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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लोकतंत्र की अवमानना- JUCS

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा- JUCS
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी(JUCS) मानती है कि विनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिका की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।

जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकिलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट् मंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्म जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।

बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।

छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा0 सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांडपर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।

हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात की कि वह, बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।

ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि बिनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार बिनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोंपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और बिनायक सेन को रिहा करे।

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS) द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव, विजय प्रताप, शाह आलम, ऋषि सिंह, अवनीश राय, राघवेंद्र प्रताप सिंह, लक्ष्मण प्रसाद, नवीन कुमार, प्रबुद्ध, रवि राव, अरुण उरांव, विवके मिश्रा, देवाशीष प्रसून, दिलीप, पंकज उपाध्याय, विनय जायसवाल, अंशु माला सिंह, शालिनी बाजपेई, शिवदास, राकेश कुमार, तारिक शफीक, प्रत्यूश प्रशांत, मसीहुद्दीन संजरी, संदीप दूबे, महेश यादव, हरेराम मिश्रा।

कार्यालय- 631/13, शंकरपुरी कलोनी, कमता चिनहट, लखनउ उ0प्र0
संपर्क- 09452800752, 09415254919, 09015898445

3 टिप्‍पणियां:

  1. इस बयान में मैं भी साथ हूँ, और भी बहुत से लोग।

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  2. आपकी बात से मैं सहमत हूँ।
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    सदाचार
    नेता की अय्यारी ने॥
    अफ़सर की मक्कारी ने॥
    सदाचार को दिया है-
    गोली भ्रष्टाचारी ने॥

    मलाई
    मंहगाई हरजाई है।
    करती जेब-सफाई है॥
    नेता उस पर क्यों बोले-
    उनके लिए मलाई है॥

    लोकतंत्र
    मैंने जिसको वोट दिया।
    उसने कर विस्फोट दिया॥
    मौका पाया लोकतंत्र की-
    गला जोर से घोट दिया॥

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