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शनिवार, 27 मार्च 2010

किस युग में रह रहे हैं हम

समाज में ऐसे विचारों के लिए जगह क्यों है ?

  • अंजलि सिन्हा


खाप पंचायतें लोगों के निजी जीवन को निर्देशित करने के लिए पंचायत और महापंचायत करती हैं और सार्वजनिक रूप से कत्ल का फरमान सुनाती हैं। सोचने का मुद्दा यह है कि ऐसा कर पाने में वे सफल क्यों हो रही हैं ? इन ताकतों और विचारों पर प्रश्न खड़ा करने का वातावरण तैयार करने के बजाय स्थानीय लोग इसे मजबूती प्रदान करने में क्यों लगे हैं ? देखने में आया है कि हजारों की संख्या में एकत्रा होकर दिनभर और कई दिन की मीटिंग करते हैं और फिर फैसला लेेते हैं कि अन्तरजातीय या सगोत्रा विवाह करने पर जान गंवानी पड़ेगी। इतनाही नहीं वे अब अपने फरमानों को लागू करवाने के लिए कानूनी वैधता हासिल करने का भी प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयोजित एक ऐसे ही महापंचायत में घोषणा की गयी है कि वे हाईकोर्ट में अपील दायर करेंगे कि ‘‘हिन्दू विवाह अधिनियम 1956’’ में संशोधन करके सगोत्रा विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन पंचायतों को अपने निरंकुश आदेश को लागू करवाने में किसी कानूनी अड़चन का सामना न करना पड़े इसके लिए वे खाप पंचायतों को कानूनी वैधता के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पिछले 13 सितम्बर को शामली में उत्तर भारत के कई राज्यों के विभिन्न खापों के प्रमुखों ने एकत्रा होकर महापंचायत की। इसमें दो अलग अलग खापों के मुखिया हरिकिशन सिंह तथा महेन्द्र सिंह टिकैत ने सुर मिलातेे हुए सगोत्र विवाह करने वाले युगलों के लिए कत्ल का फरमान जारी किया। क्या ऐसे सार्वजनिक बयानों पर हत्या के लिए उकसानेवाली धारायें लगा कर कानूनी कार्रवाई नहीं किया जाना चाहिए ? विभिन्न न्यायालयों ने इन जनविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ फैसला भी दिया है जैसे कि जिन्द जिले के वेदपाल मोर को पंजाब एवम हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनिया के साथ उसके विवाह को वैध ठहराते हुए अपनी पत्नी को गांव से लाने का आदेश दिया था। लेकिन कोर्ट के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए गांववालों ने वेदपाल को पीट पीट कर मार डाला जब वह पुलिस को साथ लेकर वहां पहुंचा। जिन युगलों या परिवारों को ये पंचायतें गांव से निकाल देती हैं और कोर्ट उन्हें वापस गांव जाने का हक देता है तथा पंचायतों के व्यवहार के खिलाफ उन पर कार्रवाई के भी आदेश देता है लेकिन गांव में पुरूषप्रधान तथा दबंगई के वातावरण में सबकुछ निष्प्रभावी हो जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि न्याय के पक्षधर तथा जनतांत्रिक आवाजें गांव के अन्दर एकजुट नहीं हो पायी हैं। 8 जुलाई 2006 को भी एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अक्सर अपनी मर्जी से अन्तरजातीय या अन्तरधर्मीय शादी करनेवालों को मार डालने की ख़बरंे आती हैं। दरअसल यह क्रूर और सामन्ती दिमाग के लोगों द्वारा किया गया ऐसा जघन्य कृत्य है जिसके लिए कठोर दण्ड मिलना चाहिए। ’’ गृहमंत्राी पी चिदम्बरम ने भी अपनी टिप्पणी में कहा कि बिरादरी के नाम पर की जानेवाली हत्याओं को भारतीय कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है इसीलिए क्राइम रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों में भी इन हत्याओं को अलग से पहचाना नहीं जाता है और इन्हें पारिवारिक मामला बता कर दबा दिया जाता है।’’ कोर्ट और सरकार की ये प्रतिक्रियाएं सुन कर ऐसा प्रतीत होता है कि इतना बड़ा तंत्र जिसने अपने नागरिकों को न्याय दिलाने तथा सुरक्षा मुहैया कराने की कसमें खायी हैं वह निरीह हो गया है। वह पड़ोसी देशों को अपने हद में रहने के लिए दहाड़ें मारता है और आतंकवादी मंसूबों को धूल में मिला देने का हौसला और ताकत रखने की बात करता है, फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने में भी वह सोचता नहीं है तथा अपने हकों के लिए आन्दोलन करनेवालों के खिलाफ अपनी ताकत और संसाधन झोंक देने में भी संकोच नहीं करता है।

इतनी सारी ताकत रखने के बावजूद आखिर क्या वजह है कि वह खाप पंचायतों की जनविरोधी भूमिका तथा अमानवीय क्रूर गतिविधियों पर अंकुश लगाने में असमर्थ दिखता है ! वह यह संकेत नहीं दे पा रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश को तालिबानी रंग में नहीं रंग सकते हैं। उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी होगी।

मेरे खयाल से जिस तरह हमारे समाज के एक मुखर हिस्से में ऐसी ताकतों या उनकी हरकतों की स्वीकार्यता है, जो उन्हें शेष समाज पर भी अपना दबदबा कायम रखने में सहूलियत प्रदान करती है उसी तरह यह भी देखा जा सकता है कि इन सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी इन खाप पंचायतों के जरिये अपना आधार या दबदबा बनाये रखना आसान जान पड़ता है। हरियाणा में इन दिनों सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की चुनावी जीत में खाप पंचायतों की भूमिका को विश्लेषकों ने रेखांकित किया था, जिन दिनों जिन्द या झज्जर में खाप पंचायतों की निरंकुश कार्रवाइयों को लेकर विरोध तीव्र हो रहा था, उन दिनों कांग्रेस के युवा सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने इन्हें ‘सामाजिक परिघटना या सामाजिक परम्परा का हिस्सा’ कह कर मामले को हल्का करने की कोशिश की थी।

सगोत्र विवाह करनेवालों के खिलाफ मौत का फरमान जारी करनेवाले टिकैत जो किसानों के हकों के लिए सरकारो ंसे लड़ते रहते हैं वे नहीं चाहते कि बेटियों को अपनी पिता की सम्पत्ति में बराबर का हक मिले या युवा पीढ़ी अपनी मर्जी से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे।

जरूरत है कि ऐसी ताकतों और फरमानों के खिलाफ कानूनी सख्ती के साथ साथ आम स्थानीय लोग भी कमर कसें तथा देश भर की न्यायप्रिय तथा प्रगतिशील ताकतें भी इसमें मदद के लिए आगे आएं।


(अंजलि सिन्हा, ‘स्त्री अधिकार संगठन’ से सम्बद्ध हैं एवम दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती काॅलेज (सांन्ध्य) में कौन्सिलर के पद पर कार्यरत हैं , यह आलेख युवा दख़ल के ताज़े अंक में प्रकाशित)

2 टिप्‍पणियां:

  1. खाँप पंचायतें सामंती राज्य व्यवस्था का हिस्सा हैं जिन्हें वर्तमान पूँजीवादी जनतांत्रिक राज्य ने अभी तक नष्ट नहीं किया। इस तरह हमारे देश के कमजोर पूंजीवाद ने अपने कर्तव्य से मुहँ मोड़ लिया है। इस ऐतिहासिक कर्तव्य को वह अब पूरा करने में असमर्थ है क्यों कि उस के जीवन के लिए आवश्यक रक्त यहीं से उसे मिलता है। इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए देश की श्रमजीवी जनता को ही सामने आना होगा। इसी लिए श्रमजीवी जनता का एक कौम के रूप में संगठन आवश्यक है।

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  2. चिन्ता की बात है. इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को परम्परा और सामाजिक परिघटना का हिस्सा कैसे बताया जा सकता है? अपराध, अपराध होता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें अधिक प्रभावशाली हैं क्योंकि हरित क्रान्ति के बाद यहाँ के बड़े किसान अमीर हो गये हैं और लाठी-डंडे के जोर से कमजोर वर्ग को दबाकर रखा हुआ है. सरकार क्या बोलेगी? वो तो वैसे भी वोट बैंक के हिसाब से निर्णय लेती है. इन सब मामलों में सिविल सोसायटी एक भूमिका निभा सकती है.
    मैं भी इलाहाबाद के दिनों में स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी हुई थी, वैचारिक प्रतिबद्धता आज भी है. अंजलि दी को तभी से जानती हूँ और उनके ऐसे ही मुद्दों पर लेख हिन्दुस्तान में भी पढ़ती रही हूँ. पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पर उनकी समझ निस्सन्देह गहरी है. इस लेख में भी उन्होंने सामंतवादी समाज के पितृसत्तात्मक मूल्यों की ओर इशारा किया है.

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