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शनिवार, 18 अप्रैल 2015

वंदना और भर्त्सना से इतर आंबेडकर की तलाश

  • संजय जोठे 


हमारे समय में और खासकर आजादी के इतने सालों बाद जबकि राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में बहुत सारा श्रम और समय लगाया जा चुका है, ऐसे समय में आंबेडकर को लेकर बात करना बहुत जरुरी और प्रासंगिक होता जा रहा है. गांधीवाद का सम्मोहन या तो टूट चुका है या वह अपना श्रेष्ठतम दे चुका है. वाम क्रांति और मार्क्सवादी विचार में रचे बसे बदलाव ने भी बीते दशकों ने बहुत करवटें बदली हैं और कई रंग दिखाए हैं. सर्वोदयी या गांधीवादी विचार से समाज निर्माण की कल्पना ने एक प्रष्ठभूमि निर्मित कर दी है, इसी तरह साम्यवादी विचार ने भी एक अन्य ढंग से प्रष्ठभूमि निर्मित कर दी है, इन प्रष्ठ्भूमियों के कंट्रास्ट में अब दलित जागरण और अधिकार का स्वर अधिक स्पष्टता से सुनाई देने लगा है, और इसे नैतिक समर्थन भी मिल रहा है.

इसीलिये इन आंदोलनों और विचारधाराओं के समानांतर स्वयं दलित चिन्तन और दलित राजनीति ने भी स्वतंत्र रूप से अपनी विशिष्ट शैली में अपनी समस्याओं और उनके संभावित समाधानों को केंद्र में रखकर विचारों और आंदोलनों की गहरी बुनाई की है. अब बुनाई को और इसके रचयिताओं को उनकी समग्रता में एकसाथ देखने का समय है ताकि अनावश्यक सम्मोहनों से आजाद होते हुए दलित मुक्तिकामियों की चेतना अपने लक्ष्य तक सीधे और अबाध ढंग से आगे बढ़ सके.

इस संदर्भ में कबीर, बुद्ध, ज्योतिबा फूले और बाबा साहेब आंबेडकर को उनके मौलिक स्वरुप में बचाए रखते हुए प्रचारित करने की सबसे पहली और सबसे बड़ी आवश्यकता है. क्रांतिकारियों और मुक्तिकामियों को महात्मा, महापुरुष और दैवीय चरित्र सिद्ध करने का जो सनातन पाखण्ड इस देश में चलता है, उससे इन्हें बचाए रखने की बड़ी जरूरत है. बुद्ध को तो अब बचाया नहीं जा सकता, बुद्ध को अवतार और भगवान् या शास्ता बतलाकर हिन्दुओं और बौद्धों – दोनों ने आसमान से पर बैठा दिया है जहां अंधी श्रद्धा और भावपूर्ण समर्पण ही पहुँच सकता है. तार्किक और वैज्ञानिक बुद्धि के लिए बुद्ध को लगभग अनुपलब्ध बना दिया गया है. सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि अपने जन्म स्थान को छोड़कर बुद्ध सब जगह पाए जाते हैं लेकिन भारत भर में उनकी कोई सुनवाई नहीं हैं.

कबीर इस अर्थ में थोड़े कम बदनसीब हैं. उनके साथ कोई संगठित धर्म खडा नहीं हुआ और उन्होंने वैदिक प्रतीकों में नए अर्थ डालने का काम करते हुए अपनी बातें रखीं हैं जो कई अर्थों में आस्तिकता का समर्थन करती नजर आती हैं, इसलिए कबीर ने धर्म सत्ता को उतनी चोट नहीं पहुंचाई जितनी बुद्ध ने पहुंचाई थी, इसीलिये कबीर को समूल उखाड़ने का या उन्हें अवतारवाद के दलदल में घसीटकर मार डालने का कोई आन्दोलन इस देश में नहीं चला. लेकिन बुद्ध को इस दलदल में बहुत गहराई में दबा दिया गया है.

लेकिन अब पिछले कुछ सालों में कबीर को लेकर जो बहस चल रही है उसमे इस दलदल के ठेकेदारों की तरफ से हलचलें तेज होने लगी हैं. कबीर को सामाजिक क्रान्ति का पुरोधा न बतलाते हुए एक रहस्यवादी और धार्मिक क्रान्ति का मसीहा बतलाने पर जो जोर दिया जा रहा है उसके गंभीर निहितार्थ हैं. कबीर के नाम पर चल रहे धर्म पीठ और डेरे इत्यादि बहुत गौर करने लायक हैं, वहां एकदम वेदांती ढंग का कर्मकांड और अंधविश्वास शुरू हो गया है.

समाज व्यवस्था के “स्टेटस को” को बनाए रखते हुए तथाकथित धर्म और अध्यात्म की व्यवस्था की आतंरिक भित्ति को बदल देना और “ऊपर कुछ और अंदर कुछ” वाली शैली में जीते रहने का पाखंडी आग्रह इस देश का मौलिक और सनातन रोग रहा है. यह सनातन पाखण्ड की धुरी है. अब इस पाखण्ड में कबीर को घसीट लेने एक नया आन्दोलन बन गया है. कबीर का ब्राह्मणीकरण करते हुए उन्हें रामानंद का शिष्य बतलाना और ब्राह्मण विधवा का पुत्र बताना या करवीर शब्द में कबीर की उत्पत्ति दिखाने सहित उनकी वाणी में प्रक्षिप्तों को ठूंस देना – ये कबीर के जाते ही शुरू हो गया था. आज जिस कबीर को हम जानते हैं वे खुद अपने लोगों के लिए गूंगे बना दिए गये हैं.

यही भय अब ज्योतिबा फूले और अंबेडकर को लेकर है. उनके कर्तृत्व के मौलिक ओज को और उनके विचार व कर्म की बुनियादी प्रेरणाओं और उसके मनोविज्ञान को उन्ही के अपने लोगों से दूर किया जा रहा है. उन्हें किन्ही फेशनेबल बहस का हिस्सा बनाकर पेश करना और उनकी क्रान्ति की असली धार को छुपा देना – ये काम बहुत ही सधे हुए तरीके से चल रहा है. और दुर्भाग्य से दलित और बहुजन समाज के लोग ही इसमें चारा बन रहे हैं. उन्हें ही इस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. आज के पढ़े लिखे दलित वर्ग में धर्म और अध्यात्म के नाम पर जो सम्मोहन बढ़ रहा है वह बहुत खतरनाक और आत्मघाती है इसी सम्मोहन के सहारे अंबेडकर की क्रान्ति को बोथरा किया जा रहा है.

अंबेडकर और ज्योतिबा फूले – दोनों हाल ही में गुजरे हैं, ये भारत के आधुनिक इतिहास के ऐसे क्रांतिकारी हैं जिनके बारे में अभी भी बहुत सरे एतिहासिक तथ्य मौजूद हैं, इन्हें बुद्ध की तरह किसी विष्णु या इंद्र का अवतार बताना संभव नहीं है लेकिन उनकी विचार प्रक्रिया को दूषित करके उसमे चलताऊ किस्म के समाज सुधार और एक कुनकुनी सामाजिक क्रान्ति की मिठास चढ़ाकर उन्हें लकवाग्रस्त किया जा सकता है. और यह ठीक हमारी आँखों के सामने हो रहा है. अंबेडकर जो कि सर्वप्रथामेक आर्थिक चिन्तक हैं जिन्होंने भारत में सामाजिक और आर्थिक शोषण को सबसे अधिक गहराई में समझा और समझाया है – उन्हें सिर्फ और सिर्फ संविधान निर्माता बनाए रखना और इसी रूप में उन्हें पूजने की प्रेरणा देना – यह एक नये षड्यंत्र का अचूक संकेत है. अर्थ जगत में उनकी क्रान्तिकारी प्रस्तावनाओं को या धर्म और धर्म के मनोविज्ञान के बारे में उनके कठोर विश्लेषणों पर पर्दा डालते हुए उन्हें केवल एक राजनीतिक व्यक्ति साबित करना एक तरह से अपराध ही कहा जाएगा. यह एक सचेतन अपराध है इसलिए इसे षड्यंत्र कहना चाहिए. 
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संजय जोठे युवा विचारक और कवि हैं. ज्योतिबा फुले पर उनकी एक किताब हाल ही में दख़ल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है.



बुधवार, 14 अप्रैल 2010

क्या अम्बेडकर दलितों के मसीहा थे?

डा अम्बेडकर

(यह जाने माने विचारक सुभाष गाताडे के लंबे आलेख का एक हिस्सा है जिसे युवा संवाद ने एक पुस्तिका के रूप में छापा है)




एक बात जो लगभग हमारे सहजबोध (कामन सेन्स) का हिस्सा बन गयी है - जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं - जो डा अम्बेडकर के बारे में कही जाती है, कि वह ‘दलितों के मसीहा’ थे। दिलचस्प है कि समूचे राजनीतिक स्पेक्ट्रम में यह बात स्वीकार्य है। अपने आप को उनका सच्चा वारिस घोषित करनेवालों के लिए भी यह बात सुनकर कोई बेआरामी नहीं होती।


क्या उनका यह चित्रण पूरी तौर पर सही है ? या उनको दलितों का मसीहा कह देने से उनके जीवन के तमाम पक्ष छूट जाते हैं और उनकी एकांगी किस्म की छवि बनती है





अगर उनके इस चित्रण को सही मान लें तो उनके लगभग चालीस साला राजनीतिक-सामाजिक जीवन के कई अहम पहलुओं पर चुप्पी साधनी पड़ती है। और यही बात स्वीकारनी पड़ती है कि मनु के विधान की स्वीकार्यतावाले हमारे समाज में - जिसने शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रिायों की विशाल आबादी को तमाम मानवीय हकों से वंचित किया था - उन्होंने अतिशूद्रों के अधिकारों के लिए कुछ संघर्ष किया एवम कुछ रिआयतें हासिल कीं।


फिर इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो जाता है कि
क्या वे स्त्रिायों के अधिकारों के लिए संघर्षरत नहीं रहे या क्या किसानों-मजदूरों की समस्या की ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी, क्या जनता के आर्थिक सवालों से वह बेख़बर रहे या क्या वह शूद्रों-अतिशूद्रों का नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर करनेवाली जाति/जातियों के खिलाफ थे या उस मानसिकता के खिलाफ थे जिसने इस स्थिति का निर्माण किया था ? शिक्षा संस्थानों का जाल बिछाने के पीछे तथा अख़बार-पत्रा-पत्रिकाओं को शुरू करने के पीछे उनका क्या मकसद था ? और सबसे बढ़ कर क्या उन्होंने उपनिवेशवादियों के खिलाफ जारी राजनीतिक आन्दोलन की सीमा को उजागर नहीं किया जिसके लिए उन्हें जोखिम उठाना पड़ा



एक गुलाम मुल्क में उपनिवेशवादियों के खिलाफ राजनीतिक आन्दोलनों के साथ एक सुविधा रहती हैं कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समूचे जनसमुदाय का उन्हें समर्थन प्राप्त रहता है लेकिन बाबासाहेब की अपनी जद्दोजहद का अच्छा खासा हिस्सा समाज की अपनी बीमारियों, परम्पराओं, संस्थाओं के खिलाफ, उपनिवेशवादियों के आगमन से पहले से चली आ रही उस सामाजिक-धार्मिक निज़ाम के खिलाफ था। उनके सामने खड़ी चुनौती को आसानी से समझा जा सकता है जहां उन्हें उन लोगों को भी निशाने पर लेना पड़ रहा था जो खुद साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित थे या उसके विरोध में संघर्ष के लिए तैयार थे मगर जो खुद भारतीय समाज की उस मंज़िलनुमा बनावट के खिलाफ खडे़ होने के लिए तैयार नहीं थे। अपने एक आलेख में डा अम्बेडकर ने उच्चनीचअनुक्रम, शुद्धता एवम प्रदूषण पर टिकी भारतीय समाज रचना की तुलना उस बहुमंजिली इमारत से की थी जिसमें एक मंज़िल से दूसरी पर जाने के तमाम दरवाजे़ बिल्कुल बन्द थे। वे लोग जो जातिप्रथा को श्रम का विभाजन कह कर महिमामण्डित करते थे, उन्हें करारा जवाब देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि ‘जातिप्रथा श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।’


उनके जीवन एवम संघर्ष को सरसरी निगाह से देखने पर पता चलता है कि तमाम शोषितों-उत्पीड़ितों के हालात के प्रति उनका गहरा सरोकार एवम उसको बदल डालने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। और अहम बात जो उनके यहां नज़र आती है वह है राजनीतिक-आर्थिक संघर्षों में या सामाजिक-सांस्कृतिक हलचलों के बीच उनके यहां किसी ‘चीन की दीवार’ की अनुपस्थिति।
( क्या यह कहना अनुचित होगा कि उत्तरअम्बेडकर आन्दोलन में इस सिलसिले का बनाये नहीं रखा जा सका)



उनके जीवन के सबसे पहले ऐतिहासिक संघर्ष को ही देखें जब 1927 में महाड के चवदार तालाब पर सत्याग्रह करने वह पहुंचते हैं (19-20 मार्च 2008) जिसके बारे में मराठी में हम कहते हैं कि जब ‘उन्होंने पानी में आग लगा दी।’ मालूम हो कि महाराष्ट्र के कोकण नामक इलाके के महाड नामक क्षेत्रा के सार्वजनिक तालाब पर हजारों की संख्या में दलितों ने अन्य तमाम समानविचारी लोगों डाॅ बाबासाहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में एक सत्याग्रह किया था। यूं तो कहने के लिए यह महज पानी पीने का हक था लेकिन इसकी विशिष्टता इसी में निहित थी कि सदियों से उच्चनीचअनुक्रम पर टिके, प्रदूषण एवम शुद्धता पर आधारित समाज केे उत्पीड़ित जनों ने अपने विद्रोह का एक संगठित हुंकार भरा था।



इस अवसर पर आयोजित सम्मेलन के प्रस्ताव गौर करनेलायक हैं। प्रस्तुत सम्मेलन में कई सारे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये। जंगल की जमीन दलितों को खेती के लिये दी जाय, उन्हें सरकारी नौकरियां मिलें, सरकार न केवल शिक्षा को अनिवार्य करे बल्कि 20 साल के छोटे लड़कों तथा 15 साल से छोटी लड़कियों की शादी पर भी पाबन्दी लगाये आदि विभिन्न आर्थिक सामाजिक मसलों पर प्रस्ताव मंजूर हुए । सरकार से अपील की गयी वह शराबबन्दी लागू करे तथा मरे हुए जानवरों का मांस खाने पर पाबंदी लगा दे । सम्मेलन में उच्चवर्णीयों से भी आवाहन किया कि वे अछूतों को उनके नागरिक अधिकार दिलाने में सहायता करें, उन्हें नौकरियां दें, अपने मरे हुए जानवरों को खुद दफनायें।



सत्याग्रह के दूसरे चरण में उन्होंनेे शुचिता तथा प्रदूषण के आधार पर उनके अपमान को जायज ठहराने वाले पवित्र कहलानेवाले मनुस्मृति नामक ग्रंथ को भी आग के हवाले किया था। (25 दिसम्बर 1927)



सम्मेलन के अपने शुरूआती वक्तव्य में बाबासाहेब ने प्रस्तुत सत्याग्रह परिषद का उद्देश्य स्पष्ट किया ‘‘ अन्य लोगों की तरह हमभी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है । आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं । .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजारानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी । 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने ‘जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्रा जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा‘‘ उन्होंने अपील की थी इस सभा को फ्रेंच राष्ट्रीय सभा का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए..‘‘ हिन्दुओं में व्याप्त वर्णव्यवस्था ने किस तरह विषमता और विघटन के बीज बोये हैं इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘
समानता के व्यवहार के बिना प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं हो पाता उसी तरह समानता के व्यवहार के बिना इन गुणों का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। एक तरफ से देखें तो हिन्दु समाज में व्याप्त असमानता व्यक्ति का विकास रोक कर समाज को भी कुंठित करती है और दूसरी तरफ यही असमानता व्यक्ति में संचित शक्ति का समाज के लिए उचित इस्तेमाल नहीं होने देती।…‘सभी मानवों की जनम के साथ बराबरी की घोषणा करता हुआ मानवी हकों का एक ऐलाननामा भी सभा में जारी हुआ।



सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गये जिसमें जातिभेद के कायम होने के चलते स्थापित विषमता की भत्र्सना की गयी तथा यहभी मांग की गयी कि धर्माधिकारी पद पर लोगों की तरफ से नियुक्ति हो। इसमें से दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृतिदहन का था जिसे सहस्त्राबुद्धे नामक एक ब्राहमण जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने प्रस्तुत किया था । प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘शूद्र जाति को अपमानित करनेवाली उसकी प्रगति को रोकनेवाली उसके आत्मबल को नष्ट कर उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूती देनेवाली मनुस्मृति के श्लोकों को देखते हुए … ऐसे जनद्रोही और इन्सानविरोधी ग्रंथ को हम आज आग के हवाले कर रहे हैं।’



इस सत्याग्रह के अवसर महिलाओं को दिया गया उनका स्वतंत्रा उद्बोधन काफी चर्चित रहा है। मनुस्मृति दहन के बाद रात में स्त्रिायांे को अलग सम्बोधित करते हुए डा अम्बेडकर ने जोर देकर कहा था:



‘‘ परिवार की दिक्कतें स्त्राी एवम पुरूष दोनों मिला कर ही सुलझाते है और उसी तरह समाज की, दुनिया की कठिनाइयों को भी स्त्रिायों एवम पुरूषों को दोनों को मिला कर ही सुलझानी चाहिए। स्त्रिायां ही इस काम को बखूबी कर सकती हैं, इस पर मुझे पूरा यकीन है। इसके आगे आप को भी सभाओं एवम सम्मेलनों में आना चाहिए।आप ने हम पुरूषों को जन्म दिया है। आप के पेट से जन्म लेना आखिर अपराध क्यों माना जाता है और ब्राह्मण स्त्री के पेट से जन्म लेना पुण्य क्यों समझा जाता है ? ..
स्त्रिायां गृहलक्ष्मी बनें यही हमें क्यों सोचना चाहिए, इसके आगे की मंजिल उन्हें क्यों नहीं पार करनी चाहिए ? ... ज्ञान और विद्या की आवश्यकता सिर्फ पुरूषों के लिए नहीं है वह स्त्रिायों के लिए भी उतनीही जरूरी है इसलिए आनेवाली पीढ़ी को सुधारना हो तो आप को चाहिए कि बेटों के साथ बेटियों को भी शिक्षा दें।स्त्रियों को राजनीतिक-सामाजिक सक्रियताओं में उतारने की, उन्हें अधिकारों से लैस करने की चिन्ता हमें उनके समूचे जीवन में दिखती है।



अगर हम 50 के दशक में नेहरू मंत्रिमण्डल से उनके इस्तीफे पर गौर करें तो क्या वजह समझ में आती है। जहां वे इस बात के प्रति क्षुब्ध है कि अनुसूचित जातियों एवम जनजातियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रति सरकार पर्याप्त गम्भीरता का परिचय नहीं दे रही हैं वहीं वे इस बात को विशेष तौर पर रेखांकित करते हैं कि उनके इस निर्णय लेने के पीछे ‘हिन्दु कोड बिल’ को लेकर नज़र आती सरकार की आनाकानी का मसला अहम था।आखिर क्या था ‘हिन्दु कोड बिल’ ? दरअसल हिन्दु कोड बिल के जरिये आपसी सम्बन्ध विच्छेद एवम जायदाद के मामले में हिन्दु महिलाओं को अधिकार दिए जा रहे थे। सभी जानते हैं कि उसके पहले हिन्दुओं में बहुपत्नीप्रथा कायम थी, यहां तक कि तलाक या सम्पत्ति के मामले में उन्हें कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे। हिन्दु कोड बिल को लेकर डा अम्बेडकर को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह अपने आप में एक रोचक इतिहास है।
स्त्रिायों को अधिकारसम्पन्न कर ‘हिन्दु संस्कृति एव परम्परा को ध्वस्त करने’ की कोशिश करने के लिए कई बार उनके घर पर प्रदर्शन भी हुए। इस बिल को न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध था बल्कि कांग्रेस के अन्दर मौजूद रूढिवादी/सनातनी तत्वों ने भी उनके इस कदम की लगातार मुखालिफत की थी जिसमें अग्रणी थे बाबू राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल आदि।नेहरू मंत्रिमण्डल से इस्तीफा सौंपते हुए प्रस्तुत वक्तव्य में उन्होंने लिखा था:



‘हिन्दु कोड बिल एक तरह से इस मुल्क की विधायिका द्वारा हाथ में लिया गया समाज सुधार का सबसे बड़ा कदम था। अतीत में हिन्दोस्तां की विधायिका द्वारा पारित किसी भी कानून से या भविष्य में पारित किए जा सकनेवाले किसी भी कानून से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।
वर्ग और वर्ग के बीच की गैरबराबरी, लिंगों के बीच की गैरबराबरी - जो हिन्दु समाज की आत्मा है - को अक्षुण्ण बनाये रखना तथा आर्थिक समस्याओं को लेकर एक के बाद एक विधेयक पारित करते रहना, एक तरह से संविधान का माखौल उड़ाना है और गोबर के ढेर पर महल खड़े करने जैसा है मेरे लिए हिन्दु कोड का यही महत्व रहा है। और अपने मतभेदों के बावजूद इसी वजह से मैं मंत्रिमण्डल का सदस्य बना रहा।’



डा अम्बेडकर के जीवन और संघर्षों की व्यापकता जानना हों तो तीस का दशक कई मायनों में अहम दिखता है जिसमें वह सामाजिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर भी नयी जमीन तोड़ते प्रतीत होते हैं वहीं वह राजनीतिक-आर्थिक मसले पर भी एक अलग रास्ता अख्तियार करते नज़र आते हैं