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सोमवार, 22 मार्च 2010

या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ!


अंडमान की ८५ वर्षीय महिला "बोआ बुजुर्ग" जो "बो" भाषा को समझने काअंतिम माध्यम थीं


इस लेख को संक्षिप्त में २ भागो में रखता हूँ, पहली तो "बो" और दूसरा भारत में " हिंदी के समकालीन सरलीकृत साहित्य के प्रति"।

" बोआ " इस नाम से इन दिनों सभी परिचित होंगे, "बोआ" अंडमान के विशेषअंडमानी जाति के आदिवासी समुदाय की ८५ वर्षीय महिला थी, जो बीते दिनोंस्वास्थ्य के चलते विदा हो गई। अंडमान की मुख्य १० भाषाओं में एक " बो " भाषाजो कि मूल रूप से संवाद आदि माध्यमों में ज्यादा परिपक्व थी, बजाय साहित्य के।इस ८५ वर्षीय महिला के साथ यह भी ख़तम हो गई। भाषा वैज्ञानिकों के पास इसभाषा के प्रति बहुत शोध हैं, मगर इसको वार्तालाप के तरीके तक लाने का माध्यमअब नहीं रहा, और अंडमान की बहुत ख़ास भाषा के साथ साथ एक जनजाति भीख़तम हो गई। और तमाम तरह के साधन होने के बावजूद यदि इतिहास कोखंगालेगा भविष्य तो "बो" संस्कृति की पहचान के अवशेष मिलेंगे मगर उन केप्रतीकों को समझने वाला अब कोई नहीं बचा। बस गवाह यह कि "एक भाषा की मृत्युहमारे सामने हुई"

ये वक़्त
वक़्त नहीं मुक़दमा है
या तो गवाही दो
या गूंगे हो जाओ _ चंद्रकांत देवताले

सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में भारत जैसे बहुभाषी देश में, कई बोलियाँ शिकस्त पर चुकी हैंग्रियर्सन और अनेक शोधों के परिणाम स्वरूप बोलियों में घटोत्तरी - बढ़ोत्तरीहो रही है, जिसमें नई मिश्रित भाषाएँ (बोली) तो रही हैं, वहीं पुरानी बहुत सीबोलियों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा हैसीधे कहा जाए कि बहुभाषी देश होने केबावजूद भारत में इतनी विशाल संस्कृतियों, भाषाओं,बोलियों को बचाने के कोईउपाय नहीं किये जा रहे, और ये सब बोलियां हाशिये पर हैं, इनकी संस्कृति से उनलोगो को कोई मतलब नहीं जो अपनी प्रादेशिक या राष्ट्रीय छद्म संस्कृति के लिएतलवार लिए खड़े हैंहिंदी साहित्य में एक नयी पीढ़ी (आमतौर पर) तैयार हो रही है,जिनकी सृजन क्षमता मात्र उनकी अभिव्यक्ति खासकर "प्रेम" पर जाकर समाप्त होजाती हैंइंटरनेट में ही मैं ने कई अनुभवी ४०-४५ साल के लोगों को मूल्यहीन प्रेमकविताओं में अपना समय बांटते देखा है, अपने ब्लोग्स में ये कविताएँ पोस्ट करनेपर टिप्पणी की संख्या देखकर उनकी रचना के स्तर का निर्धारण होता है, औरटिपण्णीकर्ता भी बिना कुछ पढ़े,समझे आत्मीय संबोधनों से रचनाकार को खुश करदेते हैं कि भविष्य में हमारी किसी रचना के प्रति इनके विचार शुभ रहे। औरआलोचना करने पर कविता को " अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कहकर फ़ौरन दामन छुड़ाले जाते हैं। मुश्किल से चंद जगहों पर कविता,रचना की मीमांसा या उसकी खुलकरआलोचना देखने पाती है

उर्दू भाषा में लिखे गए साहित्य में कम से कम ७६% साहित्यवस्ल,राहत,बेवफा,वफ़ा,रुसवाई जैसे शब्दों से अटा पड़ा है,जिसमें,ग़ालिब,मीर,वलीदकनी,आदिल शाह,वाजिद अली शाह, बहादुर शाह ज़फर आदि मुख्य तौर पर सामनेआते हैंइनकी अगली पीढ़ी में ब्रजनारायण चकबस्त (आध्यात्मिक एवं राष्ट्रमीमांसात्मक) ,नज़ीर(लोक रंग), इकबाल (शुरू में रहस्यवादी या सूफी खासकरहाफिज़, सादी और रूमी,राष्ट्र भक्ति, इस्लामिक धारा ), फिराक़ गोरखपुरी (तत्वमीमांसा, दृष्टि योजना, प्रयोगवाद) आदि मुख्य हैं, जो साहित्य की तत्कालीन धाराको प्रभावित करते हैं

हिंदी साहित्य के साथ कम से कम शुरू में ये समस्या नहीं रही मगर अब यहीसमस्या प्रवाह बनकर छा रही है, इलेक्ट्रोनिक मीडिया,अखबार जगत में ये वर्ग इसतरह छाया है कि वास्तव में जो गंभीरता से लिखा जा रहा है वह इस विशालमूल्यहीन साहित्य के नीचे दबा चला जा रहा है


उनका कहना है कि अब कविता मनोरंजन का साधन बन गई है, कैम्पस में जयशंकरप्रसाद, या किसी आधुनिक कवि की समझ से लिखी गई कविताएँ नहीं कुमारविश्वास की श्रृंगार लालित्य से परिपूर्ण कविताएँ सुनी जा रही हैं, और ये लोगो कोपसंद भी हैं, इसमें सवाल कुमार विश्वास पर नहीं, हमारी समझ पर है कि साहित्यको कब तक इसी रूप में स्वीकार करते रहेंगेक्या इस तरह से साहित्य बचा रहसकता है, जो व्यक्तिवादी अभिव्यक्तियो से भरा पड़ा हो, बजाय उस समय केआकलन के

खैर! भाषाई साम्राज्यवाद की परिभाषा में स्पष्ट किया था कि हिंदी का ख़ास रूपसमाज में विकसित होते होते कहीं और जा मिला और साहित्य को तो फिलहाल छोड़ाही जाए, हम प्रेमचंद,शरत चन्द्र,मंटो को पढ़कर बड़े हुए हैं, और अब बच्चे चेतनभगत को पढ़कर युवा हो रहे हैंसवाल ये नहीं कि चेतन भगत को छोड़कर प्रेमचंदको पढना चाहिए, या कुमार विश्वास की जगह कबीर के बीजक को गानाचाहिएसवाल यह कि हम कब तक ये बचकानी हरकतें करते रहेंगे, साहित्य देश कीसंस्कृति,मानसिक चिंतन,वैचारिकता सभी को सामने रखता है, किन्तु ये साहित्यअगर कहीं रखा जाए तो संस्कृति की नहीं, बस किसी व्यक्तिवादी धारणा की पहचानहो सकती हैंइंटरनेट में कई वेबसाईट हैं जहाँ आर्थिक योगदान करके आसानी सेसूची में शामिल हुआ जा सकता हैभले ही आपकी रचनाओं में कुछ हो या होजीतेन्द्र गुप्ता ने एक बहुत उम्दा बात रखी थी, कि "क्या किसी भाषा का अस्तित्वसिर्फ कहानी,उपन्यास,कविता पर टिका हुआ है "? अगर इसका उत्तर हाँ है तोभाषा का अस्तित्व खतरे में हैं, और अगर नहीं तो मैंने " भाषाई साम्राज्यवाद "लेख में पहले ही कह दिया था कि हिंदी भाषा समाज से कैसे विमुख हो रही है, और ये कैसे मिश्रित परिधान पहनकर हमारे जीवन में प्रवेश कर रही है.


यह आलेख ताहम से साभार…

7 टिप्‍पणियां:

  1. सहमत हूँ...किसी भी विषय को चाहें वह विज्ञान से संबधित हो या कला से, सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ होना ही चाहिए.

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  2. निशांत के इस लेख को पढ़ चूका हूँ अशोक जी.....टाइम्स ऑफ़ इंडिया के स्पेशल एडिशन में भी इस पर दिलचस्प लेख है

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  3. हां अनुराग जी मुझे भी यह आलेख अत्यंत ज़रूरी लगा तो ताहम से लेकर यहां लगाया। निशांत जल्द ही जनपक्ष से जुड़ेंगे

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  4. हम्म स्थिति तो सोचनीय है...करीब करीब प्रत्येक भाषा का साहित्य इसी संकट से गुजर रहा है. शुद्ध बंगाली ,मराठी,मलयालम,तमिल कोई नहीं बोल पाता और इन भाषाओँ के साहित्य में भी रूचि नहीं है लोगों की. अंग्रेजी साहित्य का भी हाल ज्यादा अच्छा नहीं. वहाँ भी अब classics कोई नहीं पढता सब लोग Best sellers ही ज्यादा पढ़ते हैं. फिर भी अच्छा साहित्य पढने वाले और रचने वाले लोग हर युग में रहें हैं .भाषा में बदलाव जरूर आ जाते हैं और शायद वह अवश्यम्भावी भी हैं. पर हाँ यह बदलाव खलता जरूर है.
    (भाषाई साम्राज्यवाद वाला लेख जरूर पढना चाहूंगी,अगर संभव हो तो )

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  5. यह बाजार और इसके द्वारा पैदा की जा रही स्थितियां वैसे तो सामाजिक सरोकारों के रास्ते का रोड़ा है लेकिन इनके पोषक शायद यह भूल रहे हैं कि इससे सामाजिक सरोकारों का दायरा बढ़ रहा है और स्थितियां उनके लिए ज्यादा बदतर होती जाएंगी।

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  6. यह बाजार और इसके द्वारा पैदा की जा रही स्थितियां वैसे तो सामाजिक सरोकारों के रास्ते का रोड़ा है लेकिन इनके पोषक शायद यह भूल रहे हैं कि इससे सामाजिक सरोकारों का दायरा बढ़ रहा है और स्थितियां उनके लिए ज्यादा बदतर होती जाएंगी।

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