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रविवार, 30 मई 2010

कचरे से बीनी एक ज़िंदगी

( कचरा बीनने वाली एक महिला की यह केस स्टडी हमें देवास से फैज ने भेजी है। अगर आप के पास भी विकास की विसंगतियों से जुड़ी ऐसी कोई बात है तो जनपक्ष के लिये भेजिये ashokk34@gmail.com पर)

तस्वीर यहां से
कचरे और झूठन से चलता जीवन - एक तस्वीर
  • फैज


‘जूली बाई’ महाराष्ट्र के भूसावल गांव से आकर पिछले 20-22 सालों से भोपाल में अपने परिवार के साथ रह रही हैं । रेल्वे स्टे्शन के निर्माण के चलते इनकी बसाहट को बाग मुगालिया विस्थापित किया गया । उस समय मुगालिया जाना आना एक मुष्किल भरा काम होता था क्योंकि धंधे पर आने-जाने मे 15 से 20 रू. खर्चा होते थे। अपने रहने के लिये जगह ना होना और आर्थिक अक्षमता के कारण सरगम टाकिज के बाजू में ये नाले के किनारे एक झोपड़ी बनाकर रहने लगी , इनसे पहले यहां सिर्फ एक झोपड़ी हुआ करती थी । झोपड़ी ऐसी की जिसमें 6’4 की जगह,बक्सा पेटी की लकड़ी के नाम मात्र के दरवाजे , बांस-बल्ली और पुट्ठे की दिवार तथा पन्नी की आधी ढ़ंकी छत। घर में क्या हो रहा है ये अन्दर से बाहर और बाहर से अन्दर साफ दिखता है । 

जूली के पति राजेन्द्र लोखंडे 1992 के दंगो के पहले न्यू मार्केट में हकीम होटल पर  खाना बनाने का काम करते थे , जहां गुजर बसर के लिए अच्छा पैसा मिल जाता था । किसी तरह के विवाद के चलते इन्हें वहां का काम छोड़ना पड़ा । बस यहीं से जूली बाई के एक नये संघर्ष की कहानी आरंभ होती है । राजेन्द्र ने सरगम टाकिज के पास ठेकेदारों के पास बेलदारी का काम आरंभ किया उस समय बेलदारी के 25 रूप्ये मिलते थे । कम पैसो में गुजारा ना होने के कारण सड़क निर्माण का काम करने लगे उस समय बाइपास का काम चल रहा था और दिहाड़ी पर काम करके वे 150-200 रूप्ये प्रति दिन कमाने लगे । बायपास निर्माण काम बंद हाने पर ये काम बंद हो गया । इसके बाद पलटू उर्फ राजेन्द्र ने हम्माली करना शुरू किया । आज भी पलटु कभी कभी हम्माली करता है । 
अपनी रोज की ज़रूरतो को पूरी न कर पाने और अन्य काम ना मिल पाने के कारण जूली बाई ने कचरा चुनना आरंभ किया । इस काम को आरंभ करते समय इनकेा शर्म आती थी जिसके चलते ये मुंह अंधेरे लगभग सुबह 4 बजे बीनने चली जाती और सूरज निकलने के पहले वापस लौट आती । इस काम में जूली के साथ सकारात्मक यह था कि इसका कोई परिचित या परिवार वाला यहां नहीं रहता था । धीरे-धीरे ज़रूरतों और साहस के चलते यह काम जूली बाई का मुख्य काम हो गया । वर्तमान में जूली बाई को यह काम करते हुए लगभग 15 साल हो गये हैं । ये आज भी अपने परिवार के साथ उसी जगह अपनी उसी झोपड़ी में रहती हैं । कचरा चुनकर संघर्ष पूर्ण जीवन चलाती हैं ।
जूली बाई के 6 बच्चे हैं । अनिता 19,संगीता 18,सुनिता 17,बीरजू 14,तनू 12,संजू 6 वर्ष । इनकी तीनो लड़कियों ने अपनी अपनी पसंद के लड़कों से शादी की है और यही बस्ती में रहते हैं। इनके दो लड़के बीनने का काम करते हैं और अपनी दैनिक खर्चों को पूरा करते हैं । पति हम्माली करते और ना करते तब भी दारू पीते हैं और गाना गाते रहते हैं। इनके पति स्वयं को पति साबित करने के चक्कर में अक्सर इन्हें पीटा करते थे,  बात करने पर अक्सर पिटाई का जस्टीफिके्शन भी दिया करते थे किन्तु जब से जूली ने इनकी पिटाई की है और दारू के पैसे देने बन्द किये हैं तब से इन्हें अपने को पति साबित करते नहीं देखा गया। जूली बाई भी दारू पीती है, कहती है ‘भैया कमाती हुं तो पीती हूं किसी के बाप का थोड़ी पीती हूं ।
जूली बाई कभी स्कूल नहीं गई, पर अपने सारे बच्चों को स्कूल भेजती थी। संगीता, सुनिता, को संजय गांधी स्कूल (पड़ौस का सरकारी स्कूल) में भर्ती कराया था पर स्कूल ने इन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। गंदे आते हो , गाली बकते हो ,लड़ते हो इत्यादी सम्बोधन देकर इस तंत्र ने सारे बच्चों को बाहर कर दिया, उनकी परिस्थिति को भी समझने का प्रयास नहीं किया। अब जूली बाई का कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता । सबसे छोटी लडकी संगीता कक्षा तीसरी तक पढ़ाई कर पाई है वह भी पांच सालों में । इसमें एक बड़ा तथ्य यह की ये सारे बच्चे पहली पीढी के सीखने वाले है । स्कूल इनकी ज़रूरतों को देख और समझ भी नहीं पाया । 

परिस्थिती ऐसी है कि एक जोड़ कपड़े में सारा साल गुजार देते हैं सिर्फ लड़कियों के पास साझा रूप में 2 जोड़ अतिरिक्त कपड़े हैं, जो बस्ती के किसी कार्यक्रम में कोई भी पहन लेती है । कभी किसी ने पुराने कपड़े दिये तो दूसरा कपड़ा मिला नही ंतो उसी को कभी साफ करके पहन लिया । त्योहारों पर तो ज़रूर नये कपड़े खरीदते हैं ।

जूली बाई और इनके बच्चे भी बीमार होतें है , किसी अन्य व्यक्ति की तरह मेडीकल स्टोर से दवाई खरीदी और खा कर अपनी बीमारी का इलाज कर लिया । सरकारी अस्पताल में डाक्टर भी हाथ पकड़ कर जांच नहीं करता । यहां कहते है ‘8-10 बच्चे पैदा कर लेते हैं बीमार नहीं होगें तो क्या ? बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखतें । इस पर जूली बाई कहती है - ये अपना काम करें नौकरी भी तो हमारी करते हैं, इनके भरोसे पैदा थोड़े किये हैं 9 महीने पेट में लेके घुमी हूं तब जाकर पैदा हुए हैं । जूली बाई को करिश्मा हास्पिटल का डाक्टर पसंद है क्योंकि वह हाथ पकड़ कर देखता है, बात करता है और इंजेक्शन भी लगाता है । इसके बदले 50 रू; लेता है तो क्या ?

जूली बाई को अक्सर पुलिस वाले भी परेशान करते हैं । आस पड़ोस में चोरी होने पर इनकी तलाशी लेनेे मे कहीं भी हाथ लगाते  है और थाने भी बैठा देते है । इनके या पति के साथ मारपीट होने पर रिर्पोट भी नहीं लिखते । भगा देते हैं - कहते हैं दारू पीकर झगड़ते हो और आ जाते हो रिर्पोट लिखाने, अभी लड़ लेगे और फिर एक हो जाएगे , एफ आइ आर लिख दी तो हमको कोरट कचेरी करना होगी । जूली अनुभव की इतनी पक्की हैं बताती हैं किसी काम में पुलिस को 100-500 रू दो तो वो किसी को भी थाने में बंद कर देगी और अपन को पकड़े तो 100-500 दे दो ।
ये जूली बाई के जीवन के वे आयाम हैं जिनसे जूली बाई प्रतिदिन गुजरती हैं । ये बहुत बोलने वाली , खुश मिजाज़,नीडर और जुझारू महिला हैं । अपने बीनने के काम के बाद खाना बनाना ,बच्चों की देखभाल और घर से जुड़े अन्य काम प्रतिदिन करती हैं, इसमें पति का खर्चा चलाना भी शामिल है। इन सबके बदले में पति से मार भी खाती है। अपने हर बच्चे को 2-10 रूपया रोज देती हैं।

आज से 4 साल पहले बीनते समय ज्योति टाकिज के पास ये ‘सौरभ ’ नाम के व्यक्ति से मिली । सौरभ एक स्वयं सेवी संस्था का कार्यकर्ता था वह वहां पार्किग लार्ड में बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाता था। ये उससे जिद्द करके अपनी बस्ती लाईं । जब बस्ती में 14 झोपड़ी हुआ करती थीं, आज बस्ती में 31 झोपड़ीयां है जिसमें 34 परिवार रहते है। बस्ती दिखाने के बाद सौरभ से कहने लगी -यहां भी बच्चे हैं इनको भी पढाया करा कोइ भी स्कूल नहीं जाता। कुछ समय बाद संस्था ने अपना एक अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र बस्ती में आरंभ किया। यहां की षिक्षिका ने पहली बार जूली बाई की 2 लड़कीयो और बस्ती की एक अन्य लड़की को पास के सरकारी स्कूल में भर्ती कराया। वर्तमान में बस्ती के पांच बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। बाकी 20 बच्चे संस्था के अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र पर पढने जाते हैं। पिछले वर्ष तक बस्ती की 5 लड़कियों ने 5वीं की परीक्षा दी जिनमें से 3 लड़कियां पास हुई ।

जूली बाई कभी लिखने पढने की प्रक्रिया में शामिल नहीं हुई मगर बस्ती की अन्य महिलाओं के पढने बैठने पर उनके साथ बैठती ज़रूर थी उस समय 6 महिलाएं केन्द्र पर कभी कभी पढने बैठती थी। ये अपने बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र पर जाने के लिये हमेशा बोलती और उनके ना मानने पर पिटाई भी कर देती थीं। वर्तमान में जूली बाई का 1 बच्चा अ.शि.केन्द्र पर पढने जाता है। मगर इनके कारण बस्ती के लगभग सभी बच्चे शिक्षण की प्रक्रिया में कहीं न कहीं शामिल हैं ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जनपक्षधरता बेबाक हो रही है...
    कई आयामों को सामने लाता आलेख...

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  2. अक्सर ऐसी जिंदगियों को हम दूर से ही देख कर रह जाते हैं.इस केस स्टडी के माध्यम से इनकी समस्याओं को समझने का मौका मिला।

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  3. ऐसी कितनी ही जूली हैं देश में... एक को उजागर करके सभी पर रोशनी डाली है... बहुतसे मुद्दे समक्ष आते हैं समाधान हमेशा की तरह दुर्लभ..

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