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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

‘नेरेटिव माध्यम होता है लक्ष्य नहीं' : पंकज बिष्ट ( लोकार्पण की रपट)

चित्र सबद से साभार
(पाठकों को गीत चतुर्वेदी के दो कहानी संकलनों के विमोचन की सूचना मैने कबाड़खाना पर दी थी। इस कार्यक्रम की एक रपट आई जिसमें समयांतर के संपादक और हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट पर जो अशोभनीय टिप्पणी की गई थी, वह हमारे साहित्य के इतिहास में शायद पहली बार ही की गयी इस स्तर की अभद्रता है। जनपक्ष की ओर से हम इसकी तीखी भर्त्सना करते हैं।
यहां हम अपने एक साथी द्वारा, जो कि वहां उपस्थित थे, भेजी गयी उस कार्यक्रम की विस्तृत रपट प्रस्तुत कर रहे हैं। यह फैसला पाठकों को करना है कि इसमें दिये गये वक्तव्य में कितनी 'मूर्खता' है।
साथ ही हम गीत चतुर्वेदी को उनके संग्रहों के प्रकाशन पर शुभकामनायें भी देते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनकी सक्रिय रचनाशीलता हिन्दी को समृद्ध करेगी)


27 जून को राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गीत चतुर्वेदी की कहानियों के दो संग्रहों सावंत आंटी की लड़कियां और पिंक स्लिम डैडी विमोचन किया गया। इंडिया इंटरनेशन सेंटर में आयोजित समारोह में पुस्तकों का लोकार्पण जानेमाने मराठी उपन्यासकार भालचंद्र नेमाड़े ने किया। नामवर सिंह ने अध्यक्षता और पंकज बिष्ट मुख्य वक्ता थे।पंकज बिष्ट ने अपने वक्तव्य की शुरूआत यह कहते हुए की कि बेहतर होता कोई आलोचक इन संग्रहों पर बोलता। रचनाकारों की रचनाओं को लेकर अपनी समझ होती है। इसलिए बहुत संभव है वह उस तरह की तटस्थता न बरत पायें जो किसी मूल्यांकन के लिए जरूरी होती है। उन्होंने अपनी स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि मैं दिल्ली से बाहर था और मुझे ये संग्रह 23 जून को ही मिले। गोकि मैंने इन में से कुछ कहानियां पहले भी देखी हुई थीं पर मुझे नये सिरे से उन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिला। फिर इस बीच मेरी व्यस्तता भी बहुत बढ़ जाती है। (उनका इशारा समयांतर की ओर था।) इसलिए मैंने उन दो कहानियों - ‘सावंत आंटी की लड़कियां’ और ‘पिंक स्लिप डैडी’ - पर अपने को केंद्रित किया है जिनके शीर्षकों पर ये संग्रह हैं। ये कहानियां एक तरह से उनकी विषयवस्तु के दो ध्रुव हैं। एक ओर मुंबई का निम्न मध्यवर्ग है और दूसरी ओर वहां की कारपोरेट दुनिया। उन्होंने कहा वैसे वह मुंबई पर लिखनेवाले हिंदी के पहले कथाकार नहीं हैं। इससे पहले शैलेश मटियानी ने मुंबई के उस जीवन की कहानियां लिखीं हैं जिसे अंडर बैली या ऐसी दुनिया कहा जाता है जो नजर नहीं आती।

उन्होंने आगे कहा गीत चतुर्वेदी का उदय हिंदी साहित्य के परिदृश्य में धूमकेतु की तरह हुआ है। वह कवि- कथाकारों की उस परंपरा से हैं जिस में अज्ञेय और रघुवीर सहाय आते हैं। हिंदी में लंबी कहानियां लिखनेवाले वे अकेले ऐसे कथाकार हैं जिसकी मात्रा छह कहानियों सेे दो संग्रह तैयार हुए हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है। वह गद्य में चित्रकार हैं। कहीं वह यथार्थवादी लैंड स्केप पंेटर की तरह हैं तो कहीं इप्रैशनिस्टिक चित्राकार मतीस की तरह कम रेखाओं में बहुत सारी बात कह देते हैं। बिष्ट ने दोनों कहानियों से पढ़कर ऐसे अंशों सुनाए भी। गीत की भाषा की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी भाषा में ऐसी सघनता और खिलंदड़ापन जो समकालीन लेखन में बिरल है। वह एक तरह से भाषा के शिल्पी हैं। यानी वह अपने वाक्यों को गढ़ते हैं। पिंक स्लिप डैडी को उन्होंने कारपोरेट जगत की ऐसी कहानी बतलाया जो हिंदी में अपने तरह की है। हालकी आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी हमें कारपोरेट जगत की उस व्यक्तिवादी दुनिया में ले जाती है जहां सफलता ही सब कुछ है। पर यह कहानी पूरी तरह पुरुष की दृष्टि से लिखी गई है जहां स्त्राी केवल एक उपभोग्य वस्तु है। पूरी कहानी मैनेजमेंट के लोगों की नजर से ही लिखी गई है। इसमें वे लोग नहीं हैं जो लोग वास्तव में मंदी का शिकार हुए थे।

सावंत आंटी की लड़कियां निम्नमध्यवर्ग की दुनिया की कहानियां हैं जहां परिवार अपनी बेटियों के विवाह को लेकर त्रस्त हैं। यह हिंदूओं की विवाह प्रथा की विकृतियों की ओर इशारा करती हैं। माता-पिता बच्चों को अपने जीवन साथी के चुनाव का अधिकार नहीं देना चाहते हैं और कहानी में लड़कियां इस अधिकार के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं। बड़ी बहन जो नहीं कर सकी उसे दूसरी बहन कर दिखाती है। पंकज बिष्ट ने कहानी का कथ्य बतलाते हुए कहा कि दूसरी बेटी अंततः उसी लड़के से शादी करती है जिसे पहले पिता चाहता था। पर पत्नी के दबाव में आकर वह तब बेटी की शादी दूसरी जगह करने को तैयार हो जाता है।कहानी पर उनकी पहली आपत्ति उसके अंत को लेकर थी।स्वाभाविक तौरपर ऐसी स्थिति में कम से कम पिता को इतना विषाद नहीं होना चाहिए था,जितना कि दिखाया गया है। बहुत हुआ तो ट्रेजिक-काॅमिक स्थिति हो सकती थी। कुल मिला कर यह प्रोग्रेसिव कदम था। पर लेखक ने स्थिति से अन्याय किया है। उनकी दूसरी आपत्ति थी कि यह कहानी दलित समाज की पृष्ठभूमि पर है जो कि जाति नामों से समझी जा सकती है। आखिर उन्होंने यहां हर लड़की को ऐसा क्यों दिखलाया है कि वह 13-14 वर्ष की हुई नहीं कि भागने को तैयार है। या उनका एकमात्र काम आंखें लड़ाना है? क्या वहां जीवन का और कोई संघर्ष नहीं है। इस समाज में सिर्फ हंगामा ही होता रहता है। पंकज जी ने कहा मैं नहीं जानता कि ऐसा जानबूझ कर हुआ है या अनजाने में पर अंबेडकर और नवबौद्धों तक के जो संदर्भ आये हैं वे कोई बहुत सकारात्मक नहीं है। उन्होंने कहा लेखकों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस तरह की स्थिति से सायास बचें।

उनकी आपत्ति विशेषकर ‘पिंक स्लिप डैडी’ के संदर्भ में अंग्रेजी शब्दों के अनावश्यक इस्तेमाल पर भी थी जिससे कि कहानी भरी पड़ी है। उन्होंने सवाल किया कि ऐसा क्यों है कि लेखक यौन संदर्भों का जहां-जहां खुलकर और अनावश्यक भी, वर्णन करता है पर उनमें जनेंद्रियों के लिए अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल है। लगता है जैसे वह स्वयं उन संदर्भों और शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अगर डर नहीं भी रहा है तो भी बहुत आश्वस्त नहीं महसूस कर रहा है और इसलिए अंग्रेजी की आड़ ले रहा है। जिन शब्दों को बोलने से लेखक को परहेज है उन्हें वह क्यों शामिल करना चाहता है। उनका उन्होंने कहा कम से कम मेरे जैसे आदमी को इस तरह के संदर्भों, अपशब्दों और गालियां का इस्तेमाल जरूरी नहीं लगता है। वैसे कला का मतलब जीवन की यथावत अनुकृति नहीं है। वह जो है और जो होना चाहिए उसके बीच की कड़ी होताहै।

उन्होंने कहा कि लंबी कहानियों और उपन्यासों के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली होती है। इस पर भी कहानी और उपन्यास में अंतर होता है। दुनिया में बहुत ही कम लेखक ऐसे हैं जिन्होंने लंबी कहानियां लिखी हैं। जो लिखीं हैं वह इक्की-दुक्की हैं। उदाहरण के लिए काफ्का की एक कहानी ‘मेटामाॅर्फासिस’ लंबी है। इसी तरह जैक लंडन की भी एक ही कहानी ‘एन आॅडेसी आफ दि नार्थ’ लंबी है। हां, माक्र्वेज की एक से अधिक लंबी कहानियां नजर आ जाती हैं। लंबी कहानियों में विषय वस्तु की तारतम्यता को बनाए रखनेके लिए अक्सर अतिरिक्त वर्णन या नैरेटिव पर निर्भर रहना पड़ता है जो पठनीयता को बाधित करता है। हिंदी में भी कुछ बहुत अच्छी लंबी कहानियां लिखी गई हैं। इन में दो मुझे याद आ रही हैं। एक है संजय सहाय की ‘मध्यातंर ’ और दूसरी है नीलिमा सिन्हा की ‘कुल्हाड़ी गीदड़ और वो...’उन्होंने कहा कि बेहतर है कि गीत चतुर्वेदी उपन्यास लिखें जिनकी उनमें प्रतिभा है। वैसे भी उनकी कहानी ‘पिंक स्लिप...’ उपन्यास ही है। हिंदी में पिछले साठ वर्ष से कहानी-कहानी ही हो रही है।जिस भाषा में उपन्यास नहीं है उसकी कोई पहचान ही नहीं है।

बिष्ट ने कहा कि लेखक पर जदूई यथार्थवाद का जबर्दस्त प्रभाव है। यह अभिव्यक्तियों में भी है और उनके चरित्रों में भी। गीत के कई चरित्र सनके हुए से हंै जैसे कि माक्र्वेज की रचनाओं में नजर आते हैं। उदाहरण के लिए ‘पिंक स्लिप डैडी’ की एक पात्रा पृशिला जोशी तो, जो तांत्रिक है, माक्र्वेज के एक कम चर्चित उपन्यास न्यूज आॅफ ए किडनैपिंग के नजूमी/तांत्रिक जैसी ही है। इसके अलावा सबीना, अजरा जहांगीर, नताशा, जयंत और चंदूलाल के व्यवहारों में भी यह सनकीपन साफ नजर आता है जो कि माक्र्वेज का ट्रेड मार्क है। इसी तरह तथ्यवाद की झलकियां भी देखी जा सकती हैं - इतने बज कर इतने मिनट और इतने सेकेंड या इतना फिट इतना इंच आदि।

अंत में उन्होंने कहा कलात्मकता रचनाओं के लिए जरूरी है पर अपने आपमें अंत नहीं है। नेरेटिव माध्यम है लक्ष्य नहीं। लेखन सिर्फ जो है वह भर नहीं है उसमें जो होना चाहिए वह भी निहित होता है। इसलिए हर रचना दृष्टि की मांग करती है। उन्होंने गीत चतुर्वेदी की एक पताका टिप्पणी की अंतिम पंक्तियों को, जो कहानी के हर खंड में है, उद्धृत कियाः
‘‘ऐसे में लगता है, भ्रम महज मानसिक अवस्था नहीं, एक राजनीतिक विचारधारा होता है।
‘‘क्या हम श्रम के राग पर भ्रम का गीत गाते हैं?’

और कहा, हमें इस पर रुककर सोचने की जरूरत है।
वाक्य सुंदर हो सकते हैं, पर उनकी तार्किकता का जांचा जाना जरूरी है।

जानेमाने मराठी उपन्यासकार भालचंद्र नेमाड़े ने पंकज बिष्ट की बात का समर्थन करते हुए कहा कि कहानी पर ज्यादा समय खराब करने की जरूरत नहीं है। मराठी में भी कहानी का बड़ा जोर था। कहानी लिखना आसान होता है और उसकी कामर्शियल वेल्यु ज्याता होती है। अखबारवाले उसे फौरन छाप देते हैं। पर वह जीवन को सही तरीके से नहीं पकड़ पाती। उन्होंने कहा मुंबई में कामगारों की जिंदगी के संघर्ष को आप कहानी में नहीं पकड़ सकते। मध्यवर्ग का लेखक अपनी खिड़की से बाहर जाती एक औरत को देखता है और फिर उसके अकेलेपन की कहानी गढ़ लेता है। उन्होंने मजाक में राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी से कहा कि वह कहानियां छापना बिल्कुल बंद कर दें। मराठी में हमने यही किया इसी वजह से अब वहां उपन्यास लिखे जा रहे हैं।

समारोह के अध्यक्ष नामवर सिंह ने कहा कि गीत चतुर्वेदी धमाके के साथ हिंदी के परिदृश्य में उभरे हैं। उनकी चार किताबें एक साथ आई हैं। इन में दो कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह है जो इसी वर्ष के प्रारंभ में आया था। उन्होंने चौथी किताब के रूप में गीत चतुर्वेदी के उस साक्षात्कार को शामिल किया जो उन्होंने कुछ समय पहले एक ब्लाग को दिया था और जिसे एक पुस्तिका के रूप में समारोह के असवर पर निकाला गया था और श्रोताओं को मुफ्त बांटा गया। पंकज बिष्ट द्वारा कही बातों पर कोई टिप्पणी न कर के उन्होंने गीत चतुर्वेदी को एक महत्वपूर्ण लेखक मानते हुए अपनी बात को उनकी एक अन्य कहानी ‘सिमसिम’ तक ही सीमित रखा। कहानी की तारीफ करते हुए उन्होंने इसके एक उपशीर्षक ‘मेरा नाम मैं’ को समकालीन संवेदना की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण बतलाया। नामवर सिंह ने कहानी का पक्ष लेते हुए यह जरूर कहा कि जो जिस विधा में चाहे लिखे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह कमोबेश भालचंद्र नेमाड़े और पंकज बिष्ट की इस बात से सहमत नहीं थे कि कहानी पर ज्यादा समय नहीं खराब किया जाना चाहिए।

14 टिप्‍पणियां:

  1. आप के भेजे मैं सबद पर पहुँचा हूँ। अनुराग वत्स ने बहुत ही बेहूदा टिप्पणी की है। यह उन के स्वयं के व्यक्तित्व को अधिक उजागर करती है। वैसे भी उन्हों ने बाद में टिप्पणी में कहा है....
    "दरअसल गिरावट के अन्तहीन मुकाबले चल रहे हैं"
    ...... आलेख में की गई उन की टिप्पणी (मूर्ख-वक्तव्य शुरू करते हैं और उसे लगभग हास्यास्पद होने की हद तक खींचते जाते हैं... (बलिहारी समझ की!!!)... ) देकर इस की सब से महत्वपूर्ण प्रविष्टि दे दी है। मेरा मत है कि उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार दे दिया जाए।

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  2. मुझे अब लगने लगा है की ब्लॉग जगत में भी खेमेबाजी का सा माहौल बनने लगा है. यह सचमुच दुखद है. आरोप प्रत्यारोप से दूर हम कुछ बेहतर लिखने पढने का संसार बना रहे हैं, जहाँ क्रिएटिव रिलीफ मिले. यहाँ भी ये सब होगा तो दिल तो दुखेगा ही. और ये कोई किसी पर एहसान नहीं कर रहा. मुझे दुःख है की ये सबद पर हुआ. सबद को मै प्यार से पढ़ती रही हूँ. गीत भी मेरे प्रिय लेखक हैं. क्यों आलोचना को इस रूप में लिया गया समझ में नहीं आया...

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  3. आपने तफसील से पंकज बिष्‍ट के वक्‍तव्‍य को रखकर अच्‍छा काम किया है. सबद के संपादक अपनी बात पर अडिग हैं. वो अपना यह मत पंकज का वक्‍तव्‍य देने के बाद देते तो बात कुछ और होती. फिर भी हम दूसरे को अपनी बात कहने का हक देंगे या नहीं. यह ध्‍यान तो रखना ही पड़ेगा कि उत्‍साह, दुस्‍साहस और दंभ में न बदल जाए. इसके अलावा जीवन में कुछ मर्यादाओं का पालन तो करना ही होता है.
    फिर भी क्‍या इस प्रकरण को इस पद की छाया में रखा जा सकता है या नहीं, विचार करें -
    छिमा बड़न को चाहिए छोटन को उतपात

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  4. ye jald se jald sthapit hone ki lalsa hai. jo in sabse ye karwa rahi hai. pankaj bisht hindi ke kuch gine chune smajhdar logo me se hain. doori aur garmi ke alawa us karakram me mere na jane ki ek vjh lokarpan se pahale ka lekhak aadi ka aatmprachar bhi tha jisse mujhe thodi koft hui thi. usne facebook par bhi karkram ka invitation card laga rakha tha. prachar ki yah bhookh bachkana hai aur unke sarokaro ki asliyat ki taraf ishara karti hai. yahi karaan shayad ek mamuli si asahamati ko lekar unke bhitar bhabhak uthi unki asahishnuta ke pichhe bhi hai

    r.chetankranti

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  5. ऐसे नयों को नाम पाने की कुछ ज़्यादा ही जल्दबाज़ी दिख रही है.ये आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते.यह सारा मामला प्रायोजित प्रचार पर टिका हुआ लगता है.हिन्दी में थोडी सी चमक मार कर बुझ जाने वाली ऐसी फुलझड़ियां बहुत हुई हैं.
    -राम प्रकाश

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  6. मुझे लगता है प्रचार में बुराई नहीं है. यूं भी हिंदी के लेखक एक खास ग्रुप में ही पढ़े और सराहे जाते हैं. मार्केटिंग वाली चीज नहीं है यहां. जबकि अंग्रेजी में मार्केटिंग काफी होती है. तो रचना को ज्यादा लोगों तक पहुंचाना बुरा नहीं है. बाकी प्रशंसा और आलोचना तो बाद की बात है. आलोचना को सर माथे लगाने का रिवाज तो अब खत्म ही हो चला है लगता है.

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  7. दरअसल अनुराग ने व्यक्तिगत आवेगों और समझबूझ के दायरे में बंध कर एक निहायत ही निजी ब्यौरा प्रत्स्तुत किया है- मैं इसे रपट मानने के पक्ष में नहीं हूँ. पंकज बिष्ट के वक्तव्य के लिए जिस विशेषण का प्रयोग लेखक ने किया है, उसी अर्थ को ध्वनित करने वाले किसी और शालीन शब्द का प्रयोग वहाँ किया जा सकता था....यह मेरी राय है....जिसे मैं कभी किसी पर भी थोपना नहीं चाहूँगा...अनुराग पर भी नहीं.....बस कहना चाहूँगा. अनुराग ने जो लिखा उसकी उन्होंने जिम्मेदारी ली है....जो कि उन्हें लेनी ही चाहिए....अपनी टिप्पणी में उन्होंने जो लिखा...उस शब्द की जगह बस उसे ही वे पोस्ट में भी लिख सकते थे....बाक़ी पाठकों पर छोड़ देते .....लेकिन यह उनका विवेक है.... जिससे उन्होंने काम लिया.....इस शब्द से मैं अपनी पूरी असहमति यहाँ व्यक्त करना चाहता हूँ. इस असहमति को अनुराग से बातचीत में भी मैंने व्यक्त किया था. ...किन्तु मेरी राय के बरखिलाफ़ उनके अपने तर्क थे....और जाहिर है अब भी होंगे ही.

    यहाँ जो कुछ पोस्ट किया गया है...वह रपट है....पर साथ उसके लेखक का नाम होना इसे और सार्थक, पारदर्शी और अर्थपूर्ण बनाता. अशोक मेरी गुजारिश है कि कृपया रपट भेजने वाले का नाम लिखें ताकि उसे भलीभांति स्थापित किया जा सके..

    गीत को बहुत सारी बधाई...शुभकामनाएँ....
    ***
    पुनश्च : वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट के कहे को ज़रा युवा कथाकार गीत के बहुचर्चित साक्षात्कार से जोड़ कर पढ़ें....बहुत कुछ हाथ लगेगा....ये मेरी गारंटी है.

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  8. सबद के नियामक ने इस पोस्ट की प्रतिक्रिया में एक पोस्ट अपने ब्लाग पर लगाई है, जो उनके पूर्वाग्रहों,सेलेक्टिव रीडिंग और असहिष्णुता से परिपूर्ण अहंकार को और स्पष्ट करती है।

    चूंकि उन्होंने जवाब अपने ब्लाग पर दिया है और वहां टिप्पणियां न छापने, छाप कर मिटा देने को हम पिछली पोस्ट पर ही नहीं, पहले भी देख चुके हैं, तो उसका जवाब हम इसी ब्लाग पर देंगे।

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  9. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. वक्तव्य अक्सर ही व्यक्तित्व का ही आईना होता है...

    इस तरह से सिर्फ़ यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि उक्त विशेषण सिर्फ़ वक्तव्य के साथ लगाया गया था...

    मतलब साफ़ है कि वहां विष्ट जी को निशाना बनाया जा रहा है...

    अनुराग जी का वक्तव्य भी इसी हिसाब से उनके स्वयं के व्यक्तित्व और चरित्र की पोल खोल रहा है...

    कुछ लोग सिर्फ़ आपसी वाह-वाही और महिमामंडन को ही आलोचना का मंतव्य समझते हैं...

    और साहित्य को औरों से श्रेष्ठ समझे जाने का जरिया...

    हद है...

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  11. मेरे विचार से अब यह बात बहस के बाहर है। हम यह तो नहीं कर सकते कि किसी को किसी के प्रति कमतम मान सम्मान के लिए बाध्य करें। क्या आपको लगता है कि पंकज विष्ट किसी अनुराग वत्स के कह देने से मूर्ख हो जाएँगे।
    इस पूरे प्रकरण को बीत जाने दीजिए। आपत्ति करना था किया गया। अनुराग ने नहीं माना तो नहीं माना।

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  12. Mere Priy Kavi Shireesh Maury JE Ko ab USTAD ka darja diya jana chahiye. Kya likhte hain..unhen mahan tippanni ke liye badhaii.

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  13. meri tippani bhi anurag ne hata di thi. main us karyakram me tha aour sab janata hon. anurag moorakh hai, use kuch nahi aata sivay thothe ahnkar ke.
    shashi bhooshan dwivedi

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  14. Behude aur badtameez Anurag ko gal par ek kas kar thappad.

    Wah lagta hai kisi nalee mein pala badha hai.

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