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रविवार, 13 अप्रैल 2014

12 इयर्स ए स्लेव - इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापकार्न’ नहीं खा सकते

                              


आस्कर पुरस्कारों की घोषणा ने इस बार सबको चौंका दिया है | अपने 86 सालों के इतिहास में आस्कर-अकादमी ने पहली बार किसी ऐसी फिल्म को पुरस्कृत किया है, जो अमेरिकी इतिहास के उन काले पन्नों को पढने की कोशिश करती है, जिनमें सदियों लंबा नरसंहार दर्ज है | हालाकि यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए था कि दुनिया के इतिहास को खंगालने की कोशिश करने वाली हालीवुड की फिल्म-इंडस्ट्री अपने इतिहास के भीतर झांकने और उसे पढने की कोशिश करने वाली फिल्मों को भी पुरस्कृत करती रहती | लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका | और ऐसा ही क्यों, अकादमी ने तो उन प्रत्येक विषयों पर बनने वाली फिल्मों को कूड़ेदान के हवाले ही किया है, जिसमें अमेरिकी मानसिकता के द्वंद्व को जांचने की कोशिश की गयी थी | हालीवुड में वियतनाम युद्ध पर बनी फ़िल्में इस बात की क्लासिक उदाहरण है कि आस्कर-अकादमी की मानसिकता क्या है | मतलब अकादमी के इतिहास को देखते हुए इस बात का जश्न मनाया जा सकता है, कि उसने इस बार ‘दास-प्रथा’ पर आधारित फिल्म ‘ 12 इयर्स ए स्लेव’ को ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ का पुरस्कार दिया है | यह जानते हुए कि इस पुरस्कार की ज्यूरी में लगभग 94 प्रतिशत ‘श्वेत’ लोगों का कब्ज़ा है, इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |

हम सब जानते हैं कि अमेरिका में सदियों चली दास-प्रथा में लाखों लोगों के साथ किस अमानवीय तरीके का व्यवहार किया गया | 17 वीं शताब्दी से आरम्भ होकर 19 वीं शताब्दी तक चलने वाली इस नरसंहारक प्रथा में अफ्रीका से लाये गए लोगों की संख्या एक समय तो लगभग पचास लाख तक पहुँच गयी थी | आंकड़े बताते हैं कि 1865 में जिस समय इस दास-प्रथा का अंत किया गया, उस समय अमेरिका की पूरी आबादी लगभग चार करोड़ थी | और उस चार करोड़ में अश्वेत लोगों की संख्या लगभग पचास लाख के आसपास थी | हमें यह जानकर आश्चर्य होता है कि उन पचास लाख अश्वेतों में केवल तीन लाख ही ऐसे सौभाग्यशाली थे, जो ‘दासता’ से बाहर स्वतंत्र नागरिक का जीवन जीते थे | मतलब कुल अश्वेत आबादी की लगभग 90 प्रतिशत जनसँख्या ‘दासता’ के अधीन थी | और उन पर ढाये गए जुल्मों की फेहरिश्त भी बहुत लम्बी थी | हम इसे इस तरह से भी समझ सकते हैं कि ईसाईयत और लोकतंत्र के बड़े आदर्शों वाले उस देश में इन्हें मनुष्य मानने का प्रचलन तक नहीं था | इनके बारे में ऐसी धारणा थी कि ईश्वर ने इन्हें श्वेत लोगों की सेवा करने के लिए ही इस दुनिया में भेजा है | और फिर यह भी कि अश्वेत लोग ऐसे नहीं होते, जिन पर धर्म और लोकतंत्र के महान कानूनों को लागू किया जाए |

उन्हें एक तरह से संपत्ति के रूप में देखा जाता था | जिस समय तक वे इस रूप में उपयोगी होते थे, उन्हें जीने की सुविधा दी जाती थी | और अनुपयोगी होते ही उन्हें जीवन से बाहर से फेंक दिया जाता था | मार-पिटाई, महिला दासों के साथ यौन-उत्पीड़न, उन्हें सामान की तरह मंडी में बेचना-खरीदना और प्रतिरोध करने पर फांसी दे देना जैसे घटनाएं सामान्यतया प्रचलन में थीं | यूरोप और अमेरिका की चकाचौंध देखकर मुग्ध होने वाले लोगों को यह जरुर जानना चाहिए कि इन दोनों महाद्वीपों की बुनियाद किन रक्तिम आधारों पर निर्मित की गयी है | इन्हें बनाने में एक तरफ दुनिया के प्राकृतिक संशाधनों को लूटा गया है और दूसरी तरफ अपनी सुविधाओं के लिए दुनिया के नागरिकों की बलि चढ़ाई गयी है | इस औद्योगिक क्रान्ति की चमक में लाखों लोगों की खूनी शहादत भी शामिल है |

आईये फिल्म की तरफ लौटते हैं | सन 1841 में ‘सोलोमन नार्थप’ नाम का एक अफ्रीकी अश्वेत आदमी न्यूयार्क के एक ईलाके में अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रह रहा होता है | वह अमेरिका में निवास कर रहे उन चन्द खुशनसीब लोगों में से एक हैं, जो अफ्रीकी अश्वेत होते हुए भी ‘दासता’ के नरक से मुक्त है | लेकिन उसकी खुशनसीबी उस समय जाती रहती है, जब उसे धोखे से शराब पिलाकर अपहृत कर लिया जाता है और ‘जार्जिया राज्य’ का ‘प्लाट’ नामक दास बताकर ‘न्यू आरलेन्स’ राज्य में बेच दिया जाता है | वह लगातार यह बताता है कि उसके साथ धोखा हुआ है, और वह एक स्वतंत्र आदमी है लेकिन उसकी गुहार व्यर्थ हो जाती है | इसके बाद फिल्म ‘प्लाट’ के बहाने उन अमानवीयताओं को चित्रित करती है, जिसमें वहां की अश्वेत आबादी पिसती रहती है | हलाकि ‘प्लाट’ का मालिक थोड़ा अच्छा आदमी है, लेकिन इस अच्छा होने का मतलब यह नहीं है कि वह उसे आजाद कर दे | बल्कि यह कि वह उस पर थोडा कम जुल्म ढाता है, और कभी-कभी उसकी बात भी सुनता है | परिस्थितिवश जब उसे ‘प्लाट’ की जरुरत नहीं रह जाती, तो वह उसे दूसरे व्यक्ति को बेच देता है | ‘प्लाट’ उससे दया की भीख मांगता है, तो वह कहता है कि उसके लिए वह एक संपत्ति है और वह अपनी सम्पति को यूँ ही नहीं जाने दे सकता है |

नए मालिक के यहाँ ‘प्लाट’ का सामना भयानक क्रूरताओं से होता है | उसके साथ रहने वाले और ‘दास’ भी उसी चक्की में पिसते रहते हैं, जिसमें कि ‘प्लाट’ | काम कम करने पर कोड़े लगाना और महिला दासों के साथ बलात्कार करना तो जैसे रोज-दिन का काम है | बाद में एक साथी कनेडीयाई मजदूर की मदद से ‘प्लाट’ अपने राज्य में यह सन्देश भिजवाने में कामयाब रहता है कि उसे यहाँ पर अपहृत करके ‘दासता’ में धकेल दिया गया है | वह आजाद होकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट आता है |

फिल्म कई एक दृश्यों में बहुत प्रभावकारी है, जिनमें से दो-तीन का जिक्र करना यहाँ आवश्यक होगा | एक जगह जहाँ ‘प्लाट’ को खरीदकर लाया जाता है, एक महिला दास भी अपने बच्चों के साथ लायी गयी होती है | वह चाहती है कि उसे उसके बच्चों के साथ ही रखा जाए | मतलब एक ही व्यक्ति उसको और उसके बच्चों, दोनों को खरीदे | जबकि उस समाज में ऐसी संवेदनाओं के लिए बिलकुल भी जगह नहीं | उसे अपने बच्चों के साथ जिस दृश्य में अलग किया जाता है, वह इतना कारुणिक होता है कि उसे बेचने वाला भी असहज हो जाता है | वह ‘प्लाट’ को आदेशित करता है कि इस रुदन को ढकने के लिए वह वाइलिन बजाना आरम्भ कर दे | चीत्कार के मध्य वायलिन की धुन हृदयविदारक दृश्य उत्पन्न करती है | एक दूसरे दृश्य में ‘प्लाट’ का अपने साथी श्वेत व्यक्ति के साथ झगडा हो जाता है | वह श्वेत अपने साथियों की मदद से ‘प्लाट’ को फांसी दे देना चाहता है कि अचानक उसके मालिक का आदमी देख लेता है | वह ‘प्लाट’ के गले में डाला हुआ फंदा छोड़कर भाग जाता है | ‘प्लाट’ के हाथ पीछे बंधे हुए हैं, गले में फंदा कसा हुआ है, पैर किसी तरह जमीन पर बस लहराते हुए टिक भर पा रहे हैं | लेकिन किसी भी अन्य व्यक्ति के पास यह साहस नहीं है, कि वह जाकर उस रस्सी की काट दे | उसको काटने के लिए मालिक के आने का इन्तजार किया जाता है | साथी अश्वेत अगल-बगल में उसी रूटीन के साथ अपना काम कर रहे होते हैं, दुनिया उसी सामान्य तरीके से चल रही होती हैं, और ‘प्लाट’ तब तक घर के बाहर एक पेड़ से लटका अपनी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा होता है, जब तक उसका मालिक आकर रस्सी को काट नहीं देता | और वह भी किसी हमदर्दी के कारण नहीं, वरन इसलिए कि उसे ‘प्लाट’ को खोने में आर्थिक नुकसान है |

यह दृश्य इतने बढ़िया एंगिल से ‘लांग और क्लोज शाट्स’ के जरिये फिल्माया गया है, कि दर्शक इस बात के लिए बेताब होने लगता है कि कोई तो उसकी रस्सी काट दे | तीसरे दृश्य में एक अश्वेत महिला दास को उसका मालिक सजा देता है | कोड़े खाने की सजा | लगाने का काम  ‘प्लाट’ से कराया जाता है | महिला दास को नंगा करके एक पेड़ से बाँध दिया जाता है, जिसके पीठ पर कोड़े बरसाए जाने हैं | अपने निर्दोष साथी पर कोड़े बरसाने में ‘प्लाट’ की रूह कापने लगती है | लेकिन वह ना नहीं कर सकता | उसे वह अमानवीय काम करना ही पड़ता है | लेकिन उसके मालिक को लगता है कि ‘प्लाट’ जोर से कोड़े नहीं लगा पा रहा है, तो वह स्वयं कोड़े बरसाने लगता है, जब तक कि वह महिला दास बेहोश होकर जमीन पर गिर नहीं जाती | ऐसे अनेक दृश्य उस दौर के समाज की गवाही देते हैं, जिसमें एक तरफ तो इसको करने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में रंचमात्र का शिकन या अपराधबोध तक नहीं होता और दूसरी ओर इसको सहने वाले लोगों की परेशानियों का कोई अंत ही नही |

इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापकार्न’ नहीं खा सकते हैं | यह आपको बेचैन करती है, व्यथित करती है और मथती चलती है | उस व्यवस्था के प्रति, उस समाज के प्रति, उस ईश्वर के प्रति और इंसान के उस दिमाग के प्रति भी, जिसमें ऎसी अमानवीयताएं जन्म लेती हैं और जिससे खुराक ग्रहण करती हैं | फिल्म उस दौर की पूरी मनः-स्थिति को बताती है जिसमें अश्वेत लोगों को इतना अकेला कर दिया जाता है कि वे भी यही मानने लगते है कि उन्हें ईश्वर ने इसी अमानवीय कार्य के लिए इस धरती पर भेजा है | उन्हें जरा भी इस बात का अवकाश नहीं दिया जाता है कि वे इससे निकलने का प्रयास करें | फिल्म को देखकर सामान्यतया यह कहा जा सकता है, कि अकादमी ने इस फिल्म को पुरस्कृत करके साहसिक कार्य किया है, और अमेरिका को अपने भीतर झाँकने का एक अवसर भी दिया है |   

लेकिन इस सामान्य नजर से जैसे ही हम विश्लेष्णात्मक दृष्टि की तरफ पहुँचते हैं, इसमें कई पेंच फंसते हुए दिखाई देने लगते हैं | अकादमी में श्वेत लोगों का बर्चस्व रहा है, जिनकी भावनाएं उस देश में कुछ इस तरह से विकसित की गयी हैं कि वे अपने भीतर झाँकने की ईजाजत ही नहीं देती | बेशक वे जापान में परमाणु बम गिराने पर आहत नहीं होतीं, वे वियतनाम, ईराक और अफगानिस्तान में लाखों लोगों के नरसंहार पर भी साबुत बची रह जाती हैं, लेकिन इन विषयों पर फिल्म बनाने और उन फिल्मों को पुरस्कृत करने पर जरुर आहत हो जाती हैं | इसलिए हालीवुड में इन विषयों पर फिल्मों के बनने और अकादमी द्वारा उन्हें पुरस्कृत किये जाने की एक सीमा रेखा रही है | आस्कर विजेता फिल्मों की सूची देखकर आप अकादमी की उस सीमा रेखा को भी चिन्हित कर सकते हैं | मसलन दासता आधारित फिल्मों के लिए अकादमी के सामने ‘गान विथ द विंड’ एक सेट उदाहरण है | इसमें अकादमी की सूची भी समृद्ध हो जाती है, और श्वेत लोगों की भावनाएं भी आहत नहीं होतीं |

यह अनायास नहीं है कि अकादमी को किसी अश्वेत कलाकार को पुरस्कृत करने में ‘गान विथ द विंड’ के बाद लगभग पचास साल का समय लग जाता है | और ‘दासता’ आधारित फिल्म को पुरस्कृत करने में 86 साल | जबकि हालीवुड की उसी फिल्म-इंडस्ट्री में ’रूट्स’ ‘ग्लोरी’ , ‘एमिस्टेड’, ‘बिलव्ड’ ,और ‘जैन्गों अनचेंज्ड’ जैसी ‘दासता’ आधारित शानदार फ़िल्में बनती रही हैं | ‘ग्लोरी’ में पचास साल बाद कोई अश्वेत कलाकार पुरस्कृत होता है, तो इसलिए कि फिल्म यह बताती है कि अश्वेत लोग अपने ऊपर हुयी ज्यादतियों को भूलने के लिए तैयार हैं | ‘एमिस्टेड’ में पुरस्कार भी मिलता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति एडम्स के चरित्र को और ‘बिलव्ड’ में कास्ट्यूम डिजाइनिंग को | वहीँ ‘जैन्गो अनचेंज्ड’ का सामना ‘जीरो डार्क थर्टी’ और ‘आर्गो’ जैसी अमेरिकी मानसिकता को तुष्ट करने वाली फिल्मों से होता है, सो उसके पुरस्कृत होने का सवाल ही नहीं उठता |

अकादमी की इस मानसिकता के बीच यदि फिल्म ’12 इयर्स ए स्लेव’ पुरस्कृत हो जाती है, तो इसके अर्थों को समझना जरुरी है | पहला कारण तो यह है कि अकादमी अपने ऊपर लगने वाले आरोपों का जबाब देना चाहती है कि उसके पास अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं है | और दूसरा कारण यह कि उसकी नजर में यह फिल्म श्वेत लोगों की भावनाओं का खयाल रखती है | फिल्म में दो-तीन प्रस्थापनाएं ऐसी ही हैं | एक तो यह कि अश्वेत लोग भी अमेरिका के आजाद बाशिंदे थे, और उनका जीवन भी किसी आम अमेरिकी जैसा ही सुखमय और बेहतरीन था | दूसरा यह कि श्वेत लोगों के सहयोग से ही ऐसे लोग दास प्रथा से बाहर निकले | तीसरा यह कि वहां की व्यवस्था न्यायप्रिय थी, जो गलती से ‘दासता’ में धकेल दिए गये दासों का खयाल रखती थी | और सबसे बढ़कर फिल्म का सुखान्त एंगिल, कि जिसमें दर्शक उस विपदा के बीच से हंसता हुआ अपने घर वापस आता है |

हकीकत में हालात इससे काफी कठिन और बीभत्स थे | दासता गलती से थोपी हुयी इक्का-दुक्का घटना नही थी, वरन सोची-समझी एक नीति थी, जिसमें दूसरे के श्रम को बंधक बनाकर अपने लिए सुविधाएँ जुटाई जाती थी | 1841 के अमेरिका में अश्वेतों की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी दासता का नरक झेल रही थी | यह कोई अपवाद या कि गलती से हो गयी कार्यवाई नहीं थी, वरन उस समूचे अमेरिकी समाज के विवेकच्युत और पतनशील होने की दास्तान थी | उसे समाप्त करने के लिए कितने संघर्ष हुए, और कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, फिल्म इस विषय पर मौन साधे हुए ख़त्म हो जाती है | इस गंभीर मसले को अमेरिकी श्वेत दर्शकों के लायक बनाने में यह फिल्म अपनी दिशा से भटक सी गयी है | अंत आते-आते पूरा मामला इतना ‘रिड्यूस’ हो जाता है कि दर्शक इतिहास की उस दारुण कथा के अंत में ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौटता है | जाहिर है, इतिहास का यह एकांगी सच इसलिए अकादमी की पसंद बन सका |

हालाकि इन तमाम बातों के होते हुए आस्कर-अकादमी की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उसने ‘दासता’ आधारित फिल्मों को पुरस्कृत करने पर लगाया गया अघोषित प्रतिबन्ध हटा लिया है | सच तो ये है कि ’12 इयर्स ए स्लेव’ के पुरस्कृत होने से अकादमी का ही मान बढ़ा है, जिसने अपनी लगातार गिरती हुयी विश्वसनीयता को थोड़ा सँभालने की कोशिश की है | बेशक इसमें इतराने जैसा कुछ नहीं है, लेकिन इस दिशा में यदि अकादमीं ने कोई सार्थक कदम उठाया है, तो उसका आगे बढ़कर स्वागत तो किया ही जाना  चाहिए |   



प्रस्तुतकर्ता

रामजी तिवारी
बलिया, उ.प्र.
मो.न. 09450546312  


3 टिप्‍पणियां:

  1. किसी भी प्रकार की कला स्वयं में एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो हमारी संवेदनाओं और विचारों को किसी भी प्रकार के बंधन से मुक्त करती है और हमारे 'अनछुये मन' का विस्तार करती है. लेकिन कला के माध्यम से मिलने वाले इस 'स्पेस' को भी 'वर्चस्ववादियों' नें हाइजैक कर लिया..रामजी नें शब्दों को बगैर फेब्रिकेटेड किये एक बढ़िया लेख लिखा है .

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  2. Sharad Kokas प्रश्न केवल यह नहीं है कि फिल्म " 12 इयर्स अ स्लेव " अमेरिकी श्वेत दर्शकों के मन में अपने पूर्वजों द्वारा किए गए अपराध के प्रति अपराधबोध उत्पन्न करने में सफल है या नहीं इसलिए कि यह आवश्यक नहीं है अपितु फिल्म का उद्देश्य उस अश्वेत विरोधी मानसिकता को दूर करने के प्रति होना चाहिए जिसके शेष होने की सम्भावना वर्तमान समाज में अब भी विद्यमान है ।भले ही फिल्म इतिहास का एकांगी सच बयान करे लेकिन यदि वह उस लक्ष्य की दिशा में लेशमात्र भी सुगबुगाहट उत्पन्न करती है तो इसे पुरस्कृत होने के अपने मापदण्ड के अलावा भी दर्शनीय की श्रेणी में रखा जा सकता है ।

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  3. अच्छा विश्लेषण किया है आपने....बधाई!!
    पुरस्कार का अपना महत्व है पर अपनी समझ के अनुसार-
    कोई कृति पुरुस्कृत हो या नहीं पर उससे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि हर तरह की रचना हर वर्ग तक पहुंचे और उनकी चेतना को हर तरह की स्थिति, परिस्थिति और इतिहास का विश्लेषण करने में समर्थ बनाएं.....निश्चित ही पूरा परिदृश्य ही बदल जाएगा.

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