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शनिवार, 30 जनवरी 2016

सरहदों के पार- रोहित वेमुला : अभिनव श्रीवास्तव


रोहित वेमुला को गुजरे हुये दस दिन से भी ज्यादा हो गये हैं। इन दस दिनों में हममें से कुछ लोगों ने रोहित को कभी दुःख और अफ़सोस तो कभी क्षोभ और आक्रोश के साथ याद किया है। दुःख और अफ़सोस इसलिये क्योंकि रोहित जैसे स्वप्नद्रष्टा युवा की असमय मौत से हम कहीं भीतर ही भीतर बेहतर समाज बनाने के अपने साझा सपनों को नुचा हुआ महसूस कर रहे हैं, आख़िरी ख़त में रोहित ने अपने भीतर के द्वंद और अपनी पहचान से जुड़ी विडम्बनाओं का जैसा चित्र उकेरा है, उसका मर्म समझने के लियेr हमें संभवतः हजारों-हजार विमर्शों की आवश्यकता पड़े।

क्षोभ और आक्रोश इसलिये क्योंकि रोहित की मौत के लिये एक ऐसी सरकार और उसका सड़ा-गला तंत्र ज़िम्मेदार रहा जिसके राष्ट्रवाद के खांचे में रोहित के सपनों की कोई जगह नहीं थी। यूं भी सितारों तक की यात्रा करने की चाह रखने वाले रोहित के विशाल सपने एक ऐसे तंग राष्ट्रवाद में समा नहीं सकते थे जो रोहित के गुजर जाने के बाद भी उसकी दलित पहचान को नकारने जैसी निम्नतम और फूहड़ प्रवृत्तियों से खुद को संतुष्ट करता हो, जिस शासक वर्ग में रोहित के गुजर जाने का सामान्य मानवीय दुःख तो न हो, लेकिन इस बात का गर्व अवश्य हो कि उसने रोहित को गैर-दलित साबित कर अपने बचाव में तर्क गढ़ लिये हैं।

अपने समय के कड़वे यथार्थ और उसकी जकड़बंदी से आजाद होते हुये रोहित ने तो किसी से कोई शिकायत नहीं की, लेकिन एक राष्ट्र की सामूहिक चेतना में इतनी जगह नहीं कि वह अपने ही बीच एक स्वप्नदर्शी नौजवान की आत्महत्या की वजहों पर चिंतन-मनन कर सके। कुछ विचारों और टिप्पणियों से चोटिल और आहत हो जाने वाली सामूहिक चेतना आज स्वयं को आईने के सामने खड़ा कर ऐसे सवाल पूछने से डर रही है। जाहिर है कि महज झंडों, नारों तक सिमटे हुये राष्ट्रवाद से यह उम्मीद न तो पहले ही की जा सकती थी और न अब की जा सकती है।

हमें याद रखना होगा कि रोहित वेमुला ने जिन परिस्थितियों में घिरकर आत्महत्या की, वे परिस्थितियां जान-बूझकर पैदा की गयीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के एक सदस्य ने रोहित वेमुला और उनके चार साथियों पर मारपीट करने का आरोप लगाया था। हैदराबाद विश्वविद्यालय की पहली जांच में यह आरोप बेबुनियाद निकला, लेकिन विश्वविद्यालय में अप्पा राव पोडिले के नये कुलपति की हैसियत से आने वाले की बाद स्थिति बदल गयी। बगैर किसी नयी जांच के पुराना फैसला पलट दिया गया और रोहित समेत उनके चार साथियों की छात्रावास समेत सार्वजनिक जगहों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी गयी। वास्तव में नये कुलपति के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद पर रोहित और उसके चार साथियों को दण्डित करने का दबाव भाजपा नेता और केंद्र सरकार में श्रम रोजगार राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के कारण पड़ा जिन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताकर दखल करने की मांग की। बंगारू दत्तात्रेय की चिंता का कारण रोहित और उसके साथियों का आंबेडकर स्टूडेंट एसोशियेशन से जुड़ाव था। आम्बेडकर स्टूडेंट एसोशियेशन के सदस्य होने के नाते रोहित ने विश्वविद्यालय में ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ फिल्म के प्रदर्शन के दौरान हुये हमले के विरोध में एक जुलूस निकाला था, किसी भी सामान्य प्रगतिशील छात्र संगठन की तरह एसोशियेशन ने याकूब मेनन को फांसी दिये जाने की सजा का विरोध किया था। कुल मिलाकर ऐसी ही गतिविधियों के चलते संगठन पर राष्ट्रविरोधी होने का तमगा लगा दिया गया।

इतना लिख देने के बाद इस पूरे मामले में सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन की क्या भूमिका रही, इस पर कुछ कहने की जरुरत भी महसूस नहीं होती, रोहित की मौत से पहले भी सरकार और उसके प्रतिनिधियों की भूमिका साफ थी और उसके बाद रोहित की पहचान को नकारने की जैसी घ्रणित कोशिशों से यह और ज्यादा साफ होती चली गयी है, सरकार ही क्यों, हमारे समाज के एक खास हिस्से में कई बार दबी जुबान में और कई बार बेहिचक इस बात को लेकर स्वीकार्यता का माहौल है कि रोहित की आत्महत्या को दलित पहचान का मुद्दा न बनाया जाये। अमानवीयता की हद तक जाने वाली ऐसी दलीलों पर मुमकिन है कि हममें से कुछ लोग उद्वेलित हो उठें, लेकिन रोहित अपने दलित होने के कड़वे सामाजिक यथार्थ को उसके अनुभवों से एक ऐसे दायरे में चला गया था, जहां उसके लिये पाने-खोने, खुशी-रुलाई, हंसी-मायूसी के कोई मायने ही नहीं थे। शायद रोहित ने इसी को अपने भीतर का खालीपन कहा है- ऐसा खालीपन जिसमें न्याय मिलने या न मिलने की उम्मीद तो दूर अपना अस्तित्व भी कहीं खोया हुआ नजर आता है। रोहित की आत्महत्या को हम इतनी सहजता से कायरता का कृत्य नहीं कह पायेंगे, अपने दलित होने की लम्बी प्रताड़ना, बतौर विद्यार्थी अपना सब कुछ खोने और अंततः मौत को गले लगाने के लिये मजबूर होने के बावजूद रोहित ने तो ‘सबको माफ़’ करने की असाधारण हिम्मत दिखायी, लेकिन हमारे समाज और शासक वर्ग में इतना साहस भी नहीं कि उसकी दलित पहचान को स्वीकार कर सके! हम कह सकते हैं कि अपने आस-पास बन रहे ऐसे समाज और उसके खतरों का अंदेशा हमें भले न रहा हो, लेकिन संभवतः रोहित वेमुला को इस सामाजिक यथार्थ को ज्ञान बहुत पहले से था।

रोहित की आत्महत्या और उसके आख़िरी ख़त ने हमारे 66 साल के लोकतंत्र के सामने एक बहुत बड़ी लकीर खींच दी है. निस्संदेह, ऐसे अनेक मौके आये हैं जब विभिन्न समूह/लोग न्याय से महरूम कर दिये गये हैं लेकिन न्याय का न मिल पाना एक बात है और न्याय से नाउम्मीद हो जाना दूसरी बात। अगर 28 साल के एक शोधरत दलित नौजवान के न्याय की उम्मीद और सपनें इस कदर टूट जायें कि उसे लिखना पड़े कि- “मैं एक लेखक बनना चाहता था, कार्ल सगान की तरह सायेंस का लेखक, लेकिन अंत में मैं सिर्फ एक ख़त लिख पा रहा हूं”... तो हमें मान लेना चाहिये कि हम एक बेहद खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन हम शायद ही रोहित के इन शब्दों में छिपी असहायता और खालीपन से खिंची लकीर के मायने समझ पा रहे हैं। रोहित, तुम हमारी काल्पनिकताओं, हमारे शब्दों, हमारी भाषा और हमारी समझ को इतना छोटा बना गये कि हम तुम्हें समझने का दावा कभी नहीं कर पायेंगे..

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " अविभाजित भारत की प्रसिद्ध चित्रकार - अमृता शेरगिल - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. Bohut aacha ..complaint pr action nhi Lena tha ..vc ko ..dalit ke khilaf sarecomplaints jhoonthi hoti hain..ye SC se order kyun nhi nikalwa dete..jai..jatibaad..!!

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