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सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

महावीर राज़ी की कविता

अंतिम दिन है आज रामचंदर का
इस निर्माणाधीन भवन मेँ
काम का

बीत गए चुटकियोँ मेँ चौदह महीने
वनवास के से यहाँ
जैसे बीते थे चौदह साल
रामचंद्रजी के चुटकियोँ मेँ

पहले ढाँचा , फिर ढलाई-चिनाई
और अंत मेँ
पहाडी षोढषी के गात सा
चिकना प्लास्टर
बूँद बूँद कर डाल दिया जिसमेँ
बेहतरीन कारीगीरी का करारा छौँक

हसरत से देख रहा है रामचंदर
भवन की हर दीवार को
आँगन को , ओने कोने को
वनवास के दौरान जहाँ
होते रहे हैँ सृजित - विसर्जित
उसके भी
चित्रकूट , किष्किन्धा और रामेश्वरम

अब समय आ गया है कहने का
अलविदा

वह रामचंद्रजी नहीँ है
कि कोई अयोध्या खडी होगी बाहर
पलक पाँवडे बिछाए उसके लिए
उसकी नियति मेँ लिखा है
वनवास और पुनः पुनः वनवास

एक वनवास खत्म होते ही
कस लेनी होती है कमर
दूसरे के लिए तभी से
दो वनवासोँ के बीच की संकरी गली मेँ
नाचता रहेगा विस्थापन का प्रेत
थोडे समय के लिए

हसरत से देख रहा है रामचंदर
नवेली सी खडी अट्टालिका को
मुँह बाए

अचानक तनतना कर
गोद देता है करनी से अपना नाम
दीवार पर नीचे की ओर कोने मेँ
कि सनद रहे
नहीँ रहा तुम्हारा कौमार्य अच्छत अब
कि तुम्हारे आँगन की दरारोँ मेँ
गिर चुका है
एक मजदूर के स्वेद कण का
बजबजाता वीर्य

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता के लिए महावीर राजी को बहुत बहुत बधाई!!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक वनवास खत्म होते ही
    कस लेनी होती है कमर
    दूसरे के लिए तभी से
    दो वनवासोँ के बीच की संकरी गली मेँ
    नाचता रहेगा विस्थापन का प्रेत
    थोडे समय के लिए

    एक बेहतरीन शानदार कविता जीवन के यथार्थ का बोध कराती हुयी……………काफ़ी कुछ छुपा है इस कविता मे, एक दर्द की अनुभूति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut hi shaandaar kavita hai ashok...
    lagane ke liye tumhein salaam aur likhne ke liye kavi ko...

    उत्तर देंहटाएं

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