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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

सीढ़ियों की राजनीति और अहंकार की नुमाईश

एक ब्लाग पर 'एक दिन पुरानी स्मृति' का जो 'रेख' खींचा गया था…हम उसे रपट नहीं कहेंगे। यह तो दिख ही रहा था कि वह किस पर फोकस है और कौन प्रसंगवश आया है लेकिन हम यह नहीं पूछेंगे कि इस प्रसंगवश आने में दो लोग जी क्यों बन गये और तीसरा इस जी से महरूम क्यों रहा? हम यह भी नहीं पूछेंगे कि दो कहानियां पढ़कर आलोचना के कुछ शब्द कह देने वाले व्यक्ति का वक्तव्य अगर मूर्ख हो गया तो बस एक कहानी ( एक दिन की संगत में इससे ज़्यादा पढ़ पाना संभव भी नहीं था) पढ़कर प्रशंषा के पुल बांधने वाले जी महोदय एक विज्ञ आलोचक कैसे हो गये शायद प्रशंसा के शब्द विद्वत्ता के पर्यायवाची होते हैं। हम यह भी नहीं पूछेंगे कि प्रसंगवश की आड़ मे स्वीपिंग रिमार्क या फतवे ज़ारी कराना जिस 'अमेरिका' की परंपरा है, आपके उस पर क्या विचार हैं।

हिंदी की धंधई पर उस ब्लाग में ख़ूब टिप्पणी की गयी है। पुरानों पर तीर चलाते हुए। हम नयों की उस धंधई के बारे में कुछ नहीं कहेंगे जिसमें कुछ सर्टिफिकेट दाता पुरानों की चरणवन्दना की जाती है, बड़े करीने से चुप्पी और आवाज़ दोनों का इस्तेमाल किया जाता है, पुरस्कारों की गोट बिछाई जाती है, म्यूचुएल एडमिरेशन कमिटी बनाई जाती है, अपनी लाईब्रेरी के फोटुओं से सजे स्मृति रेख खींचे जाते हैं, सेलेक्टिव तरीके से जी और जी विहीन की श्रेणियां बनाई जाती हैं, बाज़ार साधा जाता है…और न जाने क्या-क्या किया जाता है! यहां कोई रुढ़ियां नहीं होती … बस सीढ़िया होती हैं…और सीढ़ियां बनाने की कला! जब कोई भी उनकी इस प्लान्ड यात्रा में जरा सा भी खलल पैदा करता है तो वे बिलबिलाते नहीं…सीधे काट खाने दौड़ते हैं…ख़ासकर तब जब सामने वाला किसी पुरस्कार का नियामक न हो!

हम 'तिनकों' के बरगद हो जाने के भ्रम और उसे स्थापित करने के लिये किये गये श्रम पर भी चुप रहेंगे।

रिपोर्ट छापने से पहले तथ्यों की जांच! मुझे लोगों के मुह में अपने शब्द डालने, अपने निष्कर्ष और फतवे ज़ारी करने वाले रेख नहीं लिखने थे…रपट यानि कि जिसने जो कहा वही पेश करना। ग़लत कहा तो भी। उसे सुधार कर किसी को महान साबित करना एक इमानदार रपट का उल्लंघन होता। शायद उस ब्लाग के नियामक भूल गये कि मैने इसे बाक़ायदा रपट कहा है तो बाद में इसे कुछ और कहने की सुविधा मेरे पास नहीं।

वैसे मार्केज़ की उस रचना में वह पात्र आता है कि नहीं? वह रचना क्या आत्महत्याओं की बस तथ्यपरक रिपोर्ट है या मार्केज़ ने उसे फिक्शनलाईज किया है? हम यह भी नहीं पूछेंगे…

यहाँ यह बता देना भी ज़रूरी है की जिस चीनी कवि की बात यहाँ की गयी है, उसका ज़िक्र पंकज जी के पूरे वक्तव्य में नही है...शायद बाद की बात में वह प्रसंग आया हो...तो एक अनुपस्थित प्रसंग के आधार पर जारी फतवे का उद्देश्य पाठक तय करें... साथ ही अगर वह ब्लॉग और उसके नियामक आडियो पेश करें तो यह भी सुना जा सकेगा कि मार्खेज की उस रचना को पंकज जी ने कहीं उपन्यास नही कहा...वह हमारे रिपोर्टर की गलती थी..वैसे क्या यह ज़रूरी है कि पंकज जी सहित कोई भी दुनिया के सारे लेखकों का बायोडाटा जाने तभी उसे सयाना कहा जाएगा?

सांवत आंटी की लड़कियां के ब्लैक ह्यूमर से मेरा इंकार नहीं, लेकिन अंबेडकर और नवबौद्धों के संदर्भ में पंकज जी ने जो सवाल उठाये हैं, उस पर 'विद्वान' नियामक चुप क्यों हैं? यहां तक कि असहमति भी दर्ज़ नहीं कराते। सनकीपन पर पंकज जी ने मार्केज़ की कहानियों का जिक्र किया था, उसे पूरे मैजिक रियलिज्म तक पसार कर उस ब्लाग के नियामक जो करते हैं, उसे हम मक्कारी कैसे कहें?

ऐसा क्यों है कि लेखक यौन संदर्भों का जहां-जहां खुलकर और अनावश्यक भी, वर्णन करता है पर उनमें जनेंद्रियों के लिए अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल है। लगता है जैसे वह स्वयं उन संदर्भों और शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अगर डर नहीं भी रहा है तो भी बहुत आश्वस्त नहीं महसूस कर रहा है और इसलिए अंग्रेजी की आड़ ले रहा है। जिन शब्दों को बोलने से लेखक को परहेज है उन्हें वह क्यों शामिल करना चाहता है। उनका उन्होंने कहा कम से कम मेरे जैसे आदमी को इस तरह के संदर्भों, अपशब्दों और गालियां का इस्तेमाल जरूरी नहीं लगता है। वैसे कला का मतलब जीवन की यथावत अनुकृति नहीं है। वह जो है और जो होना चाहिए उसके बीच की कड़ी होता है। पर अंतहीन पाज़ को भी सेलेक्टिव नहीं कहेंगे हम।


उन्होंने गीत चतुर्वेदी की एक पताका टिप्पणी की अंतिम पंक्तियों को, जो कहानी के हर खंड में है, उद्धृत कियाः ‘‘ऐसे में लगता है, भ्रम महज मानसिक अवस्था नहीं, एक राजनीतिक विचारधारा होता है।'' ‘‘क्या हम श्रम के राग पर भ्रम का गीत गाते हैं?’’ और कहा, हमें इस पर रुककर सोचने की जरूरत है। वाक्य सुंदर हो सकते हैं, पर उनकी तार्किकता का जांचा जाना जरूरी है।

टिप्पणी मूर्खता है या असहमति यह तो पाठक ही तय करें! इस पर चुप रहने की शिकायत क्या करना…

लंबी कहानियों वाले मसले पर उनके मनमाने अर्थग्रहण पर भी हम चुप रहेंगे। वह उसका यह अर्थ क्यों ग्रहण करें कि दुनिया में बहुत कम ऐसे कहानीकार हैं जिन्होंने इक्की-दुक्की से अधिक लंबी कहानियां लिखी हैं, वे हमारे ऊपर वाक्य सुधारने का आरोप लगा सकते हैं भले हम यह बतायें कि ऐसा पंकज जी ने मार्केज़ के इक्की-दुक्की से ज्यादा लंबी कहानियां लिखने को रेखांकित करने के लिये कहा है तथा हिन्दी में इसका साम्य गीत से स्थापित करने के लिये कि वह हिन्दी के इकलौते ऐसे कहानीकार हैं जिन्होंने इतनी लंबी कहानियां लिखी हैं। यहां तो वह लेखक की कोई आलोचना कर नहीं रहे बस उस फार्म की सीमाओं की ओर ध्यान दिला रहे हैं। यह सलाह देना की गीत उपन्यास लिखें…उनमें प्रतिभा है आपको नागवार गुज़रा तो गुज़रा, लेखक को तो शायद प्रेरणास्पद ही लगा होगा। अब आप इसे यह बना दें कि पंकज यह कह रहे हैं कि दुनिया भर में लंबी कहानियों की परंपरा ही नहीं, तो हम क्या कहें!

यहां यह भी कि ज्ञानोदय में छपी एक लंबी कहानी को तो ज्ञानपीठ ने उपन्यास के रूप में छापने का विज्ञापन भी कर दिया था, जिसे शायद गीत ने मना कर दिया। गीत को अपनी रचना को उपन्यास न मानने का पूरा हक़ है और उस पर किसी को एतराज भी नहीं, लेकिन आप क्या उस संदर्भ में ज्ञानोदय के संपादक और ज्ञानपीठ के कर्ता-धर्ता को मूर्ख कहेंगे?

अब सवाल नेमाड़े जी का। यह आपने माना कि उन्होंने कहा कि short story (हिन्दी में कहानी, मराठी में लघुकथा) नहीं छापी जानी चाहिये- तो आख़िर उस मौके पर यह कहने की ज़रूरत उन्हें क्यों पड़ी? जहां दो कहानी संकलन विमोचित किये जा रहे थे? फिर भी आप पूरी रिपोर्ट का आडियो लगाईये…हम जानना चाहते हैं…इमानदारी से जानना चाहते हैं। हमारे पास जो सूचना है, हमने लगाई…आप के पास पूरा आडियो है आप लगाइये…हमने पहले भी कहा है हम फैसला नहीं करना चाहते, फतवा नहीं देना चाहते … लोग पढ़ें…और फैसला करें…हमें अपनी व्यक्तिगत समझ से व्यापक पाठक समुदाय के विवेक पर ज़्यादा भरोसा है…आपको यह पांच दशक पुरानी बात लगेगी … पर हम क्या कर सकते हैं!

व्यक्तियों का आदर किया जाना चाहिये, रचना का आदर किया जाना चाहिये और असहमतियों का भी आदर किया जाना चाहिये। यहां तो हाल यह है कि ब्लाग पर विपरीत टिप्पणी करने वालों को सुनाया जाता है कि बहुत कम लोगों को छाप पाया हूं! मानो आपके यहां न छप पाने की कुंठा के अलावा कोई और परिचालक शक्ति हो ही नहीं सकती…मानों टिप्पणीकारों की रचनायें आपके दरवाजे पर स्वीकृति का इंतज़ार कर रहीं हों! यह आपकी उस मानसिकता को साफ़ करता है कि जो आपके प्रमोशन अभियान के साथ नहीं उसके ख़िलाफ़ आप अपनी जी विहीन कुण्ठा निकालेंगे और जो आपके इस अभियान में सीढ़ी बनने की क्षमता रखेगा उसके जी हज़ूरी वाले प्रशस्तिवंदना में आप कलमें तोड़ देंगे। हम इसे 'ऊपर' जाने की अदम्य लालसा से उपजी नैतिक गिरावट कहेंगे।

हम भी उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं कि जब सीढ़ियों का यह विमर्श हिन्दी के मंच पर उपस्थित हो पूर्वाग्रहयुक्त, हीनभावनाग्रस्त रेखों के बहाने अपना अहंकारी प्रलाप करने में सफल नहीं होगा। और जबतक ऐसा होता रहेगा हम विरोध दर्ज़ करते रहेंगे।

7 टिप्‍पणियां:

  1. मैं खुद उस कार्यक्रम में था. राजकमल का आयोजन होने पर भी वहां पच्चीस लोग से ज्यादा मौजूद नहीं थे. दिल्ली के अख़बार देखिये-बताइये किसमे उसकी रिपोर्ट छपी है. पच्चीस में से कितने राजकमल के लोग रहे होंगे सोच लीजिये. आखिर ये माजरा क्या है?

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  2. कितने लोग आये-गये, रिपोर्ट कहां छपी-नहीं छपी … यह अधिक मायने नहीं रखता…

    बेहतर हो कि 'उस' ब्लाग पर हुई बात पर ही केन्द्रित रखा जाय न कि किताब या लेखक को अंडरमाइन करने का प्रयास…

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  3. main kaii din se bahar hoon. is prasang ke bare men phone se hi suna aur ek mitr se hi apki post ko `ziddi dhun` par chipakvaya. ab net dekh raha hoon. bas ek line - chhichhorepan ko naii sanskriti ke roop men pesh karne ki koshish karne wale khud moorkh hain.

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  4. अशोक धैर्य बनाए रखें। यह संघर्ष एक दो पोस्ट या एक दो दिन नहीं लम्बा चलेगा। किसी भी स्थिति में अनुराग का कथन स्वीकार योग्य नहीं है। उन्हें पीरे प्रकरण पर माफी माँगनी चाहिए। पंकज जी का अपमान होना हिंदी की एक पूरी पीढ़ी का अपमान है। यह ठीक नहीं। उस तरह की भाषा में किसी के प्रति भी नहीं प्रयोग की जा सकती। जैसी सबद पर पंकज जी के लिए प्रयोग की गई है।
    इसका एक साफ मतलब है कि यदि विपक्ष में हो तो हम तुम्हें रहने नहीं देंगे।

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  5. मुझे अनुराग वत्स जी का साहित्यिक परिचय मालूम नहीं है, क्या आप बताएँगे? बोधिसत्व जी, अशोक जी ने कहीं अधैर्य का परिचय नहीं दिया है... ब्लॉगिंग को क्रिटिकल होना ही चाहिये. वरना सहमत लोगों के छोटे छोटे समूह यहाँ भी एक दूसरे की बड़ाई करते हुये दिखाई देंगे. महेश वर्मा, छत्तीसगढ़

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  6. महेश जी…मिलते ही परिचय बताऊंगा…अभी तो सबद भर का ज्ञान है।

    वैसे कोई सुधी पाठक भी सवाल उठा सकता है, असहमत हो सकता है…और बद्तमीज होने का हक़ किसी परिचयधारी को भी नहीं। हमारी आपत्ति उसी से थी।

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  7. साहित्य की सीढियों पर तुरत फ़ुरत चढ़ कर कुछ पा लेने की यह हड़बडी. भइया जरा संभल के !
    -संजय जगशा

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