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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

साहित्यिक –राजनीतिक पोस्टर - एक आधुनिक लोक-कला ·





यह आलेख परिकथा के लोक-कला विशेषांक में छपा है.


मैं एक पोस्टर हूँ
सड़क या दीवार पर
चिपका हुआ इश्तहार
तुम चाहो
सैनिक-ट्रक के नीचे कुचल सकते हो
फाड़कर चिन्दी-चिन्दी कर सकते हो!
पर उससे क्या ?
मैं ज़माने के दर्द को तो
बेनकाब कर चुका हूँ,
कुचल कर समझ लो
मर चुका हूँ!
                                                            (मुक्तिबोध की कविता ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ से)

कुछ कलाएं ऐसी होती हैं, जिनका बाज़ार नहीं होता या यों कहें जो अपने कद्रदानों से अपने काम के बदले पैसा नहीं मांगती. वे बहुत शोर भी नहीं करतीं. बस चुपचाप अपना काम करती रहतीं हैं. ज़ाहिर है उनकी ओर ध्यान भी किसी का नहीं जाता. उनके हिस्से न कोई पुरस्कार है न कोई चर्चा. असल में उन्हें अलग से किसी कला का दर्ज़ा न दिया जाता है, न वे मांगती हैं. उनके उद्देश्य दूसरे होते हैं और हासिल भी. पोस्टर और वाल राइटिंग भी ऐसी ही कलाएं है. आप इन्हें लगभग हर साहित्यिक जलसे में देखेंगे लेकिन इन्हें बनाने वाले कलाकार अनचीन्हे रह जाते हैं. अगर देखा जाय तो साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है. अलग-अलग शहरों में सैकड़ों कलाकार धन के पीछे भागते हुए ‘मुख्यधारा’ की पेंटिंग्स बनाने की जगह पूरी लगन और निष्ठा से वैचारिक पक्षधरता के साथ साहित्यिक और राजनीतिक पोस्टर्स बनाने में लगे हुए हैं. ब्रश के सहारे रेखांकनों के साथ लिखे हुए ये पोस्टर लिखित शब्दों को दुगनी अर्थवत्ता के साथ आम लोगों के बीच ले जाते हैं. मैं इन्हें हमारे समय की एक महत्वपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण लोक-कला की तरह देखता हूँ.


हिंदी में इस तरह के पोस्टर ठीक-ठीक कब बनने शुरू हुए, यह तो मैं पता नहीं लगा सका, लेकिन वर्तमान रूप में पोस्टर शायद इप्टा तथा प्रलेस की स्थापना के साथ ही बनने शुरू हुए.  उन दिनों सिनेमा नया-नया आया था और छापेखाने वाले सिनेमा के पोस्टर हिन्दुस्तान के शहरों में प्रचार-प्रसार के लिए खूब उपयोग होते थे. इन नए बने वामपंथी संगठनों ने प्रेरणा वहीँ से ली होगी. वैसे सांडर्स ह्त्या के प्रकरण में भी पोस्टर्स का ज़िक्र आता है, जिन्हें भगत सिंह के साथियों ने बनाया और चिपकाया था. ज़ाहिर है कि लेखक संगठनों के पास छापेखाने से पोस्टर्स छपवाने की जगह कलाकारों द्वारा बनाए गए सुरुचिपूर्ण पोस्टर आर्थिक और कलात्मक दोनों दृष्टि से मुफीद थे. वैसे कविता और कला का सम्बन्ध तो बहुत पुरानी और वैश्विक अवधारणा है. बंगाल के प्रसिद्ध  चित्रकार चित्त प्रसाद ने कविताओं पर आधारित तमाम पेंटिंग्स और रेखांकन बनाए थे. एम ऍफ़ हुसैन ने अपनी कविता ‘पंढरपुर की औरत’ पर आधारित एक अद्भुत पेंटिंग बनाई है. हैदर रजा की पेंटिग्स में भी शब्दों का प्रयोग खूब दिखाई देता है. गोगी सरोज पाल और मंजीत बावा के यहाँ भी शब्द और चित्र की व्यापक आवाजाही है. पत्रिकाओं में रेखांकन भी साहित्य और कला को करीब लाते हैं तथा दोनों की अर्थवत्ता बढाते हैं. पत्रिकाओं में रेखांकन की शुरुआत यशस्वी संपादक भाऊ समर्थ ने की थी. बाद में के के हेब्बार जैसे  कलाकारों ने पत्रिकाओं के लिए खूब रेखांकन बनाए. धर्मयुग के जमाने में इसके संपादक धर्मवीर भारती तो बाक़ायदा रचनाएँ भेज कर उनके अनुरूप चित्र बनवाया करते थे. जाने-माने प्रतिबद्ध कलाकार अशोक भौमिक के चित्रों से तो साहित्य जगत बखूबी परिचित है ही. उनके राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना से भरे रेखांकन न जाने कितनी किताबों के आवरण बने हैं. जाने-माने कवि कुबेर दत्त ने भी प्रचुर मात्रा में कविताओं पर आधारिट रेखांकन और पेंटिंग्स बनाई हैं. खैर बात पोस्टर्स की हो रही थी.


मुक्तिबोध की कविता का जो हिस्सा मैंने ऊपर पोस्ट किया है, वह बताता है कि एक जन माध्यम के रूप में पोस्टर किस तरह की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. नक्सलबारी आन्दोलन और उसके पहले भी मजदूर आन्दोलनों में पोस्टर्स और वाल राइटिंग राजनीतिक कार्यवाहियों का ज़रूरी हिस्सा रहे. सस्ते सफ़ेद काग़ज़ों पर लाल-काले अक्षरों में लिखी कवितायें और राजनीतिक नारों की इबारतें रात के घुप अँधेरे और पुलिस-गुंडों के खौफ के बीच राजनीतिक कार्यकर्ता फैक्ट्रियों/ शहरों/कालेजों की दीवारों पर चस्पा हो जाती थी या फिर सीधे दीवार पर ही उन्हें कूची से उकेर दिया जाता और सुबह जनता के बीच ये सन्देश जब पहुँचते तो उनके दिलो-दिमाग में यह सब लम्बे समय के लिए पैबस्त हो जाता. जनता की राजनीतिक चेतना के उन्नयन में इनकी भूमिका भले इतिहास के पन्नों में दर्ज न हो, बेहद अहम रही है. इसका एक ताज़ा उदाहरण उत्तराखंड के आन्दोलन के दौरान जनकवि अतुल शर्मा की कविताओं पर बने पोस्टर हैं जिन्होंने उस आन्दोलन को आगे बढ़ाने में एक ज़रूरी भूमिका निभाई और उसे धार दी.


मेरे अपने निर्माण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है. उच्च शिक्षा के लिए गोरखपुर आने के बाद मेरी नज़र जब विश्विद्यालय की दीवारों पर लिखे ‘भगत सिंह की बात सुनो, इन्कलाब की राह चुनो’ जैसे नारों और मुक्तिबोध, पाश, कुमार विकल. आलोक धन्वा जैसे कवियों की कविताओं के तथा भगत सिंह के उद्धरणों के पोस्टर्स पर पड़ी तो वहाँ से दुनिया को देखने का एक बेहतर और जनपक्षीय नज़रिया पहली बार मेरे सामने आया. संगठन से जुड़ने के बाद इन पोस्टर्स को बनाने वाले प्रमुख कलाकार साथी आज़म अनवर से मुलाक़ात हुई और तब पता चला कि साधारण से दिखने वाले इन पोस्टर्स के पीछे कितनी लगन, कितना श्रम और कितना समर्पण ज़रूरी होता है. एक हायर सेकंडरी स्कूल के कला अध्यापक आज़म अनवर एक बेहद ज़हीन कलाकार हैं. उन्होंने ढेरों पेंटिंग्स बनाई लेकिन संगठन से जुड़ने के बाद उन्होंने लगभग पूर्णकालिक रूप से पोस्टर्स बनाने का ही काम किया. और ये पोस्टर्स भी उनकी निजी संपत्ति नहीं संगठन के होते थे, इन पर कहीं उनका नाम नहीं होता. हालत यह थी कि संगठन और उनसे अपरिचित लोग जब कार्यक्रमों में इनकी प्रसंशा किया करते तो आज़म भाई शर्माए, सकुचाये से पीछे खड़े रहते. और ऐसे प्रतिबद्ध कलाकार देश भर में मिल जायेंगे.

अशोक नगर के पंकज दीक्षित को तो लोग कविता पोस्टरों के लिए ही जानते हैं. इप्टा से जुड़े पंकज भाई के पोस्टरों की प्रदर्शनियाँ देश भर में लगी हैं. कम लोग जानते हैं कि उन्होंने देश की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में रेखांकन बनाएं हैं तथा अनेकों बार उनके कवर तैयार किये हैं. इप्टा अशोकनगर और इप्टा मध्यप्रदेश ही नहीं प्राची, प्रलेस जैसे तमाम संगठनों की राजनीतिक पुस्तिकाओं के आवरण उनके रेखांकनों से बने हैं. आमतौर पर काले काग़ज़ पर ब्रश से बनाए गए उनके पोस्टर्स की सबसे बड़ी खूबी उनके मानीखेज रेखांकन ही होते हैं. समकालीन और पुराने कवियों में से शायद ही कोई ऐसा महत्वपूर्ण नाम होगा, जिसकी कविताओं पर आधारित पोस्टर उन्होंने न बनाए हों. भगत सिंह जन्म शताब्दी के अवसर पर भगत सिंह के उद्धरणों की उनके द्वारा बनाई गयी पोस्टर सीरीज देश भर में प्रदर्शित हुई थी. ऐसा एक और नाम है रावतभाटा, राजस्थान के रवि कुमार का. रवि पोस्टर को लेकर पैशन से इतने ज़्यादा भरे हुए हैं कि अपने कवि होने को उन्होंने लगभग भुला ही रखा है. विकल्प सांस्कृतिक मंच से जुड़े रवि एक प्रतिबद्ध वामपंथी कलाकार तथा कवि हैं. उन्होंने अपने पोस्टर्स के लिए एक अलग स्टाइल चुनी है. आम तौर पर सफ़ेद कागजों पर चुभते हुए शब्दों को उकेरने वाले रवि भी रेखांकनों का खूब प्रयोग करते हैं. अपनी पैनी राजनीतिक समझदारी के चलते वह चटख रंगों का भी कविता के अनुकूल प्रयोग बड़ी कुशलता से करते हैं तो श्वेत-श्याम पोस्टर्स में भी अर्थ भर देते हैं. हाल में जाने-माने कहानीकार स्वयंप्रकाश की कहानियों पर केन्द्रित चित्तौड़ के एक आयोजन में जिस तरह बेहद कम समय में उन्होंने स्वयंप्रकाश की कहानियों के पोस्टर तैयार किये और खुद उन्हें लगाने चित्तौड़ पहुंचे, वह उनके गहरे समर्पण की मिसाल है. उनके पोस्टर की एक बड़ी खूबी पठनीयता है. वह आम तौर पर बड़े अक्षरों का प्रयोग करते हैं जिससे दूर से ही पोस्टर पढ़ा जा सके. जबलपुर के विनय अम्बर ने भी पोस्टरों के क्षेत्र में काफी प्रयोग किये हैं. पिछले साल उन्होंने तमाम कवियों की कविताओं के हिस्से चुनकर हस्तनिर्मित कागज़ पर नव वर्ष के खूबसूरत बधाई कार्ड बनाए. इन दिनों उज्जैन में रह रहे चित्रकार मुकेश बिजौले ने भी कविता पोस्टर के क्षेत्र में महत्वपूर्ण किया है. इनके अलावा दीपक कुमार, बी मोहन नेगी, श्रीकांत आप्टे, महेश वर्मा, कैलाश तिवारी, अरुण मिश्र, धीरेन्द्र, अमज़द एहसास, के रवीन्द्र जैसे कलाकार भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. जसम से जुड़े कलाकारों ने भी बहुत अच्छे पोस्टर बनाए हैं.


इधर कम्प्युटर के आने के बाद कई कलाकारों ने नई तकनीक का बेहतर प्रयोग किया है तो कुछ ने उसका सहारा लेकर बिना इस विधा की मूल भावना को समझे थोक के भाव से असंगत चित्रों के साथ जिस तरह से भोंडे अक्षरों में कवितायें चिपकानी शुरू की हैं, वह एक खतरनाक प्रवृति है. उन्हें देखकर मुझे कवि मित्र हरिओम राजोरिया का सुनाया वह किस्सा याद आता है जब एक नए-नए उत्साही कलाकार ने (जो अब परिपक्व और गंभीर कलाकार बन चुके हैं) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता जूता का कविता पोस्टर बनाते हुए एक बड़ा सा जूता बड़ी मेहनत से बनाया था. कविता पोस्टर बनाना न तो इतना आसान काम है, न इतना गैर-जिम्मेदाराना कि गूगल पर सर्च किये हुए किसी चित्र को चिपका कर और कविता को किसी कथित कलात्मक फांट में टाइप कर किया जा सके. यह एक तरफ कला की गहरी समझदारी माँगता है तो दूसरी तरफ साहित्य तथा विचार  में भी उतनी ही गहरी पकड़. पूरी कविता या कहानी से एक छोटे से हिस्से का चुनाव, फिर उसके भावों के अनुरूप रेखांकन बनाना और शब्द तथा रेखांकन के बीच ऐसा तालमेल बिठाना कि कविता का मूल सन्देश लोगों तक और अधिक अर्थवत्ता के साथ पहुँचे, यह किसी तकनीकी विशेषज्ञता का नहीं बल्कि वैचारिक समर्पण का मामला है. 

ज़ाहिर है कि देश भर में अनाम रहकर कलाकारों द्वारा किये  गए कामों का मूल्यांकन कर पाना किसी एक लेख के बस की बात नहीं है. ये काम किसी प्रसिद्धि के लिए नहीं बल्कि सामूहिक कार्यवाहियों की हिस्सेदारी के रूप में किये जाते हैं तो मैं भी इन सभी कलाकारों को सामूहिक रूप से इस आधुनिक लोक-कला की मुहिम के लिए सलाम करना चाहता हूँ और साहित्य के मठों पर बैठे बड़े लोगों से अपील करना चाहता हूँ कि इन कलाकारों के कामों को महत्त्व देने के लिए, जनता तक पहुँचाने के लिए और नए-नए कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए ज़रूरी क़दम उठाये जाएं. साहित्य के लगातार जनता से दूर होते जाने के इस दौर में ये पोस्टर साहित्य और जनता के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं. हालांकि अपनी अदम्य जीजिविषा से संचालित ये कलाकार इन सबके बिना भी चुपचाप अपना काम कर ही रहे हैं. बकौल मदन डागा - मैं एक पोस्टर हूँ/ सड़क या दीवार पर/ चिपका हुआ इश्तहार/ तुम चाहो /सैनिक-ट्रक के नीचे कुचल सकते हो/ फाड़कर चिन्दी-चिन्दी कर सकते हो!/ पर उससे क्या ?/मैं ज़माने के दर्द को तो/ बेनकाब कर चुका हूँ/ कुचल कर समझ लो/ मर चुका हूँ!

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

किस्सा कहानी का ...

परिकथा के युवा कहानी अंक में एक परिचर्चा कराई गयी है जिसमे युवा कहानी के तमाम पक्षों को लेकर सवाल पूछे गए हैं. अब दो कहानियों के बल पर कहानीकार बने मुझ जैसे 'जैक आफ आल' से भी जब ये सवाल पूछ ही लिए गए तो 'मत चूको चौहान' वाली अदा में हमने भी जवाब दे डाले जो इस अंक में छपे हैं.. आप भी देखिये..

पिछली शताब्दी के अंतिम द्शक का और इस शताब्दी के आरंभिक दशक में देश और दुनिया के पैमाने पर जो सबसे बड़ी चीज़ दिखती है वह है नव आर्थिक उदारवाद का पूरी दुनिया के पैमाने पर व्यापक रूप में स्वीकृत होते जाना। देश के भीतर भूमण्डलीकरण की नीतियों को लेकर शासक वर्ग के भीतर एक आम सहमति और वैश्विक स्तर पर अमेरिका की एक ध्रुवीय दुनिया के नेता के रूप में स्वीकृति ने एक ऐसा माहौल बनाया है जिससे वैकल्पिक सामाजार्थिक व्यवस्था का स्वप्न धुंधला पड़ा है। प्रतिरोध की ताक़तें बैकफुट पर आई हैं और फूकियामा का ‘इतिहास का अंत’ बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश में सक्रिय लोगों का सच बना है। अगर साहित्य की बात करुं तो कलावाद का उत्तर आधुनिकता के रूप में पुनरुद्धार हुआ है। बाज़ार की ताक़तों के नाम पर जो खेल आर्थिक क्षेत्र में खेला जा रहा है उसका सीधा असर साहित्य के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। यह कालखंड इन्हीं प्रवृतियों के सतत प्रभावी होते जाने का काल है। नब्बे के दशक में जब इन नीतियों को लागू किया जा रहा था तो जहां बौद्धिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनको लेकर सशंकित था वहीं ख़ासतौर पर वाम बुद्धीजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसके जनविरोधी स्वरूप को लेकर कोई भ्रम नहीं था। कम से कम साहित्य में तो इनका सीधा समर्थन करने वाला शायद ही कोई था। लेकिन आज जब इनके प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं तो ठीक यही नहीं कहा जा सकता। आज न केवल युवा अपितु कई वरिष्ठ तथा भूतपूर्व समाजवादी तथा वामपंथी लेखकों तक में पूंजीवाद को लेकर एक स्वीकृति ही नहीं दिखाई देती अपितु किसी शोषण रहित समाज के स्वप्न और उसे फलीभूत करने में साहित्य की भूमिका को लेकर स्पष्ट संशय और अरुचि दिखाई देती है।

इस कालखंड में दुनिया भर में दक्षिणपंथ का उभार भी एक बेहद महत्वपूर्ण परिघटना है।

अगर बात देश की की जाये तो नब्बे का दशक हिन्दू कट्टरपंथ के उभार का समय रहा। नवसाम्राज्यवाद के साथ इसके अंतर्संबंध को समझना कोई मुश्किल काम नहीं। यहां इसका विस्तृत विवेचन तो संभव नहीं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनैतिक मंच भाजपा का नई आर्थिक नीतियों के प्रति समर्पण और भूमण्डलीकरण की नीतियों को आगे बढ़ाने में उसकी भूमिका कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है।

अगर ‘इस कालखण्ड के प्रतिबिंबन’ का अर्थ साहित्य के माध्यम से इस नई सामाजार्थिक व्यवस्था के जनपक्षधर विवेचन और किसी स्पष्ट विकल्प की प्रस्तुति से है तो मुझे अफसोस के साथ कहना होगा कि युवा कहानी ही नहीं हिन्दी के पूरे साहित्य को इसमें कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। हमारा पूरा साहित्य बाज़ार के विरोध के नाम पर या तो पुरोगामी, यथास्थितिवादी और किसी ‘आदर्श’ के विघटित होने पर छाती पीटता नज़र आता है या फिर ख़ासतौर पर युवा विशेषांको के माध्यम से आई युवा कहानीकारों की पीढ़ी की कहानियों में इसका दूसरा आयाम इन नई परिस्थितियों के स्वीकार और सेलीब्रेशन में दिखाई देता है। इसका कारण शायद हिन्दी का आवश्यकता से अधिक साहित्य केन्द्रित होते जाना है। साहित्येतर विषयों में हिन्दी का हस्तक्षेप लगभग नहीं के बराबर है। साहित्यकारों के बीच अर्थशास्त्र, दर्शन, इतिहास और दूसरे सामाजिक विषयों की समझदारी का जो भयावह अभाव दिखता है वह पब्लिक सेक्टर वाली अर्थव्यवस्था को समाजवाद मानने या फिर सेकुलरिज़्म के नाम पर गांधीवादी सर्वधर्म समभाव वाली अत्यंत सरलीकृत समझ के रूप में दिखाई देता है। कहानियां तो छोड़िये, मुझे कोई ऐसा उपन्यास भी नहीं दिखाई देता जिसमें इस नवसाम्राज्यवादी समय की एक मुकम्मल झलक देखी जा सके। जब-जब किसानों की आत्महत्या या ऐसे विषयों पर कहानी लिखने की कोशिश की गयी है वह या तो बिखर गयी है या फिर रिपोर्ताज जैसी हो गयी है। ‘बाज़ार में रामधन’ जैसी जिस कहानी की बेहद चर्चा हुई है अगर आप उसकी विवेचना करें तो वह कतई प्रगतिशील कहानी नहीं है। हल-बैल और ट्रेक्टर के माध्यम से जो द्वंद्व वहां चित्रित हुआ है वह उस मशीन विरोधी सोच में हल होता है, मार्क्स जिसे दो सदी पहले ही विवेचित कर चुके थे। बाज़ार को सही तरह से न समझ पाने और इस तथ्य को समझने की कोशिश न करने की वज़ह से कि न तो सरकार का अर्थ समाजवाद है और न बाज़ार का पूंजीवाद, बल्कि असल समस्या बाज़ार से पैदा होने वाले मुनाफ़े के वितरण की है, इस तरह की कहानियों से साहित्य संसार अटा पड़ा है। परिकथा के युवा कहानी अंक में प्रकाशित वसंत त्रिपाठी की कहानी फंदा इसका दूसरा छोर है जो रिपोर्ताज़ में बदल गयी है और पी साईंनाथ के किसी आलेख का कहानीकरण लगती है।

`मेरे ही नहीं किसी भी रचनाकार के लिये उसकी परंपरा एक ऐसा तत्व है जिसकी आप चाहे जितनी आलोचना कर लें, उससे मुक्त नहीं हो सकते। हिन्दी का साहित्य चूंकि उपनिवेशवाद के दौर में देशी साहित्य के तौर पर विकसित हुआ इसलिये प्रतिरोध का एक तत्व हमेशा ही उसमें प्रभावी तौर पर रहा है। लेकिन इसकी अपनी सीमायें रही हैं और अपनी ख़ूबियां। मेरे लिये परंपरा का अर्थ केवल देशज़ भर नहीं है। मेरे लिये जितने प्रेमचंद, यशपाल, दूधनाथ सिंह, अमरकांत, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, गोरख, पाश, फैज आदि अपने हैं उतने ही गोर्की, टालस्टाय, चेखव ,मार्खेज, ब्रेख्त, नेरुदा, एंत्सेबर्गर, रिल्के, लोर्का, मार्टिन एस्पादा आदि भी। और इस परंपरा से मैने साहित्य को प्रतिरोध के एक हथियार के रूप में प्रयोग करना सीखा है। इस परंपरा ने मुझे एक बेहतर दुनिया का स्वपन देखना सिखाया है और यह भी कि एक रचनाकार के लिये यह स्वप्न देख भर लेना काफ़ी नहीं होता है बल्कि उसे पूरा करने के लिये हर तरह की लड़ाई के लिये तैयार होना और ज़रूरत पड़ने पर प्रत्यक्ष लड़ाईयों में भागीदार होना भी ज़रूरी होता है। इसी से जोड़कर अगर मैं आपके एक और सवाल का उत्तर दूं तो विचार बोध के बिना कोई साहित्य रचा जा सकता है ऐसा कम से कम मैं नहीं मानता। प्रश्न केवल यह है कि वह विचार बोध किस प्रकार का है? वह किसके पक्ष में है और किसके विरोध में? मेरा मानना है कि जनता के पक्ष में लिखा गया साहित्य ही सच्चा साहित्य होता है। और इस रूप में देशकाल की समझ के लिये, एक बेहतर और शोषणमुक्त समाज के निर्माण के लिये आज भी मुझे वामपंथ या मार्क्सवाद सबसे बेहतर विचार सरणी लगती है। इसीलिये इस विचार के प्रति तार्किक प्रतिबद्धता मुझे लेखन के लिये महत्वपूर्ण लगती है।

इस दौर में युवा कहानीकारों की कहानियों ने समकालीन होने के कारण मुझे हमेशा आकर्षित किया है और अक्सर निराश भी। तमाम ऐसे कहानीकार जिन्हें हमारे आदरणीय आलोचकों ने बड़े तामझाम से प्रस्तुत किया मुझे कभी नहीं रुचे। कारण बहुत से हैं…पर सबसे ज़रूरी बात यह कि इनमें मुझे कोई युगप्रवर्तक नवाचार नहीं दिखा। जैसे कुणाल सिंह की कहानी है ‘सनातन बाबू का दांपत्य’ … मैं कभी नहीं समझ पाया कि इसे इतना महत्व क्यूं दिया गया? अगर सवाल शिल्प का है तो हमारे यहां ‘इस दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसी उत्कृष्ट रचना पहले से ही उपलब्ध है और कथ्य के बारे में तो कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है। चंदन पांडेय की भी जिन कहानियों की इतनी वाहवाही हुई वे मुझे कभी उद्वेलित करने वाली नहीं लगीं। लगभग इसी समय सत्यनारायण पटेल की एक महत्वपूर्ण कहानी ‘पनही’ आई थी, लेकिन आलोचकों का उस पर कोई ध्यान नहीं गया। इस कहानी का कथ्य अत्यंत मज़बूत है, हालांकि अस्सी के दशक की कहानियों का इस पर भरपूर प्रभाव है और भाषा के स्तर पर स्थानिकता का अतिमोह भी लेकिन यह कहानी निश्चित तौर पर अपने समय का एक ज़्यादा बड़ा सच कहती है। इसी प्रकार परिकथा के युवा कहानी अंक (अंक 18) में प्रत्यक्षा की एक कहानी ‘ब्याह’ है जो अपनी भाषा और शिल्प के चलते ख़ुद को पढ़वा तो ले जाती है लेकिन कथ्य के स्तर पर यह एक प्रतिगामी कहानी है, टिपिकल अपर मिडिल क्लास की मानसिकता से ग्रस्त। तद्भव के अंक 21 में प्रकाशित प्रभात रंजन की ‘कहानी बंडा भगत की उर्फ़ अथ कथा ढेलमरवा गोंसाई’ भी शिल्प के स्तर पर बेहद प्रभावित करती है लेकिन जब बात कथ्य की आती है तो कमज़ोर साबित होती है। इसके बरक्स मुझे अरुण कुमार असफल , चरण सिंह पथिक, मेजर रतन जांगिड, कमल, कविता, विजय गौड़, अल्पना मिश्रा, नवीन नैथानी जैसे कथाकार ज्यादा प्रभावित करते हैं। अभी हाल में परिकथा के नवलेखन अंक में मज़कूर आलम और राकेश दूबे की कहानियों ने मुझे बेहद प्रभावित किया है। जितेन्द्र बिसारिया ने वागर्थ में प्रकाशित अपनी कहानी ‘हाथी’ से उम्मीदें तो बहुत जगाईं थीं लेकिन उसके बाद उनकी कोई उल्लेखनीय कहानी मुझे नहीं दिखी। अपने अतिलेखन के बावज़ूद रंजना जायसवाल कविताओं की ही तरह कहानियों में भी कई बार चौंकाती हैं। इनके साथ अभी कथन के ताज़ा अंक में आई लक्ष्मी शर्मा की कहानी ‘मोक्ष’ का नाम मैं ज़रूर लेना चाहूंगा जो इधर लंबे दौर में पढ़ी गयी कहानियों में मुझे लगभग अविस्मरणीय लगी। हालांकि जिस ओर आपका इशारा है, अपने समकालीनों से क्षमा याचना सहित मैं कहना चाहूंगा कि वैसी अविस्मरणीय किसी एक कहानी का नाम ले पाना मेरे लिये संभव नहीं है। किसी युवा लेखक द्वारा लिखी जो कहानी मुझे इसके सबसे करीब लगती है वह है गीत चतुर्वेदी की अपेक्षाकृत कम चर्चित कहानी ‘सिम सिम’, उद्धरणों और विस्तार के अतिमोह से अगर गीत बच पाते तो एक पारंपरिक चाय की दुकान और पुस्तकालय के माध्यम से जो कथा उन्होंने विकसित की है वह हमारे समय का एक अविस्मरणीय आख्यान बन सकता था। हालांकि ठीक यही बात उनकी दूसरी कहानियों के बारे में कह पाना संभव नहीं।

आने वाले समय की कहानी के बारे में एक पाठक के तौर पर मैं यह उम्मीद ज़रूर करता हूं कि वे शिल्प और तथ्य की जगह कथ्य को केन्द्र में लायेंगी। वे अपने समय को समझने और इसके बरक्स कोई प्रतिसंसार रचने के लिये आवश्यक राजनीतिक समझदारी विकसित करेंगी और हिन्दी के पाठक को वह मानसिक खुराक दे सकेंगी जो उसमें और-और पढ़ने की ललक जगाये। इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय जी के शब्द उधार लूं तो वह भविष्योन्मुखी हो।