभ्रमों” के सहारे शक्तिशाली कुलीन वर्ग सत्ता पर अपना नियंत्रण और यथास्थिति को बनाए रखने में कामयाब होता है. ज़ाहिर है मीडिया इस तरह बीस प्रतिशत सत्ताधारी कुलीन वर्ग के नियंत्रण का एक प्रमुख हथियार बन जाता है.

ज़ाहिर तौर पर इसे पढ़ते हुए आज किसी भी संवेदनशील भारतीय को इन चुनावों के पहले और दौरान मीडिया के व्यवहार और असर की याद आएगी. पिछले लम्बे समय से गुजरात के “विकास” और इसके नायक के पक्ष में जिस तरह से मीडिया ने एक आम सहमति बनाई है उसे नब्बे के दशक के बाद से ही नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पक्ष में बनाई गयी आम सहमति से जोड़ कर देखा जाना चाहिए जिसके तहत आम जनता के अधिकारों के पक्ष में किये गए धरनों/प्रदर्शन और हड़ताल का समाचार इसके कारण होने वाले कारोबार के कथित नुकसानों और ग़रीबों को दी गई सुविधाओं को पैसे की बर्बादी के रूप में दिखाने का चलन लगातार बढ़ता चला गया. यही वह दौर था जिसमें निजी समाचार चैनलों की बाढ़ आती चली गयी जिनका नियंत्रण पूरी तरह से कारपोरेट वर्ग के पास था. यही वह दौर था जब अखबारों का चरित्र पूरी तरह से बदल गया, पेज थ्री जैसी घटिया चीज़ का समावेश हुआ, जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने वाली तथा नवउदारवाद को प्रश्नांकित करने वाली वाम ताक़तों का बहिष्कार लगातार बढ़ता गया और हालात यहाँ तक पहुँचे कि अखबारों में पत्रकारों को सीधे सीधे इनके न्यूज़ न कवर करने और मसाला बढ़ाते जाने का निर्देश दिया गया. गुजरात का चमत्कार मीडिया के इसी “आवश्यक संभ्रम” पैदा करने के प्रयास का हिस्सा है. इस लेख में हम इसी संभ्रम की रुपहली परतों के भीतर छिपी कुछ बदशक्ल सच्चाइयों की तहक़ीकात करने की कोशिश करेंगे.

“गुजरात माडल” आख़िर क्या बला है?  

नरेंद्र मोदी और उनकी पिछलग्गू मीडिया ही नहीं बल्कि इनके प्रभाव में सवर्ण मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अक्सर यह कहता नज़र आता है कि जो माडल गुजरात में विकास के लिए अपनाया गया वह पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए. हालांकि न खुद मोदी, न मीडिया और न ही उनके समर्थक कभी यह बताते हैं कि आख़िर यह माडल है क्या और किस तरह से बाक़ी देश में अपनाई जा रही नीतियों से जुदा है. मोटे तौर पर उनका दावा होता है कि इससे विकास की गति बढ़ गयी है, विदेशी निवेश में तेज़ी आई है, मूलभूत सुविधाएं सर्वसुलभ हो गयी हैं और ग़रीबी में कमी आई है. यही नहीं उनका यह भी कहना है कि इसकी सहायता से भ्रष्टाचार में भी कमी आई है. ये बातें अंतिम और अप्रश्नेय सत्य की तरह कही जाती हैं और इन पर कोई सवाल कुफ्र से कम नहीं समझा जाता. लेकिन सवाल तो पूछे जायेंगे.

2013 में प्रकाशित अतुल सूद द्वारा संपादित “पावर्टी एमिड्स्ट प्रास्पेरिटी : एसेज़ आन द ट्राजेक्ट्री आफ डेवलपमेंट इन गुजरात” में इस मिथक की बेहतर पड़ताल की गयी है.  “गुजरात माडल” की विशेषताएँ चिन्हित करते हुए यह इसकी विकास रणनीति के दो प्रमुख अवयव रेखांकित करती है, “पहला, बंदरगाहों, रेल, रोड तथा ऊर्जा क्षेत्र में संवृद्धि के लिए निजी क्षेत्र का एकीकृत निवेश और दूसरा, औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र की संवृद्धि के लिए “ग्रीनफील्ड साइट्स” की तरह  विशाल अन्तः क्षेत्रों का निर्माण जिनमें विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाएँ हों. साथ ही इन क्षेत्रों में निवेश करने वालों को भरपूर सब्सीडीज, रियायतें, करों में राहत, सस्ते ऋण तथा ऐसी अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई गयी हैं” देखा जाय तो इसमें नया कुछ नहीं है. विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़), विशेष निवेश क्षेत्र जैसी चीजें नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद पूरे देश में ही कमोबेश लागू हुई हैं. फिर “गुजरात माडल” देश के बाक़ी हिस्सों से अलग कहाँ है?

मूल रूप से देखा जाए तो न ही तरीकों में कोई मूलभूत फर्क है न ही परिणामों में. गुजरात में भी मूलभूत संरचनाएं गाँवों और कस्बों में विकसित करने की जगह ऐसे “विशेष क्षेत्रों” में की गयीं, जिनका उद्देश्य गुजरात के निवासियों को नहीं, बल्कि वहाँ निवेश करने आ रहे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाना था. इसका स्वाभाविक असर ग़ैरबराबरी और विषमताओं में वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और ऐसी ज़रूरी मदों में खर्च की कमी और इसके चलते बदहाली में ही होना था. हम आगे देखेंगे कि वह हुआ भी. सूद उदाहरण देते हैं कि दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कारीडोर (DMIC) परियोजना की योजना इंगित करती है कि गुजरात को औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल सिंचाई और घरेलू उपयोग से हटाकर देना पड़ेगा. साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि 2039 तक यहाँ विस्थापित होकर आने वाले मज़दूरों और कामगारों की संख्या नौ लाख चालीस करोड़ होगी. लेकिन इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं है कि इस बढ़ी हुई आबादी की पेयजल सहित दूसरी आधारभूत ज़रूरतें कैसे पूरी होंगी?

हाँ, गुजरात माडल दो स्तरों पर बाक़ी जगहों से अलग है. पहला तो यह कि यहाँ शक्ति और निर्णय का केंद्र पूरी तरह से एक व्यक्ति में सिमट गया है. मंत्रिमंडल तथा अन्य व्यवस्थाएं काग़ज़ में हैं लेकिन कैबिनेट की बैठकें शायद ही कभी होती हैं. सारी लोकतांत्रिक प्रणालियाँ पूरी तरह से एक व्यक्ति में केन्द्रित हो गयी हैं, असहमति की सभी संभावनाएँ समाप्त कर दी गयी हैं और मीडिया पर पूरी तरह से एकाधिकार जमा लिया गया है. मालिकान को उनके दूसरे व्यापारों के लिए अकूत सुविधाएँ (आगे विस्तार में) दे देने के बाद उनके अखबारों या चैनलों से वैसे भी सिर्फ सहमति का माहौल बनाने की ही उम्मीद की जा सकती है. दूसरी विशेषता जो इसी से जुड़ी हुई है, वह यह कि निजीकरण की इस मुहिम को सबसे अधिक  आक्रामक तरीके से लागू करते हुए सभी परम्पराओं और जनहित के ख्यालात को ताक पर रख दिया गया है. कूंजीभूत कहे जाने वाले क्षेत्र, जैसे बंदरगाह, रेलवे, सड़कें और ऊर्जा, पारंपरिक रूप से सरकारों के ही नियंत्रण में रहे हैं क्योंकि इनसे जनता का व्यापक हित और सुरक्षा दोनों ही सीधे सीधे जुड़े हैं. लेकिन “गुजरात माडल” इस परम्परा और चिंता को तिरोहित कर इनका नियंत्रण सीधे सीधे निजी पूंजीपतियों को सौंप देता है. देश के और राज्यों में भी निजीकरण हुआ है लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ है कि इन चीजों के सम्बन्ध में सारे अधिकार और निर्णय लेने की सारी ताक़त कार्पोरेट्स के हाथों में सौंप दी गयी. उदाहरण के लिए बिल्ड ओन आपरेट ट्रांसफर (BOOT) के तहत बंदरगाहों को निजी हाथों में सौंपने के साथ आय सरकार के साथ साझा करने की जगह उन्हें “रायल्टी हालीडे” दे दिया गया यानि जितना शुल्क उगाहा जाएगा सब उनका, यह भी कारपोरेट ही तय करेंगे कि कितना शुल्क होगा और कैसे उगाहा जाएगा, निजी निवेशकों के लिए भूमि अधिग्रहीत करके बाज़ार दर से कम पर उपलब्ध कराई गयी. लाभ कमाने के लिए तीस बरस तक छूट ज़ारी रखने का प्रावधान किया गया और भी जाने क्या क्या! एक दूसरा उदाहरण नैनो तथा दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए टाटा को दी गयी सब्सीडी है. टाटा ने 29000 करोड़ के निवेश के बदले 0.1% वार्षिक ब्याज पर 9570 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया जिसका बीस साल तक कोई भुगतान नहीं करना है और बीस साल बाद भी मासिक क़िस्तों में ही भुगतान करना है. बाज़ार से काफी कम क़ीमत पर ज़मीन तो उपलब्ध कराई ही गयी, जिसमें गांधीनगर के पास एक हाउसिंग काम्प्लेक्स बनाने के लिए दी गयी ज़मीन भी शामिल है, साथ में इसके लिए स्टैम्प ड्यूटी, रजिस्ट्री के खर्चे और बिजली का भुगतान भी राज्य सरकार द्वारा ही किया गया. साथ में टैक्स ब्रेक जो दिया गया है उससे यह तय कर दिया गया कि टाटा की आमदनी का कोई हिस्सा गुजरात की जनता को आने वाले समय में नहीं मिलने वाला. और ऐसी सुविधाएँ पाने वाले टाटा अकेले नहीं हैं. रिलायंस, अदानी और तमाम लोगों को ये रेवड़ियाँ खुले हाथ बांटी गयी हैं. तब अगर ये सारे कारपोरेट नमो नमो का गान कर रहे हैं और इनके पैसों से चलने वाले चलन अपनी बनाई हवा को लहर से सूनामी में तब्दील किये दे रहे हैं तो किमाश्चर्यम?
इस तरह इस कथित “नए” माडल में असल में कुछ नया है ही नहीं. यह विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं द्वारा सुझाया गया वही बाज़ार आधारित संवृद्धि का आक्रामक नव उदारवादी माडल ही है जिसे अपना कर लैटिन अमेरिका सहित तमाम देश बर्बाद हो गए. यह वही माडल है जिसे नब्बे के दशक से सारे देश में अपनाया जा रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि जहां बाकी जगहों पर इसे इतनी आक्रामकता से लागू न करके ग़रीब-गुरबे के लिए कुछ राहत योजनाएँ भी बनाई जाती हैं, किसानों के बारे में भी थोड़ा सोचा जाता है, लोकतांत्रिक प्रणाली के चलते असहमतियों और विरोधों के कारण आक्रामकता के नाखून कभी क़तर दिए जाते हैं वहीँ गुजरात में लोकतंत्र के बाने में चल रही तानाशाही ऐसी सभी असहमतियों और विरोधों के प्रति पूरी तरह से असहिष्णु है, हम आगे देखेंगे कि कैसे जनकल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर देती है और दोनों हाथों से कार्पोरेट्स को सरकारी सुविधाओं की रेवड़ियाँ मुक्तहस्त लुटाते हुए नियम-क़ानून ताक पर रख देती है. देखा जाय तो “गुजरात माडल” एक तानाशाह की सरपरस्ती में कारोपोरेट्स को चरने के लिए मुक्त चारागाह उपलब्ध कराने का माडल है. अगर यू पी ए के संवृद्धि माडल से इसकी तुलना कर सकते हों तो हम कह सकते हैं कि, गुजरात माडल = यू पी ए माडल – कल्याणकारी योजनायें!

इस माडल का हासिल क्या है?

आखिर इस माडल के परिणाम भी बाक़ी जगहों पर लागू नव उदारवादी नीतियों के परिणामों से अलग कैसे हो सकते थे? मेनस्ट्रीम के 16 अप्रैल 2014 को छपे एक लेख “गुजरात : अ माडल आफ डेवलपमेंट” में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा न केवल विकास और संवृद्धि (Growth) के अंतर को साफ़ करते हुए इस कथित माडल पर सवाल खड़े करते हुए सूद के निष्कर्षों तक ही पहुँचते हैं बल्कि सीधा सवाल भी करते हैं कि “सामान तरह की नीतियों, सामान ब्यूरोक्रेसी, सामान कारपोरेट संस्कृति, नियामक संस्थाओं, निर्णयकारी संस्थाओं और समान राजनीतिक संस्कृति जिसमें कारपोरेट मानसिकता वाला व्यापारी जैसा राजनीतिक वर्ग है, एक ऐसा अलग परिणाम कैसे हासिल किया जा सकता है जिसमें आम जनता के लम्बे समय से नज़रअंदाज किये गए अधिकार, आवश्यकताएं और उम्मीदें पूरी हो सकें? गुजरात सरकार की नीतियाँ पूरी तरह से सरकार की सरपरस्ती में नव उदारवादी, बाजारोंमुख नीतियाँ ही हैं.” और इसके उदाहरण सामाजिक क्षेत्रों में बिखरे पड़े हैं. सरकारी आंकडें ही विकास के इन दुष्परिणामों को साफ़ साफ़ दिखा देते हैं. काउंटर करेंट डाट ओआरजी में 19 मार्च 2014 को छपे एक लेख “द गुजरात माडल आफ डेवेलपमेंट : व्हाट वुड इट डू टू द इन्डियन इकानामी” में रोहिणी हेंसन बताती हैं कि “गुजरात के आम लोगों ने इस आर्थिक संवृद्धि की भारी क़ीमत चुकाई है. गुजरात ग़रीबी के उच्चतम स्तरों वाले भारतीय राज्यों में से एक है.कारपोरेटों को दिए गए ज़मीन के विशाल पट्टों से लाखों की संख्या में किसान, दलित, खेत मज़दूर, मछुआरे, चरवाहे और आदिवासी स्थापित हुए हैं.  2011 तक मोदी के शासन काल में 16000 किसानों, कामगारों और खेत मज़दूरों ने आर्थिक बदहाली के कारण ख़ुदकुशी की. अपने स्तर की प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में गुजरात का मानव विकास सूचकांक सबसे निचले स्तर का है. बड़े राज्यों में नरेगा लागू करने के मामले में यह राज्य सबसे पीछे है. मुसलामानों के हालात ग़रीबी, भूखमरी, शिक्षा तथा सुरक्षा के मामलों में बहुत ख़राब हैं. कुपोषण बहुत ज्यादा है और इस बारे में शाकाहारी प्रवृत्तियों को जिम्मेदार ठहराने के मोदी के बयान को खारिज करते हुए एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इसकी वजूहात अत्यंत निचले स्तर की मज़दूरी, पोषण योजनाओं का ठीक तरह से काम न करना, पेय जल वितरण की अव्यवस्था और सैनिटेशन की कमी बताते हैं (गुजरात शौचालयों के उपयोग के मामले में देश के सभी राज्यों में दसवें पायदान पर है और यहाँ की पैंसठ प्रतिशत से अधिक जनता खुले में शौच करती है जिसकी वज़ह से पीलिया, डायरिया, मलेरिया तथा अन्य ऐसे रोगों के रोगियों की संख्या बहुत ज्यादा है. अनियंत्रित प्रदूषण ने किसानों और मछुआरों की आजीविका नष्ट कर दी है और स्थानीय नागरिकों को चर्मरोग, अस्थमा, टी बी, कैंसर जैसी बीमारियाँ बड़े पैमाने पर हुई हैं.”

कुपोषण को लेकर तो ख़ुद गुजरात सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े भयावह हैं. 5 अक्टूबर 2013 के द हिन्दू में छपी एक खबर के अनुसार वहाँ की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती वसुबेन त्रिवेदी ने विधानसभा में एक लिखित उत्तर में बताया प्रदेश के 14 ज़िलों में कम से कम 6.13 लाख बच्चे कुपोषित या अत्यंत कुपोषित थे जबकि 12 ज़िलों के लिए यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं था. आश्चर्यजनक रूप से प्रदेश के वाणिज्यिक केंद्र अहमदाबाद में 54,975 बच्चे कुपोषित तथा 3,8600  बच्चे अत्यन कुपोषित थे. इस तरह कुल कुपोषित बच्चों की संख्या (लगभग 85,000) वहां प्रदेश में सर्वाधिक थी. बनासकांठा और साबरकांठा जैसे आदिवासी इलाकों में भी यह संख्या क्रमशः 78,421 और 73,384 थी. सी ए जी की रपट के अनुसार “2007 और 2012 के बीच लक्षित बच्चों को सप्लीमेंट्री पोषण देने के सरकारी दावों के बावजूद मार्च 2012 की मासिक प्रगति रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का हर तीसरा बच्चा सामान्य से कम वज़न का था.” इसी रिपोर्ट के अनुसार “राज्य में आवश्यक 75,480 आंगनवाड़ी केन्द्रों की जगह केवल 52,137 आंगनवाड़ी केंद्र संस्तुत किये गए और उनमें से भी केवल 50,225 काम कर रहे हैं. परिणामस्वरूप एकीकृत बाल विकास योजना के लाभों से 1.87 करोड़ बच्चे वंचित हो गए हैं.” जबकि 2012 की राज्यवार रिपोर्ट में यूनिसेफ ने बताया कि “पाँच साल से कम उम्र का गुजरात का लगभग हर दूसरा बच्चा सामान्य से कम वज़न का है और हर चार में से तीन को खून की कमी है. पिछले दशक में नवजात मृत्यु दर तथा प्रजनन के समय की मृत्यु दरों में कमी की दर बहुत धीमी है. गुजरात में हर तीसरी माँ भयावह कुपोषण की समस्या से जूझ रही है...बच्चों के स्वास्थ्य की समस्या बाल विवाहों की बड़ी संख्या से और विकट हो गयी है. गुजरात बाल विवाहों की संख्या के ज्ञात आंकड़ों के मद्देनज़र देश का चौथा राज्य है. 2001 और 2011 के बीच गुजरात के सेक्स रेशियो में भी कमी आई है. सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट में भी इन बातों की पुष्टि होती है. इसके अनुसार गुजरात का कैलोरी उपभोग राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है. ग्रामीण इलाकों में तो यह उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मिजोरम से भी नीचे 18वें स्थान पर है. यह रिपोर्ट एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने लाती है कि आर्थिक गैरबराबरी के मामले में गुजरात देश में अन्य राज्यों से काफ़ी आगे है. यहाँ अमीर और ग़रीब के बीच की खाई पिछले दस वर्षों में सबसे तेज़ी से बढ़ी है.

शिक्षा के मामले में भी हालात बदतर हुए हैं. यू एन डी पी की एक रपट के अनुसार बच्चों को स्कूल में रोकने के मामले में गुजरात का नम्बर देश के सभी राज्यों में 18 वाँ है. साक्षरता दर के मामले में बड़े राज्यों में यह सातवें नंबर पर है और 1997-98 से 2012-13 के बीच इसकी स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बदतर हुई है. रिपोर्ट में वहां के शिक्षा के स्तर पर चिंता प्रकट करते हुए उसे बेहतर बनाने की अनुशंषा भी की गयी है. (देखें, मिराज़ आफ डेवलपमेंट, फ्रंटलाइन, 20 फरवरी, 2013) गुजरात सड़कों तथा सिंचाई पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में तो सबसे ऊपर है लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में इसका नम्बर छठां है. 6-14 साल के आयुवर्ग के बच्चों के बीच शिक्षा में दलित, आदिवासी, महिलाओं तथा आदिवासियों की भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कम है और अपने स्तर के आय वाले राज्यों से यह काफी पीछे है. लेकिन सरकार इस मद में अपना खर्च बढाकर शिक्षा का स्तर सुधारने और इन संस्थाओं को बेहतर बनाने की जगह निजी शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा देने में लगी है. जनवरी 2013 की वाइब्रेंट गुजरात समिट में यह स्पष्ट था जब नरेंद्र मोदी ने दुनिया भर के निजी विश्वविद्यालयों के बीच भागीदारी के लिए एक फोरम बनाने का प्रस्ताव दिया. हालांकि मोदी के शासनकाल में राष्ट्रीय औसत की तुलना में गुजरात में शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है  लेकिन खासतौर पर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में सरकारी अनुदान प्राप्त तथा सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित विद्यालयों पर लोगों की निर्भरता कम होने की जगह बढ़ी है, जो इस बात का सूचक है कि मंहगे निजी स्कूल लोगों की पहुँच से बाहर हैं और शिक्षा के स्तर को बढ़ा पाने में इनकी भूमिका प्रभावी नहीं हो पा रही.

इन सामाजिक सूचकों से इतर अगर शुद्ध आर्थिक पहलुओं को देखें तो भी इस मिथक की कोई सुन्दर तस्वीर नहीं दिखती. ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में कमी के मामले में एन एस एस ओ की रिपोर्ट के अनुसार 2004 और 2012 के बीच में ग़रीबी में सबसे ज़्यादा कमी उड़ीसा में आई (20.2 %) और सबसे कम गुजरात में (8.6%).

रोज़गार के मामले तो हालात बेहद खराब हैं. एन एस एस ओ के ही आंकड़े बताते हैं कि पिछले बारह सालों में रोज़गार में वृद्धि की दर लगभग शून्य तक पहुँच गयी है. ग्रामीण क्षेत्र में संवृद्धि के बावजूद रोज़गार में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. जिस तरह की कृषि भूमि की बिक्री और खरीद की नीतियाँ बनाई गयीं हैं, छोटे और मध्यम किसान अपने खेत लगातार बेच रहे हैं. बदहाली के शिकार इस वर्ग को तुरत पैसे तो मिल जा रहे हैं लेकिन इससे रोजगारहीन लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्पेशल इकान्मिक जोंस वगैरह बनने से जिस तरह की नौकरियां सृजित हो रही हैं, वे स्थानीय लोगों के अनुरूप नहीं हैं. 5 दिसंबर 2012 को हिमालयन मिरर में लिखे अपने आलेख में अतुल सूद का कहना है कि गुजरात माडल के इस विकास का सबसे बड़ा शिकार रोज़गार ही हुआ है. 1993-94 से 2004-05 तक जो रोज़गार वृद्धि दर 2.69 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी वह 2004-05 से 2009-10 के बीच लगभग शून्य हो गयी. इसके साथ ही चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इसी दौर में कामगारों के वेतन में वृद्धि की दर भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में अत्यंत धीमी रही है. इसका प्रमुख कारण पक्की नौकरियों में कमी और ठेके पर रखे गए कामगारों की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी है. विडंबना यह कि इसी दौर में कार्पोरेट्स के लाभ में भारी वृद्धि हुई है. ज़ाहिर है आर्थिक विषमता में भारी वृद्धि हुई है.

विकास के इस मिथक के प्रचार में किस तरह जान बूझकर मीडिया वाम द्वारा शासित राज्यों को नज़रंदाज़ करती है इसका एक उदाहरण हाल में आई नॅशनल सैम्पल सर्वे आफिस की रिपोर्ट से मिलता है. इसको अगर देखें तो 2004 से 2011 के बीच मैनुफेक्चरिंग क्षेत्र में सबसे ज्यादा नौकरियों का सृजन पश्चिम बंगाल के उस वाम शासनकाल में हुआ जिसे बदनाम करने के लिए मीडिया और उसके चम्पू अर्थशास्त्री पूरा जोर लगा देते हैं. इस मामले में न केवल गुजरात उससे पीछे रहा बल्कि महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्य भी. मध्य प्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों में तो इस दौर में ऋणात्मक वृद्धि पाई गयी. लेकिन मीडिया के निशाने पर हमेशा ही वाम की “असफलता” रही. (देखें, द हिन्दू, पेज 12, 26 अप्रैल, 2014)

अन्य सूचकों की बात की जाय तो 2012 में भारत के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में गुजरात के डिपाजिट्स की हिस्सेदारी थी 4.8 प्रतिशत जो आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र से कम थी. इन बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋणों में गुजरात की भागीदारी 4.4% थी जो फिर महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु से कम थी. इन बैंकों में/से गुजरात की प्रति व्यक्ति जमा और प्रति व्यक्ति ऋण तमिलनाडू, कर्नाटक, महाराष्ट्र और यहाँ तक कि केरला से भी कम थी. ज़ाहिर है जब राज्य पूँजी एकत्रण में पीछे रहा तो ग़रीबी दूर करने में आगे कैसे रह सकता था? 2011 में प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह पांचवें नंबर पर रहा तो 2004 से 2009 के दौर में औद्योगिक विकास के मामले में छठवें स्थान पर.  

सबसे चौंकाने वाले आंकड़े तो उस प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के है जिसका सबसे ज्यादा शोर मचाया जाता है. ‘निवेशक अनुरूप राज्य’ के अपने गलाफाड़ शोर के बावजूद इस क्षेत्र में भी उपलब्धि उतनी नहीं जितनी दिखाई जाती है. हर दो साल पर होने वाली बहु प्रचारित “वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल निवेशक समिट” भी अपनी चमक खोती जा रही है. 2003 में जहां हस्ताक्षर किये गए एम ओ यूज में से 73% ज़मीन पर उतारे जा सके वहीँ 2011 आते आते कुल समझौतों में से केवल 13% ही कारगर हो सके. इस मामले में अन्य राज्यों की तुलना में उसकी उपलब्धि कोई बेहतर नहीं रही. 2006 से 2010 के बीच गुजरात ने 5.35 लाख करोड़ के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर किया तो उनसे 6.47 लाख नए रोजगारों की उम्मीद जताई गयी, इसी दौर में महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने समझौते तो क्रमशः 4.2 लाख करोड़ और 1.63 लाख करोड़ के ही किये लेकिन इनमें क्रमशः 8.63 और 13.09 लाख नौकरियों  की क्षमता बताई गयी.

तो जिस माडल के सहारे नरेंद्र मोदी गुजरात में न तो ग़रीबी कम कर पाए, न बेरोज़गारी कम कर पाए न ही औद्योगिक विकास को सबसे तेज़ कर पाए उसके सहारे वह किस तरह भारत भर की समस्याएँ दूर करेंगे, यह कोई भी अंदाज़ लगा सकता है. दरअसल गुजरात पारम्परिक रूप से उद्यमियों का राज्य रहा है. समुद्र तटों से क़रीब होने के वजह से यहाँ व्यापार हमेशा से ही फलता फूलता रहा है. गुजरात के किसानों, मज़दूरों, दस्तकारों, महिलाओं और व्यापारियों ने अपनी मेहनत और लगन से इसे एक विकसित राज्य मोदी के आगमन से बहुत पहले ही बना दिया था. गांधी के आन्दोलन के समय से ही गुजराती महिलाओं ने आंदोलनों में हिस्सेदारी और घर से बाहर निकलने के सबक सीख लिए थे. अपने इस कथित विकास माडल के बहाने उन्होंने सिर्फ इस सामूहिक प्रयास से विकसित किये गए जनता के संसाधनों को कौड़ियों के भाव कार्पोरेट्स को मुहैया करा उनका लाभ बढ़ाया है और जनता की मुश्किलात. आगे अदानी वाले केस को विस्तार से देखते हुए हम इस तथ्य को समझ सकते हैं.

यहाँ एक और आंकड़े का ज़िक्र कर देना विषयांतर नहीं होगा.  2005 में गुजरात में अपहरण के 1,164 केस दर्ज हुए. जो बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे पारम्परिक अपहरण वाले राज्यों के तो आधा ही है लेकिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन गुजरात के संदर्भ में विशिष्ट बात यह है कि गुजरात में अपहरण किये गए लोगों में से नब्बे फ़ीसद तीस वर्ष से कम आयुवर्ग के लोग थे तो अस्सी फीसद महिलायें!  यह राष्ट्रीय औसत का लगभग दुगना है. समझा जा सकता है कि देश भर में महिलाओं को सुरक्षा देने का उनका दावा कितना गंभीर है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों की माने तो हिंसक अपराधों में भी गुजरात किसी से पीछे नहीं है. यहाँ की अपराध दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. वह गुजरात के सबसे सुरक्षित होने का दावा भी करते हैं लेकिन 2003 के दौरान वहाँ कुल चोरी हुए माल का मूल्य था 32,419 लाख रुपये जबकि बरामदगी इसमें से केवल 9.5% की हो पायी. हरियाणा सहित कई अन्य राज्यों का प्रदर्शन इस मामले में बेहतर था. (देखें, मिथ आफ द गुजरात माडल मिराकल, मोहन गुरुस्वामी, आब्जर्वर रिसर्च फाउन्डेशन, 13 फरवरी, 2013.) 5 अक्टूबर 2013  के “द हिन्दू” में छपी एक खबर के अनुसार सी ए जी ने पाया था कि देश की सबसे बड़ी कोस्टल लाइन होने के बावजूद गुजरात में समुद्र तट की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. मैरीन पुलिस चौकियों की संख्या बहुत कम है और उनमें भी कार्यरत सुरक्षाकर्मियों का सही तरीके से प्रशिक्षण नहीं हुआ है तथा वे रात्रि गश्तों पर नहीं जाते. आडिटर ने चिन्हित किया था कि कच्छ जिले में 235 किलोमीटर लम्बे समुद्रतट के बीच केवल एक मैरीन पुलिस चौकी मुंद्रा में है जबकि द्वारका और हर्षद के बीच एक भी नहीं है. अपने राज्य की सीमाओं के प्रति इस क़दर लापरवाह व्यक्ति जब देश की सुरक्षा की बात करे और मीडिया उसे ज़ोर शोर से प्रचारित करे तो इसे “आवश्यक विभ्रम” के अलावा क्या कहा जा सकता है?

असल में मौक़ा तो दुश्मनों ने दिया

गोधरा और उसके बाद की भयावह घटनाओं के बाद बनी मोदी की नकारात्मक छवि को असल में पहला उद्धार जो मिला वह राजीव गांधी फाउंडेशन की वर्ष 2005 की उस रिपोर्ट से मिला, जिसमें गुजरात को “आर्थिक स्वतंत्रता” के आधार पर  देश का अग्रणी राज्य घोषित किया गया. ज़ाहिर है कि मोदी ने इसको हाथोहाथ लिया और देश भर के अखबारों में पूरे पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया गया. इसी बीच सिंगूर की घटना हुई और मोदी ने इसका भी पूरा फ़ायदा उठाते हुए तमाम इनाम-ओ-इकराम तथा रियायत देते हुए टाटा को गुजरात आने का न्यौता दे दिया. और फिर तो कार्पोरेट्स का तांता लग गया और मोदी का कथित विकास रथ सबको रौंदते हुए तेज़ी से भागने लगा.

आर्थिक स्वतंत्रता की अवधारणा की जड़ें 1986 और 1994 के बीच कनाडा के फ्रेज़र इन्स्टीट्यूट द्वारा प्रायोजित तथा मिल्टन फ्रीडमैन तथा रोज़ फ्रीडमैन द्वारा आयोजित सेमिनारों में पड़ीं. घोर दक्षिणपंथी तथा बाज़ार परस्त जनविरोधी आर्थिक नीतियों के समर्थक नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रीडमैन की इस अवधारणा को अमेरिका के दो घोर रूढ़िवादी आर्थिक संस्थानों हेरिटेज फाउंडेशन और केटो इंस्टीट्यूट का समर्थन भी मिला था.  फ्रीडमैन की आर्थिक नीतियों का सबसे मूर्त रूप चिली के तानाशाह आगस्टो पिनाशो के यहाँ ही देखने को मिलता है. तो वाल स्ट्रीट जनरल द्वारा तय किये गए मानकों के आधार पर राजीव गांधी फाउंडेशन ने गुजरात को जो सबसे अधिक “आर्थिक स्वतंत्रता” वाला राज्य घोषित किया उसके मानी कोई समझ सकता था. गुरुस्वामी बताते हैं कि एम आई टी के अर्थशास्त्र के शब्दकोष के अनुसार किसी आर्थिक माडल की जगह यह दरअसल  “अति दक्षिणपंथियों द्वारा समर्थित एक विचारधारात्मक जीवन शैली है.” फ्रेज़र इन्स्टीट्यूट कहता है कि “आर्थिक स्वतंत्रता का स्तर उस हद तक होता है जिस हद तक किसी समाज में सरकार के किसी हस्तक्षेप के बिना कोई व्यक्ति आर्थिक संक्रियाएं कर सकता है. आर्थिक अवधारणा के अवयव हैं, निजी चुनाव, स्वैच्छिक आदान प्रदान, अपनी कमाई को अपने ही पास रखने का अधिकार और संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा.” यानि सीधे सीधे कहें तो एक ऐसी व्यवस्था जिसमें धनिकों को अपनी मनमानी करने की पूरी छूट हो और उन पर सरकार का कोई नियंत्रण न हो यानि बाज़ार को अपने खेल खेलने की खुली छूट मिले और आम आदमी जाए भाड़ में.

गुजरात माडल इसी खेल का नाम है और इसीलिए इसे चलाने के लिए उसे भी पिनोशे जैसा सर्वसत्तावादी तानाशाह चाहिए. क्या राजीव गांधी फाउंडेशन जानता था कि वह किस चीज़ का सर्टिफिकेट दे रहा है?

क़िस्सा अदानी का उर्फ़ खुला खेल फर्रुखाबादी  उर्फ़ सैयाँ भये कोतवाल

गुलेल डाट काम के राजीव कुमार ने अदानी-मोदी गठजोड़ पर बड़ा खुलासा किया है. वह बताते हैं कि 2006 में गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड ने 3000 मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए निजी कंपनियों से सौदे किये. अदानी ग्रुप के साथ 1000 वाट के उत्पादन के लिए दो समझौते किये गए जिसमें पहला आयातित कोयले से बिजली उत्पादन के लिए था तो दूसरा देशी और आयातित कोयले के मिश्रित रूप से उत्पादन के लिए. इनके लिए बिजली खरीदने की दरें क्रमशः रूपये 2.89 और 2.35 प्रति यूनिट के हिसाब से तय की गयीं. इन समझौतों के ठीक पहले शेष 1000 मेगावाट के उत्पादन के लिए टाटा के साथ समझौता किया गया. यहाँ भी बिजली का उत्पादन आयातित कोयले द्वारा ही होना था लेकिन दर यहाँ सिर्फ 2.26 रुपये प्रति यूनिट थी. अदानी ग्रुप से अधिक दर पर बिजली खरीदने के चलते सरकार को प्रतिवर्ष 1347 करोड़ रुपयों का नुक्सान हुआ जबकि तय अवधि 25 सालों के लिए यह नुक्सान 23,625 करोड़ रुपयों का होगा!

हालांकि किस्सा इतना ही नहीं है. राजीव कुमार का पूरा लेख पढने पर आप समझ सकते हैं कि किस तरह सरकार के संरक्षण में अदानी ने नियमों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हें अपने पक्ष में बदलवाने में सफल हुए. पूरा लेख http//:gulail.com/the-people-of-gujarat-will-bear-the-burnt-of-the-modi-adani-nexus/ पर पढ़ा जा सकता है.

खेल यहीं ख़त्म नहीं होता है. अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र और बंदरगाह के लिए अदानी को गुजरात में सबसे कम कीमत पर ज़मीन मिली, क्रमशः 32 रुपये और 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से! 26 अप्रैल 2014 के बिजनेस स्टैण्डर्ड में छपी ख़बर के अनुसार कच्छ ज़िले के मुंद्रा ब्लाक में 6,456 हेक्टेयर ज़मीन इन दरों पर अदानी को सरकार ने मुहैया कराई. जबकि इनका बाज़ार दर 50 रुपये से 100 रुपये प्रति वर्ग मीटर तक था. गुजरात में ही अन्य किसी कारपोरेट को इतनी सस्ती दर पर कोई ज़मीन उपलब्ध नहीं कराई गयी है, न ही देश के किसी दूसरे हिस्से में.

किस्से और भी हैं लेकिन अभी के लिए तो यह भी कम नहीं. अब जब मोदी सरकार गुजरात में इस क़दर मेहरबान हो तो अदानी क्यों न चाहेंगे कि अबकी बार केंद्र में भी मोदी सरकार ही हो...और ऐसे अकेले अदानी ही नहीं.

31 मार्च 2012 की रिपोर्ट में सी ए जी ने गुजरात सरकार पर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाते हुए सरकार को 580 करोड़ का नुक्सान पहुंचाने का आरोप लगाया. यह मामला गैस से जुड़ा था और फायदा पाने वाली कम्पनियाँ थीं रिलायंस, अदानी और एस्सार स्टील. साथ ही रिपोर्ट में फोर्ड इण्डिया और एस्सार समूह को ज़मीनें देने के मामले में भी अनियमितता का आरोप लगाया गया था. (देखें 3 अप्रैल 2013 का इन्डियन एक्सप्रेस). सी ए जी की ही एक अन्य रिपोर्ट में सरकार पर गैस खरीद के मामले में निजी कंपनियों (रिलायंस और अदानी) को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी खजाने को 16,700 करोड़ का चूना लगाने का आरोप लगा.

लेकिन इनमें से किसी की आंच मोदी तक नहीं पहुंची. यह यों ही नहीं था कि उन्होंने लोकायुक्त को रोकने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और फिर एक ऐसा लोकपाल बना दिया जिसके दूध के दांत भी नहीं टूटे, उसे उसी सरकार के नियंत्रण में रहना था, जिसकी निगरानी करनी थी. आखिर वह येदियुरप्पा से सबक ले चुके थे.

लेकिन मीडिया में आपने कहीं इसकी चर्चा सुनी? ज़ाहिर है जब अधिकाँश चैनलों में रिलायंस का पैसा लगा हो तो यह खबर मीडिया में कैसे आ सकती थी?

तो अब?
इन सबके बावजूद अगर मोदी 2014 के चुनावों के पहले मीडिया के सहारे अपनी छवि एक विकास पुरुष और भ्रष्टाचार विरोधी की बनाने में सफल हो गए तो यह समझ लेना चाहिए कि अब भारत में भी मीडिया एक निर्णायक कंसेंट मैन्युफैक्चरर बन चुका है. उसकी ताक़त इतनी बढ़ चुकी है कि वह अपने नियमित प्रोपेगेंडा से एक तानाशाह को सिर्फ इसलिए एक लोकप्रिय नायक में तब्दील कर सकता है कि वह तानाशाह पूरी ताक़त के साथ उसके मालिकान की तिजोरी भरने को तैयार है. वह ह्त्या के सारे दाग मिटा सकता है और सारी असहमतियों और विरोधों को कूड़ेदान के हवाले कर सकता है. फिर जनता के पास चारा क्या है?

ज़ाहिर तौर पर वैकल्पिक मीडिया और जनांदोलन. इन तथ्यों और सच्चाइयों को लेकर जनता के पास जाना होगा और इनका एक मज़बूत तथा सकारात्मक विकल्प तैयार करना होगा. रास्ता लंबा है लेकिन चुनावों के नतीजे जो भी हों चलना इसी पर पड़ेगा. 



6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत जरुरी आलेख, थोडा देर से आया लेकिन ज़बरदस्त आया. अंधो कि भी आखें खोल देने के लिए काफी है. हमारे समय का यह एक सबसे उपयोगी दस्तावेज़ है. हाँ मोदी के काल में जितनी सांप्रदायिक घटनाएं हुई उसका हवाला नहीं दिया गया यह कमी खली, वह सब विवरण यदि डाल दे तो सौ सुन्हार की एक लुहार की कहावत सही साबित होगी.

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  2. इसे भी कोंग्रेस में छुपे बैठे संघी नज़रअंदाज कर देंगे.

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  3. कोंग्रेस में छुपे बैठे संघी इसे पढकर चुप्पी साध लेंगे.अशोक जी की मेहनत को सलाम.

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  4. ज़रूरी सूचनाओं वाला अच्छा आलेख है. मगर इसमें विरोधाभासी बातें भी हैं. मसलन, मोदी द्वारा कॉर्पोरेट को सबसे ज्यादा रियायतें देने के बावजूद गुजरात विदेशी निवेश के मामले में अव्वल क्यों नहीं है? इसकी पड़ताल होनी चाहिए थी. साथ ही पड़ताल मोदी के उन दावों की भी होनी चाहिए थी कि क्या गुजरात में सचमुच स्माल स्केल इंडस्ट्री का ग्रोथ जबरदस्त है? क्या बिजली की कमी से जूझ रहे राज्य को वाकई मोदी ने बिजली सरप्लस बना दिया? क्या कृषि,पशुपालन और डेयरी के क्षेत्र में भी मोदी की सफलताएँ हैं?,इत्यादि. ये वो सवाल हैं जिनका उत्तर हमें चाहिए. बाकी चीजें तो पहले से ही सार्वजनिक रेल्म में हैं.

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  5. सार्थक आलेख!!! आँख-कान बंदकर एक सुर से विकास मॉडल का राग अलापने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ाया जाना चाहिए....शमशाद जी की बातों से सहमत कि इसमें गुजरात में मोदी काल में हुए साम्प्रदायिक घटनाओं का हवाला होना चाहिए.

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