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शुक्रवार, 26 मार्च 2010

स्वामी रामदेव को लाल सलाम



स्वामी जी! आप चर्बी गलाने, वीपी घटाने, शूगर मिटाने के आसन बताते हैं
जिस जोश से लगे हैं, लगता है
पूरे हिंदुस्तान को प्राणायाम से सूत के ही दम लेंगे

गुरूजी! संतों के अखाड़े में जिस सादगी और धड़ल्ले से एंट्री ली है आपने
आस्थामय हो रहा है टेलिविजनी समाज
पिल पड़ी है जनता कपाल भाति की हंफनी से खेलने को
बड़े बड़े संतों को सांप सूंघ गया लगता है

बाबा! अध्यात्म के बाघंबर से निकाल के
हथेली पर दवा की टिकिया की तरह धर दिया प्राणायाम को तुमने
चाहे खा लो चाहे खेलो
मल्टी नैशनल कंपनियों की ऐसी तैसी अलग से करते रहते हो
मुफ्त के मनोरंजन की तरह

मास्टर! क्या कर डाला है, जानते भी हो?
गूढ़ ज्ञान को झाड़ पोंछ कर
देह दुरुस्त करने के धंधे में पेल दिया

उस्ताद! लगे रहो
दो चार काम भले और कर डालो
सांस साधना सिखलाते हो
ध्यान लगाना भी सिखला दो
मुंबई की लोकल में लोगों का चढ़ना सरल बने कुछ
दिल्ली की बसों में चलने वाले भी गुर पा जाएं कुछ

एक अलग कैंप लगाना सत्ता के गलियारों में
सिर के बल उनको रखना होगा साल दस पांच
समझ बूझ से रहना लेकिन
वरना महा समाधि में तुमको ही वे धकिया देंगे

संतोष सिखाना उनको बाबा!
अकूत संपदा जिनके घर गड़ी हुई है
खुद के सिवा नहीं और किसी की पड़ी हुई है
सिखला सको तो यह भी उनको सिखलाना
कि भूख लगे तब ही खाना
जिसने दिया है दाना उसका शुकर मनाना

कोई बच जाए आसन भरपेटों से तो
उनको भी कुछ दे जाना
जिनके हिस्से आते हैं दुख के आगे दुख, दुख के पीछे भी दुख
किस विध उनका प्राण सधेगा ये तुम जानो

कुँडलिनी के चक्कर में पर मत उलझा देना
सुख का भाग जगे
बाबा ऐसी जुगत भिड़ाना.

4 टिप्‍पणियां:

  1. सही है. बाबा का चर्बी हटाने का ज्ञान तो उन लोगों के लिये है, जिनके पेट खा-खाकर अपनी परिधि का विस्तार कर चुके हैं. उनका क्या जो बेचारे भरपेट खाने को ही नहीं पाते.

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  2. कविता इस बहस में सार्थक हस्तक्क्षेप करती है..

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  3. मजा आया! कविता को पढ़ कर बाबा नागार्जुन याद आए।

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