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सोमवार, 30 मई 2011

नई नज़र से केदार

पत्रिका की कीमत है १०० रुपये और इसे भाई प्रेमचंद गांधी से 09829190626 पर फोन या prempoet@gmail.com पर मेल करके मंगाया जा सकता है. अगर ग्वालियर के आसपास हों तो मुझसे ले लें.


हाल में जयपुर से आई पत्रिका कुरजां मे प्रकाशित हिमांशु पंड्या का यह आलेख कवि केदार नाथ अग्रवाल को देख्ने की सर्वथा नवीन दृष्टि देता है. यहाँ न तो विगलित श्रद्धा है न अविवेकी आलोचना...जनपक्ष के पाठकों के लिए यह लेख उपलब्ध कराने के लिए हम पत्रिका के सम्पादक प्रेमचन्द गान्धी और लेखक के आभारी हैं

भाग १:जीवन की गति और कविता का छंद

छायावाद का अंत पन्त की घोषणा 'युगांत' के साथ हुआ था या होरी के पत्थर कूटते हुए सड़क पर पछाड़ खाकर गिरने और मर जाने से? केदारनाथ अग्रवाल की कविता यात्रा के ऐतिहासिक विकास क्रम पर गौर करते समय यह सवाल सहज ही उपस्थित हो जाता है की क्या छायावाद से प्रस्थान रूप विन्यास की एक विशिष्ट रोमानी शैली से प्रस्थान भर था या वैचारिक स्तर पर 'जन' की ठोस ,मूर्त उपस्थिति का अब अनदेखा ना किया जा सकने का आग्रह ?नए युग के निर्माता झींगुर और महंगू निराला की कविताओं में चहलकदमी करते हुए चले आये थे ,यही वह दौर था जब केदारनाथ अग्रवाल वकालत करने के लिए बांदा नामक शहर में जाकर बसे और उनकी कविता साधना को नया आयाम मिला.इंटर के दिनों से ही ब्रज में औए छायावाद विरोधी संस्कारों के साथ कविता लिखने वाले केदारजी का यों तो प्रगतिशील विचार से परिचय और दीक्षा उनके कानपुर के विद्यार्थी जीवन में हेई हो गयी थी ,जहां law की डिग्री लेने के दौरान उन्होंने उस औद्योगिक नगरी में मजदूर वर्ग की जीवन परिस्थितियों और उनकी दारुण दशा के कारणों को खोजने की कोशिश की थी मगर बांदा की धरती ने उनके कवि को मांजा .




केदारनाथ अग्रवाल बुंदेलखंड के थे .यह उनकी कविता के बारे में उतना ही जरूरी तथ्य है जितना यह की नागार्जुन मिथिला के थे और गोरख पांडे भोजपुर के.किसान संवेदना से ओतप्रोत केदारजी ने न सिर्फ बुंदेलखंड की लोकगायन शैलियों और छंदों -मसलन आल्हा का यथोचित उपयोग किया बल्कि अपनी कविता की विषय वास्तु इस हिन्दी पट्टी के जातीय जीवन और परिवेश को ही बनाया .ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारतीय सामंतवाद के गठजोड़ से निर्मित चक्र को उधेड़ते हुए उन्होंने ओअनी बेधक राजनीतिक दृष्टि से देख लिया था की आजादी की लड़ाई में दलित शोषित सर्वहारा के सवाल हाशिये पर छोताते जा रहे हैं .आजादी की लड़ाई के उन उथल पुथल भरे बरसों में उनकी कविता में सामंतवाद के विरुद्ध भारतीय किसान के संघर्ष का उद्घोष भी है और ब्रिटिश पूंजीवादी हितों के साथ नाभिनालबद्ध राष्टीय नताओं पर व्यंग्य भी .केदारनाथ अग्रवाल की राजनीतिक दूरदर्शिता यहाँ देखी जा सकती है की १९४७ की आजादी को सत्ता हस्तांतरण मानने की जो समझ प्र.ले.सं. की एक दशक बाद बनी उसकी और संकेत उन्होंने ४६ में ही कर दिया था-"लन्दन गए -लौट आये/बोलो,आजादी लाये?/नकली मिली है की असली मिली है?/कितनी दलाली में कितनी मिली है ?/"आजादी के बाद अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवाद का नवस्वाधीन देशों पर मंडराता कर्ज का मायाजाल हो ,प्रशासकों-पूंजीपतियों-नेताओं का गठजोड़ हो या देश में घटित राजनीतिक मोड़ -उदाहरणार्थ आपातकाल -हो ,केदार की कलम सभी मुद्दों पर चली.

यों तो केदारनाथ अग्रवाल ने १९४६ के नौसैनिक विद्रोह ,अमरीकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध वियतनाम की जनता के संघर्ष ,बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से लेकर डालर के बढ़ाते वर्चस्व तक सभी वैश्विक मुद्दों पर कवितायेँ लिखीं किन्तु मूलतः औए अंततः उनकी कविता बुंदेलखंड के किसान का जयगान है .अपनी जमीन से गहरे जुड़ाव के चलते उन्होंने बुन्देलखंडी किसान की अटूट संघर्ष क्षमता का रेखांकन भी किया और उसके वर्गीय हितों की रक्षा के लिए उठ खड़े होने और संगठित होने का आव्हान भी-"काटो काटो काटो कर्बी/मारो मारो मारो हंसिया /हिंसा और अहिंसा क्या है/जीवन से बढ़ हिंसा क्या है "

शमशेर ने केदारनाथ अग्रवाल के लिए लिखा था-"केदार बुनियादी तौर पर एक नार्मल रोमानी कवि हैं,छायावादी रोमानी नहीं "संभवतः यह उनकी कविता के बारे में सर्वाधिक सटीक टिप्पणी है.सबसे पहले कही बात से इसे जोड़ें तो -छायावाद का अंत रूमानियत का अंत नहीं था ,हाँ यह जरूर था की छायावादी रूमानियत जिस स्व के दायरे में जकड़ी हुई थी उसे इस वायवीयता से मुक्त करके केदारनाथ अग्रवाल ने उसमें सचेत और सायास वर्गीय चेतना का समावेश किया .केदारजी की प्रकृति केन्द्रित कविताओं में सदा ही प्रतीकों को निर्बल के पक्ष में प्रस्तुत कर कविता को वर्गीय धार दे देने की समझदारी रही है ,मसलन -"एक बित्ते के बराबर /यह हरा ठिगना चना/बांधे मुरैठा शीश पर/छोटे गुलाबी फूल का/सजाकर खडा है" या फिर "तेज धार का कर्मठ पानी/चट्टानों के ऊपर चढ़कर मार रहा है घूंसे कसकर /तोड़ रहा है तट चट्टानी "

केदारनाथ अग्रवाल को दूसरा सप्तक में सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला था जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था.प्रयोगवाद के साथ आयी आधुनिकता में व्यक्तिकेंदितता जिस कुंठा को ला रही थी उसे केदारजी अस्वीकार करते थे ,आस्था उनकी कविता का मुख्या स्वर थी.उनकी कविता का सौंदर्य बोध श्रम के साथ अभिन्न रूप से जुडा था .श्रम के साथ गतिशीलता अभिन्न रूप से जुडी है और केदारजी की लयात्मकता ने उसके सौंदर्य का असीम विस्तार किया.स्वातंत्र्योत्तर भारत की उमंग के साथ गुनगुनाने योग्य सर्वाधिक पंक्तियाँ केदारनाथ अग्रवाल के खाते में हैं ,उदाहरण के लिए -"हवा हूँ हवा मैं बसन्ती हवा हूँ "या फिर "दिन हिरन सा चौकड़ी भरता चला "

प्रकृति केन्द्रित ये कवितायेँ किसी निविड़ एकांत की और नहीं ले जातीं बल्कि प्रकृति और मानव के सघन रिश्ते को ही मजबूत करती हैं .यह केदार जी की कविताओं में ही संभव है की धुप की चमक में मइके आयी बेटी की ममता मिले और सवेरा होने पर श्रमिक के हाथों में कमल खिलने का बिम्ब बने .यहाँ पर एक अन्य विशेषता पर भी ध्यान देना ठीक होगा ,केदार जी की इन कविताओं में गहरी ऐन्द्रिक चेतना है .हिन्दी में पत्नी को संबोधित सर्वाधिक कवितायेँ भी केदार जी ने ही लिखी हैं और यह बात भी रेखांकित की जानी चाहिए की वयस बढ़ने के साथ इन कविताओं की ऐंद्रिकता और सघन होती गयी .जहां एक और आरोपित नैतिकता से घिरे लेखकों के यहाँ अशरीरी प्रेम की और बढ़ना आदर्श के रूप में चित्रित हुआ वहीं केदारजी की अकुंठ प्रेम भावना ने उनके ऐन्द्रिय बोध को और प्रखर बनाया .

केदारनाथ अग्रवाल का स्मरण साधारण जन के मृदु और रौद्र रूप का लोक चित्रण करने वाले एक लोक गायक का स्मरण है .यह इस बात का रेखाकन है की जीवन और गति कविता के छंद का अभिन्न अंग कैसे बन सकते हैं .नागार्जुन द्वारा केदारजी के लिए लिखी ये पंक्तियाँ कितनी सटीक हैं :
केन कूल की काली मिट्टी ,वह भी तुम हो!
कालिंजर का चौड़ा सीना ,वह भी तुम हो !
ग्राम वधू की दबी हुई कजरारी चितवन ,वह भी तुम हो !
कुपित कृषक की टेढ़ी भौहें ,वह भी तुम हो !




भाग २:यूं होता तो क्या होता?(केदार बरास्ते शमशेर)

"केदार,नागार्जुन और त्रिलोचन को दूसरे सप्तक में सहयोगी कवि बनने के लिए आमंत्रित किया गया था.केदार और नागार्जुन ने तो दो टूक शब्दों में सहयोग देने से इनकार कर दिया था;त्रिलोचन को शामिल न होने के लिए पर्याप्त कारण निकल आये थे."- शमशेर

यह बहुत स्वाभाविक सी परिणति थी.'तार सप्तक' के प्रकाशन और प्रसिद्धि के बाद लड़ाई के मोर्चे की सीमारेखाएं बहुत साफ़ साफ़ खिंच गयीं थीं.पर....अगर ऐसा न हुआ होता या कहें ऐसा हो गया होता ! दरअसल मैं कोई नई बहस नहीं शुरू कर रहा हूँ बल्कि यह बात शमशेर लिख चुके हैं जिसे पुनः विचार के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ .शमशेर के ही शब्दों में,"ज़रा देर के लिए हिन्दी आलोचना जगत कल्पना करे कि ये तीनों कवि 'दूसरे सप्तक' में शामिल हैं."

इस कल्पना को मैं इस लेख के 'धमाकेदार' अंत के लिए सुरक्षित रख रहा हूँ, फिलहाल देखें कि यह न होने से क्या क्या हुआ. प्रगति और विरोध दो भिन्न और विरोधी धारणाएं मान ली गयी. नागार्जुन- त्रिलोचन- केदारनाथ अग्रवाल की त्रयी की कवितायेँ राजनितिक थीं- आव्हानपरक थीं- क्रांतिधर्मी थीं....और यही उनकी कलात्मक 'सीमा' थी. केदारनाथ अग्रवाल के साथ तो और विडम्बना रही. उनकी कविताओं के दो खांचे बना दिए गए- राजनीतिक और गैरराजनीतिक. इससे आलोचना को विश्लेषण में सुविधा भी होती थी और यही सुविधा केदार जी की ऐन्द्रिक चेतना युक्त प्रेम कविताओं के पाठ में सर्वाधिक असुविधा भी पैदा करती थी. लीजिये, उन्हें लिखनी तो थी जनचेतना जागृत करनेवाली कविता और लिखने लगे ऐसी मांसल कविता!

आइये फिर एक बार शमशेर को पढ़कर भ्रम के कुहासे से बाहर आएं. बकौल शमशेर, "इस भ्रम की पोषक यह व्यापक सी धारणा है कि प्रयोग और प्रगतिशीलता विरोधी चीजें हैं. पिछले दशकों की साहित्यिक धाराओं के चर्चा प्रायः इसी धारणा की पृष्ठभूमि में हुई है. प्रगतिशीलता का संबंध विचारों से है- प्रायः समाजवादी या मार्क्सी- जिनमें मुख्य तत्त्व साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का विरोध और मजदूर- किसान के अपने स्वत्वाधिकार के आंदोलनों के लिए समर्थन है. प्रयोग का संबंध शिल्प और कथ्य में भावनाओं के नवयुगीन सन्दर्भों की खोज से है और इस खोज का उद्देश्य कलाकार के सृजनात्मक व्यक्तित्व का परिष्कार और विशेष स्पष्टीकरण है. मार्क्सवादी कवि प्रयोग के क्षेत्र में उतनी ही दिलचस्पी ले सकता है, और लेता है, जितना कि मार्क्सवाद विरोधी कवि."

देखे दांव;
पैंतरे झेले;
खाई मार
मोर के मुंह की,
आँख न फूटी ;
मत्त गयंदी
पदाघात से
कमर न टूटी;
नरम जीभ से
हमने
दिग्गज पर्वत
ठेले|

' नरम जीभ से पर्वत झेलने ' की वाहवाही में वह बिम्ब ओझल हो जाता है जो इस अद्भुत संकल्पना को संभव बनाता है .दशरथ मांझी भी याद आ सकते हैं और एक बेहद ऐन्द्रिक घनीभूत इमेज भी साकार हो सकती है.शमशेर और केदार दोनों अपने आग्रहों में इतने अकुंठ इसलिए थे कि उनके पास वह संतुलित दृष्टि थी.'पंख और पतवार' की भूमिका में केदार जी ने कलात्मकता को लेकर प्रगतिवादी खेमे के पूर्वाग्रहों पर बड़ी कठोर बातें कही हैं.कलात्मकता भी मानव के युगों के संघर्ष का अर्जन है ,यह 'खरी खरी' कहने वाले केदार जी ही 'हे मेरी तुम'जैसा कवता संग्रह लिख सकते थे.प्रगतिवादी आलोचना जब इसी एकांगी दृष्टि से घिरी थी तो केदार जी पर 'फौर्मलिस्ट' होने के आरोप लगाए गए .अब यह मजेदार था,एक खेमा आरोप लगा रहा था कला रहित नारेबाजी का,दूसरा कह रहा था कि वे 'फौर्मलिस्ट' हैं .एक बार फिर शमशेर को पढ़िए (और साथ में इस दोस्ती पर रश्क भी कीजिये!),"ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी के कुछ प्रौढ़ और आधुनिक आलोचक और साहित्यिक ,केदारनाथ अग्रवाल को 'फौर्मलिस्ट' कवि मानते हैं.अर्थात रूपप्रकारनिष्ठ ...मैं समझता हूँ कि इस धारणा को सुलझाना जरूरी है ...ऊपरी रूपप्रकार की स्थूल योजना पर अतिरिक्त ध्यान देना ,बल्कि उसमें उलझ जाना ,या उसी के फेर में ज्यादा रहना -यह एक तरह का रूपप्रकारवाद है....दूसरे प्रकार का रूपप्रकारवाद है -कला(कृति)की आतंरिक रूप-योजना पर 'रूप योजना के लिए' बल देना.इसमें भी कवि अपनी भावनाओं को किसी विशिष्ट 'क्लासिक'या रायज समसामयिक पैटर्न पर बांधता है.जबकि उसकी अपनी भावनाओं का अपना वैशिष्ट्य ,प्रखर या स्वतन्त्र रूप से ,पिचले या समसामयिक अन्य कलाकारों के वैशिष्ट्य से काफी अलग नहीं हो चुका होता-तब इस प्रकार का रूपप्रकारवाद प्रस्तुत होता है.अगर उद्देश्य अपनी भावनाओं को 'कल्चर' करने, अधिक अर्थपूर्ण और गहरा करने अर्थात अपनी ही जमीन पर उठाने और अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों से ही समृद्ध करने का है तो कालान्तर में यह दूसरे प्रकार का रूपप्रकारवाद कवि के व्यक्तित्व में अन्तर्निहित हो जाएगा;विलीन हो जाएगा.जैसा कि सभी महाकवियों के यहाँ देखा जा सकता है."(बल मेरा)

बहुत स्पष्ट है कि जिस दूसरी कोटि की बात हो रही है वह केदारनाथ अग्रवाल हैं.

वह चिड़िया जो-
चोंच मार कर
चढ़ी नदी का दिल टटोल कर
जल का मोती ले जाती है
वह छोटी गरबीली चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूँ
मुझे नदी से बहुत प्‍यार है।
अब यहाँ कविता(अंश) की कोई व्याख्या नहीं बल्कि केदार जी की यह पंक्तयां जोड़ लीजिये ,"मानसिक प्रक्रिया को कवि के व्यक्तित्व से परे समझना भूल होगी.वैसे ही कवि के व्यक्तित्व को भी आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से निर्लिप्त मानना भूल होगी ."('युग की गंगा' की भूमिका से )'मैंने उसको जब जब देखा लोहा देखा' जैसी पंक्तियाँ व्यक्तित्व में रूप योजना के अन्तर्निहित हो जाने बाद ही निकलती हैं.

अच्छा ,वह पहली कोटि कौनसी थी जिसका जिक्र शमशेर कर रहे थे ?आगे पढ़िए और देखिये कि प्रगति-प्रयोग का यह बेबनाव का द्वंद्व किसने निर्णित किया,"आधुनिक हिन्दी कविता का चौथे-पांचवे दशक का 'प्रयोगवाद'वस्तुतः रूपप्रकारवादी दृष्टिकोण ही प्रस्तुत करता है....प्रयोगवादी काव्य की मुख्य विशेषता या तत्कालीन आकर्षण अगर रूपप्रकारवाद न होता ,तो निश्चय ही 'प्रयोगवाद'प्रगतिशील काव्यधारा को कई गुना और प्रभावित करता,कई गुना अधिक पुष्ट करता ."(ऐसी ट्रेजेडी है नीच !)

अर्थात,अब मुझे कहने दीजिये,केदार जी का दूसरे सप्तक में शामिल न होने का 'दो टूक' फैसला उनके पूर्वाग्रहों के कारण नहीं था बल्कि यह प्रयोगवादी खेमे का पूर्वाग्रह था जो केदारनाथ अग्रवाल को 'समायोजित' करने में असफल रहा . (हां हंत !)

रूपप्रकार पर असाधारण अधिकार ही कवि को रूपप्रकार से मुक्ति देता है.केदारनाथ अग्रवाल इसी मुक्ति के कवि हैं.नयी कविता के आत्मसंघर्ष में मुक्तिबोध इसी मुक्ति को प्राप्त करते हैं और प्रयोगवाद का अधूरापन भी इसी ऐतिहासिक सबक से हमें रू-ब-रू कराता है .

क्या कहा आपने?मेरा बयान दम्भपूर्ण आप्ति से ग्रस्त है?नहीं,नहीं ,मेरी क्या मजाल,मैं तो शमशेर को उद्धृत कर रहा था.याद है ना आपको,हमने एक कल्पना को अंत के लिए सुरक्षित रखा था ,आइये,शमशेर के साथ वह कल्पना करें,"ज़रा देर के लिए हिन्दी आलोचना जगत कल्पना करे कि ये तीनों कवि दूसरे सप्तक में शामिल हैं.फ़ौरन प्रयोगवादी कवता के विवाद हॉल में तीन खिड़कियाँ और खुल जाती हैं और झाँक कर गौर से देखते हैं तो -व्यक्तित्व की खोज के तीन रास्ते और हाँ,ये रास्ते और रास्तों से अलग हैं जरूर -मगर प्रयोगवादी दौर के रास्ते हैं ये भी.इनको छोड़ देने से प्रयोगवादी युग का नक्शा अधूरा रह जाता हैबल्की बहुत भ्रामक हो जाता है.इतनी बात तो आईने की तरह स्पष्ट है."

यह आइना शीतकालोत्तर साहित्यिक दृष्टि के लिए रास्ता दिखाता है.इसी रास्ते केदारनाथ अग्रवाल की कविता की सही व्याख्या संभव है.

7 टिप्‍पणियां:

  1. केदार-शती में अपने प्रिय कवि पर बहुत कुछ पढ़ने को मिल रहा है. दो लेखों का संबंध तो जयपुर से ही है. पहला लेख नन्द भारद्वाज जी का जिसे अरुण देव जी ने 'समालोचन' पर लगाया था और दूसरा यह लेख. तुलना नहीं करूँगा कि कौन सा लेख अधिक अच्छा है परन्तु एक बहुत बेहतरीन लेख के लिए हिमांशु जी को और कुरजा परिवार को हार्दिक बधाई! वैसे 'कुरजा' शब्द का अर्थ क्या है?

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  2. केदार-शती में अपने प्रिय कवि पर बहुत कुछ पढ़ने को मिल रहा है. दो लेखों का संबंध तो जयपुर से ही है. पहला लेख नन्द भारद्वाज जी का जिसे अरुण देव जी ने 'समालोचन' पर लगाया था और दूसरा यह लेख. तुलना नहीं करूँगा कि कौन सा लेख अधिक अच्छा है परन्तु एक बहुत बेहतरीन लेख के लिए हिमांशु जी को और कुरजा परिवार को हार्दिक बधाई! वैसे 'कुरजा' शब्द का अर्थ क्या है?

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  3. धन्यवाद सय्यद अयूब साहब ( SAK ) आपको लेख पसंद आया , मेहनत सफल हुई. तुलना की तो जरूरत ही नहीं है . किसी लेख का आकलन उसके अपने सन्दर्भ में ही किया जाना चाहिए कि वह अच्छा है या बुरा . कभी कभी तुलना हो सकती है पर उसके लिए दोनोलेखों की भावभूमि/पृष्ठभूमि एक होनी चाहिए .
    अगर आपको मेरा लेख पसंद आया तो उसका श्रेय भी नन्द जी को ही जाएगा . विद्यार्थी जीवन से ही उनके घर जाता रहा हूं ( उनकी बेटी मेरी सहपाठी और अनन्य मित्र है ) और उनसे/उन जैसे अग्रजों से बातचीत/संवाद से ही थोड़ी बहुत समझ बनी है .

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  4. अत्यंत सारगर्भित लेख !केदारनाथ जी का ज़िक्र आते ही भारतेंदु , निराला से धूमिल रघुवीर सहाय, नागार्जुन तक कवियों कि एक जनवादी परंपरा कड़ी बद्ध हो जाती है !बावजूद इसके केदार जी अपनी कविता से किसी सामाजिक क्रान्ति का भ्रम नहीं पालते !'केदार जी की कविता ''आग लगे इस राम राज में /ढोलक मढ़ती है अमीर कि /चमड़ी बजती है गरीब कि /खून बहा है राम राज में राजनैतिक व्यवस्था के प्रति तीखा और खुला अंतर्विरोध है गौरतलब है कि नोबेल पुरूस्कार विजेता साहित्यकार ,ओरहान पामुक,जेलिनेक.,हेराल्ड पिंटर(नाटककार),अपने विद्रोहो स्वर के कारन निरंतर अपने देश कि सरकारों से संघर्ष रत रहे !नन्द जी और आपके द्वारा लिखे दौनों ही लेख बहुत बहुत अच्छे ...धन्यवाद

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  5. अत्यंत सारगर्भित लेख !केदारनाथ जी का ज़िक्र आते ही भारतेंदु , निराला से धूमिल रघुवीर सहाय, त्रिलोचन नागार्जुन तक कवियों कि एक जनवादी परंपरा कड़ी बद्ध हो जाती है !बावजूद इसके'' केदार जी अपनी कविता से किसी सामाजिक क्रान्ति का भ्रम नहीं पालते''(!अजय तिवारी) !'केदार जी की कविता ''आग लगे इस राम राज में /ढोलक मढ़ती है अमीर कि /चमड़ी बजती है गरीब कि /खून बहा है राम राज में राजनैतिक व्यवस्था के प्रति तीखा और खुला अंतर्विरोध है गौरतलब है कि नोबेल पुरूस्कार विजेता साहित्यकार ,ओरहान पामुक,जेलिनेक.,हेराल्ड पिंटर(नाटककार),अपने विद्रोहो स्वर के कारन ही अपने देश कि सरकारों से निरंतर संघर्ष रत रहे !नन्द जी और आपके द्वारा लिखे दौनों ही लेख बहुत बहुत अच्छे ...धन्यवाद -- Vandana shukla through mail

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  6. बेशक एक सुन्दर और सुलझा हुआ लेख. कविता में सब से विस्मयकारी प्रयोग प्रगतिशील कवियों ने ही किये. मुक्तिबोध , शमशेर, केदार , नागार्जुन, त्रिलोचन के प्रयोंगो की थाती देखें तो अज्ञेय , साही , भारती प्रभृति कवियों की प्रयोग -दरिद्रता प्रकट हो जाती है .प्रगति की कामना ही स्सर्थक प्रयोग तक ले जाती है. इस अंतर्दृष्टि ने इस लेख को सार्थक बनाया है.
    केदारजी की कविता में रोमानी तत्व की प्रक्रति की जांच जरूरी लगती है. श्रम के सुन्दरीकरण की प्रक्रिया में श्रमिक की यातना कहीं छूट जाती है , या हल्की पड़ जाती है. हिंदी कविता में श्रम का जितना गुणगान है , उतना श्रमिक के संघर्ष का बयान नहीं है. इस से जान पड़ता है श्रम के प्रति एक रोमानी दृष्टि दूर तक सक्रीय रही है .

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  7. Very good article about Kedarji. I wish to circulate my heartiest thankful feeling to all the authors and poets of "Janpaksha" for letting me know about the great authors and poets of the world (especially India) who raised the voices of downtrodden and underprivileged people.
    I didn't know much about such authors and poet as our text books have very little or no information about them and their work.
    Thank you very much for educating the people.

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स्वागत है समर्थन का और आलोचनाओं का भी…