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शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

किस्सा कहानी का ...

परिकथा के युवा कहानी अंक में एक परिचर्चा कराई गयी है जिसमे युवा कहानी के तमाम पक्षों को लेकर सवाल पूछे गए हैं. अब दो कहानियों के बल पर कहानीकार बने मुझ जैसे 'जैक आफ आल' से भी जब ये सवाल पूछ ही लिए गए तो 'मत चूको चौहान' वाली अदा में हमने भी जवाब दे डाले जो इस अंक में छपे हैं.. आप भी देखिये..

पिछली शताब्दी के अंतिम द्शक का और इस शताब्दी के आरंभिक दशक में देश और दुनिया के पैमाने पर जो सबसे बड़ी चीज़ दिखती है वह है नव आर्थिक उदारवाद का पूरी दुनिया के पैमाने पर व्यापक रूप में स्वीकृत होते जाना। देश के भीतर भूमण्डलीकरण की नीतियों को लेकर शासक वर्ग के भीतर एक आम सहमति और वैश्विक स्तर पर अमेरिका की एक ध्रुवीय दुनिया के नेता के रूप में स्वीकृति ने एक ऐसा माहौल बनाया है जिससे वैकल्पिक सामाजार्थिक व्यवस्था का स्वप्न धुंधला पड़ा है। प्रतिरोध की ताक़तें बैकफुट पर आई हैं और फूकियामा का इतिहास का अंत बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश में सक्रिय लोगों का सच बना है। अगर साहित्य की बात करुं तो कलावाद का उत्तर आधुनिकता के रूप में पुनरुद्धार हुआ है। बाज़ार की ताक़तों के नाम पर जो खेल आर्थिक क्षेत्र में खेला जा रहा है उसका सीधा असर साहित्य के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। यह कालखंड इन्हीं प्रवृतियों के सतत प्रभावी होते जाने का काल है। नब्बे के दशक में जब इन नीतियों को लागू किया जा रहा था तो जहां बौद्धिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनको लेकर सशंकित था वहीं ख़ासतौर पर वाम बुद्धीजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसके जनविरोधी स्वरूप को लेकर कोई भ्रम नहीं था। कम से कम साहित्य में तो इनका सीधा समर्थन करने वाला शायद ही कोई था। लेकिन आज जब इनके प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं तो ठीक यही नहीं कहा जा सकता। आज न केवल युवा अपितु कई वरिष्ठ तथा भूतपूर्व समाजवादी तथा वामपंथी लेखकों तक में पूंजीवाद को लेकर एक स्वीकृति ही नहीं दिखाई देती अपितु किसी शोषण रहित समाज के स्वप्न और उसे फलीभूत करने में साहित्य की भूमिका को लेकर स्पष्ट संशय और अरुचि दिखाई देती है।

इस कालखंड में दुनिया भर में दक्षिणपंथ का उभार भी एक बेहद महत्वपूर्ण परिघटना है।

अगर बात देश की की जाये तो नब्बे का दशक हिन्दू कट्टरपंथ के उभार का समय रहा। नवसाम्राज्यवाद के साथ इसके अंतर्संबंध को समझना कोई मुश्किल काम नहीं। यहां इसका विस्तृत विवेचन तो संभव नहीं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनैतिक मंच भाजपा का नई आर्थिक नीतियों के प्रति समर्पण और भूमण्डलीकरण की नीतियों को आगे बढ़ाने में उसकी भूमिका कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है।

अगर इस कालखण्ड के प्रतिबिंबन का अर्थ साहित्य के माध्यम से इस नई सामाजार्थिक व्यवस्था के जनपक्षधर विवेचन और किसी स्पष्ट विकल्प की प्रस्तुति से है तो मुझे अफसोस के साथ कहना होगा कि युवा कहानी ही नहीं हिन्दी के पूरे साहित्य को इसमें कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। हमारा पूरा साहित्य बाज़ार के विरोध के नाम पर या तो पुरोगामी, यथास्थितिवादी और किसी आदर्श के विघटित होने पर छाती पीटता नज़र आता है या फिर ख़ासतौर पर युवा विशेषांको के माध्यम से आई युवा कहानीकारों की पीढ़ी की कहानियों में इसका दूसरा आयाम इन नई परिस्थितियों के स्वीकार और सेलीब्रेशन में दिखाई देता है। इसका कारण शायद हिन्दी का आवश्यकता से अधिक साहित्य केन्द्रित होते जाना है। साहित्येतर विषयों में हिन्दी का हस्तक्षेप लगभग नहीं के बराबर है। साहित्यकारों के बीच अर्थशास्त्र, दर्शन, इतिहास और दूसरे सामाजिक विषयों की समझदारी का जो भयावह अभाव दिखता है वह पब्लिक सेक्टर वाली अर्थव्यवस्था को समाजवाद मानने या फिर सेकुलरिज़्म के नाम पर गांधीवादी सर्वधर्म समभाव वाली अत्यंत सरलीकृत समझ के रूप में दिखाई देता है। कहानियां तो छोड़िये, मुझे कोई ऐसा उपन्यास भी नहीं दिखाई देता जिसमें इस नवसाम्राज्यवादी समय की एक मुकम्मल झलक देखी जा सके। जब-जब किसानों की आत्महत्या या ऐसे विषयों पर कहानी लिखने की कोशिश की गयी है वह या तो बिखर गयी है या फिर रिपोर्ताज जैसी हो गयी है। बाज़ार में रामधन जैसी जिस कहानी की बेहद चर्चा हुई है अगर आप उसकी विवेचना करें तो वह कतई प्रगतिशील कहानी नहीं है। हल-बैल और ट्रेक्टर के माध्यम से जो द्वंद्व वहां चित्रित हुआ है वह उस मशीन विरोधी सोच में हल होता है, मार्क्स जिसे दो सदी पहले ही विवेचित कर चुके थे। बाज़ार को सही तरह से न समझ पाने और इस तथ्य को समझने की कोशिश न करने की वज़ह से कि न तो सरकार का अर्थ समाजवाद है और न बाज़ार का पूंजीवाद, बल्कि असल समस्या बाज़ार से पैदा होने वाले मुनाफ़े के वितरण की है, इस तरह की कहानियों से साहित्य संसार अटा पड़ा है। परिकथा के युवा कहानी अंक में प्रकाशित वसंत त्रिपाठी की कहानी फंदा इसका दूसरा छोर है जो रिपोर्ताज़ में बदल गयी है और पी साईंनाथ के किसी आलेख का कहानीकरण लगती है।

`मेरे ही नहीं किसी भी रचनाकार के लिये उसकी परंपरा एक ऐसा तत्व है जिसकी आप चाहे जितनी आलोचना कर लें, उससे मुक्त नहीं हो सकते। हिन्दी का साहित्य चूंकि उपनिवेशवाद के दौर में देशी साहित्य के तौर पर विकसित हुआ इसलिये प्रतिरोध का एक तत्व हमेशा ही उसमें प्रभावी तौर पर रहा है। लेकिन इसकी अपनी सीमायें रही हैं और अपनी ख़ूबियां। मेरे लिये परंपरा का अर्थ केवल देशज़ भर नहीं है। मेरे लिये जितने प्रेमचंद, यशपाल, दूधनाथ सिंह, अमरकांत, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, गोरख, पाश, फैज आदि अपने हैं उतने ही गोर्की, टालस्टाय, चेखव ,मार्खेज, ब्रेख्त, नेरुदा, एंत्सेबर्गर, रिल्के, लोर्का, मार्टिन एस्पादा आदि भी। और इस परंपरा से मैने साहित्य को प्रतिरोध के एक हथियार के रूप में प्रयोग करना सीखा है। इस परंपरा ने मुझे एक बेहतर दुनिया का स्वपन देखना सिखाया है और यह भी कि एक रचनाकार के लिये यह स्वप्न देख भर लेना काफ़ी नहीं होता है बल्कि उसे पूरा करने के लिये हर तरह की लड़ाई के लिये तैयार होना और ज़रूरत पड़ने पर प्रत्यक्ष लड़ाईयों में भागीदार होना भी ज़रूरी होता है। इसी से जोड़कर अगर मैं आपके एक और सवाल का उत्तर दूं तो विचार बोध के बिना कोई साहित्य रचा जा सकता है ऐसा कम से कम मैं नहीं मानता। प्रश्न केवल यह है कि वह विचार बोध किस प्रकार का है? वह किसके पक्ष में है और किसके विरोध में? मेरा मानना है कि जनता के पक्ष में लिखा गया साहित्य ही सच्चा साहित्य होता है। और इस रूप में देशकाल की समझ के लिये, एक बेहतर और शोषणमुक्त समाज के निर्माण के लिये आज भी मुझे वामपंथ या मार्क्सवाद सबसे बेहतर विचार सरणी लगती है। इसीलिये इस विचार के प्रति तार्किक प्रतिबद्धता मुझे लेखन के लिये महत्वपूर्ण लगती है।

इस दौर में युवा कहानीकारों की कहानियों ने समकालीन होने के कारण मुझे हमेशा आकर्षित किया है और अक्सर निराश भी। तमाम ऐसे कहानीकार जिन्हें हमारे आदरणीय आलोचकों ने बड़े तामझाम से प्रस्तुत किया मुझे कभी नहीं रुचे। कारण बहुत से हैं…पर सबसे ज़रूरी बात यह कि इनमें मुझे कोई युगप्रवर्तक नवाचार नहीं दिखा। जैसे कुणाल सिंह की कहानी है सनातन बाबू का दांपत्य … मैं कभी नहीं समझ पाया कि इसे इतना महत्व क्यूं दिया गया? अगर सवाल शिल्प का है तो हमारे यहां इस दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसी उत्कृष्ट रचना पहले से ही उपलब्ध है और कथ्य के बारे में तो कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है। चंदन पांडेय की भी जिन कहानियों की इतनी वाहवाही हुई वे मुझे कभी उद्वेलित करने वाली नहीं लगीं। लगभग इसी समय सत्यनारायण पटेल की एक महत्वपूर्ण कहानी पनही आई थी, लेकिन आलोचकों का उस पर कोई ध्यान नहीं गया। इस कहानी का कथ्य अत्यंत मज़बूत है, हालांकि अस्सी के दशक की कहानियों का इस पर भरपूर प्रभाव है और भाषा के स्तर पर स्थानिकता का अतिमोह भी लेकिन यह कहानी निश्चित तौर पर अपने समय का एक ज़्यादा बड़ा सच कहती है। इसी प्रकार परिकथा के युवा कहानी अंक (अंक 18) में प्रत्यक्षा की एक कहानी ब्याह है जो अपनी भाषा और शिल्प के चलते ख़ुद को पढ़वा तो ले जाती है लेकिन कथ्य के स्तर पर यह एक प्रतिगामी कहानी है, टिपिकल अपर मिडिल क्लास की मानसिकता से ग्रस्त। तद्भव के अंक 21 में प्रकाशित प्रभात रंजन की कहानी बंडा भगत की उर्फ़ अथ कथा ढेलमरवा गोंसाई भी शिल्प के स्तर पर बेहद प्रभावित करती है लेकिन जब बात कथ्य की आती है तो कमज़ोर साबित होती है। इसके बरक्स मुझे अरुण कुमार असफलचरण सिंह पथिक, मेजर रतन जांगिड, कमल, कविता, विजय गौड़, अल्पना मिश्रा, नवीन नैथानी जैसे कथाकार ज्यादा प्रभावित करते हैं। अभी हाल में परिकथा के नवलेखन अंक में मज़कूर आलम और राकेश दूबे की कहानियों ने मुझे बेहद प्रभावित किया है। जितेन्द्र बिसारिया ने वागर्थ में प्रकाशित अपनी कहानी हाथी से उम्मीदें तो बहुत जगाईं थीं लेकिन उसके बाद उनकी कोई उल्लेखनीय कहानी मुझे नहीं दिखी। अपने अतिलेखन के बावज़ूद रंजना जायसवाल कविताओं की ही तरह कहानियों में भी कई बार चौंकाती हैं। इनके साथ अभी कथन के ताज़ा अंक में आई लक्ष्मी शर्मा की कहानी मोक्ष का नाम मैं ज़रूर लेना चाहूंगा जो इधर लंबे दौर में पढ़ी गयी कहानियों में मुझे लगभग अविस्मरणीय लगी। हालांकि जिस ओर आपका इशारा है, अपने समकालीनों से क्षमा याचना सहित मैं कहना चाहूंगा कि वैसी अविस्मरणीय किसी एक कहानी का नाम ले पाना मेरे लिये संभव नहीं है। किसी युवा लेखक द्वारा लिखी जो कहानी मुझे इसके सबसे करीब लगती है वह है गीत चतुर्वेदी की अपेक्षाकृत कम चर्चित कहानी सिम सिम, उद्धरणों और विस्तार के अतिमोह से अगर गीत बच पाते तो एक पारंपरिक चाय की दुकान और पुस्तकालय के माध्यम से जो कथा उन्होंने विकसित की है वह हमारे समय का एक अविस्मरणीय आख्यान बन सकता था। हालांकि ठीक यही बात उनकी दूसरी कहानियों के बारे में कह पाना संभव नहीं।

आने वाले समय की कहानी के बारे में एक पाठक के तौर पर मैं यह उम्मीद ज़रूर करता हूं कि वे शिल्प और तथ्य की जगह कथ्य को केन्द्र में लायेंगी। वे अपने समय को समझने और इसके बरक्स कोई प्रतिसंसार रचने के लिये आवश्यक राजनीतिक समझदारी विकसित करेंगी और हिन्दी के पाठक को वह मानसिक खुराक दे सकेंगी जो उसमें और-और पढ़ने की ललक जगाये। इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय जी के शब्द उधार लूं तो वह भविष्योन्मुखी हो।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. अपने जवाब में आप बिलकुल भी नहीं चूके हैं । समकालीन कहानी के जिस परिदृश्य का चित्रण आपने किया है उसकी वज़ह यही है कि इन कहानीकारों ने उस सार्वभौमिक परम्परा को आत्मसात नहीं किया जो विचार के रूप में पिछली की पिछली सदी से चली आ रही है । तात्कालिक परिस्थितियों में रचना का दबाव बहुत सारे तथ्यों को अनदेखा कर देता है । यह सेलेब्रेशन भी चलायमान है और इसमे ठहराव नहीं है । इस समाज नें विचारशून्यता की वज़ह से प्रगतीशीलता और जनवाद की परिभाषा ही बदल दे है जिसका प्रभाव इन रचनाओं में स्पष्त दिखाई देता है । ऐसा नहीं है कि प्रतिबद्ध रचनाकार उस तरह की रचनाएँ नहीं कर रहे लेकिन वे भी इस तामझाम से भरी प्रस्तुति के आगे भौंचक्के हैं ।
    फिलहाल इतना ही । जवाब बहुत सही दिये है और इसके लिए और बिना काट छाँट के छपे हैं इसके लिए भी बधाई ।

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  2. आपने काफी विचारोत्तेजक ढंग से अपनी बातें कही हैं. आपकी यह शैली मुझे प्रभावित करती है कि आप साफ़-साफ़ बात करते हैं.

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  3. समकालीन कहानी के परिदृश्य पर सटीक और जिम्मेदार टिप्पणी है. बड़े जोर से हल्ला मचा कर धमाके के साथ 'इंट्री'लेने वाले कई चमत्कारी अब वो चमत्कार साध नहीं पा रहे हैं, आप ने कुछ महत्वपूर्ण नाम और बातें रखी हैं.

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