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सोमवार, 31 जनवरी 2011

किस्सा काले धन का ·



वैसे तो भारत में काले धन का मुद्दा कोई नया नहीं है लेकिन पिछले चुनावों में जिस तरह भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया और उसके बाद स्वामी रामदेव से लेकर तमाम लोगों ने इस बारे में दावे-प्रतिदावे करने शुरु किये उसके बाद से यह एक बार फिर बहस में आया। हालांकि स्वाभाविक तौर चुनाव के बाद राजनीतिक दलों ने इसे ठंढे बस्ते में डाल दिया और अख़बारों के पन्नों से भी यह मुद्दा ग़ायब हो गया। परंतु पहले विकीलीक्स के ख़ुलासों और फिर पूर्व क़ानून मंत्री श्री राम जेठमलानी तथा अन्य लोगों द्वारा इस संबंध में दायर की गयी याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछली 19 जनवरी को न्यायधीश बी सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस एस निज्जर की खंडपीठ ने जिस तरह कड़ाई से काले धन के मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया उसने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया। न केवल प्रधानमंत्री को इस पर कैबिनेट में चर्चा करनी पड़ी बल्कि 25 जनवरी को दिये अपने एक बयान में वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी को भी स्वीकार करना पड़ा कि 460 बिलियन डालर से लेकर 1.6 ट्रिलियन डालर तक का धन दुनिया के तमाम ऐसे देशों के बैंकों में जमा है जिन्हेंटैक्स हैवेनकहा जाता है। अगर रुपयों में बात करें तो बीस लाख करोड़ रुपये से लेकर 51 लाख करोड़ रुपये तक! लेकिन जिनके नाम से यह धन जमा है, उन्होंने उन व्यक्तियों के नाम बताने में उन देशों के साथ हुई संधियों का हवाला देते हुए असमर्थता जताई । 27 जनवरी को इसकी अगली सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूछा किजब आपको उस धन का स्रोत पता चल गया तो आपने क्या किया? हम उन अज्ञात नामों की बात नहीं कर रहे जिन्हें अब आप जानते हैं। हम जानना चाहते हैं कि आपने क्या कदम उठाये।ज्ञातव्य है कि इन देशों में से एक लिक्टेन्स्टीन के बैंकों में जिन 26 लोगों का काला धन जमा है सरकार को उनके नाम पता हैं और वह इसे न्यायालय को भी बता चुकी है, लेकिन जर्मनी के साथ इस मामले में हुई अपनी संधि के प्रावधानों तथा इन लोगों के ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही के बाधित होने की बिना पर वह इन नामों को सार्वजनिक नहीं कर रही।

दरअसल, भारत के विदेशी बैंकों में जमा काले धन की मात्रा के बारे में पहला हालिया ख़ुलासा ग्लोबल फाइनेंसियल इंटिग्रिटी स्टडी के दौरान हुआ। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व अर्थशास्त्री डा देव कार और डेवन कार्टराइट द्वारा 2002-2006 के बीच किये गये इस अध्ययन कीविकासशील देशों में अवैध वित्तीय बहिर्गमनशीर्षक रिपोर्ट ने ग़ैरक़ानूनी तरीकों, भ्रष्टाचार, आपराधिक कार्यवाहियों आदि द्वारा देश से बाहर गये धन के बारे में चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किये। इस अध्ययन के अनुसार 1948 से 2008 के बीच भारत से कुल 462 बिलियन डालर ( यानि बीस लाख करोड़ रुपये) का काला धन विदेशी बैंकों में पहुंचा है। अगर देखा जाय तो यह धनराशि भारत के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद की 40 फीसदी है और 2 जी स्पेक्ट्रम में सरकार को हुए कुल अनुमानित नुक्सान की बीस गुनी! इस अवैध धन के बाहर जाने की गति में औसतन 11.5 प्रतिशत की वृद्धि प्रतिवर्ष हुई है। यहाँ यह बता देना भी उचित होगा कि यह अनुमान रुपये की डालर के तुलना में अभी की क़ीमत के हिसाब से हैं। अगर इसमें इस तथ्य को शामिल कर लिया जाये कि प्रारंभिक वर्षों में रुपये की स्थिति बेहतर रही है तो यह राशि और अधिक बढ़ जाती है। डा कार का यह भी आकलन है कि वैसे तो काले धन का बाहर जाना आज़ादी के बाद से ही ज़ारी रहा है लेकिन नब्बे के दशक में लागू सुधारों के बाद इसकी गति और अधिक बढ़ गयी है। इस पूरी राशि का लगभग आधा हिस्सा 2000 से 2008 के बीच देश से बाहर गया है। नवंबर 2010 में पेश इस रिपोर्ट के अनुसार न केवल स्विटजरलैण्ड बल्कि ऐसे तकरीबन 70 देशों में यह काला धन जमा किया गया है।

वैसे स्विटजरलैण्ड के बैंको के एक संगठन स्विस बैंकिंग एसोसियेशनने 2006 में पेश अपनी एक रिपोर्ट में स्विटजरलैण्ड के विभिन्न बैंकों में विदेशियों द्वारा रखे गये धन की जो सूचना दी थी वह भी इस ओर पर्याप्त इशारा करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार स्विट्जरलैण्ड में धन जमा करने वालों में भारत का स्थान सबसे ऊपर है और भारतीय नागरिकों के 1,456 बिलियन डालर वहाँ जमा हैं। इसके बाद रूस, इंगलैण्ड, यूक्रेन और चीन का नंबर आता है। यहां यह बता देना ज़रूरी होगा कि इस रिपोर्ट के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गयी राशि दुनिया के बाकी सभी देशों के नागरिकों द्वारा जमा की गयी कुल राशि से भी ज़्यादा है! स्विट्जरलैण्ड के बैंकों से भारतीयों का लगाव कितना है यह इस तथ्य से ही जाना जा सकता है कि भारत से हर साल लगभग अस्सी हज़ार लोग स्विट्जरलैण्ड जाते हैं और उसमें से 25 हज़ार लोग साल में एक से अधिक बार जाते हैं। अब स्विट्जरलैण्ड की ख़ूबसूरती ही इसकी इकलौती वज़ह तो नहीं हो सकती!

भूख, कुपोषण और ग़रीबी के आंकड़ों में दुनिया के अग्रणी होने के बाद काले धन के मामले में भी सबसे ऊपर बैठा देश अपने विकास की गाथा ख़ुद कह रहा है। जिस देश में अस्सी फ़ीसदी लोग 20 रुपये रोज़ से कम में गुज़ारा करते हैं, सरकार सबको पर्याप्त अनाज उपलब्ध करा पाने में असमर्थता ज़ाहिर करती है और पैसे की कमी का रोना रोकर स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों के ख़र्च में कटौती की जाती है, वहां यह अकूत धनराशि काले धन के रूप में चुपचाप हर साल बाहर जा रही है और सरकारें बस मूक दर्शक की तरह तमाशा देख रही हैं।

काले धन की उत्पति और इसके विदेशी बैंको तक पहुंचने के तमाम कारण हैं। इस धन में भ्रष्टाचार से कमाई गयी संपत्ति, कर छूट वाले सरकारी नियमों का लाभ उठाकर उससे बचाये हुए धन को बाहर भेज देना, हथियार तथा दूसरे सौदों में मिली दलाली को विदेशी बैंकों में सुरक्षित रखना, हवाला के ज़रिये हुए लेन-देन की राशि को बाहर भेज देना तथा खिलाड़ियों व कलाकारों द्वारा विदेशों में मिली धनराशि को टैक्स बचाने के लिये इन जगहों पर जमा करना शामिल है। कुछ वर्षों पहले हवाला के संदर्भ में जिस तरह कांग्रेस और बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं का नाम सामने आया था उसकी रौशनी में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन बैंकों में जमा धन का एक बड़ा हिस्सा हमारे राजनेताओं का भी हो सकता है। अभी कुछ दिनों पहले जब सत्यम घोटाला सामने आया था तो वहां भी सरकार द्वारा निर्यात पर दी गयी छूट का फ़ायदा उठाने के लिये निर्यात बिलों को फ़र्ज़ी तरीके से बढ़ा कर दिखाया गया था। औद्योगिक घरानों में यह आम बात है और इस प्रकार जिस राशि पर कर बचाया जाता है वह विभिन्न तरीकों से उन देशों के बैंकों में जमा कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के भ्रष्टाचार से कमाई पूंजी के भी इन बैंकों में जमा होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन इस पूरी परिघटना का एक पक्ष और है। येटैक्स हैवेन्सविकासशील तथा ग़रीब देशों की पूंजी को विकसित पश्चिमी देशों में पहुंचाने का एक बड़ा और सुनियोजित षड़यंत्र हैं। इन देशों में जमा धन विकसित देशों में निवेश किया जाता है और पहले से ही पूंजी की कमी से जूझ रहे देश और ग़रीब होते जाते हैं। मार्च 2005 मेंटैक्स जस्टिस नेटवर्कके एक शोध में पाया गया कि ऐसे ग़रीब और विकासशील देशों के रईसों की साढ़े ग्यारह ट्रिलियन डालर की व्यक्तिगत संपत्ति अमीर पश्चिमी देशों में निवेश के लिये उपयोग की गयी। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए रेमंड बेकर ने अपनी हालिया प्रकाशित चर्चित किताबकैपिटलिज्म्स एचिलेज़ हील : डर्टी मनी एन्ड हाऊ टू रिन्यू द फ्री मार्केट सिस्टममें बताते हैं कि 1970 के मध्य से अब तक दुनिया भर में 5 ट्रिलियन डालर से अधिक की धनराशि इन गरीब देशों से पश्चिमी देशों में मारिशस, सिसली, मकाऊ, लिक्टेन्स्टीन सहित सत्तर से अधिक टैक्स हैवेन कहे जाने वाले देशों में जमा काले धन के रूप में पहुंच चुका है। इसी किताब में वह आगे लिखते हैं कि इन देशों में जमा काले धन के आधार पर कहा जा सकता है कि दुनिया की एक फीसदी आबादी के पास कुल भूमण्डलीय आबादी की संपत्ति का 57 फ़ीसदी है। अब अगर स्विस बैंक एसोसियेशन द्वारा दिये गये आंकड़ों के साथ इसे मिलाकर देखें तो इस बात का अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं है कि इसमें से भारतीयों का हिस्सा कितना है।

साफ़ है कि यह समस्या अब एक ऐसा दैत्याकार रूप ले चुकी है कि सत्तर के दशक में जिस समानान्तर अर्थव्यवस्था की बात की जाती थी अब वह एक भयावह सत्य बन कर हमारे सामने उपस्थित है। पूंजीवाद की कोख से पैदा हुआ काला धन हमारी अर्थव्यवस्था को घुन की तरह खाये जा रहा है। नब्बे के दशक में लागू हुई उदारवादी आर्थिक व्यवस्था ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है तथा जनता की सुविधायें छीनकर उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा देश के बाहर भेजा जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी सरकारें इस समस्या से जूझने के लिये आवश्यक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर रहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद भारत सरकार ने काले धन का वास्तविक परिमाण जानने के लियेनेशनल इंस्टीच्यूट आफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एन्ड पालिसीको जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन संस्थान के निदेशक एम गोविंद राव का कहना है कि उन्होंने अभी इस संदर्भ में फैसला नहीं लिया है। उनका कहना है किइस विषय का अध्ययन एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हमें अनेक क्षेत्रों से आने वाली भारी धनराशि की जानकारी पाने की बड़ी समस्या से जूझना है।ज़ाहिर है कि जैसा कि प्रकाश करात कहते हैं किसभी इस समस्या की गंभीरता से परिचित हैं लेकिन सरकार इस धन को वापस लाने के लिये आवश्यक राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेहद कड़े रुख के बावज़ूद संबंधित देशों से की गयी संधियों के गोपनीयता संबंधी प्रावधानों के चलते दोषियों के नाम सार्वजनिक किये जाने की कोई संभावना नहीं दिखती। काले धन के सबसे बड़े अड्डे स्विट्जरलैण्ड से हुई संधि पर तो अभी वहां की संसद में मुहर लगने में ही साल भर से अधिक का समय लग जायेगा। ऐसे में तमाम जबानी जमाखर्च के बावज़ूद देश के धन को बाहर ले जाने वाले अपराधियों पर कोई कार्यवाही कब हो पायेगी यह कह पाना मुश्किल है। न्यायालय के दबाव के साथ-साथ अगर जनता की ताक़तों का भी दबाव बन सके तो शायद जनता की गाढ़ी कमाई फिर से देश में लाया जा सके। इस दबाव के बिना तो बस हम सब एक शर्मनाक नूराकुश्ती देखने के लिये ही अभिशप्त रहेंगे।

  • दिल्ली से निकलने वाले दैनिक आज समाज के 31/01/2011 अंक में प्रकाशित

3 टिप्‍पणियां:

  1. Basant wrote "बढ़िया , तथ्यात्मक लेख है. आम जन इस बारे में बोलें यह आपकी भी कामना है और मेरी भी लेकिन " बोलेंगे " इसमे संदेह है. इस मुल्क में जहां भला - बुरा जो कुछ भी होता है वह सब " राम की मर्जी " माना जाता है वहां यह ज़रा मुश्किल नज़र आता है. जहां मंहगाई जैसी चीज़ों पर , जो जनता को सीधे प्रभावित करती हैं , कोई पत्ता हिलता नहीं वहां इस बात पर उम्मीद लगाना कुछ असंभव सा लगता है. फिर भी उम्मीद पर तो दुनिया कायम है इसलिए उसका दामन भी कैसे छोड़ा जा सकता है. कहीं कुछ शुरू हो, कहीं कोई पत्ता हिले , कहीं से कोई आवाज़ उठे यही तमन्ना है. अच्छे और ज्ञान - वर्धक लेख के लिए बधाई.यह क्रम बनाए रखें."

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  2. हजूर मेरी तो ये समझ में बात कतई नहीं आती कि कोई हमारे देश को लुट खाए और हम दूसरों कि बात रखने के लिए उसको बचाते फिरें. ऐसी संधियाँ जिनकी ओट में हमारे अपराधियों संरक्षण पायें क्या उनका पालन किया जाना चाहिए.

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  3. बहुत सी नयी बातें पता चलीं इस लेख के माध्यम से. संग्रहणीय लेख.

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