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रविवार, 1 मई 2011

चाकलेट डे और वेलेंटाइन डे के बीच लेबर्स डे!



मई दिवस पर जनसंदेश टाइम्स के लिए लिखा गया एक आलेख 

सपने कभी नहीं मरते ...

चाकलेट डे से लेकर मदर्स डे तक मनाने वाले हमारे समय में मई दिवस एक असुविधा की तरह है. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अमेरिका में मज़दूरों के ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान घटी हेमार्केट की घटना के  बाद से ही पूरी दुनिया के मज़दूरों द्वारा मनाये जाने वाला यह दिन तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी इतिहास और वर्तमान के पन्नों से मिटाया नहीं जा सका है. विडम्बना यह कि उसी अमेरिका द्वारा सरकारी तौर पर इसे १९५८ में ही ‘स्वामिभक्ति दिवस’ घोषित कर दिए जाने के बाद भी वहाँ के मज़दूर इसे ‘अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस’ के रूप में ही मनाते हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं कि कुछ बदला ही नहीं. १८८६ से अबतक दुनिया भर की नदियों में बहुत पानी बह चुका है. कभी दुनिया के आधे से अधिक हिस्से पर लहराने वाला मज़दूर का झंडा अब लगातार सिकुडता जा रहा है और पूंजी के प्रपंच के आगे मज़दूरों के अधिकार और शोषणमुक्त समाज का स्वप्न न केवल कमजोर पड़ा है बल्कि इसे मुख्यधारा की मीडिया ने यूटोपिया से प्रहसन में बदल दिया है. ऐसे में २०११ में मई दिवस की बात करते हुए यह देखना उचित होगा कि आखिर आज दुनिया का कामगार कहाँ खड़ा है और आने वाले समय में समानता के उस महास्वप्न के लिए कितनी जगह बची है जिसे कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों ने ही नहीं बल्कि दुनिया भर में शोषण के चक्के के नीचे पिसती आम जनता और उनसे सहानुभूति रखने वाले तमाम बुद्धिजीवियों ने भी जिसकी अपने-अपने हिसाब से रूपरेखा बनाई थी. यह भी देखना रोचक होगा कि उस समय से अब तक यह परिदृश्य कितना बदला है और क्या उस दौर के  मज़दूर और आज के मज़दूर में कोई समानता बची भी है?

बीसवीं सदी के पहले पचास साल समाजवाद के साल थे. पेरिस कम्यून से पैदा हुआ मज़दूरों के राज्य का स्वप्न १९१७ में सोवियत संघ में लेनिन की अगुआई में समाजवादी राज्य की स्थापना के साथ पहली बार मूर्त रूप में दिखाई दिया. तमाम विपत्तियों और देश के बाहर-भीतर के तमाम दुश्मनों से लोहा लेते इस देश ने दुनिया को दिखाया कि पूंजीवादी लोभ-लालच वाली गलाकाट प्रतियोगिता की जगह मजदूरों की समाजवादी प्रतियोगिता और समर्पण से एक बेहतर भविष्य और वर्तमान बनाया जा सकता है. तीसरे दशक की महामंदी के दौर में जब पूंजीवादी विश्व में त्राहि-त्राहि मची थी तो सोवियत संघ न केवल सामान्य था बल्कि प्रगति के नित नए सोपान चढ रहा था. इस समाजवादी विकास ने दुनिया भर की मेहनतकश जनता के साथ-साथ पूंजीवादी विचारकों को भी आकर्षित किया था. सोवियत संघ के बाद १९४९ में चीन और फिर हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम और फिदेल कास्र्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा में क्रांतियां हुई. इसके अलावा दुनिया के लगभग हर देश में कम्यूनिस्ट पार्टियां तथा कामगार यूनियनें मजदूरों के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली प्रमुख तथा ईमानदार ताकतों के रूप में उभरीं. कभी केवल बौद्धिक बहसों के लिए महत्वपूर्ण माना जाने वाला समाजवाद का यूटोपियाई विचार अब दुनिया के सामने एक हकीक़त के रूप में मौजूद था. इसका असर यह हुआ कि धुर पूंजीवादी देशों को भी अपने कामगारों को सुरक्षा और अधिकार देने पड़े. ‘मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद’ और ‘कल्याणकारी राज्य’ जैसी अवधारणायें एक तरफ इस दबाव का नतीजा थीं तो दूसरी तरफ पूंजीवादी राज्य के अमानवीय और अकल्याणकारी होने का स्वीकार भी. विकल्प की स्थापना हो चुकी थी और अब सवाल था इसे दीर्घकालिक बनाने और जनता के लिए एक वास्तविक जनता के राज्य को लगातार और बेहतर बनाते जाने की. लेकिन समाजवाद के ये पहले प्रयोग इन चुनौतियों पर खरे नहीं उतर सके. अपने समय में महानतम सफलताएं अर्जित करने वाले तथा उत्पीडन और दमन के खिलाफ तीव्रतम संघर्ष चलाने वाली ये व्यवस्थाएं कालान्तर में बिखर गयीं. सोवियत संघ में यह बिखराव भौगोलिक स्तर तक हुआ तो चीन आज एक समाजवादी नाम के बावजूद पूरी तरह से पूंजीवादी राज्य में तबदील हो चुका है.

असल में आपातकाल में बेहद सफल रही ये व्यवस्थाएं सामान्य परिस्थितियाँ आने पर अपने-आप को उनके अकुरूप ढाल नहीं सकीं. बीसवीं सदी की ये क्रांतियां पिछड़े हुए सामंती समाजों में हुई थीं और उन्होंने उन समाजों का अप्रतिम आधुनिक एवं औद्योगिक विकास किया तथा उन देशों को दुनिया के सबसे विकसित देशों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जिन पद्धतियों और राजनीतिक-सामाजिक सरंचनाओं ने जन्म लिया वे ही अंततः इनके पूंजीवादी रास्तों पर लौटने का कारण बनी. मज़दूर सारी सुविधाएँ तो पा गया लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया से उसकी दूरी बनी रही, वह श्रम का आपूर्तिकर्ता तो बना लेकिन वह उत्पादन और सत्ता का निर्णायक नहीं बन सका. सर्वहारा की प्रतिनिधि के रूप में कम्यूनिस्ट पार्टियों की जकडबंदी मज़बूत होती गयी और सर्वहारा की तानाशाही धीरे-धीरे पार्टी और फिर पार्टी प्रमुख की तानाशाही में तबदील होती चली गयी. कम्यूनिज्म के नाम पर भी सत्ताओं ने दमन और हत्याओं के तमाम पाप किये और एक समय दुनिया की उद्धारक माने जाने वाली विचारधारा कटघरे में खडी हुई. वैसे इस सन्दर्भ में साम्राज्यवादी मीडिया का भयावह दुष्प्रचार और अमेरीकी सत्ता तंत्र का सी आई ए के माध्यम से संचालित कम्यूनिज्म विरोधी अभियान भी दुनिया भर में वामपंथ को बदनाम करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है, लेकिन दुश्मन से भलमनसाहत की उम्मीद कौन करता है? जिम्मेदारी तो दोस्तों की थी.

लेख की सीमाओं के चलते इस मुद्दे की और गहराई में जाना संभव नहीं लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक के आते-आते यह महास्वप्न खंडित हुआ और पूंजीवाद दुनिया भर में एक प्रभावी सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक विचार के रूप में स्थापित हो गया. परिणाम यह हुआ कि पूरी दुनिया में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत निजीकरण-उदारीकरण की संरचनात्मक समायोजन की नीतियां अपनाई गयीं. कामगारों के अधिकार ही कम नहीं किये गए अपितु उनके प्रतिरोध को भी नियंत्रित करने का पूरा दुष्चक्र रचा गया है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारी फिल्मों में देखा जा सकता है जहां सत्तर के दशक में आदर्श नायक होने वाला मज़दूर नेता अब एक विलेन में तबदील हो गया है. एक तरफ आदिवासियों और किसानों की ज़मीनें छीन कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही हैं तो दूसरी तरफ ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं जिनसे कामगारों को अपनी मर्जी से कभी भी काम से निकाला जा सके. हडतालों-प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है तो दूसरी तरफ कामगारों के आन्दोलनों को पूरी बेरहमी से दबाया जा रहा है! और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि इसे लेकर समाज और राजनीति में एक स्वीकार की बेशर्म चुप्पी है. वर्षों के संघर्ष और असंख्य बलिदानों से हासिल किया गया आठ घंटे के काम का अधिकार देखते-देखते छीन लिया गया और कहीं कोई प्रतिरोध सुनाई नहीं दिया. अन्ना के मामले में सक्रियता की हदें तोड़ देने वाला मीडिया दिल्ली की सडकों पर लाखों कामगारों के हुजूम को अनदेखा कर जाता है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिम है कि मई दिवस केवल एक उत्सव बन कर रह गया है?
इस सवाल पर सोचते हुए मुझे विजय गौड़ के हालिया प्रकाशित उपन्यास फाँस का एक दृश्य याद आता है जहां साफ़-सुथरे कपडे पहने ट्रेड युनियन कर्मियों का एक जुलूस सड़क से गुजर रहा है और दिहाड़ी मजदूर, सफाईकर्मी और दुसरे गरीब लोग मजदूर एकता के नारे लगाते उन लोगों को थोड़ा आश्चर्य और थोड़ा व्यंग्य से देख रहे हैं! दुनिया के मज़दूरों को एक होने का आह्वान करने वाले कामगार एक ही फैक्ट्री या दफ्तर में अलग-अ क्या इन दोनों में कोई वास्तविक एकता है? पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली ने कामगारों की जो तमाम श्रेणियाँ पैदा की हैं और दुनिया के मज़दूरों एक हो का आह्वान करने वाली ताकतें एक ही फैक्ट्री या दफ्तर में अलग-अलग खांचों में बाँट दी गयी हैं.  क्या उन सब को आपस में बाँधने वाली कोई डोर है? अगर मार्क्स की माने तो निश्चित रूप से है. इन सब के पास बेचने के लिए बस अपना श्रम है- मानसिक या शारीरिक! आज बड़े पॅकेज पाने वाला प्रोफेशनल अपने आप को भले मजदूर न माने लेकिन जब मंदी के संकट के दौरान मालिक के मुनाफे में कमी आती है तो छंटनी की तलवार उसकी गर्दन तक पहुंचती है. हमें यह समझना होगा कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल गयी है लेकिन आज भी दो ही वर्ग हैं – पहला जिसके पास उत्पादन के साधन हैं और दूसरा जो अपना श्रम बेचता है. ज़ाहिर है कि जब तक ये दो वर्ग रहेंगे इनके बीच अंतर्विरोध भी रहेगा ही.  अपनी तमाम कमजोरियों और बिखराव के बावजूद इस अंतर्विरोध के चलते आज भी कामगार दुनिया भर में सड़क पर उतरता दिख जाता है. पिछले दिनों पेंशन सुधार जैसे मुद्दे पर अगर हमने यूरोप की सड़कों पर कामगारों का हुजूम देखा तो अपने देश में भी भयावह उत्पीडन के बावजूद बस्तर से बम्बई तक किसानों-कामगारों के संघर्ष दिखाई दे रहे हैं. यह सच है कि देश-दुनिया में कामगारों का नेतृत्व करने वाली ताकतें न केवल कमज़ोर हुई हैं बल्कि विभ्रम का भी शिकार हैं लेकिन यह भी सच है कि इतिहास में ऐसा दौर पहली बार नहीं आया है.

मई दिवस इसी रूप में कामगारों के उस लंबे ऐतिहासिक संघर्ष को याद करने तथा उनसे सीखकर अपने समय में संघर्ष तथा क्रांतियों के नए संस्करण खड़े करने के संकल्प को मज़बूत करने का दिन है. चुनौती जितनी मुश्किल है उतनी ही ज़रूरी भी. सामंतवाद को हराने में हज़ार वर्ष लगे थे, पूंजीवाद की उम्र तो अभी महज डेढ़ सौ साल है. अपराजेय लगने वाली यह व्यवस्था निश्चित रूप से पराजित की जा सकती है बशर्ते जनता की आँखों में इस व्यवस्था की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक और प्रगतिशील व्यवस्था का स्वप्न दिया जा सके. उसे बताया जा सके कि इससे बेहतर समाज बनाया जा सकता है जहां अधिक शान्ति होगी, अधिक समृद्धि और इन सबके साथ बराबरी भी. अगर हम यह कर पाए तभी मई दिवस को उसका खोया हुआ गौरव दिला पायेंगे.

2 टिप्‍पणियां:

  1. ट्रेड यूनियन(संगठित ,असंगठित दोनों ) आंदोलन की मौजूदा चुनौतियों और मुद्दों पर थोड़ा और लिखते तो अच्छा होता ...लग रहा है कुछ और बातें होनी चाहिए.इसलिए नहीं कि रिवाज़ है ,इसलिए कि आलोचना, आत्म विश्लेषण की ज़रूरत है.अब जबकि नयी आर्थिक नीतियों ने तबाही के बीस बरस पूरे कर लिए हैं और यह एजेंडा अपने चरम पर है , आपके और तीखे विश्लेषण का इंतज़ार है.

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