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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मार्क्स और बाज़ार-गिरीश मिश्रा




(भले ही सोवियत संघ और उसका समाजवादी खेमा अब अस्तित्व में नहीं है फिर भी वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्लमार्क्स की प्रासंगिकता कम नहीं हुई हैं।जाने-माने अर्थशास्त्री श्री गिरीश मिश्र का यह आलेख हमने जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की फेसबुक वाल से लिया है )

 वस्तुत: अतिमंदी के वर्तमान दौर में जिन चार चिंतकों के प्रति झुकाव बढ़ा है उनमें कार्लमार्क्स प्रमुख हैं। तीन अन्य है : जॉन मेनार्ड केंस, उपन्यासकार ऐन रैंड और हीमान मिंस्की। वर्ष 2002 में न्यूयार्क से छपी जेर्री जेड मुल्लर की पुस्तक 'द माइंड एंड द मार्केट' में रेखांकित किया गया है कि एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में मार्क्सवाद के प्रति तत्काल आकर्षण कम हुआ लगता है मगर विश्लेषण के आधार और बाजार की समीक्षा के रूप में उसकी प्रासंगिकता बरकरार है। इस आकर्षण के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, मार्क्स द्वारा औद्योगिक मजदूर वर्ग की बढ़ती भौतिक विपन्नता का जोरदार तथ्यात्मक विवेचन और उसके पीछे बाजार की भूमिका को उजागर करना।

दूसरा बाजार में अन्तर्निहित प्रतिस्पर्धा को मानव संबंधों को पशु संबंधों के बराबर लाने के लिए जिम्मेदार ठहराना। बाजार द्वारा लोगों को हमेशा के लिए पेशा विशेष की जंजीर में जकड़ रखने के तथ्य को उजागर कर उसके अमानवीय स्वभाव को स्पष्ट करना।

मार्क्स का सामना पूंजीवाद बाजार से पहली बार हुआ जब वे 'राइनिशे साइतुंग' के संपादक थे। राइनलैंड के किसानों पर उस समय मुकदमा किया गया था कि उन्होंने जंगल से ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठी की जबकि जंगल सामंतों की निजी संपत्ति थी। जांच के बाद मार्क्स ने पाया कि जंगल से जलावन के लिए किसानों द्वारा लकड़ी लेना नया नहीं था।

किसान ऐसा करना अपना परंपरागत अधिकार मानते थे। सामंतों द्वारा उनको इस प्रचलित रिवाज से वंचित करने की कोशिश उनके द्वारा पूंजीवादी दृष्टिकोण अपनाने का परिणाम था। किसानों के साथ उनका पुराना संबंध खत्म हो गया था और उनके ऊपर निजी संपत्ति और मुनाफे का भूत हावी हो चुका था। इस कारण चोरी की परिभाषा भी बदल गई थी।

उधर इंग्लैण्ड में रहते हुए फ्रेडरिक एंगेल्स ने महसूस किया कि बाजार अब पारस्परिकता के सिध्दांत पर आधारित नहीं रह गया है। उस पर लालच सवार हो गया है। यही लालच एडम स्मिथ ने 'स्वहित' के बतौर पेश किया था। एंगेल्स का निष्कर्ष था कि पूंजीवाद प्रतिस्पर्धा पर आधारित होने के कारण आदमी को आदमी से भिड़ाता है। इस तरह सब परस्पर युध्दरत हैं। लोग भुक्खड़ जानवर की तरह एक दूसरे को निगलने के लिए तत्पर हैं। बाजार में व्याप्त अनिश्चितता ने लोगों को सट्टेबाज बना दिया है। मार्क्स पर एंगेल्स के इस विश्लेषण का गहरा असर पड़ा जो उनकी कृतियों को पढ़ने से स्पष्ट है। वर्ष 1844-45 मार्क्स और एंगेल्स ने अपने विचारों को स्पष्ट और सुव्यवस्थित करने में व्यतीत किया। उन्होंने कई खंडन-मंडन वाली पुस्तकें लिखीं। उन सब का प्रकाशन तुरंत न हो सका। जिस पुस्तक का उनके विचारों के सार संग्रह बतौर प्रकाशन हुआ और जिसने यूरोप में तहलका मचा दिया वह थी 'कम्युनिस्ट में निफेस्टो' या 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'।

इसमें उन्होंने उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का वर्णन किया है जिसने बाजार को जन्म दिया। उन्होंने यह तथ्य उजागर किया कि व्यक्तिगत स्वहित पर आधारित बाजार ने पहले की सारी पहचानों को धराशायी कर दिया है जो पुश्तैनी हैसियत, राष्ट्रीयता, धर्म आदि पर आधारित थीं। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य श्रमशक्ति धारक माल यानि क्रय-विक्रय की वस्तु में बदल गए और उनका मानवीय पहलू लुप्त-सा हो गया। उनकी नई कानूनी स्वतंत्रता ऐसा आवरण बन गई जिसने बाजार में माल के रूप में बनी उनकी असली हैसियत को ढंकने का काम किया। वस्तुत: तत्कालीन नई परिस्थितियों में उसने उन्हें नए प्रकार का गुलाम बना दिया। जिनका अपने समय और शरीर पर पहले की अपेक्षा काफी कम नियंत्रण रह गया।
इसके बावजूद मार्क्स ने बाजार द्वारा परम्परागत पहचानों को मिटाए जाने को एक सकारात्मक घटना बतलाई। उसने धार्मिक धारणाओं और रीति-रिवाजों द्वारा युगों से ओढ़ाई गई भ्रांति की चादर को उतार फेंका। जिससे वे अपनी असली पहचान को देख पाने में सक्षम हो गए। उनमें से अधिकतर यह जान पाए कि वे शोषित-उत्पीड़ित मजदूर या सर्वहारा वर्ग के सदस्य हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पूंजीवाद द्वारा लाई गई संपदा और प्रौद्योगिकी मानव समाज की वास्तविक मुक्ति को संभव बनाएगी और लोग प्रकृति एवं अभाव के बंधनों से स्वतंत्र हो पाएंगे।

मार्क्स का कहना था कि बाजार से सबसे अधिक फायदा पूंजीपति वर्ग को होता है जो आरंभ में क्रांतिकारी भूमिका अदा करता है और निंरतर रूपांतरण की प्रक्रिया को आरंभ करता है। जिसके दूरगामी परिणाम हैं और जिससे कोई भी अछूता नहीं रह पाता। उत्पादन के साधन लगातार बदलते हैं जिनसे न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी भारी परिवर्तन होते हैं। मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा: अमेरिका की खोज और उत्तमाशा अंतरीय का रास्ता निकाल लेने से उदीयमान पूंजीपति वर्ग के प्रसार के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ईस्टइंडीज और चीनी बाजारों, अमेरिका के उपनिवेशीकरण, उपनिवेशों के साथ व्यापार, विनियम के साधनों और माल उत्पादन में आम वृध्दि ने वाणिज्य, नौ परिवहन और उद्योग को, और फलस्वरूप लड़खड़ाते हुए सामंती समाज के क्रांतिकारी तत्वों को तेजी के साथ विकास करने का अभूतपूर्व अवसर दिया।

उद्योग की सामंती प्रणाली, जिसमें औद्योगिक उत्पादन पर बंद दरवाजों वाले शिल्प संघों का एकाधिकार होता था, नए बाजारों की बढ़ती हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए अब काफी न थी। अत: उसकी जगह विनिर्माण ने ले ली। शिल्प संघ के उस्ताद कारीगरों को विनिर्माता मध्यम वर्ग ने ढकेलकर एक ओर कर दिया। अलग-अलग निगमित शिल्पसंघों का श्रम-विभाजन प्रत्येक पृथक-पृथक वर्कशाप के श्रम विभाजन के आगे लुप्त हो गया। इस बीच बाजार बराबर बढ़ते गए और माल की मांग भी निंरतर बढ़ती गई।  तब भाप और मशीन के उपयोग ने औद्योगिक उत्पादन में क्रांति पैदा कर दी। अत: मैन्युफैक्चर का स्थान दैत्याकार आधुनिक उद्योग ने और मध्यम वर्ग का स्थान औद्योगिक धन्नासेठों ने, पूरी की पूरी औद्योगिक फौजों के नेताओं ने, आधुनिक पूंजीपतियों ने ले लिया। आधुनिक उद्योग ने विश्व बाजार की स्थापना की है, जिसके लिए अमेरिका की खोज ने पथ प्रशस्त कर दिया था। इस बाजार ने वाणिज्य, नौपरिवहन और थल संचार की जबर्दस्त उन्नति की। आगे चलकर इस उन्नति का प्रभाव उद्योग के विस्तार पर पड़ा, और जिस अनुपात में उद्योग, वाणिज्य, नौपरिवहन और रेल्वे में वृध्दि हुई, उसी अनुपात में पूंजीपति वर्ग ने उन्नति की और उसकी पूंजी बढ़ी; और उसने मध्य युग से चले आते हुए प्रत्येक वर्ग को पृष्ठभूमि में ढकेल दिया। पूंजीवादी बाजार के आगे बढ़ने के साथ ही पुराने सामंती संबंध धराशायी हो गए। उसने मनुष्य को अपने स्वाभाविक बड़ों के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला, और नग्न स्वार्थ के 'नकद पैसे-कौडी' क़े हृदय शून्य व्यवहार के सिवाय मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा संबंध बाकी रहने नहीं दिया। धार्मिक श्रध्दा के स्वर्गोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है। मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकार पत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्र्यों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करण शून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं। संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्ला, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है।' जिन पेशों के संबंध में अब तक लोगों के मन में आदर और श्रध्दा की भावना थी, उन सब का प्रभामंडल पूंजीपति वर्ग ने छीन लिया। डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि और वैज्ञानिक सभी को उसने अपना उजरती मजदूर बना लिया है। पूंजीपति वर्ग ने पारिवारिक संबंधों के ऊपर से भावुकता का पर्दा उतार फेंका है और पारिवारिक संबंध को केवल द्रव्य के संबंध में बदल डाला है। पूंजीवाद ने अपने बढ़ते माल उत्पादन के लिए बाजार की खोज में सारी दुनिया की खाक छानी। नवोदित उद्योगों के लिए कच्चे मालों की तलाश में दूरदराज गया। कालक्रम में तैयार और कच्चे माल के बढ़ते बाजार ने राष्ट्रीय एकांगीपन और संकुचित दृष्टिकोण को खत्म करना आरंभ किया। जिसका एक परिणाम हुआ साहित्य का उदय। पूंजीवादी उत्पादन का पैमाना बढ़ने से मालों का मूल्य घटा। 

बाजार में टिके रहने की मजबूती उत्पादन के उपकरणों और प्रौद्योगिकी को निरंतर बेहतर बनाने के लए प्रेरित करती है।  इस प्रकार पिछली व्यवस्थाओं की तुलना में पूंजीवाद निरंतर गतिशील मगर अस्थिर होता है। पुरानी मान्यताएं, विचार, पूर्वग्रह और मूल्य निरंतर तेजी से धराशायी होते जाते हैं। 'उत्पादन में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल-पुथल, शाश्वत अनिश्चितता और हलचल ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी हुई होती है, मिटा दिए जाते हैं, और सभी नए बनने वाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।


बाजार में पूंजीपतियों के ऊपर भारी दबाव होता है जिससे वे श्रमिकों से अधिकाधिक अधिशेष मूल्य उगाहने की हर कोशिश करते हैं। इसके लिए कार्य दिवस को यथासंभव बढ़ाने की कोशिश होती है। इस दृष्टि से अभिनवीकरण द्वारा ऐसी मशीनों, उपकरणों और प्रौद्योगिकी को काम में लाया जाता है जिससे कम समय में यथासंभव अधिशेष मूल्य के सृजन के लिए दबाव हो। कहना न होगा कि बाजार जहां एक ओर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है वहीं मेहनतकशों को अपनी ताकत पहचानकर संगठित होने के लिए प्रेरित करता है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. fb पर Mohan Shrotriya ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं जा रही. गिरीशजी को पढ़ना एक सुखद अनुभव होता है. यहां दी गई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से वे लोग बेहद लाभान्वित होंगे जिन्हें मार्क्स की बुनियादी स्थापनाओं से परिचित होने का मौक़ा नहीं मिला है. पश्चिमी देशों में मार्क्स की अचानक बढ़ी, और निरंतर बढ़ती लोकप्रियता के जो सूत्र इतिहास में दबे हुए हैं, उन्हें गिरीशजी ने करीने से उकेरा है. जो लोग मार्क्स का नाम लेते हुए भी उनके काम को भूल गए हैं, उन्हें झंकझोरने-जगाने का काम भी करेगा यह लेख. साझा करने के लिए आभार.

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  2. marksvadi vichardhara aur pooji vadi vichardhara ke madhy sanghrsh ab tej ho chuka hai ... marksvad ka astittv khatare me hai ..

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