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मंगलवार, 13 मार्च 2012

आस्कर विजेता फ़िल्में और हमारी दुनिया



  • रामजी तिवारी
स्कर पुरस्कारों की राजनीति और पक्षधरता पर केंद्रित यह महत्वपूर्ण आलेख समयांतर के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है. हम इसे यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं. जिस तरह आस्कर को लेकर एक दीवानगी हमारे यहाँ देखी जाती है, यह आलेख कई ज़रूरी मुद्दों को उठाता है और उस पूरी राजनीति का खुलासा करता है जिसमें नोबल और आस्कर जैसे सम्मान अमेरीकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के उपकरण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं. 




गत 27 फ़रवरी को आस्कर पुरस्कारों की घोषणा की गई और अगले दिन सभी भारतीय अखबार और टी.वी. चैनल इस समाचार को गाते मिले | इसके पूर्व भी भारत में इसकी प्रतिक्रिया व्यापक रूप से महसूस की जाती रही है | जिस फिल्म द आर्टिस्ट को इस वर्ष का आस्कर पुरस्कार दिया गया , उसने दुनिया की प्रत्येक सी.डी. लाइब्रेरी में  वर्षों तक के लिए अपना स्थान पक्का कर लिया | आस्कर पुरस्कारों का ठप्पा लगना इस बात के लिए काफी माना जाता है कि वैश्विक स्तर पर इस फिल्म की मांग भविष्य में भी हमेशा बनी रहेगी | जीतने वाली फिल्मों के अलावा यह बात आस्कर के लिए नामांकित फिल्मों पर भी लागू होती है | अगली बार जब आप सी.डी. लाइब्रेरी में जायेंगे , तो आपको वह दुकानदार उस सी.डी. रैपर के ऊपर लिखा आस्कर नामांकन का सन्देश अवश्य दिखायेगा और आप उसे देखना भी चाहेंगे | वर्ष 2008 में इस पुरस्कार को जीतने वाली फिल्म स्लमडाग करोड़पतिऔर उसमे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार जीतने वाले ए.आर.रहमान के प्रति हमारा दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करता है | आज इस बात पर कम ही बहस होती है , कि जय होन तो गुलजार का सर्वश्रेष्ठ गीत है और न ही उसमे दिया गया संगीत ए.आर.रहमान की क्षमता की बुलंदी है |रही बात फिल्म की तो उसे भी सिर्फ इसीलिए आलोचनात्मक तरीके से विश्लेषित नहीं किया जाता क्योकि उसने आस्कर पुरस्कार जीता है |अन्यथा आप तो यह जानते ही हैं कि वह फिल्म समाज और जीवन के सामान्य धारा की कहानी नहीं कहती , वरन अपवाद के विजय की दास्तान को महिमामंडित करती है , जिसे पूंजीवादी दौर ने आम-सामान्य लोगों के गिरते पस्त मनोबल को बचाने के लिए एक स्वप्न के रूप में गढ़ा है | वर्तमान व्यवस्था इस भय से कांपती रहती है कि आमसामान्य जन के मन में इस व्यवस्था के प्रति जो आक्रोश और गुस्सा उत्पन्न हुआ है , वह कहीं फूट ना जाये |इसीलिए वह हमें स्वप्न के इस छलावे में रखना जरुरी समझती है कि तुम भी सिंहासन की उस स्वप्निल कतार में  पहुँच सकते हो , बशर्ते कि भाग्य तुम्हारा भी साथ दे |

                           
पूरी दुनिया में आस्कर पुरस्कारों के प्रति मोह और भ्रम पाया जाता है , जबकि हकीकत यह है कि ये पुरस्कार अमेरीकी फिल्म इंडस्ट्री हालीवुडके पुरस्कार  हैं , जिसे एकेडमी आफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एण्ड साइंसेजद्वारा प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है | इनका आरम्भ 1929 में किया गया था और इस वर्ष द आर्टिस्ट फिल्म को प्रदान किया जाने वाला यह 84 वां  आस्कर पुरस्कार है | इसमें नामांकन के लिये यह आवश्यक है कि वह फिल्म लॉस-एंजलिस के कैलीफ़ोर्निया शहर में उस वर्ष जनवरी से दिसंबर के मध्य रिलीज हो | मोशन पिक्चर्स अकादमी के सदस्य ही इसकी चयन समिति के सदस्य होते हैं, जिनकी संख्या तो घोषित नहीं है लेकिन अनुमानतः यह 6000 के आसपास है | अभी तक 84 वर्षों के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली सिर्फ आठ ही फिल्मे ऐसी हैं , जो हालीवुड से बाहर बनी हैं और आश्चर्यजनक तरीके से बाहर के इस देश का नाम ब्रिटेन ही है  | ये पुरस्कार कुल 24 श्रेणियों में प्रदान किये जाते हैं , जिसमे एक श्रेणी विदेशी फिल्मों की भी है | पहले इस श्रेणी में 5 फिल्मों का नामांकन होता था , जिसे आजकल बढाकर 10 कर दिया गया है |विदेशी भाषा के लिए अलग से रखी गई इसी श्रेणी की वजह से दुनिया भर में यह भ्रम गाढ़ा हो जाता है कि इन पुरस्कारों की व्याप्ति वैश्विक है |

                          
 इन सवालों को देखने से पहले हमें फिल्मों के स्वरुप और उद्देश्य को भी देख लेना चाहिए | आखिर इनके बनने और देखे जाने के पीछे कौन सी मानसिकता कार्य करती है |वह कौन सी चीज है जो आपको सिनेमा घरों तक खींच ले जाती है | क्या यह मनोरंजन तक सीमित है ? या फिर इनके बनाने में इस्तेमाल की गई तकनीक का आकर्षण आपको खींचता है  ? वह अभिनय है या पटकथा , गीत है या संगीत जिसे देखने के लिए आपका मन कुलबुलाता है ? दरअसल फिल्मे इन सबके होते हुए कुछ और बातों के लिए भी देखी और बनाई जाती हैं | वे अपने समय और समाज का आख्यान होती हैं | वे आईना होती हैं , जिसमे एक तरफ समाज अपना ऐतिहासिक चेहरा देखता है , तो दूसरी तरफ उस चेहरे को भविष्य में बेहतर बनाने का सपना भी संजोता है | बेशक फिल्मो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, फिर भी कला और मनोरंजन को साथ रखते हुए इन पर मानव सभ्यता के इतिहास को रचने और जाँचने की जिम्मेदारी तो आयत होती ही है | रचनात्मक विधा के रूप में फिल्मों की भूमिका साहित्य जैसी ही होती है , जिनके ऊपर समाज को विश्लेषित करने के साथ-साथ उसे दिग्दर्शित करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई मानी जाती है | सो फिल्मों में अपने समय की इबारतों को पढ़ने की ईच्छा रखना बेमानी नहीं है | और जहाँ सर्वश्रेष्ठ फिल्मो की बात हो , तो उनमे इस इबारत को और साफ-साफ पढ़ने की ईच्छा होनी ही चाहिए |

तो इन पुरस्कारों की वैश्विक पहचान और स्वीकृति के आधार पर यदि हम इसकी पड़ताल करते हैं कि इनके 84 वर्षों के इतिहास में हमारे समय और समाज की कोई तस्वीर बनती भी है या नहीं, तो हमें निराशा ही हाथ लगती है |हमारी इस पड़ताल का आधार सर्वश्रेष्ठ फिल्मो की श्रेणी है , जो इन पुरस्कारों की रीढ़ भी मानी जाती है और जिसे समारोह के अंतिम पुरस्कार के रूप में दिया जाता है | इन वर्षों की दुनिया पर जब हम नजर दौड़ते हैं , तो पाते हैं कि 1929 से लेकर 1945 तक के 16 वर्षों को छोड़कर , बाकि समय में इस दुनिया पर अमेरिकी आधिपत्य और प्रभुत्व साफ़-साफ़ दिखाई देता है | जाहिर है कि यदि फिल्मे समय और समाज का आईना होती हैं , तो उनमे भी यह झलक मिलनी ही चाहिए |
                       
 एक ऐसा देश जो अपने आपको दुनिया का लम्बरदार समझता है , जिसके दुनिया भर में प्रत्यक्ष और परोक्ष सैनिक अड्डे हैं , जिसे प्रत्येक घटना को अपने अस्तित्व से जोड़कर देखने की आदत है और जो दुनिया को अपने हिसाब से संचालित करने की अपनी ईच्छा को कभी नहीं छिपाता , उसकी फिल्मो को देखने का आधार भी वैश्विक ही होना चाहिए | हम ऐसी आशा किसी तीसरी दुनिया की फिल्म इंडस्ट्री से नहीं कर सकते क्योकि इन देशो की दुनियावी दखल बेहद सीमित और स्थानीय होती है | अमेरिका की बात आते ही हमारे जेहन में, दुनिया के चौधरी बनने वाली उसकी तस्वीर सामने उभरती है | वह एक ऐसा देश है जो अपने भीतर से अधिक अपने बाहर जीता है और इस बाह्य जीवन के स्पष्ट कारण भी हैं | संपत्ति , सत्ता और ऐश्वर्य के शिखर पर बैठे होने की त्रासदी उसके पैरों में चक्कर बनाती है और वह देश उसे और अधिक  सुरक्षित करने की तलाश में “और-अधिक और-अधिक” बटोरने को ही अपना ध्येय मानने लगता है |
                    
 जाहिर है , ऐसे देश की फिल्मो पर इस बाहरी जीवन का असर स्पष्टतः परिलक्षित होना चाहिए | कहना न होगा कि हालीवुड की फिल्म इंडस्ट्री हमें इस मुद्दे पर निराश भी नहीं करती | उसके निर्माताओं की  जापान से लेकर रूस , चीन , कोरिया , भारत और मध्य-पूर्व होते हुए अफ्रीका ,यूरोप और दक्षिणी अमेरिका को नापने वाली ईच्छा से हम सब परिचित हैं | अब यह बात अलग है कि उसका नायक अनिवार्यतः अमेरिकी ही होता है | यदि हम उस देश के जीवन को आधे-आधे भागो में बाँट दे , और जो तार्किक भी है , तो उस लिहाज से कम से कम 40 पुरस्कृत फिल्मों में उसका यह बाह्य जीवन दिखाई देना चाहिए | आस्कर विजेता फिल्मों की सूची देखने पर यह संख्या कुछ कम जरुर दिखाई देती है , लेकिन इतनी भी कम नहीं कि हम यह पड़ताल ही नहीं कर सकें कि वे फ़िल्में दुनिया को किस नजर से देखती हैं | हाँ....जरुरी नहीं कि उनका विषय राजनीतिक ही हो , लेकिन उनके बहिर्मुखी होने की आशा तो होनी ही चाहिए |
                            
1929 में आरम्भ इन पुरस्कारों को परखने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि उसके बाद की दुनिया की हलचलों और परिवर्तनों की झलक इन फिल्मो में कितनी मिलती है | इनमे उन घटनाओ की ओर विशेष नजर होनी चाहिए , जिनमे अमेरिका मुख्य भागीदार रहा है | फिल्म पुरस्कारों के आरम्भ के बाद की सबसे बड़ी घटना दूसरे विश्व युद्ध का पागलपन और उस समाप्त होते युद्ध पर अमेरिकी परमाणु बम के भौतिक प्रयोग की कोशिश है | लेकिन आस्कर विजेता फिल्मों की सूची  देखने पर आपको यह जानकार हैरानी होती है कि इनमे इस पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मे लगभग गायब हैं और जो तीन फ़िल्में इस युद्ध से कहीं न कहीं जुड़ती हैं , वे भी उन बर्बर और पाशविक कुकृत्यों को दूर से ही छूकर निकल जाती हैं | 1946 की फिल्म “बेस्ट इयर्स आफ आवर लाइफ्स” हो या 1957 की फिल्म “द ब्रिज आन द रिवर क्वाई” , दोनों में से किसी भी फिल्म से युद्ध की तस्वीर साफ़ नहीं होती | तीसरी फिल्म “शिंडलर्स लिस्ट” है , जो रोंगटे खड़ी कर देने वाली विभत्सताओं के मध्य मानवीय मूल्यों के बचे होने को रेखांकित करती हुयी एक अदभुत फिल्म है , लेकिन इसमें अमेरिका कहीं नहीं आता | वहीँ विश्व युद्ध के दो सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव भी इस सूची से गायब ही दिखाई देते हैं |  लेनिनग्राद की हिटलर द्वारा की गई घेरेबंदी , जहाँ से युद्ध निर्णायक मोड़ इख्तियार करता है और हिरोशिमा-नागासाकी पर डाले गए परमाणु बमों की दास्तान , जिनका भविष्य की दुनिया पर आकलित प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योकि यह मानव जाति के अस्तित्व से जुड़ा हुआ सवाल है , के दृश्य किसी भी फिल्म के कैमरे में दर्ज दिखाई नहीं देते हैं |
                                
उसी तरह तीसरी दुनिया की आजादी का संघर्ष भी इस सूची से लगभग नदारद है | यहाँ रिचर्ड एटिनबरो द्वारा निर्देशित फिल्म “गाँधी” यदि पुरस्कृत दिखाई भी देती है , तो इसलिए कि उसमे लगे दाग-धब्बे ब्रिटिश समाज को कलंकित करते हैं , न कि अमेरिकी चेहरे को | इस सूची में दक्षिणी अमेरिका को अपने पंजो में कसने के लिए चली गई अमेरिकी चालें भी सिरे गायब हैं | वहाँ ना तो क्यूबा आता है और ना ही निकारागुआ | इनसे तो यह भी नहीं पता चल पाता कि इस महाद्वीप में पिट्ठू तानाशाहों के माध्यम से हथियारों और मादक द्रव्यों की तस्करी का अमेरिकी खेल कितना भयावह है | पूरे अफ्रीका को कबीलाई झगडो में उलझाकर वहाँ के खनिज उत्पादों को किस प्रकार अपने देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया गया है , इसकी हवा तक नहीं लगती | अफ्रीका केंद्रित आस्कर विजेता फिल्म “आउट आफ अफ्रीका” (1985) केन्या की तरफ नजर तो उठाती है , लेकिन इसमें अमेरिका नहीं आता | वहीँ चीन की साम्यवादी क्रांति पर भी आस्कर की नजर बेहद सतही और दूर की है | 1987 की विजेता फिल्म “द लास्ट एम्परर” उस प्रक्रिया को नहीं समझाती , जिसने चीनी क्रांति को जन्म दिया |
                              
अब हम उस सबसे महत्वपूर्ण दौर पर आते हैं , जिसने अमेरिका को अंदर तक मथ दिया था | और वह था “वियतनाम का युद्ध” | इस पर बनी दो फिल्मो 1978 की “डियर हंटर” और 1986 की “प्लाटून” को आस्कर पुरस्कार मिले हैं | “डियर हंटर” वियतनाम युद्ध के अमेरिका पर पड़ने वाले प्रभाव को अमेरिकी समाज के माध्यम से देखती है और वहाँ अगर वियतनाम का मोर्चा आता भी है , तो वह एक ट्रेलर के रूप में गुजर जाता है | उससे हमें उसकी जमीनी हकीकते पता नहीं चल पाती | अलबत्ता “प्लाटून” वियतनाम में चलती हुई फिल्म है , लेकिन यहाँ भी कैमरा अमेरिकी सैनिकों की जिजीविषा और संघर्षो की कहानी पर ही केंद्रित रहता है | वह यह गोल कर जाता है कि शेर और मेमने के इस युद्ध में जब शेर ने इतने घाव खाए थे तब मेमने का क्या हुआ होगा |
                            
आखिर दुनिया वियतनाम युद्ध को किसलिए याद करती है | वह अमेरिकी गुरुर के टूटने और बिखरने का युद्ध है , जो अमेरिका और वियतनाम के साथ-साथ पूरी दुनिया पर भी अपना गहरा असर छोड़ता है | वियतनाम का पडोसी थाईलैंड आज जिस “अन्तर्राष्ट्रीय चकलाघर” के रूप में जाना जाता है , वह अमेरिका के लिए उसी युद्ध में निभायी गई खातिरदारी का परिणाम और उत्पाद है | जब अमेरिकी सेनाओ को मनोरंजन के लिए वेश्याओ की आपूर्ति की गई थी और बदले में उस देश को डालर की चमक में नाथ दिया गया था | आज भी वह देश उसी नथिये में घिसट रहा है | कोई भी आस्कर विजेता फिल्म इस प्रकाश नहीं डालती | “ऐसा क्यों है ..?” के जबाब में एक प्रसिद्द अमेरिकी फिल्म निर्देशक अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं “ यह अमेरिका की दुखती हुई रग है | न तो कोई इस पर फिल्म बनाना चाहता है और न ही देखना |” जाहिर है कि इस स्थिति में पुरस्कृत होने की बात ही बेमानी है |
                               
दरअसल अमेरिका जब भी अपनी चौखट से बाहर निकलता है , वह ‘वियतनाम युद्ध’ जैसे सवालो से अपने आपको घिरा हुआ पाता है | मध्यपूर्व से लेकर अफ्रीका के तानाशाहों तक , इराक से अफगानिस्तान तक , हथियारों की बिक्री से हिरोशिमा के हाहाकार तक और धरती के गर्भ में सुरक्षित तेल भंडारों से अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में तार-तार होती ओजोन परत तक , यह देश जहाँ भी देखता है , उसे वियतनाम ही दिखाई देता है | यही दुखती राग उसे इन विषयों पर फिल्म बनाने से रोकती है | वह अपनी खोल में सिमट जाता है और जब कभी कोई निर्माता-निर्देशक इससे बाहर निकलने का साहस दिखाता है , तो आस्कर की निर्णायक मंडली उसे कूड़ेदान में फेंक देती है | ऐसी स्थिति में आस्कर पुरस्कारों की सूची से अमेरिका के इस बाह्य जीवन की अनुपस्थिति स्वाभाविक ही लगती है |
                                
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सोवियत पराभव की दास्तान तक की कहानी शीत युद्ध की तिकडमी चालों की कहानी है | ऐसी चालों की कहानी , जिसमे कौन आपका मित्र है और कौन शत्रु , जान पाना कठिन है | वह जो आपको मदद करने वाला है , आपके पिछवाड़े आग भी सुलगा रहा होता है |दुनिया के क्रूरतम अधिनायकों को इसलिए पोसा और पाला जाता है , कि संतुलन कायम रखना है |आस्कर पुरस्कार विजेता फिल्मे इस सच्चाई को जानती ही नहीं | वो यहाँ भी वही शातिराना चुप्पी अख्तियार करती है |इस सूची में ईरान-इराक संघर्ष के साथ-साथ अरब-इसराइल संघर्ष भी सिरे से नदारद है | ये दोनों युद्ध हांलाकि अमेरिका से दूर और उससे अलग देशों के बीच लड़े गए, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि अमेरिका यहाँ उतना दूर खड़ा नहीं था , जितना वह इन देशो से भौतिक दूरी पर निवास करता है |
                             
पूरा अरब जगत आज जिन सर्वसत्तावादी अधिनायको को जनविद्रोह के माध्यम से चुनौती दे रहा है , उन अधिनायकों को पोसने-पालने  वाले उसी अमेरिका में निवास करते हैं , जहाँ हालीवुड फिल्म इंडस्ट्री कार्य करती है |सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात , बहरीन , क़तर और कुवैत सरीखे देशों के सुल्तानो और अमीरों का अलोकतांत्रिक शासन वाशिंगटन की मदद और मर्जी से ही चलता है | लोकतंत्र की दुहाई देने वाला अमेरिका इन तानाशाहों और एकाधिकारवादी शासकों में ही अपना हित देखता है |वह यहाँ लोक के तंत्र की कमान संभालने से ही सिहर उठता है, तभी तो   आज जब इन देशों में एक-एक कर सत्ताए घुटने टेक रही हैं , तो उसे सांप सूँघा हुआ है |वह इस विभ्रम का शिकार है कि अब लोकतंत्र की घंटी को कैसे बजाया जाए, कि वह बजती तो दिखे , लेकिन उसकी आवाज उसके कानों तक ना पहुंचे | यह सूची तेली की इस घानी को चुपचाप अनदेखा करती हुई गुजर जाती है , क्योकि वह जानती है कि इसमें आधा तेल और आधा क्रूरता की कहानी है |
                            
 इस सदी के आरम्भ में ही 9/11 की घटना हो जाती है , जिसमे अमेरिका पहली बार आतंकवाद के वृक्ष के उस फल को सीधा चखता है , जिसे उसने शीत युद्ध के दौरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बोया था | जिस अफगानिस्तान की पहाड़ियों और पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत प्रान्त की खाईयों में वह “आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध” लड़ रहा है ,वहाँ की फसलों को आखिर किसनें बोया है ? फिर आज जब वे खड़ी होकर लहलहाने लगी हैं , तो उसे कँपकपी क्यों छूट रही है ? आस्कर पुरस्कारों की सूची इस संपूर्ण परिदृश्य को भी साफ़ नजरंदाज कर देती है |
                               
 इराक के एक देश के रूप में बर्बाद हो जाने के पीछे भी अमेरिका ही है | जैविक और रासायनिक हथियारों की खोज के नाम पर आज इराक बारूद के ढेर पर बैठा देश बन गया है | आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ..? लेकिन आस्कर की सूची यहाँ भी वही शातिराना खेल खेलती है , जिसे वियतनाम युद्ध पर वह आजमा चुकी है | 2009 की विजेता फिल्म “हर्ट-लाकर” के सहारे यहाँ भी चुप्पी तो तोड़ी जाती है , लेकिन इस फिल्म को देखकर आप सिर्फ यह जान पाते हैं , कि बम निरोधक दस्ता युद्ध से कराह रहे एक देश में किस प्रकार काम करता है | एक ऐसे देश में , जिसके कदम-कदम पर बारूदी सुरंगों और बिस्फोटकों को बो दिया गया है | अब आप ही बताईये कि क्या इराक युद्ध की कहानी को आप इसी पटकथा के सहारे पकड़ पायेंगे..? क्या आप यह जान पाएंगे कि एक नालायक बेटे ने अपने क्रूर बाप द्वारा आरम्भ किये गए इस युद्ध को अंजाम तक पंहुचाने के नाम पर लाखों लोगों की बलि चढ़ा दी | इराक युद्ध एक देश के साथ-साथ, एक व्यक्ति के अहंकार की तुष्टि की भी घृणित मिसाल है , जिसे ‘हर्ट-लाकर’ फिल्म दूर-दूर तक नहीं जानती |
                                 
आस्कर की इस सूची में कामेडी और ऐतिहासिक फिल्मो की भरमार है |लेकिन यहाँ की कामेडी दूसरे की फिसलनो से उपजी हुए कामेडी है | उनमे यह साहस नहीं है कि वे अपने ऊपर भी हँसे | रही बात ऐतिहासिकता की , तो वह रोमन साम्राज्य से लेकर मध्ययुगीन अन्धकार तक गोते जरुर लगाती है , जिसमे ‘बेन-हर’ , ‘ग्लेडिएटर’ और ‘ब्रेभहार्ट’ जैसी बेहतरीन फिल्मो की उपस्थिति भी है , लेकिन यह सूची अपने समाज की रक्तिम बुनियादों की तरफ नजर उठाकर नहीं देखना चाहती | अपने ही देश के मूल निवासियों के साथ उसने कैसा व्यवहार किया है , विजेता फिल्मों की सूची इस पर पूरी तरह मौन है |
                                  
 यहाँ पिछले दो दशक की फिल्मो पर एक सरसरी निगाह डालना उचित होगा , जिससे यह समझा जा सके कि दुनिया में इस दौरान हुए बदलाओं का आस्कर विजेता फिल्मो पर कितना असर पड़ा है | 1991 की विजेता फिल्म ‘द साइलेंस आफ लैम्ब्स’ अपराध की थ्रिलर फिल्म है |1992  में क्लिंट ईस्टवुड निर्देशित फिल्म ‘अन्फारगिभेन’एक हत्यारे के जीवन पर आधारित है |1993 की फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ है , जिसका जिक्र पहले ही किया जा चुका है | 1994 की विजेता फिल्म फारेस्ट गम्प है , जो बीसवीं सदी की घटनाओं को एक सरसरी निगाह से देखती है | 1995  की ब्रेभहार्ट और 2000 की ग्लेडिएटर ऐतिहासिक फिल्मे हैं, जिसमे अमेरिका कहीं नहीं आता |1996 की विजेता ‘इंग्लिश पेशेंट’ एक रोमांटिक ड्रामा है , जबकि 1997  की टाईटेनिक इसी नाम के समुद्री जहाज के डूबने की पड़ताल करती कहानी पर आधारित है | 1998 की विजेता फिल्म ‘शेक्सपीयर इन लव’ एक रोमांटिक कामेडी है और 1999 की विजेता ‘अमेरिकन ब्यूटी’ अमेरिकी मध्य वर्ग को दिखाती एक सेटायर है | 2001  की ‘ब्यूटीफुल माइंड’ ,2002 की ‘शिकागो’, 2003 की ‘लार्ड आफ द रिंग्स’, 2004  की ‘मिलियन डालर बेबी’, 2005 की ‘क्रैश’, 2006 की ‘डिपार्टेड’, 2007 की ‘नो कंट्री फार ओल्ड मैन’ , 2008 की ‘स्लमडाग करोडपति’, 2009 की ‘हर्ट लाकर’  और 2010 की विजेता फिल्म ‘द किंग्स स्पीच’ में से अधिकतर फिल्मे अमेरिका के भीतर की कुछ पड़ताल तो करती है , वह चाहें उसके अपराध का ही चेहरा क्यों ना हो, लेकिन इसके द्वारा किये गए उन अपराधों पर मौन साध लेती है , जिससे यह दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है |
                             
आस्कर विजेता इन फिल्मों को देखने के बाद आप इस दुनिया और समाज की सामान्य समझ भी विकसित नहीं कर पाएंगे और न ही इनसे आप कोई ऐसी तस्वीर ही बना पाएंगे , जिसे पिछली सदी ने अपने रंगों और खून के छीटों से भरा है | यहाँ आत्ममुग्ध अमेरिका का चेहरा ही दिखता है , जो हमसे यह सवाल करता है कि “आखिर पूरी दुनिया हमसे घृणा क्यों करती है ...?” जबाब जानने से पहले उसका अहंकार सामने आ जाता है और अपने को श्रेष्ठ समझता हुआ वह उठकर चल देता है |
                                
यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि हम अमेरिकी फिल्म इंडस्ट्री से इस तरह के सिनेमा की उम्मीद ही आखिर क्यों करें ..? वह भी तो एक देश ही है , जिसे अन्यों की भांति अपने भीतर देखने की इजाजत होनी चाहिए | उसकी फ़िल्में दुनिया के झमेलों में अपना सिर क्यों खपाए ..?..बात में दम है , लेकिन क्या अगली बार जब आप सी.डी. लाईब्रेरी में जायेंगे तब अब्बास किआरुस्तामी और कुरुसोवा की , मजीदी और आर्सन वेल्स की , बेला तार और इंगमार बर्गमैन की , अल्मोडोवर और माइकल हैंक की या फिर इल्माज गुने और जोल्टन फाबरी की फिल्मो को देखने की ईच्छा व्यक्त करेंगे..?..क्या आप चाहेंगे विमल राय, सत्यजीत राय , अदूर गोपालकृष्णन और जाहनु बरुवा की फिल्मो को  देखना ..? यदि हां तो मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है | और यदि नहीं तो मुझे यह पड़ताल जारी रखनी पड़ेगी |यदि अमेरिका अपने आपको दुनिया का चौधरी और अगुवा समझता है , तो उसकी फिल्मो में भी हमारी इस दुनिया की झलक मिलनी चाहिए | साथ ही साथ उन फिल्मो को पुरस्कृत भी होना चाहिए , जिसमे यह चेहरा साफ़ और स्पष्ट दिखाई देता है |
                               
आस्कर पुरस्कारों को देखकर नोबेल पुरस्कारों की याद आती है और याद आते हैं ‘तालस्तोय’ अपने प्रश्न के साथ कि “एक आदमी को आखिर कितनी जमीन चाहिए ..?” आपको क्या लगता है कि इस दुनिया के आकाश से पाताल तक को अपने कब्जे में करने की ईच्छा रखने वाले इस प्रश्न के उत्तर में उन्हें ‘नोबेल पुरस्कार’ दे देते ..?और तब क्या नोबेल के नहीं मिलने से ‘तालस्तोय’ सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार नहीं रह जाते ..? यही वह मिथक है , जिसे आज तोडने की आवश्यकता है |  आस्कर पुरस्कार उसे नहीं मिलता , जिसमे हमारे समय और समाज का चेहरा दिखाई देता है और न ही आस्कर पुरस्कार जीत जाने से ही कोई फिल्म श्रेष्ठ हो जाती है | हमें इस मिथक से भी निजात पानी होगी कि दुनिया की सारी श्रेष्ठ फ़िल्में हालीवुड इंडस्ट्री में ही बनती हैं |  
                              
यदि आप दुनिया की तस्वीर को फिल्मों के माध्यम से जानना चाहते हैं तो आपको जापान से लेकर अमेरिका तक की यात्रा करनी होगी | इसमें तमाम पड़ाव आयेंगे और आपको वहाँ रूककर उसे देखना और समझना होगा | जाहिर है कि अमेरिका भी इसमें एक पड़ाव होना चाहिए , न कि आपका स्थाई निवास | क्या आप जानते हैं कि एक औसत अमेरिकी दुनिया की फिल्मों के बारे में क्या राय रखता है ..? वह किस ठस अहंकार से उन्हें अनदेखा करता है ..? वह तो तीसरी दुनिया की फिल्मो को , उसके समाज जैसा ही, देखने लायक भी नहीं समझता | और हम हैं कि उसको देखे बिना दुबले हुए जा रहे हैं | यह ठीक है कि उनकी फिल्मे तकनीकी आधार पर बहुत उन्नत होती हैं और उनकी वित्तीय ताकत उन्हें बनाने का एक मजबूत आधार भी प्रदान करती है , लेकिन क्या वित्त और तकनीक के आधार पर ही कोई फिल्म श्रेष्ठ या कमजोर हो सकती है ..? दुनिया के स्तर पर फिल्मों का इतिहास इस प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ में देता है | फिल्मो में कालजयिता , दृष्टि  संवेदना और सरोकार से मिलकर आती है , न कि वित्त और तकनीक के बल पर | इनकी भूमिका उनके सहयोगी जैसी ही हो सकती है , उससे अधिक नहीं |
                                
 हमारे अपने आँगन में सत्यजीत राय, विमल राय ,श्याम बेनेगल, गौतम घोष, अदूर गोपालकृष्णन , जाहनु बरुवा जैसे कई महत्वपूर्ण फिल्मकार मौजूद रहे है , जिनकी फिल्मे दुनिया भर में देखी और सराही जाती हैं | जापान, ईरान, तुर्की, इटली, पुर्तगाल , चीन , फ़्रांस और कोरिया जैसे देशो की फ़िल्में आज दुनिया भर में धरोहर के रूप में देखी-परखी जाती हैं | इनमे वे सारे रंग हैं, जिनसे आपकी फ़िल्मी दुनिया की मुकम्मल तस्वीर बन सके | आप उसमे अपने समय और समाज का चेहरा भी देख पाएंगे और साथ ही साथ यह भी जान सकेंगे कि उसे कैसा होना चाहिए | विश्व सिनेमा के सितारे सिर्फ हालीवुड के आँगन में ही नहीं टिमटिमाते , वरन वे उन खेतों और जंगलों , नदियों और पहाड़ों के ऊपर भी चमकते हैं , जिन्हें आप हासिये के बाहर का मानकर छोड़ आये हैं | आज हालीवुड की स्थिति साहित्य सरीखी हो गई है , जिसमे चर्चा का केंद्र महानगर तो होता है , परन्तु रचनात्मकता का नहीं | वहाँ तो तिकडमों के पीछे अवसाद और सन्नाटा पसरा हुआ है और सृजन के नाम पर सिर्फ फतवे दिए जाते हैं, जबकि सुदूर इलाके लगातार चुपचाप अपना काम करते चले जा रहे हैं |
                            
 इस आँगन से बाहर निकलकर आप सीधे पश्चिम की तरफ ना चल पड़ें , वरन चारो ओर दृष्टिपात करें | दुनिया के सतरंगी फिल्मकार आपको अपनी साधना में लीन मिलेंगे | तो अगले वर्ष के नामांकन और उसकी घोषणा के समय आप आस्कर पुरस्कारों को एक देश की फिल्म इंडस्ट्री के पुरस्कारों के रूप में ही देखें और सर्वश्रेष्ठ सिनेमा को देखने की ईच्छा के मन में आते ही भारत की अन्य भाषाओ से गुजरते हुए दुनिया भर के सिनेमा की गलियों को भी छानें | वह समय आपके सिने शौक के साथ-साथ स्वयं सिनेमा के लिए भी शुभ होगा ....|

                                             

                                    
                                      
                           
                             








                         

                         

14 टिप्‍पणियां:

  1. बाहुत बहुत बढिया , अगर आप इसका अंग्रेजी अनुवाद कर दे तो मै इसको अपनी वेबसाइट ..www.filmsforliberation.com पर प्रकाशित करने में इच्छुक हूँ ,, धन्यवाद

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  2. achchha aalekh hai. hindi me sahitya ke alawa itar vishayon pr kam hi likha jata hai, us lihaj se bhi yah aalekh ek uplabdhi hai janpaksh ki. badhai ramji bhai ko.

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  3. पता नहीं क्‍यों दुनिया को हर नजरिये से देखने के लिए खुदका चश्‍मा लगाने वाले इस चौधरी ने क्‍या पूरी दुनिया की सियासत, संस्‍कृति,
    कला, इतिहास को इतना क्‍या मजबूर कर दिया है कि उसके खिलाफ कुछ किया ही नहीं जा सकता. निश्‍चित ही इस आलेख के बिना एक बेहद महत्‍वपूर्ण और जानकारी परख दुनिया की राजनीति हमारे सामने नहीं आ पाती. बहुत बहुत बधाइयां...

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  4. बहुत अच्छा ल्र्ख है. पुस्तक मेले के दौरान भारतीय सिनेमा पर चर्चा के दौरान किसी बेवकूफ ने फारुख शेख से पूछा कि हमारी फिल्मों को आस्कर क्यों नहीं मिलता तो उसने हिकारत से प्रश्नकर्ता को देखा और कहा कि हमारे यहाँ के पुरष्कार कितने विदेशियों को मिलते है? आस्कर भला उत्कृष्ट सिनेमा का पिमाना है? विदेशी ठप्पे की लालसा उपनिवेशिक मानसिकता का घृणित नमूना है. लेखक ने इस बात का भी अच्छा खुलासा किया है. शुक्रिया.

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  5. बहुत अच्छा ल्र्ख है. पुस्तक मेले के दौरान भारतीय सिनेमा पर चर्चा के दौरान किसी बेवकूफ ने फारुख शेख से पूछा कि हमारी फिल्मों को आस्कर क्यों नहीं मिलता तो उसने हिकारत से प्रश्नकर्ता को देखा और कहा कि हमारे यहाँ के पुरष्कार कितने विदेशियों को मिलते है? आस्कर भला उत्कृष्ट सिनेमा का पिमाना है? विदेशी ठप्पे की लालसा उपनिवेशिक मानसिकता का घृणित नमूना है. लेखक ने इस बात का भी अच्छा खुलासा किया है. शुक्रिया.

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  6. see whatever written is true, but what we can realize by popularity of oscars is the fact that "publicity" is the main cause of what makes something famous..
    to make a 'class' is one thing, but to publicize it is other..
    West, America, Oscars these words fascinates us & its all because they can publicize themselves here. they can make us feel, life is better in west, movies are better .. (I'm not arguing is its true or not)

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  7. Amazing facts, really worth reading, Thanks
    Moreover my conclusion is;
    what we can realize by popularity of oscars is the fact that "publicity" is the main cause of what makes something famous..
    to make a 'class' is one thing, but to publicize it is other..
    West, America, Oscars these words fascinates us & its all because they can publicize themselves here. they can make us feel, life is better in west movies are better .. (I'm not arguing is its true or not)
    (sorry i don't know how to type in Hindi)

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  8. आस्कर के मनोविज्ञान की पड़ताल करती बढ़िया रिपोर्ट....आपने सिरे से खारिज ही कर दिया है आस्करी आपाधापी को .... निश्चित रूप से हमारे यहाँ से नामित होने वाली फिल्मों के लेकर एक संदेह तो पहले से हमारे मन में होता था और आपने उस सिरे से खड़े होकर जब हमें पूरा दृश्य दिखाया तो अब भारतीय सिनेमा दर्शकों के मन से वह सब्जबागी आकर्षण भी जाता रहेगा...सही भी तो है ...अवतार जैसी फिल्मों को तो हमारी क्षेत्रीय भाषी फिल्में ही पटखनी दे दे... आस्कर को लेकर अपने यहाँ जिस प्रकार की हाय तौबा है वैसा किसी तमिल फिल्म को फिल्म फेयर मिल जाए तो भी नहीं होगा.. :) शुक्रिया हम सिनेमा-मूर्खों के ज्ञान चक्षु खोलने के लिए.. :)

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  9. घर की रसोई छोड़ पराये परोसों पर लार टपकाने की मानसिकता पर चोट, शोधपरक तथ्यपरक 'ज्ञानचक्षु' खोलता, विभ्रम खंगालता लेख है ..तिवारी जी का परिश्रम झलकता है ..

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  10. आस्कर फिल्मों और अमेरिका पर यह एक शोधपरक लेख है लेकिन राम जी तिवारी जी थाईलैंड के बारे में बड़ी सतही बात कर गए हैं ! उसकी जरुरत नहीं थी !

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  11. रामजी तिवारी ने बहुत मेहनत के साथ यह लेख लिखा है, ८४ साल के आस्कर इतिहास को एक लेख में समेटना यूं कोई आसान काम नहीं, लेकिन जिन्हें इस विषय में रुचि है वे शायद अतृप्त ही समझें..आस्कर के राजनीतिक अर्थशास्त्र को कायदे से रेखांकित किया गया है, अमेरिका जिन मूल्यों के लिये दुनियाभर में जाना जाता है, जाहिर है उसका प्रभाव उसकी संस्कृति, साहित्य और फ़िल्मों में देखा जाना स्वभाविक ही है, सिर्फ़ राजनीतिक अर्थशास्त्र के मद्दे नज़र हालीवुड को खारिज करना शायद बेवकूफ़ी होगी, अमेरिकी हितों से अन्यत्र इस विधा को अभिव्यक्ति के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने का जबरदस्त काम भी यहीं हुआ है, जिसमें मानवीय जीवन के उन पहलुओं को छुआ गया है जिनकी कल्पना भारतीय सिनेमा में शायद अभी संभव नहीं. सर्जन और अभिव्यक्ति के नज़रिये से हालीवुड अपना अहम मुकाम रखता है, यहीं माइकल मूर भी है और यहीं चार्ली चैपलीन, फ़ालिक्स ग्रीन भी थे, पुरुस्कार लेना देना, इनके व्यापारिक और वर्गीय हितों पर निर्भर करता है.
    बारहाल, सोवियत संघ के ज़माने में भी साहित्य के पुरुस्कार दिये गये थे..फ़िल्मों में भी काम हुआ था, पर उसका हश्र क्या हुआ सभी जानते हैं. एक अच्छे लेख के लिये बधाई के पात्र है, रामजी...
    संतोष जी, रामजी की थाईलैण्ड वाली टिप्पणी को १९७०-८० के दशक के परिपेक्ष्य में देखें तभी आप इसकी रुह पकड़ पायेंगे. सेक्स ट्यूरिज़्म को प्रोमोट करके ही उसका असली विकास हुआ है..१९९१ में मैंने इस विषय पर लेख भी लिखा था, ई.पी.डब्ल्यू में इस विषय पर शोधात्मक लेख भी छपे थे, जिनके आधार पर मैंने तब वह लेख लिखा था, आज बदलते वक्त में थोडा बहुत ऊपरी बदलाव वहां आया है, जापानी निवेश आदि से भी हालत कुछ बदली हैं, लेकिन बुनियाद वही है.

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  12. लेख निश्चित तौर पर जानकारी परक है लेकिन कई पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है, थाईलैंड हो या कोई भी देश हम उसे इस तरह संबोधित नहीं कर सकते और दूसरी बात कि हम अमेरिकी फिल्मों और ऑस्कर को आखिर समझते क्या हैं, वो भी एक पुरस्कार है जैसे हमारे यहाँ फिल्मफेयर या राष्ट्रीय पुरस्कारों का तयशुदा पैमाना है वैसे उनका भी पैमाना है और उनके अपने समीकरण हैं. पूरी दुनिया में ऑस्कर का नाम है तो वो इसीलिए है क्योंकि अमेरिका का पुरस्कार है, अब अमेरिका चौधरी है तो उसकी हर चीज की नाम चर्चा तो होगी ही. अमेरिकी फिल्मों के चेहरे की बात हम कर सकते हैं जो उनकी जेम्स बोंड और दुनिया को बचाने वाली फिल्मों में साफ़ ज़ाहिर होता भी है लेकिन ऑस्कर की राजनीती में हम फोरेस्ट गंप, शिंडलर्स लिस्ट जैसी फिल्मों को ख़ारिज नहीं कर सकते,फिल्म फिल्म है, उस माध्यम से निर्देशक को जो बात कहनी है वो ज़रूरी नहीं सारी कसौटियों पर पूरी तरह खरा उतरते हुए कहे, होलीवुड ने बहुत सारी अच्छी फ़िल्में भी हमें दी हैं इसे भुला नहीं जा सकता और ऑस्कर को कोसते हुए हम इस तथ्य को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते

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  13. एक अत्यंत महत्वपूर्ण शोधपरक लेख. मेरे जैसों के लिए एक दम आंख खोलने वाला, इस अर्थ में भी कि अपने रम को तो फ़िल्मों के बारे में इसका सौवां हिस्सा जानकारी भी नहीं.ऑस्कर की चयन प्रक्रिया भी उतनी ही खोट और पूर्वाग्रहभरी, जितनी अन्य अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की. मुझे पता नहीं कि ऑस्कर पाने की आकांक्षा और ग्रंथि और किसी देश में वैसा हीनता-बोध देती होगी, जैसा भारत में. रामजी की मेहनत इस लेख में खूब झलकती है.इसे पढ़कर यह भी लगने लगा है कि वह कई माध्यमों की विशेषज्ञता हासिल कर चुके हैं. बधाई.

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  14. अपने इस आलेख में आस्कर पुरस्कारों और उसकी राजनीति के बारे में रामजी भाई ने बेहतर जानकारी उपलब्ध करायी है। निष्चित रूप से आज हिन्दी साहित्य को ऐसे लेखों की सख्त जरूरत है जिससे हम दुनिया के और पहलुओं से रू-ब-रू हो सकें। मूल रूप से अमरीका द्वारा संचालित इन आस्कर पुरस्कारों से अमरीका के सामा्रज्यवादी मानसिकता की ही झलक मिलती है। इनसे भला हम अन्य देषों के सिनेमा को पुरस्कृत करने की उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं। सही बात भी है हमारे बेहतर सिनेमा की समझ इन्हें हो भी कैसे सकती है।
    और हम इनसे झूठी उम्मीद भी कैसे और क्यों पालें। बेहतर आलेख लिखने और प्रस्तुति के लिए बधाई और आभार।
    santosh chaturvedi

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