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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

एक और स्याह दिन


पेशानी पर हल्की सलवटें, चेहरे पर साफगोई, सूती कुर्ता-पायजामा, और आँखों में अजीब सी चमक.. साल 2007 की शुरुआत में डॉक्टर बिनायक सेन से मुलाक़ात हुई थी, रायपुर, छत्तीसगढ़ में। उस वक़्त यह इल्म नहीं था कि मैं इतने बड़े समाजसेवी और डॉक्टर से मिल रही हूँ। यह भी नहीं पता था कि मानव अधिकारों की रक्षा में जुटे इस मसीहा को सलाख़ों के पीछे डाल दिया जाएगा एक दिन। बस, उनको यह कहते हुए सुना था कि नक़्सली समस्या शांतिपूर्ण तरीक़े से सुलझ सकती है- बातचीत और समझौते की बिनह पर। इसी के साथ वो मुस्कुराए और चल दिए। सौम्य-सी वह मुस्कान याद आ रही है। बार-बार। और खून खौल रहा है यह सुनकर कि डॉक्टर सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है। यह जानकर कि उन पर देशद्रोह का आरोप है। - माधवी शर्मा गुलेरी


आज का दिन

काला दिन है,
एक और मसीह को
घसीट ले जाया गया है सलीब तक

इशारा मिलते ही ठोंक दी जाएंगी
उसकी हथेलियों पर कीलें

ताकि उठें न वो हाथ कभी
ग़रीब की मदद के लिए

ठोंक दी जाएंगी कीलें
उसके पैरों पर

ताकि चल न सके वह दूर तलक
किसी मक़सद के साथ

एक और कील ठोंकी जाएगी
गले में ताकि
ख़ामोश पड़े आवाज़ और
चिर निद्रा में चला जाए वह..

आज का दिन काला ही नहीं
शर्मनाक भी है।


6 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा हरगिज नहीं होगा। डाक्‍टर बिनायक सेन की लड़ाई बेकार नहीं जाएगी।

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  2. ऐसा नहीं ही होना चाहिए,,,ऐसा हम होने नहीं देंगे....,

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  3. ऐसा नहीं ही हो तो खून का उबाल कम हो, और भरोसा क़ायम..

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  4. यह सत्ता की बहुत बड़ी गलती है. आने वाला समय यह साबित कर देगा.

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  5. विनायक सेन अब केवल एक आदमी का नाम नहीं रह गया है। वह उस सही और ईमानदार आवाज़ का प्रतीक बन गये हैं जिन्हें सत्ता किसी भी तरह दबाना चाहती है।

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